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Full text of "Krityaratnakara"

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वुत्यरत्नाकरः । 


मद्धासान्धिषिग्रद्दिक-श्रौ चर्डेरटक्तंरविरचितः | ¦ 


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रसगुणभुजचन्दः सभ्धिते कवे 
खसि धवलपक्ते वामतो सिन्धुतोरे । 
चटित तुल्लितसुचैरात्मना ख णरा 
निधिरखिल्गुणानासुत्तरः सोमनाथः ॥ 


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काप्यन्तः पारिजातं कंचिदपि च दघदोषयारोविसुक्तः | 
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विष्णव्यासखादिवाक्वस्पा र दब्टतमयः छत्यरलाकरोऽयं ॥ 
यस्तन्न किञ्चिदपि शसति कामधेनु 
येचेष्टमल्पमपि कलर्पतरूने दन्ते | 
धत्ते न गन्धमपि कश्चन पारिजात 
स्तत्‌ सव्वेमेष विविनक्ति नयप्रवौ एः । 


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भूमिका । 


मैथिलभूसुरस्य चण्डन्र्स्य छलतिः छ्यरनाकसोऽयमेतत्‌कोविद- 
प्रणत स्छतिनिबन्धरनाकरान्तमेतः पथमो ग्रस्थः । म्रग्थास्म्भे च ग्रथकार- 
प्रदत्तपरिचयेनेवं ज्ञायते यथाऽस्य पितामद्यो देवादित्यो मिधिलाधिपते- 
छ रिसिंहृदेवस्य सान्धिविग्रहिक असीत्‌ तदनु तत्तनयो वौरेखर्ठकतरो- 
ऽख भरिता तदेव पदमलङ्कतवान्‌ तदनु च वौरे-खराङ्जनिरसौ चण्डेचर- 
ठक्लरसदेव पिटयेतामह्नं पदं खगुगेरधिरुसो ड । 
सान्धिविय्द्िकच्ण्डेखरठकरो नेपालभूपतिं विजितवान्‌ । भगवतः 
पश्ुपतिनाथस्य च नेपालराजेतरछतपूजायामङ्गस्प्रशेनं तदुपज्ञमभूत्‌ । यञ्छ 
नेपाले खोपजौव्यथूयतें रि सिं देवस्यादयं प्रचत्वं संस्थाप्य बद्॑खाग्र- 
हारान्‌ ब्राद्यणसार्‌ छत अभिरामएरे च विश्यालं सरो निभ्भायाच्तयां 
कौत्तिमरच्त्‌ ॥ । 
गोडौय घम्भव्यवस्थापक रघनन्दनभट्भाचाय्येमादेभ्योऽयं निबन्धकारः 
पूव्वेलनः, तच्निद नश्च यदमौ रघनन्दनभट्राचाय्थाः खी यादटारविंश्रातिततत्वेषु 
बङषु स्थानेषु चण्डेखरौ यरनाकर मतसुपषजयेव्यतया द्रिंतवन्तः । अन्य- 
चासौ लच्तणसेनसभास्ताराणं हलायुधमादानां परवर्ती यस्मादनेन 
खग्रसे तेषां वच्वांसि प्रमागत्वेनावतारितानि दृश्यन्ते । चण्डेरः कदा 
मिथिलामलङ्कतवान्‌ तच्च सम्यक्‌ तत्िपित रुवावगम्यते खसियाटीक 
सभालुमतविज्ञोधिकायामेतद्ुन्थकततैविं वादरलाकरास्य मन्यत्‌ एकं मुडित- 
माक्ते तदुम्योपसं हरे ग्रभ्कर्तैरेवं परिचयो लभ्यते यथा 
रसगुणसुज चन स्मिते शाकव्षे, 
सहसि धवलपच्े वाम्मतौसिन्धृतौरे । 
अदित तुलितसुचेरात्मना खर्शराशिं 
निधिरखिलगुणानासुत्तरः सोमनाथः 


311 81225 ©. 


खतेनेतल्ममाणितं यथाऽयं वट्शतवर्ष॑ूर््व वत्तौ खदटौय चतुद ण- 
शतानब्दौयः। विवादर्न्लाकरसम्पादकोऽप्येतत्रमाणसुपजौव्य वट्धिंश्‌- 
दधिकदाद शश्रतश्राके ग्रन्यकन्तैस्त॒लाघएरषदानमङ्गैकत्य णवमेवास्य समय- 
मवधारितिवान्‌। परन्तु मदौयबास्यबन्धुविनोदषिद्धाटिषिद्याविनोद- 
खग्डेनर कालपरिचायकं निभ्नोक्तं महाजनवचच् प्रदाय उपल्लतवान्‌ । 
तेन चापि वचसा तदेव समर्थितम्‌ । यथा-- 


ष्षटौय चतुविगत्यधिकचयोदशशततमे संवत्सरे दौल्लौश्वरस्य 
गौयासद्िन्‌तोगलगव्राह्ादूरस्य सैन्यैः संघे प्राप्य पराजितो मिधिला- 
 धिषतिद्रिसिंहदेवो नेपालमाशितवान्‌ अस्यैव मन्त्रौ रनाकर छचरडेन्र- 
दक्र आसौत्‌ | (7706880 @€्५। 3642115 ` प्र5ऽप्०एङ 0 प्िलष् 
2१ ॐप्र"ठपा२१४६ 419००११8.) इति 

सतरामसौ चरडे्रठक्ुरो रघनन्दनभटाच्ेभ्यः साङदिशत 
धर्षतोऽग्रवत्तौ द्दौय चतुद श्रतान्दीयो मैधिलो शधम्भव्यवस्थापकः। 
हरिसिंहदेवस्य मे थिलभूपतेः सान्धिविय्रहिकश् ¦ यस्थारम्मे च ग्रन्यकर्ना 
यत्‌ प्रलोकदयं धिरचवितं तेनेवास्य कवित्वं ग्ग्यस्य च कामधेनुकाल्यतस- 
पारिजातानां निबन्धानामनुवत्तित्वं कचित्तभ्यो वैश च्छञ्चावघाय्येते । 


विश्नाणः कल्यदृच्तं क्वचन परिसरे कामधेनुं दधानः 
क्राप्यन्तः पारिजातं क्रचिदपि दघद्योषयादोषिसुक्तः। 
खौमचण्डेनघरेण स्प्रतिनिगमविदा तन्धते तेन तद्द्‌ 
विष्णुव्यासादि वाक्चस्छरदम्टतमयः छत्यरनाकरोऽयम्‌ ॥ 
यस्मिन्न किञ्चिदपि एणंसति कामधघनु- 
येचेषटमल्पमपि कल्पतर्न दन्ते | 
चत्ते न गन्धमपि कच्चन पारिजात- 
तत्‌ सव्वेमेव विविनक्ति नयप्वौखः ॥ 
प्लोकदयेनास्य कवित्वं ग्रन्यस्यापि कस्यतर्प्रभ्टतिनिबन्धालुसारितवं 
तेभ्यः बवे शिच्छच्च सम्यक्‌ व्यज्यते । 


९8174 0. 3111 


ग्रेऽस्मिन्‌ दाविंशतितरङ्गा विनिर्दिदाः ते कारडचंभमभिव्यज्यते । 
तच पथम घम्भनिरूपगतरङ्ो दितौयखख परिभाषातरङ्गेऽप्लीतिपवैः 
परिसमाप्तः ददन्तु प्रथमं काण्डं। ततः सामान्यमासतरङ्सद्हित 
दादग्रमासौय द्रादश्रतरङ्गात्मकं हितौैयं काण्डं सश्यधिकयच्चग्रतपतैः 
समपितं । हतौयच्च काण्डं मलमास संकान्ति ग्रहय प्रव्धेकवारविध्य- 
मावस्यात्रततिधिवेधात्मकं चत्वारिं श्रदधिकषट्णतपतैः सप्ततरङ्घैः परि- 
समापितम्‌ । 


ग्रन्थस्यास्य सम्पादने यानि चत्वार््याद शं एस्तकान्य॒पलब्धानि तेषु 
क-चिद्ितं णुसियाटौकसोसाद्रटौतः, दितौयं ख-विदह्ितं बारवङ्- 
राजकोचपुखकागासात्‌, टतरौयं ग-चिद्धितच्च गव्॑मेन्टषुस्तकालयात्‌, 
चतुरश्च घ-चिदधितं लण्डनस्थेणडिया अपिषनामकपुस्तकालयात्‌ संग ्यैत- 
मासौत्‌ । पएसकचतुटचेषु ग-चिदितमनेकचर खण्डितिमपि सुषिशुद्धम्‌ । 
तच्च द्ानवव्यधिकदिश्तस्रम्मितलच्तणसंवत्छरे लिखितमिति यपरातन-+ 
माद शेएस्तकम्‌ । कचित्‌ क्षचित्‌ मूलएस्तकपाठोऽपि निन्ने पदत्तः । 


अन्यानि च यानि एराणसंहितादौनि मूलघुस्तकानि रख्तत्‌- 
सम्पादने परयोजनौयतया उपलब्धानि तानि सर्व्वाख्येव रसियाटीक- 
सोसादृटो एस्तकागारात्‌ मिलितानि । 


स्याञ्च अदेश्रेन ममेतत्‌ प्राचौनपुस्तकसम्धादनकन्तत्वं सञ्जातं 
परिशेषे तामेसियाटौकसोसाद्टौसभां प्रति सबङ्छमानं क्तक्ततां 
प्रदण्रेयामि। 


ओ्रौकमलछष्णस्मतितौधैः । 


भाटपाड़ा, नट्चत्वारिणदधिकादादशश्रतशकभैय 
१० कात्तिक । ,. चान्नकात्तिकस्य दशमदिवसे । 
१८४६ पराके | 


छत्यरन्ाकर-विषयद्ष्चौ । 


अगस्त्या घेदानम्‌ ... 
अभिपरोत्ता 
अनन्तत्रतम्‌ 
अनन्तटतो यात्रतम्‌ 
अनन्तपफलसप्तमौ ... 
अनोदनासप्तमौ ... 
अपराजिताविधिः 
अभिषेकः 


अवियोगत्रतम्‌ 
अमावस्यातरङ्कः ... 
अ गर्तकार्तघम्भः ... 
अशून्य ग्र यनत्रतम्‌ ... 
अरटकाश्नाद्धम्‌ 
अर्द श घान्यानि 
आदित्याभिसुखविधिः 
 अलेख्यनागपञ्चमो 
आश्िनक्षवयम्‌ 
अषाठ्क्रत्यम्‌ 
इन्द्रपूजामन्लः 
उत्थानदादण्यी 
उपवासादिपर्भाषा 
उभयनवमो रतम्‌ .. „ 


उभयसप्तमौत्रतम्‌ 


41 
२९8 
२३८ 
८६४९ 
र्‌ 
२७९६ 
९२९ 
२९५ 
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१९ । उमामाहेश्चरत्रतम्‌ 


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रकानङ्कपूजा 
चअषधिगणः 
कटुारकपूजा 
कनकपरिभाषा ... 
कमलसप्तमी 

करं जापमन्तः 


कान्तारदौपदानविधिः 
कामव्रतम्‌ 


काम्यानि 
कात्तिकलछत्यम्‌ 
कुन्तयुजा 
कूम्मदादगौ ... 
छष्णद्ाद शोत्रतम्‌ ... 
छष्णादधमोत्रतम्‌ .. 
कमपूजा 

खञ्जनद शनम्‌ 
खङ्गपूना 
गजारकपूजा 
गौड़वाक्यम्‌ 
गौरौपूज्ा 
यहगनिणेयः 
ग्रडगल्ानम्‌ 


| चनत्राकादिपूजा 


चेचमासङ्लत्यम्‌ 


धुः पं 
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्चयुजा 
कुरिकापूजा 


जन्मतिधिक्लत्यम्‌ ... 


जघपपरिभाषा 
जयन्तौसप्तमौ 
जलधेनुदानम्‌ 


(~ 
ज्येषलत्यम्‌ 


ताराराचितव्रतम्‌ ... 
तिथिनच्तचदेवतापुजा 


चिगतिसप्तमौ 


चितयप्रदासप्तमो ... 
दद्टोड्धरणपच्चम्म .. 


. दौपपरिमाषा 
दुन्द्भिपूना 
दुर्गात्रतम्‌ 
दुर्गारययाचा 
टर्व्वामौत्रतम्‌ 
देवग्रदहभ्रूमाविधिः 


व्रव्यगणपरिभाषा ... 


घनुः्घूजा 
घम्भविषेषः 
दचपपरिभाषा 
नक्कयरिभाषा 
नच्तचद्‌ानम्‌ 


नच्तचपरुषत्रतम्‌ .... 


नवान्नन्राच्ताभच्तय- 
विधिः 
नन्द्‌ात्रतम्‌ 


नरसिंददादण्ौ ... 


२५५ 
२५२ 
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६र्‌ 
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२९९ 
२४८ 
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७७ 
५७ 
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२० 
५२८ 


( उष} ) 


षं 
९२ | नागपञ्चमौ 
९६ । नानाद्‌ानं 


२ | नामसप्तमोत्रतम्‌ ... 
९५ | निमित्ततोघम्भः 


२० ¦ नौराजनविधिः 

६ | पञ्चरतानि 

७ पताकायूजा 

६ | पद्मकयोगः 

२४ | पद्मनाभदादश्रौत्रतम्‌ 
५ | पविचारोदणम्‌ ... 
९० | परिभाषा 
२० । पव्वज्लव्यम्‌ 

५ | एचकामत्रतम्‌ 

४ | पौषमासल्लद्म्‌ ... 
९२ | प्रकौगेल्लत्यम्‌ 
१८ | प्रतिनिधिपरिभाषा 
द | प्रतिमासपूजा 

१२ | प्रमाणतो घम्भः 

९९ | परलतोघभ्भः 

१९० | फाल्युनमासक्लव्यम्‌ 
७ | वराददादणशौ 

९ | वरूगूना 
९५ | वम्भपूना 
९० | वासुदेवद्‌ानानि “." 
१६ | विजयदादण्यौ 

२ | बुडधदादशोत्रतम्‌ ... 

ब्रतचिन्ता . 

९५. | त्रतचघम्भः ००. 
५ | तव्रतादितिधिवेधव्यवस्धा ईद 
९८ | भत्तदादृशौत्रतम्‌ ." 


२७द्‌ 
५६० 
९२४ 
४१ 
२२२ 
७१. 
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५४ 


श्रद्‌ 


भल्लत्यम्‌ 
मौद्मतपेशम्‌ 
भेरवोत्यत्तिः 
मघाचयोदणष्र 
मतव्छखद्ाद शोव्रतम्‌ ... 
मदनद्वादश्नौत्रतम्‌ ... 
मलिक््ञचनियंयः ... 
मदहाकौश्िकमन्लः 
महाजनपरिगश्दौत- 
वाक्यानि 


महहिषौदनविधिः 
मडेशरदानानि 
माघल्लत्यम्‌ 
माघौसप्तमी 
मानपरिभाषा 
मागेमासज्ल्म्‌ .... 
मासपरिस्ितिः ... 
सू त्तिषूजाव्रतम्‌ 
योगौखरधरणौ- 
दाद्‌श्ोत्रतम्‌ 
रसकल्याणिनौत्रतम्‌ 
राघवदाद शोत्रतम्‌ . 
रेवन्तपुजामन्लः 
लच्छौपूजामन्ः 


वारदानम्‌ 


ˆ २५४ 


५०९६ 
२८८६ 
२९५ 
४६२ 
"१.२५ 
५३६ 
२५२ 


९२६ 
९२७ 
९९४५ 
९६६ 
९८७ 
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५७१ 
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विष्णश्ाङ्गरत्रतम्‌ ... 


वैश्ाखतरङ्कः 
पाङ्धुषूजा 
श्कारासप्तमौ व्रतम्‌ 
शाकसप्तमौनतम्‌ ... 
णान्तिपञ्चमौत्रतम्‌ 
शिवचतुदेशौत्रतम्‌ 


शिष्परिग्दयीत- 
वाक्यानि 


शिवर्थयाचा 
शौय्धेत्रतम्‌ 
शआवणक्त्यम्‌ 
वट्तिलौषिधिः 
षष्टो कल्यः 
संकान्तिनिणेयः 
सप्तघान्यानि 


सप्तोषधिगणः ... 


सर्पाभयपञ्चमौत्रतम्‌ 
स्वगन्ध 
सव्वंघातुगणः 
सव्वरलगणः 
सव्वैरसः 


सान्व॑भौमदाद श्रौत्रम्‌ 


सौतापूजा 

सिंहासनयूजा 
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खय्थदानानि 


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स्य्येत्रतम्‌ 
खग्धधूजा 
सोमत्रतम्‌ 
सौभाग्यश्चयनव्रतम्‌ 
सोभाग्त्रतम्‌ 


४७५ 
५०४ 
२.६६ 
९९ 
५२ 


( रणए ) 
प 
१९ | खन्द्षष्धे ` 
२ | खान्द षष्टोत्रतम्‌ 
९७ | दिमपुजा 
€ | देमपरिभिाषा 
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४१५ 
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४७९ 

१९ 


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कुत्यरत्नाकरः। 
न्य 
मं गणपतये नमः । 


हपेव्यालोलमूकद्रवदमरघुनो वारिधाराभिषेका- 

दिख्रान्ते लोचनाग्नौ विगलितभिरिजासम्भमादस्तवित्ना। 

देयादनदुरो चिर्विरचितकवरोकुन्दमालानुकारा 

सावः ज्रेधांसि गौरोवदनसरसिजे शाङ्रो ङ्गलोला ॥ १। 
वेददुमं सुक्लतसत्‌फलसुचशाख- 
सुक्ञासयन्रधिपयो निधिमौनमूत्तिः । 
मूमण्डलोद्रणकश्मटकूश्मरूपो 
देवः शिवं दिशतु विश्ठजनोनवत्तिःः ॥ २। 

यस्प्ाददहिकसुज्चलं प्रभवति रेयस्तथासुशिकं 

विश्वं छतस्नसुदित्वरं समभवद्यस्य प्रभावादिदम्‌। 

यस्मित्राचरिते सुवन्तिः क्तिनः कोषः अुतेर्यौ महान्‌ 

यः सन्धारयति त्िलोकमखिलं धश्माय तस्मे नमः.॥ २॥ 


(१) ठ-मौलि। (२) ५--सून्तिः | 
(३ स्फरन्ति 


सत्यस्लाकरः | 


रस्ति ओीदरसिंहदेव ट पतिनिःगेषविद्धेषिणां 
निर्माधो निधिलां प्रणासदखिलां काणांटवंशोद्धवः । 
आशा; सिच्चति यो यशोभिरमलेः पौयूषधारोडवे"- 
देवः शारद शब्वरोपतिरिवाशेषश्रिय्भावुकः ॥ ४ ॥ 
अस्मिन्‌ दिश्विजयोद्यते बलभरात्‌ कुनौभवद्धिः फण 
रन्योन्यं निविडं मिलद्भिरभितः शेषः सहखरेणए सः । 
गच्छत्यम्बुजवान्धवे दिनपतौ प्रल्यक्पयोधैरधः 
सद्यः-सङ्चदनकरक वपुःसाटश्यमालम्बतः ॥ ५ ॥ 
ष्मा माः खेदं भजष्वं जलधिसुपगते बान्धवे पड्जाना- 
मन्तः पञ्चेषुरोषव्यसनभयशचश्चक्रवाका वराकाः | 
खोमत्‌-कार्णटभूमौपति-सुक्वयमरेः प्रीणयनत्रय लोका- 
नेष प्रौदृप्रतापद्युमणिरुदयिनौं सम्पदं सन्तनोति ॥ € ॥.. | 
एतस्याङ्तसनिविग्रहष्राात्रं पवित्रोक्लत९ 
चऋलोकः शरदिन्दुसुन्दर्यश्ः-सन्दोहगङ्गास्बभिः | 
आसोन्म चमयद्युतिप्रतिदहतामितरान्धकारोदयो 
देवादित्य्‌ इतिः प्रसत्रहृदयो देवहुमौ जङ्गमः ॥ ७ ॥ 


(१) ए--घारद्रवेः। 

(९) ए-धराशेष- | 

(३) +--अातन्वते | 

(४) ^-माऽन्तः। 

५) ए--एसतके षस्लोको नास्ति । 
(६) ठए-परिजोड्त-। 

(७) ^+-देवादहति सः। 


छत्यरलाकरः। ४ 


महादानैसतस्तेविंभवमहितेनेन्दितिमभत्‌ 

कलं भृदेवानां बहविधम खस्तेम खभजाम्‌ । 
तड़ागैरारामैः कमलमधघुपानोन्मदनद- 
दहिरेफखेणौनामुपक्षतमनेन कितितलम्‌ ॥ ८ ॥ 
गुणाम्भोेरस्मादजनि रजनोजानिसद्धे- 
रिवास्भोजादहेवो द्रविण इव मन्तौशतिलकः । 

नवं पौयुषांशोर तमिव शततिप्रणयिनो 

नयादथेः श्चाष्यादिव जगति वौरेश्ठर इति ॥ ९ ॥ 
लच्छीभाजो दिजन्द्रानक्त क्तमतिर्यी महादानदानेः 
परादत्तोचैखु रामप्रश्तियुरवरं शासनं अ्रोतरियेभ्यः । 
वापीं चक्रोऽखिबन्धु दहिभतनगरे निज्नितारातिदुगेः | 
प्रास्ादस्तेन तुङ्गो व्यरचि सुक्ततिना शदसोपानमागेः' ॥ १०॥ 
ष्यः सन्धि-विग्रहविधौ विविधानुभावः 

, शर्ययोदयेन भिथिलाधिपराज्यभारम्‌ । 

निमेत्सरं सुनयसञ्ितकोषजातं 
सप्ताङ्गसङ्कट नसन्भु तमेव चक्रो ॥ ११ ॥ 

प्रज्ञावतां सदसि संसदि वाकपटुनां 

राज्ञां सभासु पररिषत्‌खपि.मन्तभाजाम्‌ | 
चित्तेऽधथिनाच्च कविताखपि सत्‌कवीनां 
वौरेष्ठरः स्फुरति विश्वविलासः कौत्तिः ॥ १२॥ 





(१) -सोपानवङ्ः | (२) परद्यभिरटं 5 एके नासि | 
(2) ए विलासिं। 


1 कत्यरलाकरः। 


सौ मानसुख तनयो नयचक्रचार्- 
चारालवालनवकल्यतरप्ररोहः | 
सत्सन्धि-विग्रहधुरो णष्पदावलम्ब- 
अण्डेश्वरो विजयते सचिवावतंसः ॥ १२॥ 
यद्याताचतुरङ्गिणौ भरनमहुगोलघातस्पुट- 
दो गीन्द्रागरशिरः-फणा-मणिपतत्‌खण्डप्रदोपांशभिः | 
पाताले निविडान्धकारपटल निर्मोपदृष्टप्रिया- 
सलौ चणलब्चलोचनफला्गायन्ति भोगिस्ियः ॥ १४ ॥ 
"नेपालं गरि दुगेमं भुजवलादुन्ुख्य तद्धपतोन्‌ 
सत्वान्‌ राघववंशजान्‌ विरिपोसुल्यःप्रतापानलै; 
टेवं विष्ववरप्रदं पश्पतिं संशश्य योऽप्रूजयत्‌ 
केषां नैष धरातसे सुतिपदं मन्तोन्द्रचण्डेष्वरः ॥ १५॥ 
आसीनं गिरिकन्दरास्वपि बनेव्वन्तहितं निरे 
गम्भौरे चिरमम्नमद्विशिखरप्राग्मारमप्याखितम्‌ | 
नेपाले विजितेरनेन सुतरा भोताकभिभूमिपैः 
विस्ब्रुल द्युमणेः कुजे भगवतः सरं जन्म तत्तत्‌ क्तम्‌ ॥ १६ ।॥ 
उत्‌खाते रथचक्रनेभिनिवह्दंन्तावबलानां मदा- 
सारः सिक्लतल्ते महायतरणकचेजे हयन्नो दिते । 


7 भभ म 1 


(१) ~+-वरोष्। (२) ^+-यालाद्चवुरङ्किणो। ` (र)^+-कलाः 
(४) ¢ एस्तके-उन्यलयाद्विनितम्बमम्बरमण्णि लत्वा पताकां 
श्वेनोतरजोभरोरनिभ्टतं भिता महाकन्दरं । 
इगे सत्पथ ? टडमथो निर्माय दुग एुनः 
नेपालच्ितिपालवगेमनयङ्गङ्ग्मन्तादयम्‌ ॥ 





ऊसत्यरन्नाकरः । 


नाराचाहतदाडिमोपमपतत्‌ कुम्भी न्रङुभ्भापतत्‌ः 
मुक्ताजालकसुप्तमस्य नु यशोबोजं विरेजे चिरम्‌ ॥ १७॥ 
एतेनातिवदान्यमोलिम णिना सम्मानितेरथिभि- 
दंत्तामेकमनोरथाधिकमदहादानोच्छितेरुन्छरितः । 
स्गखेखणिमसीमलोमसतनुच्छायः स कल्यटुमः 
\प्रश्चमोतन्मकरन्दबिन्दुनिवहव्याजेन रोरुद्यते ॥ १८ ॥ 
"एष मेथिलमहोभुजा भुजदन्दवारितसमस्तवैरिणा | 
खो विधाथिनि कुलक्रमागते सभ्धिविग्रहपदटे पुरस्तः ॥१९। 
उन््रोलत्‌सहकारसीौरभमिलद्‌श्डोघभङ्गरिणो 
विप्रेभ्यः सुरपत्तनप्रणयिनो रम्भावनश्यामलाः | 
ग्रामाः सच्चरदापगाजलभरेरुतनिद्रनालिथिय- 
स्तं दत्ताः कति न प्रसन्रमनसा मन्तीश्वरेणासुना ॥ २० ॥ 
१अरयमुदचोखनत्तरलमारुतलङ्नया 
घनरवावत्तमभिरामपुरेऽथ सरः । 
दिवि शरदश्रविश्रमपटलोदरगस्फर- 
दरविन्दवेश्म विलसत्‌ निरुन्मसितम्‌ ९१। २१॥ 


म 





(१) ए-प्रच्योतत्‌ | (२) ^+ पुस्तके अधिकमिदेप्य'। 
(३) 8 (--पुस्तके ठकविं श ति-दाविंशतिश्लोकौ नस्तः | 
0--कुसटषनेन शंखसकला भद्रलमतिना 
सनतरतारकाङरसमं सिमरामपुरे। 
. पवनजवोडताम्बुजरजःपटवासुचयं 
` किरद्् दिष्यखे नवमचौ सनेव सरः ॥ 
^+ एस्तके अभिकर्चिंद्‌ं पदयमश्एद्धम्‌ । 


सस्डरल!(कर्‌, | 


आपीत जलधिसत्रया चुलुकितः ्ारोदकीोऽभ्यहि मा- 
मापात्‌ मधुरं घटोद्वभरुने यद्यस्ति शक्तिस्तव । 
इत्येवेद तीव वोवितुलितग्धोधिस्फुटःम्भोभरा- 
रावेरुद्यतहस्तिरासमहिताहङ्ारमेतत्‌ सरः ॥ २२॥ 
एतव्वौतिजिमौषुरोशएमभजदेवः सुधादौधितिः 
प्रायः शेखरतामवाप न युनस्तस्मादसौ तत्‌फलम्‌ । 
इत्येवं गलिते मनोरथभरे पङ्क "च्छटासोद्रं 
धत्ते निज्नितकान्तिरन्तरधिक्रं णद्ध कलङ्कः शभ ॥ २२ ॥ 
विश्वाणः कल्प्हत्तं कचन परिसरे कामधेनुं दधानः 
काप्यन्तः पारिजातं कचिदपि च दधदोषयादोविभुक्तः। 
खौ मच्चर्डेश्वरेण स्मृतिनिगमविदा तन्यते तेन तदत्‌ 
विष्णुव्यासादिवाक्वस्मुरद खतमयः लल्यर लाक रोऽयम्‌ ॥ २४ ॥ 
यस्मिन्न किचिदपि शंसति कामधेनु- | 
यंते्टमल्यमपि कल्यतरने दत्ते, 
धत्ते न गन्धमपि कञ्चन पारिजात- 
स्तत्सवेमेष विविनक्ति नयप्रवीणः ॥ २५ ॥ 
नानाशुतिस्मृतिकदम्बयुराणराशि- 
गौड़तिहासनिङ्करुम्बमहागमानाम्‌ । 
तं तं विरोधमवधुय बुधेन छत्य- 
रल्ञाकरोऽयससमुना विहितो हिताय ॥-२६॥ 


(१> ^+--भरे$ग्यङ् 


कत्यरलाकरः)। 


खरूपफलमानेभ्यो निमित्ताच्च विधोयते । 
अभोषटफलरद स्यात धम्यस्यादौ निरूपणम्‌ ॥ 
परिभाषा ततः प्रोक्ता ततो मासपरिखितिः। 
भरधाऽच चैतर-वेशाखौ ज्येष्ठाषाढौ ततः परम्‌ ॥ 
ततश्च खावणो भाद्र आश्विन; कात्तिकस्तथा। 
मागे; पौषश्च! माघश्च फादगुनः परिकौत्तिंतः ॥ 
मलमासव्यवसखापि-तरङ्गेऽस् ततः क्षतः । 
प्रकोणेकाञ्च वाराणां ब्रतादिविधिविस्तरः॥ 
रविसंक्रान्यमावस्या-ग्रहणस्यितथस्तथा । 
व्रतादितिथिवैधादिव्यवस्ितिरनन्तरम्‌ ॥ 
एवमागमविन्ञन खौचर्डेश्रमन्तिणा । 
इाविंश्तिस्तरङ्ाणां छत्यरलाकरे कता ॥ 
लच् प्रहत्यौपयिकं धमेनिरूपणं खरूपतः। 
तत्र मनुः- | 
विद्धिः सेवितः सह्धिनित्यमद्ेषरागिभिः । 
दथेनाम्बनुक्ञातो यो धर्मस्तं निबोधत ॥ 
सदविर्मंहाजनेः अदेषरागिभिनिंषिदरागदेषशृन्ये हं दयेनाभ्य- 
नुज्ञातोऽतिखद्वाविषयोक्घतः । 
विश्वामितः- 
यमाग्य; क्रियमाणं हि शंसन्द्यागमवेदिनः। 
स धर्मो य॑ विगदन्ति तमधस प्रचन्तते॥ 


(१) ए ९-मौषोऽय। 


१ क्लत्यरनाकरः | 


तस्मात्तां प्रूजयेत्तचन ोपवामो जितेद्धियः। 
विचिचेबलिभिर्भत्तया सर्व्वासु नवमोघु च॥ 
ब्रह्मपुराणे- 
एकादश्यां ततः स्त्रोभिर्दैवौ पज्या च रुक्तिणो । 
पौराणे योगिनौ काचिच्छक्तिर्नाराचण्णङ्गजा ॥ 
युष्पालद्कारधपान्नशराकैश्च विविधैरपि । 
चरपूयेविविधाकारैवङ्कि-नाद्मए-तपेणेः ॥ 
तचापराहे वासवश्च वेश्मनो वश्रधार कः । 
च्र्यै्मा्येश्च वस्वेश्च पूज्यो रङ्खः सुगन्धिभिः 
प्रदोषसमये तन पञ्चगव्य विधानवत्‌ । 
तिलशिद्धायेकेयुक्ं ग्यद्ोला वेश्मनो वहिः । 
देयं दिचु च पय्धुचेडुष्टप्राणिनिवारणम्‌ ॥ 
पथ्येत्‌ तदेव पञ्चगव्यं प्रतिदिशं चिपेत्‌ । 
ङतोपवाो दाद्‌ण्यां ततो विष्णुश्च प्रजयेत्‌ । 
अपराहे च तत्रैव कामदेवश्च पूजयेत्‌ ॥ 
घरस्थं विविधे्माखछि्गन्धेरुचावचेर पि । 
ततस्तु श्नौतलं तोयं पुण्यमादाय वाग्यतेः ॥ 
कामदेवाय्रतः साप्यं पुष्यच्छन्ने महाघटे | 
अर््यादि पूजितं सम्यक्‌ प्रशरसतेटलप लवैः ॥ 
तस्यां राव्यं यतौतावां ततो शुप्रतरे गडे। 
श्रनक्काभ्यिदिते काले खाघाःः खस्तेन वारिणा ॥ 


१ 1) खाप्याः। 


कछव्यर्लाकर+ । 


सथाणाः मूले वच्छमाणएण देवता एव । 
विन्णधन्नत्तरे । 

दादण्यां चेचश्क्ञास्य चेचवस्तप्रदो नरः । 

श्रचयं फलमाप्नोति नागलोकञ्च गच्छति. ॥ 

वै्ाखमासदादण्यां रक्मदानं तथेव च। 

कचोपानदयोदानात्‌ च्येष्ठे मासि दिजोन्तमाः ॥ 
तयेव चेति प्रयममासोक्तफलानुषङ्गः । 

श्ास्तौणं शयनं दला मरौणएचेद्धोगशायिनम्‌ ¦ 

आषादशक्रदादश्या श्वेतदरौपे मरोयते ॥ 
भोगग्रायिनं विष्णं ्रास्तौणै श्यनं दत्वा महौयते दति 

सम्बन्धः । 

श्रावणे वस्तरद्‌ानेन विष्णुलोके महौयते । 

गोदः प्रयाति गोलोक मासि भाद्रपदे तया ॥ 

ग्रोण्येदश्वशिरसमश्चं दत्वा तथाश्िने । 
श्रश्वशिरसं दयगोवं देवम्‌ । 

विष्एलोकमवाप्रौति कुलसुद्धरति खकम्‌ ॥ 

सरोमवस््दानेन काके वस्तरमाभ्रुयात्‌ ! 

` प्रदानं लवणणनान्तु मागं शं महाफलम्‌ । 

रोमवस्त द्लपरो । 

धान्यानाञ्च तथा पौषे दारूणाञ्चाणनन्तरे । 

फाद्याने सव्वेगन्धानां नाच कार्यां विचारणा ॥ 


१५७ 


१३० छव्यरनाकरः । 


अनन्तरे माचे दानं महाफलमित्यलुषज्यते । अच यद्यपि 
दादश्यक्ग्वो नाति तथापि समभिव्यादाराद्रा दश्येव विव्चिता । 
भाग्यकचरसंयुता चेचे दादौ स्यान्महा फला । 
भाग्यक् पूव्वैफल्णुनौो उत्तर फद्णुनो वा । 
पूर्वायां विजयं विद्यादुत्तरायां भगन्तया ॥ 
दति भविव्यपुराणे नच्चदेवता कथनात्‌ । 
दस्तयुक्ता तु वेश्राखे चेष्टे च खातिना तथा ! 
व्येष्ठया च तथाषाद़ं मूलोपेता च वेष्णवे ॥ 
वेष्णवे श्रावणे । 
तथा भाद्रपदे मासि श्रवणेन तु संयुता । 
आश्िने दादौ पुण्या भवत्याजकचंसंयुता ॥ 
आजग्टकं पूव्वेभाद्रपदा । 
कार्तिके रेवतौयुक्ता सौम्ये छत्तिकथा तथा 
सौम्ये मागं । 
पौषे स्गशिरोपेता माघे चादित्यसंयुता ॥ 
आदित्यं पुनवेसु । 
फाख्युने पुव्यसदहिता दादश पावन परा। 
नचचयुक्ताखेतासु तया द्‌ानमुपोषितम्‌ । 
सव्वे महाफलं ज्ञेयमनन्तं दिजसन्तमाः । 
तया दानसुपोषितमिति- च्रच पूवव चेषर्क्तदादश्वादि दाद- 
शद्धा शो विहितदानफलाधिकफलत्वं मदहाफललं दाने उपोषिते 
च अनन्तफलमिति वचनादत्यत्कषेः फले एतानि दाद ्मासशक्ञ- 


कछत्यर्नाकरः | 


दाद्‌ णषु प्रत्येकं दादश्दानानि तच क्च लिखितान्यपि माश 
न्तरद्ाद शो फलानुषङ्ायमेकचापि सङ्लयय लिखितानि । 
एवश्च दाद एनचचयोगेनापि दाद्‌श्ादश्रौषु दादश्रदानान्यु- 
पोषितानि च प्रत्येकं केवलतत्तदाद्रोद्‌ानफलापेच्चया अति- 
भ्रयितफलसाघचनानोति मन्तव्यम्‌ । 
वराहयुराणे । 
सत्यतपा उवाच- 
कोऽसौ धरण्ां सद्धं उपवासो महामुने ! । 
कानि व्रतानि च तथा एते वक्रमदंसि ॥ 
दुर्वासा उवाच- 
एवमेव सुने मासि चेच सङ्ल्य इादभौम्‌ । 
उपोव्या रा घधेद्क्या देवदेवं जनादेनम्‌ ॥ 
वामनायेति वे पादौ विष्णवे कटिमच्च॑येत्‌ । 
वासुदेवेति जटठरमुरः सम्णेकाच च ॥ 
कण्ठं विश्वश्छते पृच्छं शिरो दै योमरूपिरे। 
बाह्न विश्वजिते पूृन्छौ खनाश्ना शङ्खनचक्रके ॥ 
श्रनेन विधिनाऽग्यच्यै देवदेवं सनातनम्‌ । 
मराग्बद्रनोदरं कम्भ सयुग्पं पुरतो न्यसेत्‌ ॥ 
मागुक्तपाज सखाप्य वामनं काञ्चनं बुधः । 
यथाश्ह्वा कतं खं सितयन्ञोपवौतिनम्‌ ॥ : 
कुण्डिकां खापयेत्‌ पाच कचिकां - पादुके तथा + "`" 
श्रच्मालाञ्च सस्थाण टषिकाञ्च विशेषतः ॥ 


९२२ 


चछत्यर्नाकर्‌ः । 


एतेरपस्करे्क्तं प्रभाते ब्राह्मणच तम्‌ । 
दापयेत्‌ ओौचतां विष्णुद्खरपोत्युटौ रयेत्‌ ॥ 
मासनान्ना तु संयुक्तं प्रादुर्भांवाभिधानकम्‌ः । 
मरौयतामिति स्वे विधिरेष प्रकौत्तिंतः॥ 
श्रयते च पुरा राजा य्यः एथिवोपतिः । 
श्रपुचः स॒ तपस्तेपे युच मिच्छस्तपो धनः ॥ 
तस्येव कुर्व्व॑तस्िष्टिं पुत्रार्थ मुनिसत्तम , 
्राजगाम हरिर्देवो दिजरूपसमन्वितः ॥ 

स उवाच नृपं राजन्‌ किन्ते चवसितं विति । 
पुचाथेमिति चोवाच तं विप्रः प्रव्यवाच इ॥ 
दूद्मेव्र विधानन्तु कुर्‌ राजन्‌ प्रयनतः । 

स विप्र एवसुक्का च चणादन्तददिंतस्ततः॥ 
राजापि तच्चकाराय मन््वित्तं दिजातये | 
दरिद्राय खयं प्रादात्‌ ज्योतिगेर्वाय धौमते। 
यथाऽदितेरपुचायाः खयं पुचलमागतः । 
भगवांस्तेन सत्येन ममा्यस्तु सुतो वरः, 
अनेन विधिनोक्तन तस्य युचौऽभवन्मने । 
उग्ास्य दति ख्यातश्च चक्रवर्तौ महावलः । 
अपुत्रो लभते पुच्ानधनो धनवान्‌ भवेत्‌ । 
भ्रष्टराज्यो लभेद्राज्ये खतो विष्णपुर ब्रजेत्‌. ।' 


एवमेबेति वच्छमाएमागे शोषेमासद्ादशोशत्ये ट ग्म्यां निय- 


९ 3 विधानकं) 


छत्यरनाकरः। ' शर्र्‌ 


तात्मवान्‌, सातो देवाच्चैनं कला, श्रश्रिकाय्ये यथाविधि इत्यादि 
" तत्राराध्य महायोगदेवं नारायणं मरसुम्‌ ” इत्यन्तेन चदुक्त 
तच्छनेत्ययेः । उपोग्येकादण्वां वामनाधेत्यच॑नोयम्‌ । 
अन्कारादि नमोऽन्तेन चतुर्येन्तेन चाच्चैयेत्‌ । 
प्राग्वदिति जलप्रणत्-षमाच्ल-सितचन्दनलेपितल्र तिलपाच- 
खगितल पञ्चरननगकिंतलानां यदहणं । सयुन्प्ं धितवस्तयुग्म 
खदित प्रागुक्तपाचे यथाग्र्वा सौवणं सौष्य-ताचाघाराणामन्यतनने 
वारिप्ूणं, काञ्चनं सौव कुण्डिका कमण्डलः । षिका यत्या- 
सन, माखनाननेत्यादि प्रादुभावाभिधानकं प्रीयतामित्यन्तख मागं 
गोष, दादश्रमासेषु केशव नारायण माधव गोविन्द विष्णु मधु- 
सदन चिविक्रम वामन ओ्रोधर इषौकेश पद्मनाभ दामोदरेति 
यचाक्रमं प्रत्येक नामोच्चाय्यै केशवो मद्छूपौ प्रीयतां, नारायणः 
कूभ्मेरूपो प्रोयतामिति क्रमेण तन्तन्मासि उदौरधेदित्य्यः । 
ज्योतिं्माय ब्रह्मविदे । 
वराहपुराणए एव श्र्यरसः प्रति नारद उवाच- 
ददानो कथययाभ्याग्ु त्रतं येन हरिः खयम्‌ 
वरं दच्याद्धत्तभावं स चवे याति शोभनाः!) 
शोभना दति सम्बोधनं चकारखरसात्‌ वरदान- हरिभत्त 
भावौ इावपि फले । 
वसन्ते श्क्तपचस्य दादौ या भषेत्‌ इभा । 
तस्यामुपोग्य विधिवत्‌ स्रौकं दरिमरयेत्‌ ॥ 
पथ्यङ्कास्तरणं कृवा नानास्तर एसंयुतम्‌ । 


१२९ छत्यरल्ाकरः | 


तच लच्छौपति देवं रूप्यं कला निवेशयेत्‌ । 

तस्योपरि ततः पुव्येमण्डलं कारयेदुधः। 

नृत्य-वादि घोषश्च जागरन्तच कारयेत्‌ । 

मनोभवाधेति गिरखट्यम्बकायेति वे कटिम्‌ ) 

कामाय बाङ्कमूलन्त्‌ क्ुखुमास्तराय चोदरम्‌ । 

मन्मथाथेति परै पादौ हरये इति सव्वेतः। 

ुष्येः सम्यूज्य देनेग्रं मलिकाजातिभिस्तया । 

पञ्चाच्तुर श्रादाय ईचुदण्डान्‌ सुशोभनान्‌ 

चतुरि न्यसेन्तस्य देवस्य प्रणतो नुप । 

एवं छृलला प्रभातेषु प्रदद्याद्भाद्यणय च । 

वेद वेदाङ्ग युक्ताय सन्ूणङ्गाय धमति 

राह्मण श्च ततो भोज्य व्रतमेतत्‌ समापयेत्‌ । 

ब्रतस्वान्ते ततो विष्एभेत्ता वे भविता भ्रुवम्‌ । 

छलायतप्प्रणामन्तु ष्टं गव्वेंण च प्रुवम्‌ । | 

व्रतेन देवदेवेशं पति लयाऽभिमानतः। 

श्रवसानेऽपहरणं गोपालेर्वो भविष्यति । 

परा इतानां कन्यानां देवो भत्ता भविश्यति ॥ 

श्रच मल्लिकाजातोरूपकसुमयोयंद्यपि योभ्रे पयोद्ागमे च 

निनफर स्तथापि यथाकथच्चिदनयोरन्वयो बोद्धव्यः ॥ 


दति भन्तं राद भोनतम्‌ ॥ 





० ना 9 


२ 1) खला मत्‌ । 





छत्यरन्नाकरः । १.२४. 


मद्छपुराणे- 
सेचने मासि सिते पक्त इादश्यां नियतव्रतः । 
स्थापयेदत्रणं कुशं सिततण्डलपूरितम्‌ ॥ 
नानाफलयुत तद्दि च्‌दण्डखमन्वितम्‌ । 
सितवस्तयुगढन्नं सितचन्दनचञ्धिंतम्‌ ॥ 
नानाभच्छयसमाकणं मद्दिरण्छञ्च श्रक्रितः । 
ताश्चपाचं गुडोपेते तस्यो परि निवेशयेत्‌ ॥ 
नस्मादुपरि कामन्तु कदल दलसंस्ितम्‌ । 
ुरय्याच्छ करयो पेतां रतिन्तस्य च वामतः ॥ 
च्रय्रतोऽन्नं ततो दद्यात्‌ गोतवाद्यञ्च कारयेत्‌ 
तदभावे कथां ज्ुर्य्यात्‌ काम-केग्रवयो नैरः ॥ 
कामनान्नञा हरेरचचीं स्ञापयेह्ुङ्वारिणण । 
्एक्तपुष्या चततिलेरयेन्मधुद्दनम्‌ । 
कामाय पादौ सम्यूज्य जङ्ग सौभाग्यदाय च । 
ऊरू स्मरारेति पुनमेन्मथायेति ते कटिम्‌ ॥ 
भक्तो द रायेत्युद र मनङ्गायेत्युरो हरेः । 
मुखं पद्ममुखायेति बद्ध पञ्चशराय वे ॥ 
पुनः सर्व्वात्मने मौ लिमद्येन्मधु रदनम्‌ । 
ततः प्रभाते तं कुम्भम्‌? ब्राह्मणाय निवेदयेत्‌ ॥ 
° ब्राह्मणएणन्‌ भोजयेद्धक्या यथा च लवणदूते। 
यक्तात्‌ दक्चिष्णं दद्यादिमं मन्त्रसुटौरयेत्‌ ।] 


-"-* "~ ~ "~--------- ~~ ~~ -~ ~~~ ~= ~ ~~ ~~ 





१९ ए 1) इति केशवस्‌ । २ ^ उदकुम्मम्‌ ३ ^[ 1 पद्यं नासि; ` 


२२६ ज्त्यरनाकरः | 


म्रोयतामच्र भगवान्‌ कामरूपौ जनादन: | 
दये सब्वेश्रता्ना य श्रानन्दोऽभिभौ यते ॥ 
श्रनेन विधिना सव्वं माचि मासि समाचरेत्‌ 
उपवासो चयो दश्वा मचयेदिष्एमव्ययम्‌ ॥ 
फलसमेकञ्च सम्प्राश्य इादण्यां तले खपेत्‌ । 
ततस्रयोदगशे मासि छतघेनुसमन्विताम्‌ ॥ 
शय्यां दद्यादनङ्गाच सर््वोपसकरसयुताम्‌ । 
कालञ्च कामदिवश्च श्णक्तां गाञ्च पयखिनोम्‌ ॥ 
वासो भिर्दिजदाम्यत्यं पूज्य शक्मा विग्धषरेः। 
शरय्यागवादिक दात्‌ प्रौयताभिन्युदौरयेत्‌ ॥ 
होमः श्एक्ततिलेः काय्यैः कामनामालुकौत्तेनात्‌ । 
गव्येन सर्पिषा तदत्‌ पायसेन च धम्मविद्‌ ॥ 
विप्रभ्यो भोजनं दद्यात्‌ वित्तशाद्यविवष्िंतः। 
इ चुदण्डांस्तया दद्यात्‌ पुष्यमालाञ्च शक्तितः ॥ 
यः कुर्य्यादिधिनानेन मद्नदाद भ्नमिमाम्‌ । 
मव्वेपा पविनिरुक्रः प्राप्नोति इरिसाम्यताम्‌ ॥ 
दृह रोके वरान्‌ पुचान्‌ सौभाग्यच्च समश्रुते । 
यः स्मरः स खतो विष्णरानन्दात्मा महेश्वरः ॥ 
खुखार्थोः कामङ्पेण सरे त्त जगदीश्वरम्‌ । 
दति मदनद्ाद शोत्रतम्‌ । 
श्रच द्वादश्यां पूजा एकपंलाश्रननं चयोदश्वामुपवासश्चतुदेश्णां 
पारएमिति प्रतिमासं करमः। चयोद ग्रे मासि चृतधेन्वादिः | 





छ््यरलनाकरः । १.३७ 


न्द्ध पुराण- 
चयोदग्नौषु सर्व्वासु कामः पूज्योऽच वा नरैः । 
याचोत्सवश्च विधिवत्‌ कन्तयश्चाय विष्णवे ॥ 
चयोद्श्यान्त॒ दयिता खयं भचा प्रियेण तु । 
श्रात्मप्ूना च कन्तेव्या प्रूजनोया ग्रहे स्ियः ॥ 
लिङ्गपुराणे- कामेश्वर क्घण्डमधिछत्य , 
चेचे मासि सिते पचे जयोदश्वान्त्‌ मानवाः । 
स्ञानं ये तच कुव्वैन्ति ते कामसदुश्ा नराः॥ 
अच कामसद्शनरत्वं काम्यम्‌ । 
मदाजनपरिग्डोतवाक्यम्‌- 
चेच्रत्तचयो दश्यां दमनं मदनात्मकम्‌? । 
छत्वा सम्यज्य यनेन बोजयेद्रजनेन तु ॥ 
ततः सन्धितः कामः युत्रपौचख्द्धिदः । 
पूजामन्लौ- ` 
एयोदि भगवन्‌ काम रतिप्रौतिसदाकर । 
'सन्वेषान्त्‌ प्रियो भावस्वत्‌प्रसादान्धनोभव ! ॥ 
नमोऽस्तु परुष्यवाणय जगद्‌द्खादकारिणे । 
मन्मथाय जगन्नेन रतिप्रोतिकराय ते॥ 
्रतिश्यितयुण्वा चेयं चयोदशयो भविव्यपुराणोक्तेः । 
शिष्टपरिग्टदौतगेवागमः- 
मधुमासे तु स्मरा शक्ञपक्तं चतुदेशो । 





नअ 


१ 7 चन्दनात्मकस्‌। २ 7 सव्वं प्रिया भावाः । 


१८ 


१२९ छत्यरलाकरः । 


ख्याता मदनभञ्ञोति सिद्धिदा सुमरोत्सवा ॥ 
तच ये मूलनचचे घमूलदमनोचयम्‌ । 
निवेदयति गौरे तेषां चेाचंनाफलम्‌ ॥ 


शिष्टपरिग्टदोतवाक्यम्‌- 
चेचे मासि चतुद्‌श्यां भवेत्का ममो त्सवः । 
जगुश्ितो क्तिभिस्तच गोतवा्चादिभिनृणणम्‌ 
अवते तुग्यते कामः पुचपोचसष्टद्धिदः॥ 

ब्ह्मपुराण- 
उपोग्याय चतुदःश्यां पौणमास्यां हरिं यजेत्‌ । 
पौणमास्यां निकुम्भश्च पिभ्राचेः सद्ितो बलौ ॥ 
याति योद्धु पिश्राचाश्च सिकताद्ोपवासिनः१ 
तदथं गच्छतां तेषां मध्याङ्के तु ग्डे गडे॥ 
पूजा कार्य्या प्रयन्नेन नित्यं प्रत्ना यथाक्रमम्‌ 
पिशाचं शणएमयं छत्वा रम्य ठणएमयञ्च वा ॥ 
गन्येमच्धिस्तथा वस्तेरलङ्गारेमेनोहरैः । 
भच्छेरुन्धो पिकापपे्मे सेदि खेश्च पानकैः ॥ 
खजातिविदहतैः पेयेने बेदयेश्च एथग्‌ विधैः । 
च्रायुधेवि विधा कारेः कचो पानहयष्टिभिः। 
शका ननपूरिकायुकरैः सितिर्भच्छेशच भस्लया ॥ 

श्कान्नं यवादि भसा चश्रेपुटः | 


~~~ 
[1 न्न ------------ ~ भाय ० 


१ 1) पुः | 


कछत्यरन्ाकरः | ९.२९. 


शिक्यकुन्दानविटयपेवेद्धनद्धेख चरेण । 
तन्त्रो वाचर्मनोक्ञेञ्च तया पान्धोपयोगिभिः। 
चश्मेणा वद्धनद्धेखग्मेवन्धनवद्धेः पान्धोपयो यिभिः कचो पानहा- 
दिभिः॥ | 
मध्यद्हतस्त॒ सपृज्य प्रान्ते चन्द्रोदये पुनः। 
पव्वेवत्‌ पूजयेन्तन्तु विन्तश्रा्विवच्जितः ॥ 
ततः शृतखस््यनो न्वा णन्तु विसच्छेयेत्‌ । 
तमनुज्रजनौयन्त्‌ दितौयदिवसे सति ॥ 
गटहाददूरे यो यस्य पव्वेतस्तमयारहेत्‌ । 
तमनुत्रजनोयं विसन्जंयेदि ति सम्बन्धे: ॥ 
पुनमग्येह प्रविश्चेव कन्तैव्यः सुमहोत्सवः । 
गौ तवा दिचनि्घोषिजेनकोला दलेस्तया ॥ 
कछला णमयं सथं दुः काष्ठैः सुबेष्टितम्‌ । 
क्र डितव्यं पुरयामनगरेषु च सब्वेदा ॥ 
सन्लासो दष्टसर्पाणं तत्‌च्णाद्यन जायते) 
चिभिश्चतुभिंदि वरे: कन्तैव्यः खण्डखण्डशः ॥ 
पसर्पो पसपश्र मनं तच्च खण्डं गहे ग्य । 
परजितव्यं सुपे तु रचितव्यञ्च वत्रम्‌ ॥ 
तथा- 
मन्दे चाव गुरौ कापि वारेष्वेतेषु चेरे । 
तच्चा शमे धिकं पुण्यं स्ातश्च लभते नरः| 





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१ 7 सर्पा। 


१४० क्र्यरनकरः। 


दानमच्यतां चाति यिद्ृणाञ्चापि तपेणम्‌ ॥ 
मन्दे श्रनौ । 
विष्णः-- चेचौ विचायुता चेत्‌ स्यात्‌ तस्याञ्चिचवस्तप्रदानेन 
सौभाग्यं फलमाप्नोति 
विष्णधर्मोत्तरे- 
सम्प्राप्य चेचमासखय भ्रक्तां पञ्चदश नरः। 
विचरवस्लवुग दला सोपवासो दिजातये। 
ब्राह्मणं स्तपंयन्‌ विप्राः सौभाग्ये मददाप्रुयात्‌ ॥ 
्न्यत्राद्यमणानां भोजनादिना तपैणएम्‌ । 
मव्छपुराण महावराहस्य पुराणएमाहाव्यमधिकत्य - 
विष्णनाभिदितं युष्छं तद्ाराहमिहोच्यते ॥ 
मानवस्य प्रसङ्गए कल्पस्य मुनिसत्तमाः । 
चतुर्विं शखदखाणि तत्युराएमिहोच्यति ॥ 
काञ्चनं गरुड कला तिलधेतुसमन्वितम्‌ । 
पौणमास्यां मधौ दला ब्राह्मणाय ज्ुटुज्विने । 
वरदस्य प्रदानेन पदमाप्नोति वैष्णवम्‌ ॥ 
मघो चेचे। 
ज्रह्मुपुराणे- 
श्राषाच्छामाश्वयुज्याञ्च पौ वयाञ्चेश्याञ्च सतव्वेद्‌ा 
न रटहोयात्‌ गवां चौर न्वं वत्साय निक्िपेत्‌ ॥ 
खातः सव्वेपापेः प्रमुच्यते दल्युपक्रम्य श्रलयासे तथा चेचौ- 
-मिति यमः । 


कछत्यरलाकरः | २.४१. 


थ क्रमप्रूजा । 
देवौपुरण- 
सव्वेकामप्ररिद्यां पुजनौया यथा शिवा । 
तथा ते कथयिष्यामि प्रण वत्स ! समासतः ॥ 
चे्यादौ या समाख्याता पूजा सर्व्वा्ैसाधनो ¦ 
तस्या भेदान्‌ प्रवच्छामि इष्टा पूत्तपसिद्भये । 
व्यां चि च्चंगां प्रजां छत्रा लाष्रपदं लमेत्‌ ॥ 
दतौचायान्त्‌ वैश्राखे रो दिष्य प्रपूजयेत्‌ । 
उदकुम्भप्रदानेन ब्रह्मलोके महौयते ॥ 
दरद्राद्चिदेवते क्ते पौणमास्यां तथेव च । 
पूजां छता भवेद्ह्मन्‌ विगताचघौ नरोत्तमः ॥ 
दृनद्राभ्निदेवते विशाखानचचे " 
चभ्रः परिग्रहः कार्ययो दानं देयं दिजातिषु । 
चयाणामेकमादाय श्रशधिं देवं प्रपूजयेत्‌ ॥ 
श्रतरिहोचौ भवेत्‌ पूत एतदर्णाभितं फलम्‌ । 
मूलक्चं पश्घातेन व्येष्टे देवौ प्रपूजयेत्‌ ॥ 
सर्वान्‌ कामानवाश्नोति भावश्द्ेन कश्येण । 
श्राषाढ़ मासि यो देवौमाषादृच्ं प्रपूजयेत्‌ ॥ 
सर्वान्‌ कामानवाप्नोति देवौीलोकन्च गच्छति । 
श्रावणे पूजयेदेवौ परतिपद्यादितः क्रमात्‌ ! ` 
ब्रह्ममूत्तिगताग्डच्चे पुखे भौजङ्गमेऽपि वा ॥- 
भोजङ्गसे अक्षेषानचते । 


९४२ 


छत्यर्नाक्ररः | 


श्रधिवाख्विधानेन पविचारोहणं भवेत्‌ , 
नह्माग्धुमागणेश्रस्य नागस्कन्दतलुखिता ॥ 
रविमातङ्गरूपा तु मङ्गला सा तदा भवेत्‌| 
ृषविष्णु शिवाकारा कामसद्रसमाकतिः ॥ 
श्रक्ररूपा प्रयष्ट्या देवो गन्धखगादिभिः। 
प्रथसे चाश्रमे पूजां गटद्यकम्म ्रतादि च॥ 
छत्रा कामानवाप्रोति बिगताघो सुनोश्वर ! | 
प्रोष्ठकर्णासु (?) कन्तव्या पूजा जागरणं निभि ॥ 
मद्येतससव विधानेन सौ नार्मणिफलं लभेत्‌ । 
अष्टम्यां रोदि खच्वे सोपवासस्तु पूजयेत्‌ ॥ 
विष्एलो कमवाश्नोति सब्वेकामश्टद्धये । 
तचैवं कारयेदेवौं वेदरूपां महोदयाम्‌ । 
कन्यास्े च रवादिषे पूजनौया यथाविधि ॥ 


षे आध्िने। 


भौजङ्ग तिथिमाञित्य यावचन्राकंसङ्गमम्‌ । 
तचापि महतौ पूजा कन्तैव्या पिढदेवते । 
क्ते पिण्डप्रदानन्तु च्येष्टपु्रौ विवच्नेयेत्‌ ॥ 
आहवेषु विपन्नानां जला्चिग्डगुपातिनाम्‌ । 
चतुदेश्यां भवेत्‌ प्रजा श्रमावखान्तु कामिक ॥ 
कन्यास च रवाविषे शक्ताष्टम्यां प्रपूनयेत्‌ । ` 
सोपवासो निश्द्धं तु मंहाविभवविस्तरौः॥ 





१ -सुनि। 


कत्यरनाकरः | १,४द्‌ 


पूजां समार भेदेव्ा नज वारुणेऽपि वा । 
वारणे शतभिषानक्षचे । 
ग्रघातः प्रकन्तंग्यो गवलाजवधस्तया ॥ 
वलिक्तपं सुरेन्द्रापणं कला सर्व्वान्निष्णं नयेत्‌ । 
युद्धयाचा तु कत्ता या युरा संप्रकौत्तिता॥ 
शक्रोत्सवे महापुण्टे तस्मिन्‌ देवों प्रपूजयेत्‌ । 
तुलां दौपदानेन पूना कार्यां महाफला ॥ 
दोपः प्रकन्तेव्यो दौ पचक्रमथापि वा। 
ठनैपयाचा प्रकन्तेव्या चतुद्‌श्यां कुहु च ॥ 
सोनौवाक्ती यदा वत्स तदा काय्य महाफलम्‌ ! 
सव्वेेव प्रकन्तेव्यं बलिपरूजामहोव्सवम्‌ ॥ 
देवतानां समुत्थानं कुर्य्यात्‌ पौष्णे तु बुद्धिमान्‌| 
नोराजनं प्रकन्यं नृ-नाग-तुरगादिषु ॥ 
कान्तिक्यां कारयेत्‌ ` पूजां यागं देवौग्रियं सदा ¦ 
नद्ध -विष्ण-शिवादौनां तच पूजा महाफला ॥ 
गवोत्सगेः प्रकन्तेयो नौलं वा उषमुत्मृजेत्‌ । 
सन्वेयन्नफलं बरद्वान्‌ प्राप्रुयादविचारयन्‌ ॥ 
श्रस््ाणां पूजनं तच कन्तेवयं सव्वंमिद्धये । 
मागं पूजा प्रकर्तव्या श्रहिन्रश्नचंमा इभा ॥ 
अदिढ्रघ्र उत्तरभाद्रपदा नचचम्‌ । | 
सोमर कारयेत्‌ प्रजां सव्वंकामफलप्रदाम्‌ । 
पु्ये पुव्याभिषेकस्तु कन्तवयः पूजयेच्नयाम्‌ ॥ 


२४४ छंत्यर्नाकरः । 


चतुर्थां शरक्ञमाघस्य महापूजा विधौयते । 

माध्यां पूजा प्रकर्तव्या देवौ वे मङ्गलां यजेत्‌ ॥ 

फादगुने परजयेदेवौं चण्डिकेति च या मता । 

मादृणाञ्च विग्रेषेण तेच पूजा विधौयते ॥ 

एवं मव्वैगता देवौ खव्वेदेवतनुखिता । 

पूजिता विधिना वत्स सव्वेकामान्‌ प्रयच्छति ॥ 

दति क्रमप्रूजा। 
चेजादौति प्रथमवाक्यस्य एवं स्वेगतेत्यादि चरमवाक्यस्य च 

परामर्ादिषां कन्मेणां श्रुताश्रुतफलानां सब्वेकामावाश्चिजनकलेन 
सिति एतदन्तगेतानां \केषाल्चित्‌ आद्धादोनां निरपेचतत्तत्‌- 
फलकामनया शिषटैराचय्थैमाएल्वात्‌, कल्यतरूकारप्रण्टेतिभिरेत- 
दन्तगतानां वेच्यां विचच॑गां पूजाभित्यादि, तचेव महतौ- 
पज्ेत्यादि वाक्छानामन्यविधि] निरपेचचविधितयाऽवतारितलाच 
फल निरपेचचलमपि अनयेव दि श्ाऽमौषां वाक्यानामर्योऽपि नेतः 
प्रयसे चाश्रम इति श्रयिद्दोचौ भवेत्‌ पूत इति दशनाच्च नाच 
कमणि तदन्येषामधिकार इति न वाच्यं एत्देकदे शायं अन्येषा- 
मप्यविगोतातुष्टानात्‌ पापच्चयसव्व॑कामावास्भिर चिहोटन्रह्मचारिणणै- 
रन्येषान्त्‌ सव्वेकामावािः फलमिति विवेकः । 


दति महासान्धिविग्रहिकठक्ुर ओ्रोबोरेश्वरात्मज महासान्ि- 
वि्हिकटक्कर ओचण्डग्वरङतो कत्यरनाकरे चेचतरङ्गः ॥ 





ताया व यी 1 


९ 1 पुस्तके [{ ] चिचिर्तांश्टः पतितः। 


छत्यरनाकरः । . १४१ 


अथ वेशाखलत्यम्‌ । 

ब्रह्मपुराणे । 

मेषं जिगमिषो सूरं शिरं ठतकम्बलम्‌ । 

श्रपास्य देदहादवेभ्यः प्रजा काय्य प्रयन्नतः॥ 

मेषसंक्रान्तिदिने सक्रमणपूर्व्वाच्छिभशिरसमयश्त्यं टतकम्बलं 

देवद दाद पास्य देवपूजां ङूर््यादित्यथः । 
विष्णएधर्मो्तरे- 

मेषसक्रमणे भानोमेषदान महाफलम्‌ । 
श्राग्मेयपुराणे- 

पुष्ये वा जन््नचचरे च्रयने विषुवेषु च ' 

ग्रहणे च व्यतोपाते स्क्रान्तौ च दिनक्षये ॥ 

यानमश्चमनङ्धाइं हेमरगय मणोन्‌ तिलान्‌ । 

ये प्रयच्छन्ति पापेधु निरताः सब्वेद्‌ा सुने ॥ 

न तेषां भेरवः पन्थाः देषां द्‌ानमिल्युत । 

पापेषु जिंरताः सव्वेदेत्यमिधानात्‌ कतबह्तरपापानां 

पापच्यायंमिदं दानम्‌ ¦ तथाच गोतमेनाश्चस्य पापनिच्रयण- 
 द्रव्यलसुक्त । 
महाजनपरिग्टरोतवाक्चम्‌- 

मसूर निम्नपच्राभ्यां पिवेन्मेषगते रवौ । 

विषं न क्रमते तस यावदब्टो न प्रते ॥ 





१९ ^. सितान्‌ | 
१९ 


१४६ छत्यरनाकरः | 


संक्रान्तिदिन एवेतत्‌ कत्तव्य पिवेदित्यभिधानात्‌ पानोयेन 
खहा विक्शतस्य पानम्‌ । 
अथ प्रतिमासपूजा। 
तच दैवौप्ूराणे । 
ब्रह्मोवाच । 

वेश्राखे मासि कन्तेव्या पूजा पारलया सदा | 
सर्व्वान्‌ कामानवाप्नोति च्येटे पश्चा्ेनेः सद्‌ा ॥ 
्राषाठ् विल्वकह्ारेरो हितं लभते फलम्‌ । 
नवमल्ञिकया पूजा नभसि च महाफला ॥ 
कट म्बेखन्पकरेरेव नमसे सव्वेकामदा । 
पूजा पङ्जमा लत्या दषेऽभ्यृद्‌ दायिनौ ॥ 
श्रतपनिकया पूजा का्तिके सव्वैकामिको । 
मागे नोलोत्यलेः पूजा पौषे कुलकजा एमा ॥ 
माघे च कुन्दक्ुसुमे शूंद्करेण९ च फाल्ताने । 
्रतपचेस्तथा चेजे यः कुर्याद्र हसन्तम्‌ ॥ 
लभते स्व्वधन्ञानां सव्वेदानफन्नं तया । 
पूजनं फल पुष्पैश्च वस्तरपचरखजा लुजम्‌ । 
ठन-चौर -द चि. तक्रः सव्वकामफलप्रदम्‌ ॥ 
एवं भावानुदूपेए यस्तु प्रजां प्रकल्ययेत्‌ । 
श्वाय स भवेदत्स शिवस्थानचरः सद्‌ा । 





१ 8 कुरुदकेणए च । 


छव्यरनाकर्‌ः | ९४७ 


प्रतिमास पूजाविधिः । 

भविष्यपूराणे ) 

वेश्ाखे माक्षि राजेन्द्र नवम्यां पच्योदेयोः । 

उपवासपरो भ्या परूजमानस्तु चण्डिकाम्‌ ॥ 

नाख्ना भगवतौत्येव कला चाश्ममयोः विभो । 

रूपेणा्ट्ुजां दरएभ्ां प्रणचन््रनिभाननाम्‌ । 

सुङ्कगाणणां सजो भिश्च "जयेदिधिवन्नुप ॥ 

चन्दनागुरुकपूरेधरेपेन विजयेन च । 

= 9 । 

+^ 9. 

एवं सम्पूज्य विधिवत्‌ कुमारोभोजनं ततः। 

गो पुच्छचालणजलं स्ान-प्राशनयोभेतम्‌ ॥ 

हसङून्देन्दसङ्गाशं तेजसा ब्रदह्मसन्निमः | 

विमानवरमारूढो देवोलोके महोयते ॥ 

श्रत्तापि नेक्तभोजनं मासव्यापि प्रक्रमात्‌ । मुङ्रो मल्लिका 

विजयघूपः परिभाषोक्रः, नेवेद्यं दद्यादिति श्षः। 
भवय्यपुराण-- 

वैशाखे मासि राजेन! यः कुर््यननक्रभोजनम्‌ । 

दथ्योद्नञ्च. सुज्ञान जितक्रोधो जितेन्द्रियः ॥ 

गोष्ठे सायमघःशायौ निशायामे कवस्तर्त्‌ । 

निघमच्च ययोदिष्टं सामान्यं सब्वेमा चरेत्‌ ॥ 

वेशास्यां पौणंमास्याच्च दुर्ययात्‌ लानं इतादिमिः। 

सर््याया लङ्तां श्वेतां दद्याद्गां तरुणौ नृप! ॥ 


१४८ छत्यरलाकरः । 


्रङ्खक्न्देन्दुव्णमि मेहायानेरलङतैः । 
खेतगेरुडसयुक्रै गेच्छेद्‌कंस्य मन्दिरम्‌ । 
सरव्वातिश्रयदूपाभिर्नारोभिः परिवारितः 
नोलोत्यलसुगन्धाभिर्मोदते कालमच्यम्‌ ॥ 
्रचोपवासदिनं सप्रमों त्यक्ता मासं याप नक्तभोजनं 
प्रहतमासि निश्रायामेकवस््रष्डत्‌ गोष्ठेऽघःशायो भवेत्‌ । सप्तम्याम्‌ 
पौषसप्तमो दयवत्‌ सव्व नियमादि कमाचरेदिति गोष्ठे इत्यादे- 
रिक्यस्यायेः ॥ 
वेशास्यां पौणेमास्याञ्च ठतादिभिः खानं मासि प्ररं श्ेताया- 
स्तरुण्या गोर्टानम्‌ भानवे | 
महाभारते- | 
निस्तरेदेकभक्रन वैशाखं यो जितेदधियः। 
च्रायु्यं ब्रह्मचस्छेञ्च महापातकनाग़रनम्‌ ॥ 
निस्तर द तिवाहयेत्‌ । 
स्कन्द पुराण- 
वैशाखं यः किपेन््रासन्ञेकभक्रेन मानवः । 
ख याति ओेष्ठतां लोके पूजितो धनवानपि।॥ 
भविव्यपुराणे- 
तण्डलोद्‌कपिष्टेन क्त्वा वे मेरपव्वेलम्‌ । 
तण्ड़लोद कपिष्टेन उदकपिष्टेन तष््लेनेत्यथेः । 
(?) निचुताचेखमा युक्तं सब्वेधातुविश्वषितम्‌ ¦ 
नानालङ्कारसन्पन नाना माद्यविश्ूषितम्‌ । 


छ्त्यरल्ाकरः । ९४९ 


सब्वेरन्नसमायुक्र खापयेद्गास्करालये । 
मदाव्योमन्रतद्चैतत्‌ वैश्राखे या समाचरेत्‌ | . 
नानाविसैविमानेश्च खय्थेलोके महोयते । 
रमाद्‌ागत्य लोकेऽस्मिन्‌ क्रोडते मानसेऽचले । 
श्रचापि चेचवत्‌ कात्तिक यकामत्रतसामान्यधस्मान्वयः । 
दृति स्त्लौणां कामन्रतम्‌ । 
विष्णधकान्तरे-- 
अरपरूपानां प्रदानेन वेश्राखे खगेमश्नते । 
राजमान्तेण्ड- 
तुलामकरमेषेषु प्रातःखायो सद्‌ा भवेत्‌ । 
हविष्यं बरह्मचय्येञ्च मदापातकना शनम्‌ ॥ 
वरादपुराणे- 
` वराह उवाच- 
ये यजन्ति वरारोहे माधवे मासि शंसिताः। 
श्रं तत्‌ प्रतिग्टह्णाभि माधे यन्नयाजिनाम्‌ ॥ 
दत्वा निष्कखदस्लाणि यत्‌ फलञ्च वसुन्धरे ! । ` 
मामेव माध्वे यष्टा फल प्राप्रोति मानवः ॥ 
ग्रसिता नियमक्लश्राः | 
मन्छपुराण- 
वै्राखे पुष्यलवणं वञ्जंयित्वा तु गोग्रदः 
श्त्वा विष्णुपदे कर्यं सिला राजा भवेदिह ॥ 


१५० छत्यरलन्नाकरः । 


वामनपुराणे- 
गन्धाश्च माद्यानि तथा वैशाख सुरभौोणि च। 
देयानि दिजमुख्येभ्यो मधुदद नतुषये ॥ 
ब्रह्मपुराणे- 

द्रा नामाष्यराः पूवव सक्ता विश्वावसोधंदा । 
गो तनुत्येस्तथा देवान्‌ नास्तुवन्मन्द चेतना ॥ 
वासवेन ततः श्ना जाताऽरण्छे हिमाचले | 
मनोन्ञपुष्यतां प्राप्ता कल्ये वेवस्ते सति ॥ 
श्रय कल्लान्त्‌ तां दृष्टा वेशाखे मासि माघवोम्‌ । 
सलौ पुचमिचम्टल्येख सहितः सुसमादितः ॥ 
सुवाषाश्चानुलिप्ताङ्गः परितुष्टेन चेतसा । 
समो पसो विधानेन तामादौ पूजयेत्‌ क्रमात्‌ ॥ 
अर्चेः पव्येभच्छभोच्चेदौ पधूपेः सुगन्धिभिः । 
ततः प्रदचिणकत्य दिवयामष्रषञ्च ताम्‌ । 
ग्टहोला परया भक्या बरह्मणे तु निवेदयेत्‌ ॥ 
तत्युष्याणां खदसन्तु विष्णवे च निवेदयेत्‌ । 
ततः प्रदच्िणणेक्लत्य दिवयामष्यरसच्च ताम्‌ । 
दह लोके च पुश्चयं स्वर्गायान्ते च शव्वेदा ॥ 

` श्रय इट्ेद्राकंदेव-वसु-नागेभ्य एव च । 
लद्द चोरोदकन्याये दुर्गाये कश्यपाय च ॥ 
नलाय नागपतये ब्राद्यणभ्यस्ततः क्रमात्‌ । 
स्तो पुचमिचग्टत्येन्यो च्येष्ठपुचक्रमेण तु । 


क्लत्यरलाकरः | ९५१ 


रक्रसूतरेण सुप्रोतां खजच्च परमात्मने ¦ 
निवेदयिला तां देवौ सुगन्धां सव्वेबज्ञभाम्‌ । 
तैव भोजनं युङः सम्डत्यज्ञा तिबान्धेवः॥ 
तत्‌पुष्याद्ं पिबेत्‌ पानं खजातिविंडितं श्चिः। 
"्रटणयात्‌ गौतवाच्ादि पण्टंशेव सुन ततकान्‌ ॥ 


श्राग्रयपुराणे- 


वैशाखे रद्रनामानं प्रूजयिला इषान्ितम्‌ । 
धेनुं तिलमयौः ददात्‌ सर्ग्वोपस्कर संयुताम्‌ ॥ 
एतद्र तरतं नाम महापातकनाश्रनम्‌ । 

ङृतल्वा रुद्र्रतं याति यस्मान्नावत्तेनं पुनः । 


= 
तया तजच्रवे । 


यमः- 


{> क ् १ हं 

वेशाख पुष्पलवण वञ्जयेद्‌शगोप्रदः। 

विष्णो विज्ञापयेत्‌ कल्प खिला राजा भवेदिह । 
एतत्‌ कान्तिन्नतं नाम कान्तिकोत्तिफलप्रदम्‌ ॥ 


सव्वेपातकमद्त्त्‌ कामतो वाऽप्यकामतः । 
एएद्धिन्तस्य प्रवच्छामि सरगेसाधनमेव च ॥ 
एलो ङष्टेयेयालबदाचि शद कुलो च्छरितः । 
राग्रिस्तिलेः समे देशे कन्ंब्यः पुरुषायतः ॥ 
प्रतिमाऽषटाङ्कलोत्‌ चेष्या सौ वर्णा विभवे सति । 


~-------~ ~~ -----------~ 


१ 7 श्टष्ठंख गोतवद्यादि पश्यंश्च नटनन्ैकान्‌ । 


१५२ क्त्यरन्ाकरः ) 


चोद्धेण पयसा दध्ना छतेनापूरयेहट्ान । 
यथा विभव विस्तारं द्ये ओ नरियेऽधिनि ॥ 
दयान्माघे च वेग्राखे विषुवे चोत्तरायणे 
यावन्नो वक्तं पापं तत्छषणा रेव नश्यति ॥ 
प्रज्ञः छष्णेस्िलेरित्यन्नयः। यथालस्धेदांटप्रा काम्यलब्ैः 
दा िंशदङ्गुलो च्छरितो दाच्गुलेन, पुरूषायतो दाढपुरुषायतः। 
प्रतिमाऽच द्‌ाहप्रतिकृतिः श्रष्टाङ्गलाऽपि प्रतिमा दाजङ्गुलेनेव 
दातुः श्न्निहितव्वात्‌ । 
मानक्रियायासुक्राया मनुक्त मानकन्तेरि । 
मानछ्द्यजमानः स्यादिदुषामेष निश्चयः ॥ 
अष्टा ङ्ुलादिमानन्त्‌ यच यत्रो पदिश्वते । 
तच तच इहत्यव्वेयन्थिभि मिनुयात्‌ सदा । 
दति छन्दोगपरि शिष्टवचनाच्च | 


१डल्िप्य तिज्लरा शेरूपरि धार्या विभवे सतोति वचनात्‌ तथा- 
विधविभवाभावे विनाषयष्टाङ्ुलसौ विप्रतिमया फलं । माघे 
भ न [> ॐ 
चेत्यादि प्रव्येकमेवान्वयसखर सात्‌ माघव गश्राखविषुवोन्तरायणणनां 
प्रत्येकमेव समयलं । दानसागरे त्वविभवपच्छेऽन्येनापि तैजसेन 
म्रतिमा कायति लिखितम्‌ | 

श्रच ग्रहणं श्रेष्ठमिति प्रकरणे । 


१ 7 उत्क्ेप्या | 


क्ल्यर्नाकरः | १५द्‌ 


पुण्यनदोसुपक्रम्य । देवोपुराणे- 
वेश्राखे तु महापु्ठा चन्द्रभागा सरिद्धरा। 
एवं सर्वषु पर्व्वघु चन्द्रे सध्वेकलाश्टति ॥ 
तौयायाच्च वैशाख्यामष्टम्यां कुजवासरे । 
चत्‌ दश्याञ्च कृष्णायां भौ माहे पिदतपेणम्‌ । 
कन्तेवयं सव्यैकामानां पूरणाय दिजोन्तमेः ॥ 
हतौयायां वेश्राख्यामिति सामानाधिकरण्यं भदे माना- 
मावात्‌ तरैश्राखपूणिमायाः पर्व्वाद्धन प्राप्रलाच्, र्टम्यां क्ुजवासखरे 
इत्यादि सादचर््यादष्टम्यपि छष्टैवेति केचित्‌ । 
श्रनेश्वरस्य वारेण वारेणाक्गारकस्य च । 
छष्णाष्टमौ-चतुरद्यो पुण्यात्‌ पुण्यतमे स्छते ॥ 
दूति गौङडौोयवाक्यानुसाराच। 
आग्नेय पुराणे- 
यो ददाति दिजेभ्यस्तु ठतो यायासुपानद्यौ । 
वेश्राखश्एक्तपचे तु सकचकरका जिते ॥ 
न तख मानसो दाहो मन्तऽलोकेऽभिजायति । 
सब्वेव्या धिविनिमुक्रः रिय पुचांञ्च विन्दति ॥ 
कालादिह चद्‌ायाति मम लोकान्‌ दिजोन्तमाः। 
यानच्चाश्वतरोयुक्तं सव्वेहेममये श्ठभम्‌ ॥ 
दिव्याङ्गनाभिराकौण सव्वैरलविश्षितम्‌ । 
उपतिष्ठति विप्रेद्ध सब्वेकामफलप्रदम्‌ ॥ 
अबदिजेभ्य दति बहवचनं प्रयोगबह्त्वापेक्तम्‌ । 


8., 


१५४ छत्यरताकरः । 


भवियपुराण- 
यत्‌ किञ्चिहौयते दानं खल्प वा यदि वा बहन 
तत्‌ सव्वमक्यं स्याद्वे तेनासावच्या स्मृता ॥ 
विष्णधर््ोत्तरे- 
वेशा खश्क्घपच्च तु ठतौयायां ददिजोन्तमाः ! । 
यद्‌द्‌ाति नरश्रे्ठस्तदष्यच्यमुच्यते ॥ 
रच चेयमच्या ठतोचा प्रसिद्धा 
विशेषेण तथा दानमच्चतानां महाफलम्‌ । 
ब्रह्मपुराणे । 
वेश्ाखण्णक्तपके तु ठतौयायां जनार्दनः | 
यवालुत्पादयामास युगच्चारग्धवान्‌ कतम्‌ ॥ 
न्रद्यलो काल्तिपथगां थिव्यामवतारयत्‌ । 
तस्यां कार्ययो यवेहोमो यवे विष्णं समर्चयेत्‌ 
यवान्‌ ददा द्विजातिभ्यः प्रयतः प्राशयेद्यवान्‌ | 
पूजयेच्छङर गङ्गां कैलाग्रञ्च हिमाचलम्‌ ॥ 
भगौरयश्च नृपतिं सागराणां सुखावद्दम्‌ 
खान दानं तपः श्राद्धं जपहोमादिकश्च यत्‌ ॥ 
अद्धया करियते तन्न तदानन्त्याय कल्पऽते , 
शिन्धोस्तौरे विगरेषेण सब्वेमक्षयमु च्यते ॥ 
श्रच वासुदेउदेवताक एव होम उपक्रमे कौ त्नात्‌ । 
यवप्रागनं तदिकारद्रारा साकचात्तृष्यनहेवादित्याह्ः । 
तन्न श्रदृष्टाथेलात्‌ । सिन्धोनेद्याः | 


छत्यरल्ाकरः | १५४५. 


विष्णः-- 
वे शाखश्क्ञहतोयायामुपो षितोऽचतेर्वासुदे वमभ्य्ये तान्येव 

त्वा दला च पापेभ्यः प्रतो भवति, यच्च तसिन्नहनि प्रयच्छति 
तदच्यतामाप्नोति, अभ्वच्यै उतौयायामित्यन्यः। तेनार्या- 
द्वितौयायासुपवासः । श्रचतेयंवेर्हामो वाखुदेवसुदिश्वेव । 
भतिखपुराण- 

दृषा तिधिरिल्येवं हतोया लोकपूजिता । 

सदा विशेषतः पुणा वैशाखं मामि या भवेत्‌ ॥ 

वारिदान प्रशस्तं स्यान््मोदकानाञ्च भारत! 

वेशाखे मासि राजेनद्र ठतोयाश्चन्दनस्य च ॥ 
दतौोयां ठतीयायाम्‌ । 

वारिणा त्ख्यते देवौ मोदकैर्मौम एव च| 

दानात्त्‌ चन्दनस्येह कञ्जजो नाच श्यः ॥ 
कञ्जजो ब्रह्मा 

या चेषा कुरुश्ादल! वेश्राखे मासि वरै तियिः। 

तीया साऽचया लोके गो्व्वाणेरिह शस्यते ॥ 

योऽख्यां ददाति करकान्‌ वारि-धान्यसमन्वितान्‌ 

ख याति पुरुष वौर लोकान्‌ वै हेलिमालिनः ॥ 

करकान्‌ कमण्डलून्‌ वारिघान्यसमन्वितान्‌ वारिपूर्णान्‌ 

उपरिनिहितघान्यपूणेभाजनां शति शत्यकल्यतरू-कामधेतु-पारि- 
जातानुसारः। हेलिमालिनः दुय्यैस्य, मूलौग्तभविव्यपुराण- 
लया निवन्धे-वषंदौ पिकासु वारिवाजखमच्वितानिति पाठो इष्टसतव 


१५६ ल्लत्यर नाक्रः | 


वाजमन्नं इति व्याख्येयम्‌ । एतानि वाक्यानि श्रलवणढतोया- 
नतबोधकवाक्यमध्ये शपाल-कामधेनु-कल्पतर्षु लिखितानि 
पारिजाते ठु प्रत्येकं फलश्चुतेः खतन््रविधिमभिगप्रेत्य लिखितानि) 
देवोपुराणे- 
हतोयायान्त्‌ वेशराखे रोहि्छकचं प्रपूजयेत्‌ । 
उदक्मप्रदानेन ब्रद्यलोके मदहोयते ॥ 
तचैव । 
कलधो तन्त्या चान्नं ठतञ्चापि विशेषतः । 
अस्यां दत्तनवच्य स्या ्नेयञ्चाच्या स्मृता ॥ 
दरत्येषा कथिता राजन्‌ ठतौधा तिचिरुत्तमा । 
यासुपोष्य नरो राजन्‌ इद्िषडद्धं भियं लभेत्‌ ॥ 
यमः- । 
वेण्णखण्एक्तपच्े तु ठतोयायां तयेव च । 
गङ्गातोये नरः लाता सुच्यते सव्वकिल्विषेः ॥ 
यक्किचिदौ यते दान खन्यं वा यदि वा बह । 
ततसव्वेमच्यं स्वादे तेने यमचया सता ॥ 
विष्णधर्मोत्तरे- 
भच्छभोव्यसमायुक्तां बद्धेन यः प्रयच्छति , 
दतोयायाञ्च वैशाखे ब्रह्मलोके मरौयते ॥ 
ब्रह्मपुराणे- 


युगाद्यषु युगान्तेषु श्राङ्मच्यसुच्यते । 


क्रत्यरल्ाकरः ९५७ 


दत्युपक्रम्य-- 
वैशाखश्क्ञपक्ते तु ठतोयायां छतं युगम्‌ । 
विष्णपुराणे- 
पानौयम्यच्न तिद्धेविमि्रम्‌ 
दद्यात्‌ पिहभ्यः म्रयतो मनुव्यः। 
श्राद्ध क्रत तेन समाः सहम्‌ 
र दस्येत्‌ पितरो वदन्ति । 
एतच्च युगाद्यान्तरेऽपि फलं तथेवोपक्रमात्‌ । 
शिष्टपरिग्णहयोतभविय्योत्तरे- 
वैशाखस्य इतौ यायां श्रौ समेतं जगहुरुम्‌ । 
नारायणं प्रूनयेत्तृ पुष्यधेपविरेपनेः ॥ 
वस्ालङ् र सम्भारं ने वेदय विंवियैस्तथा 
ततस्तस्याय्तो धेनुलेवणस्याढकेन तू ॥ 
कार्य्या ऊुरकुलश्रष्ठ ! चतुर्भागेन वत्सकः ॥ 
अभिच्मरोपरि खाप्य कल्ययिला विधानतः । 
शास्त्तोक्तक्रमयोगेन न्राद्धणयोपपादयेत्‌ । 
श्रौधरः श्रोपतिः ओौमान्‌ अरोगः स्रोयतामिति!॥ 
अनेम विधिना दला धेनुं विप्राय भारत! 
गोसहसखं दश्रगुणं प्राप्रोतह न संशयः ¦ 
मव्यपुराणे ईश्वर उवाच- 
शकरासप्तमौः वच्छे तदत्‌ कल्मषनाशिनोम्‌ । 
आयुरारोग्य मेश््यै ययाऽनन्तं प्रजायते ॥ 


९५ 


कछव्यरनलाकरः। 


माघवस्य शति प्ते सप्रम्यां नियतन्रतः । 
प्रातःख्ञाला तिलैः शक्लः इएक्तमाच्यानुलेपनः। 
स्थण्डिले पद्ममालिख्य कुङ्कुमेन सकणिकम्‌ 
तङ्िन्नमः सविते ठ गन्धः चूपौ निवेदयेत्‌ । 
स्ापयेदु दकम्भन्त शकरा पाचसंयुतम्‌ 
एक्तवस्तेरलङ्कत्य शरक्ञमाच्यानुलेपनेः । 

सुवन समायुक्तं मन््ेणानेन पूजयेत्‌ । 
विश्वदेवमयो यस्मादेद्‌ वादेषु, पच्यसे । 
सब्बेस्याग्तसमेव त्वं ततः शान्तिं प्रयच्छ से। 
पञ्चगव्यन्ततः पौवचा खपेत्तत्पाश्वैतः चितौ । 
सौर सक्तं सरन्नास्ते पुराणएश्रवणेन तु 
श्रहोराते गदे पश्चादष्टम्यां छतनेत्यकः। 

तत्‌ सव्वं वेद्‌ विदुषे ब्राह्मणाय निवेदयेत्‌ । 
भोजयेच्छक्तितो विप्रान्‌ शकराषटतपायसेः ॥ 
सुश्खौतातेललवणं खयमष्यय वाग्यत. । 

चरनेन विधिना स्वं मामि मासि र्माचरेत्‌ । 
सवत्छरान्ते शयनं श कंराकमलारन्वितम्‌ । 

सर्व्वा पसर संयुक्तां तथेकां गां पथखिनौम्‌ । 
ग्टश्च शक्तिमान्‌ दद्यात्‌ समस्तोपसकरान्ितम्‌ । 
सहखेणाय निष्काणणं कला ट द्याच्छतेन वा । 


"न = ~~~ --+-*~ ~~ ----~-~ ~ ~~ - ~~ ~ ~~ =-= = ~ ~~~ न नानजजम्‌ ७ि 


९ 2 वेदवारौति। ? कसा 


छत्यरनाकरः | १,५६८ 


1 


निष्कः कषः पलं वा श्रत्यलुसाराङ्खावस्या । 

द्‌ शरभिर्वाथ निष्केण तद द्धंनापि शक्रितः। 

सुवणेञ्च प्रदातव्यं पृव्वेवत्‌ ख स्तिवाचनम्‌ ॥ 

न विन्तश्राख कुर्व्वीत कुव्वेन्‌ दोषान्‌ समश्रुते । 

श्रन्टतं पिवतो वक्तात्‌ खुय्यैस्याश्टतनिन्दवः॥ 

सन्िपेतुधेरप्ां ये शालिसुद्गे्चवः स्मृताः । 

शकरा परमा तस्मात्‌ दचखाराण्टता त्मिका ॥ 

दष्टा रवेरतः पुण्या श्कंरा हव्यकव्ययोः । 

शकंरासप्तमो देषा बाजिभमेधफलप्रद्‌ा । 

सब्वैद्‌ःखप्रश्मनो पुचपौ चम्रबद्धेनो ॥ 

यः कर्य्यात्‌ परया भक्या स पर ब्रह्म गच्छति। 

कल्यमेकं वसेत्‌ खगं ततो याति परां गतिम्‌ । 

इदमनघे प्रटणोति यः सरेदा 

यदि पठतोह सुरेश्वरस्य लोके । 

मतिमपि च ददाति सोऽपि दवै- 

रमर बधूजनमालयाऽभिपूज्यः ॥ 

दति मत्यपुराफे शकरासप्तमोवत्रतं समाप्तम्‌ ॥ 
रह्यपुराणे- 

वेश्राखे प्रक्तसप्तभ्यां जाक्वो जन्भूना पुरा । 

क्रोधात्‌ पोता पुनस्यक्ता कणेर न्नात्त दकिणान्‌ ॥ 

तां तच पूजयेदेवों गङ्गां गगनमेखलाम्‌ । 

अष्टा विंश्रतिमे प्राक्च विष्णः कलियुगे सति । 


१६० क्त्यरनाकरः | 


शाक्यान्‌ विनष्टघन्मौ ञ्च बुद्धो भाऽपवन्तेयत्‌ । 
तच पन्यो भविव्योऽषौ पुव्यादिदिवसच्रयम्‌ । 
€ ॐ. ५ ॐ € > (च्‌ 
सब्वाषधेः सव्वंगन्धेः सब्वबोजेख सव्वंदा । 
[} £ > € 4 

बुद्धार्चा्लपनं काय्य शाक्यो क्तव चनः प्रुभः ॥ 

अरां प्रतिमा । 
सुविचित्राणि कार्य्याणि चेत्यदि वग्णहाणि च । 
पूञ्याः शाक्याश्च यतयः पुस्तक हार चोवरेः ॥ 
पुष्यवस््ानदानञ्च देय टौ नजनस्य च। 
चिदिनञ्चोह्छवः कार्य्यो नटनन्तेनखङ्कुलः । 

भ 
रच वेश्राखश्रक्तसप्तम्यामित्युपक्रमात्‌ पुखादिदिवसचय- 
भित्यमिधानात्‌ पुखयुक्तवे शा खशटक्तस्तम्यां वुद्धार्चादि गङ्गा 
पूजा तु केवलायामपि। 
देवौ पुराणए- 
ब्रह्मोवाच । 
~ = क्‌ 

सहकार फलेः स्नान वेशाखे दयष्टमोषु च । 
रात्मानं देवतां खला मांसो-बालकवारिभिः। 
लेपनं फलकपूर धूपं पञ्चसुगन्धिकम्‌ । 
देव्याः प्ूजाञ्च कुरध्ौत केतक्या चभ्पकेन च। 
श्रवराच्षौरनेवेद्यं कन्याविप्रेषु भोजनम्‌ । 
श्रात्मनः पारणं तच्च दच्चिणणं शक्तितो ददेत्‌ ॥ 
श्रपराजिता भवानौ च भिवानान्ना च वाचयेत्‌ । 
प्नोयतां सव्वेकालं मे ई श्ितं मे प्रयच्छतु ॥ 


कछत्यरनलाकैरः | २६२. 


स्तौ थाभिषेकन्ट च्रनेनाप्नोति भागेव ¦ । 
सव्येलोको भवेदन्ते तन्तच्यो जायते खदा ॥ 
्रचापि दरक्तैवाष्टमो प्रक्रमात्‌ वेश्ाख दत्येकवचनानुरोधा- 
दष्टमोष्विति बह्वचनमविवकछिताये वाध्यलात्‌। सहकारः 
सुरभिचतः, मासौ . जटामांसो बालक वार दति प्रसिद्ध 
लेपनं लिप्तो करणं पञ्चसुगन्धकं जिन्धृकाग्‌ कपू रसितचन्दन 
गृग्गृलधेपमिति केतक इेमकेतको । 
| विष्णएधर्मोत्तरे । 
वैश्राखप्रक्तदाद्वां रकादानं तथेव च । 
श्र तयेव चेति वचनात्‌ पू व्वप्रसतुतमचय्यं फलम्‌ । 
वरादहपुराणे- 
दुरवांखा उवाच । 
वेश्राखेऽप्येवमेवन्त॒ संकर विधिना नरः । 
तदत्‌ खानं खदा क्वा ततो देवालयं ब्रजेत्‌ ॥ 
तचाराध्य हरिं भक्ता एमिरमेन््ेवि च्चणः । 
जामदन्धाय पादौ तु उदरं सव्वधारिणे॥ 
मधुखूदनायेति कटिसुरः ओरौवस्सधारिणे । 
चान्तकाय बाह च मणिकण्ठाय कण्ठकम्‌ ॥ 
खनान्ना शङ्खन्चक्रे तु शिरो ब्रह्माण्डधारिणे । 
एवमन्ये मेधावो प्राम्बत्तस्याग्रतो घरम्‌ ॥ 
विन्यसेत्‌ स्थगितं वस््युगया च विगरेषतः । 


= थि [1 क 
वेणबेन तु पाच्णं तस्मिन्‌ सस्था पयेद्ध रिम्‌ ॥ 
२१ 


छल्यस्नाकरः | 


जामदन्येन ख्पेणए क्ता सौवणंमयतः । 

द चिणे परश्रं हस्ते लस्य देवस्य कारयेत्‌ ॥ 
स्वेगन्धेश्च सम्यूज्य पुव्यर्नाना विधेस्तया । 
ततस्तस्याग्रतः कुय्याच्ना गरं भक्तिमान्‌ नरः , 
प्रभाते विमले खय्यं बराह्मणाय निवेरयेत्‌ ॥ 
श्रासोद्राजा महाभागो वोरसेनो महावलः । 
श्रपुच्ञ महातौन्रं तपस्तेपे महायशाः ॥ 

चर तस्त तपो घोर यान्नवरूक्यो महामुनिः 
्राजगाम महायोगो तं दरष्टुं नातिदूरतः॥ 


राजोवाच । 


कथं मे भविता पुः खल्यायासेन वे दिज | 
एतन्मे कथथ प्रौत्या भगवन्‌ प्रणतस्य वे ॥ 
एवमुक्तो मुनिस्तेन पाथिवेन यश्रखिना। 
आचख्यौ इादग्नोञ्चेमां वैशाखस्ितिपचजाम्‌ ॥ 
स॒ हि राजा विधानेन पुच्कामो विग्रेषतः। 
उपोग्य लब्धवान्‌ पुचं नलं परमधािकम्‌ । 
योऽद्यापि कौत्येते लोके पुष्श्चो को नरोत्तमः ॥ 
प्रासङ्गिकं फलं देतत्‌ त्रतस्याख्य महामुने । 

यत्‌ पुचो जायते वित्त विद्या वा कान्तिरत्तमा । 
दृह जन्मनि किञ्चिचं परलोके ्टणष्वमे॥ 
कल्ये क ब्रह्मलोक सुषित्वाऽ्छरसां कुलेः । 


१4 8 दुर । 


छत्यरनाकरः । ९६द्‌ 


करड्न्ति ते पुनः ष्टौ जायन्ते चक्रवर्तिनः । 
विशत्‌ कल्पसहस्राणि वन्ते नाच संग्रयः ॥ 
एवमेवेत्यनेन दश्रम्यां नियतात्मवानित्यादि करतोयेन 
मानव इत्यन्तेन बोधितेतिकन्तेखता मक्छदाद्‌ शनौ नतौयाः परा- 
ग्टव्यन्ते । संकल्प एकादश्यां निराहार इत्यादि वाक्योचारणशं 
क्रत्वा तददिति ततः प्रभाते विमले इत्यादि कुण्डमालिख्य वे 
जले इत्यन्तेनोक्े तिकन्तेवयतां इत्वा । कण्ठक गलं, खनास्ेति 
शङ्खग्चक्रनाश्ना वस्तरयुगया वस्ल्युगेन वेणवेन वित्यनेन घटोपरि- 
भ्थितवेणवपाचधारण विवितम्‌ । सव्वेगन्धाः परिभाषाया, 
ब्राह्मणाय निवेदयेदिति प्रतिपादयेत्‌ । 
ब्रह्मपुराणे । 

वैशाख्यां पौणेमास्यान्त्‌ खष्टाः कमलयोनिना । 

तिलाः छष्णाश्च गोराञ्च ठप्तये मव्वदे-हिनाम्‌ ५ 

तस्मात्‌ काय्यं तिकलैः ञानं तचार ज॒डयान्तिलान्‌ । 

निवेद येच विधिवत्तिलपाचन्तु्‌ विष्णवे । 

तिलतेलेन दौपाशच देया देवेभ्य एव च ॥ 

सोदकेख तिलैः ञानं कन्तेवयं पिरत पंणम्‌ । 

तिलेः समधुभियेक्तं त्राद्यणेभ्यञ्च भोजनम्‌ ॥ 

दातव्या द्किण चापि तिलेमेधुयुतैः सह । 

मन्तं जपेच पौराणं पारग्यय्यक्रमागतम्‌ ॥ 

ॐ तिलाः सोमदैवत्याः सुरैः ख्ष्टास्ट गोसवे । 

सखगेप्रदाः खतन्त्राञ्च ते मां ,रचन्त्‌ नित्यः ॥ 


१६४ क्रत्यरलाकरः । 


दद्यादनेन मन्त्रेण तिलपाचाणि तच्च च। 
सप्तभ्यस्य पञ्चभ्यो ब्राह्मणेभ्यस्व॒ कौन्तयेत्‌ ॥ 
मोयतां घण्येराजस्त॒ देवांश्चान्यानयापि वा। 
एवं कते स सुक्तः स्यात्‌ पापैजंन्म्रता चितेः ॥ 
प्रीयतां घश्येराज दति कौत्तंयेदिति सम्बन्धः । 
यमः । 
वैशाख्यां पौणंमास्वान्त ब्राह्मणान्‌ सप्त पञ्च वा । 
चौ दरयक्रैस्तिलेः ङष्णे्वा चयेद्यदिं वेतरः ॥ 
प्प्रोयतां धम्मेराजेति यद्धा मनसि रोचते, 
यावच्नौवङ्खतं पापं ततषणादेव नश्यति ॥ 
तिले््राह्मणएभोजनं मरौयतां धम्मेराज दति वाचयेत्‌ यदा 
मनसि रोचते तद्ाचयेत्‌ । 
तेनायम्यैः। असुकदेवः प्रोयतामिति तदितरं वासुदेव- 
सुटिश् वाचयेदिति । 
तथाच ब्रह्मुपुराणएम्‌- 
तिलैः समधुभियेक्तं ब्राह्मणेभ्यश्च भोजनम्‌ । 
तथा । वेश्राख्यामेव विधिवद्खोजयेड्ाद्यणान्‌ दश्च । 
जिराचसुषितः साला छृशर प्रयतः श्टुचिः॥ 
गौरान्‌ वा चदि वा छृष्णान्‌ तिलान्‌ चौरेण संयुतान्‌ । 
दत्वा दश्रसु विप्रेषु तानेव खस्ति वाचयेत्‌ ॥ 


१ ^ ? वैश्णष्डयां पौेमास्यान्तु । 


छ्त्यरलाकरः | ९६५ 


प्रौयतां घम्मराजेति पिद्न्‌ देवांश्च तपेयेत्‌ । 
यावन्नौव्रह्ृतं पापं तत्षणएारेव नश्यति ॥ 
खस्ति वाचयेदिति दानाङ्ग सखस्िवाचनं प्रयतां धम्मराज 
दति दाता कौौन्तेयेत्‌ पिद्रन्‌ देवांञ्च तपयेत्‌ दति तपण 
पाव्वणश्राद्ं। रएतम्मधुतिक्लेरेव दानखुंकल्यानन्तरमेव प्रीयतां 
धम्मेराजेति कौत्तनं ततो दानं ततः खस्तिवाचनं ततः 
ओआद्धमिति दानसागर, 
एतत्त दानं ्राह्मणच्चियकन्तकमेव | 
चतुथंभक्रचपणं वश्ये शुद्र विधीयते । 
चिराच विह धम्मज्ञ विदितं ज्ह्मवादिनोः ॥ 
दति मदाभारतवाक्यवलात्‌ ¦ सागरोऽपेवम्‌ | 
श्रयुतायुतच्च तिष्ठेत खगंलोके न संश्रयः । 
मामेव तु न पश्चे्त॒ न च पापेन लिप्यते॥ 
मामेव यममेवेत्यर्थो यमवक्तकलात्‌ । 
जावालः । 


। 


ष्टतानसुद कुम्भञ्च दद्यादिमं विशेषतः । 
निदि श्च धम्येराजाय गोदानफलमा भुयात्‌ ॥ 
सुवणंतिलयुक्तेश्च ब्राह्मणान्‌ मक्त पञ्च च । 
तपेयेदुद पाचेश्च ब्रह्महत्यां पोहति ॥ 
प्टतान्न पक्वान्नं पक चोर-दविषोरित्यन्ये, निर्दिश्य निवेद्य । 
महाभारते । 
वेश्रास्यां पौणेमाख्यान्त्‌ तिलान्‌ ददयाद्भिजातिषु ! 


१६६ छ्त्यरलाकरः | 


तिला भक्षयितव्याश्च सदेवालभमञ्च तेः 
सदेवेति विचिस्तवायेम्‌ । श्रालभनसुदन्तंनम्‌ । 
काय्यं सततमिच्छङ्खिः अयः सर्व्वात्मना रहे । 
विष्णुः । 
वैशाख्यां पौणेमास्यान्त॒ ब्राह्मएसप्तकं चौ द्रयुक्रैस्तिलेः सन्त 
धम्मराजानं प्रौएयिला पापेभ्यः पूतो भवति। श्रच वैशाखो 
विश्राखायुक्ता तन्तन्नचच्युक्तसकलपौ णमः रोया चर्यात्‌, चोद मध्‌। 
देवोपुरारे । वेशखमधिङृत्य । 
दन्द्रा दिदैवते क्वे पौणंमास्ान्तयेव च । 
पूजां कला भवेड्द्यन्‌ विगताघो न संश्रयः ॥ 
इन्द्रा िदेवतं विग्राखा । पूजा देयाः । 
मदहाजनपरिग्णहोतवाक्यम्‌- 
मोदकानुदङ्खम्भांख पक्ान्नसहितान्नरः। 
दलाऽस्यां पौणंमास््ाञ्च ब्रह्मलोके मरौयते ॥ 
्रषादुौौ कान्तिकौ माघो वेशाखोषु च यत्‌ रतम्‌ । 
तदनन्तफलं प्रोक्त सानदानजपाटिकम्‌ ॥ 
भविव्यपुराणे वेशराख्यधिकारे सुमन्त्रुवाच-- 
सोमन्रतन्तया चान्यच्छङ्कर प्रोतये श्रटण, । 
तापाचं पथःपूणं कला तत्‌स्यञ्च शङ्रम्‌ ॥ 
प्रच्छाद्योपरि वस्त्रेण गन्धपुष्या्िंतं नृप 
शिवभक्त दिजे दद्यात्‌ भोजयित्वा विधानतः ॥ 
प्राच्यां समुहे चन्द्रे प्रतौच्याञ्च रवौ गते। 


क्त्यरल्ाकरः । २६७ 


पौणेमाखाच्च वेशाख्यां गद्य पाचं शरिवायतः। 
प्रौयतां मे महादेवः सोममूलिजेगत्पतिः | 
तस्त विप्राय त पाचम्पयेद्धक्रितः शनेः ॥ 
एतत्‌ सोमव्रतं नाम क्वा सोमान्तिक ब्रजेत्‌ । 
रद्रलोकात्‌ परिभ्रष्टो भवेत्‌ जातिस्मरो नरः 
^पूजाभ्यारुवलेनेव पुनः श्रिवपुरं जञेत्‌ ॥ 
प्रौयतां मे महादेवः सोममू्तिजेगत्पतिरित्युक्रा प्रूजाभ्यासे 
पौनःपुन्ये । 
मव्खपुराएे । 
ब्रह्मणा भिदितं पववे यावन्ाचं मर चये । 
ब्राह्यं तद्‌ शखाहखं पुराणं परिक त्तऽते ॥ 
लिखित्वा तच्च यो दद्यात्‌ जलघेनुसमन्वितम्‌ । 
वैशाखे पौणमास्यां स ब्रह्लोके मरहोयते ॥ 
वेशास्यधिकारे वसिष्ठः- 
सुवणेनाभ कला तु सुरं छष्णमा्ंकम्‌ । 
तिलेः प्रादय यो दद्यात्‌ त्य पुण्छफलं ष्टण, ॥ 
ससमुद्र गृहा तेन सगरलबनकानना । 
चतुरणां भवेदृत्ता एयिवो नाच संश्यः ॥ 
छष्णम्डगसम्बस्वि च्म । 
विष्णः 


श्रय वेश्राख्यां पौणंमास्यां कृष्णा जिनं सरवुरं सुवणप्ररङ्खल- 


५ ~> म~~ नन म ~~ = ~~~ ~~ ~~ 





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२ 7 पूजभ्यासे ल्वमेनेव । 


९६८ छत्यरनाकरः | 


षितं कला आविके वस्त्रे प्रसारयेत्‌ ततस्तिलेः प्रच्छादयेत्‌ 
सुवणेनामच्च कुर्य्यात्‌ । चतर्षु दिचु चारि तेजसानि पाचाणि 
चोर-दधि-मधु-सपिः-पूर्णानि निधायादिताग्रये ब्राह्मणाय वासो- 
युगाच्छादिताय दद्यात्‌ । 
मतत्रपुराणे । 
छष्ाजिनप्रदानस्य विधि कालं ममानघ) 
जाह्यणञ्च समाचकच्त तच मे मश्रयो महान्‌ ॥ 
ओ मव्य उवाच । 
वेशाखौ पौणेमासौ च ग्रहणं चन्द्र ुय्येयोः । 
पौणेमासो तथा माचौ श्राषादढ्ो कात्तिंकौ तथा| 
उन्तरायणे च द्वादश्यां तम्यां दन्तं महाफलम्‌ ॥ 
अआहिता्निदिजो यश्च तदेयं तख पांव । 
यथा येन विधानेन तन्प्रे निगदतः श्ररण ॥ 
गोमयेनोपललिप्रे तु प्रटचौ देशे नराधिप) 
श्रादावेव समास्तौय्ये शोभनं वस््रमाविकं ॥ 
गो मयोपलेपादेव श्टचित्वे प्राप्ते युनः इचाविति पदं 
गोमयोपलेपेऽपि कते केश्को खादिवारणाचम्‌ । 


ततः सश्रटङ्ग सखुरमास्तरेत्‌ छष्णमागे कम्‌ । 


्रास्तरेत्‌ प्राग्गौवसुपरिखलोमकञ्च ““ चर्ा्युत्तरलो मानि 
प्रागयौवाणोति कात्यायनवचनात्‌ । मागेकं स्गसम्बन्धि | 


कन्तव्यं रुकष्ङ्गन्तु रुष्य न्तन्तयेव च । 


क्रत्यरनाकरः। १६९ 


मच्छपुराणे तयान्येष्वपि निबन्धेषु रूप्यदन्तमिति पटो दृष्टः 
तेन दानक्षागरस्य र्क्मद्‌न्तमिति पाट उपचितः । 
लाङ्गुलं मौ करिवी्ुतं तिलकनन्तथेव च , 
तिलञेरात्मसमं छता वासखाष्कादयेदुधः ॥ 
श्रात्मसमं कला सब्वतः छष्णाजिनाच्छादकं तिलं छलेत्ययेः । 
सुवणेनाभं तत्कुर््यादलङ्कवयादि शेषतः । 
रबनगेन्धेयेयाश्या तस्य दच्च च विन्यसेत्‌ ॥ 
रन्नैरिति परिभाषोक्रनवरन्नमध्ये यथालम्धेन रन्नजयेण 
गन्धेरिति प्रसिद्धचन्दनादिभिः। 
कांस्यपाचराणि चैलारिं तेषां दद्याद्यधाक्रमम्‌ । 
स्टसर्सयेषु च पाचेषु पूर्वादिषु क्रमेण तु ॥ 
छतं स्तीर दधि च्तौद्रमेवं हुर्य्याद्यथाविधि। 
चौर मधे । 
चम्पकस्य तया शखामन्रण कुम्भमेव च ॥ 
वाद्यो पञ्थानकं क्रला श्टुचिविन्लो निवेशयेत्‌ । 
जोणैवस्तरेण पौतेन सर्व्वाङ्गाणि च माव्नेयेत्‌ ॥ 
एतच्चम्प्रक शाखा जितस्य कुम्भस्य दानटेणदह्िः सखापन पोत- 
वाससा दानोत्तर्ञानानन्तर मङ्गमाच्जेनञ्च॒ यजमानेन कन्त 
तस्येव प्रकतल्रात्‌ । 
धातूमयानि पाज्राणि पादेष्वस्य प्रदापयेत्‌ । 
यानि कानि च पापानि मया लोभक्ृतानि च॥ 
लोहपाचप्रदानेन प्रणण्यन्तु ममाश्ट वे। 


ग्र 


९७० छ्ल्यर्नाकरः | 


तिलपुणेन्त॒ तत्‌ क्त्वा वामपादे निवे श्रयेत्‌ ॥ 
यानि पापान्यकाम्यानि कर््मात्थानि छतानि तू । 
कास्यपाच्रप्रदानेन तानि नश्न्तु मे मदा ॥ 
मधुपरणन्त्‌ तत्‌ छतां पादे वे दक्चिएे न्यसेत्‌ ॥ 
परापवाद पेष्न्यात्‌ ध्णष्टमां खस्य भच्चणात्‌ ॥ 
"तचोन्नोतञ्च पाप्म तान्नपाचात्‌ प्रणश्यतु । 
कन्यानृतं गवाञ्चेव पर द्‌ारप्रधषेणम्‌ 
रोष्यपाचप्रदानाे चिप्रं नारं प्रचान्त्‌ मे, 
ऊद्धंपादौ लिमौ कार्यं ताच्नस्य रजतस्य तु ॥ 
सम्बन्धिनाभिति विवितम्‌ । 
कल्पतरो तु- 
ऊद्धंपादे विभे कायं दति पटिला एकवचनमलविवच्ित- 
भिति वयाख्यातम्‌ । 
ऊद्धपादावय्रपादौ तयोख्च वा करमेणेव पाच्रारोपणं पश्चात्‌ 
पादयोः तथाश्रृतेरिति दानक्षागरः। 
जन््रजन्मसहसषु छतं पापं कुबृद्धिना । 
सुवणपाचदानान्तृ नाश्रयाश् जनार्दन ॥ 
हेमशुक्रा विद्रुमञ्च दाडोमं बोजपूरकम्‌ । 
प्रशस्तपाचश्रवणे गुरे श्टङ्गाटकानि च। 
दामसागरे । 
अचाग्रपाद दयस्य पाच्रदयस्यानुपदिष्टस्थानकसौ वणेपाचसश्य अवण 





१ ए दथा २ 7 तबोल्यितच्च | 


छत्यरल्ाकरः । १७१ 


इति कणेस्थानद्यस्येति पञ्चानामाधारतयाऽवगतेराधेयद्रयाणा- 
मन्ट्षाच्चाञ्चते हंमसुक्तादौनां पञ्चानां त्राधेयल्ं यथासंख्य 
सुज्ञेयम्‌ । पाचञ्च अवरे च दति पाचश्रवणं श्रनिदिषटस्यानस्य 
च सौवणेपाचस्य मध्यस्थान एव निवेशः । 
सुवणेनाभिकं दद्यात्‌ प्रौयतां इषभध्वजः । 

दति पुनः सुवणनाभिकलश्चतेः । 

एवं सुवणनाभं तत्‌ कुर्यात्‌ रति प्रथमयन्येन मध्ये सुवणा 
स्था्यमिति सिद्धं दविधा सुवणेनाभिकलमिव्युक्म्‌ । 

भरूपालस्तु-- मध्यप्रदेशे सुवणेपाचमचतपूण जन्मजन्ममहसेषु 
दूत्यादिना मन्लेण निवेग्रयेत्‌ ततो हेमादि पञ्चकं तच दद्यात्‌ । 
तथा प्रशस्ते पाते अवणएयोदद्यादित्याह स्म । 


ॐ, 
युक्र्चतत्‌ । 
न्ये तु अवणाधारकप्रश्रस्तपात्े सुवर्णादिपञ्चकधारण- 
मेकवाक्यताद्युपरोधादित्या्कः । 


खुरे श्टङ्गारकानि सिष्ठमन दृति प्रसिद्धानि फलानि 
योज्यानि खुरेषु देयानोत्यथेः। 
एवं शता यथोक्तेन सरव्व॑शराकफंलानि च । 
तत्‌ प्रति्रहविदिदानाडिता्िदिजोत्तमः॥ 
एवं कृतेति खुरेष्वेव नानाजातौयश्कानि फलानि च 
नानाजातौयानि देयानौत्ययेः । 
खातो वस्तयुगच्छन्नः ख श्या चाप्यलङ्कलः । 
प्रतियदश्च तस्योक्रः पुच्छदेशे महोपते ॥ 


९७२ क्लत्यरन्नाकरः । 


सुवणेनाभिकं दद्यात्‌ प्रयतां इषभष्वजः। 
ञ्रनेन विधिना दद्यात्‌ न यावत्‌ ष्णमार्भकम्‌ ॥ 
न स्पृश्य: म ददिजो राजन्‌ चितियूपसमो डि मः। 
दाने च \्यज्ञकाले च दूरतः परिवन्लेयेत्‌ ॥ 
खग्रदात्‌ प्रच्य विप्रं तं मण्डले लानमाचरेत्‌ । 
परणेकुम्भेन राजेन्द्र शाखया चम्पकस्य च । 
छत्वाचाय्येश्च कलसं मन्त्रेणानेन मूद्धेनि ॥ 
आचार्याऽच कृष्णा जिनविष्य॒पदेष्टा । 
श्च दानखागरे । 
श्राप्यायतां ससुद्रस्य चो जघ्यास्तु षोडश्र । 
दति पारिजातलिखितं भरापयायतामित्येका खक्‌ । 
समुद्रस्य दारकथेति पञ्चद श एवं षोडश भवन्तोति याख्यातम्‌ । 
छष्णङृष्णा चलोदर इत्यादिमन्त्रस्द न लिखितः 
तदस्पिहितं इम्मं नोला चप्यं चतुष्यये । 
छतेनानेन या श्यष्टिने सा शक्या श्रतेरपिः॥ 
यष्टिः फम्‌ । 
फालं वक्त, नृपश्रेष्ठ तयाष्यद तः श्ररण । 
समयश्दमिदानस्य फलं प्राप्रोत्यसंश्रयम्‌ \ 
सरववौश्च लोकान्‌ जयति कामचारौ विहङ्गमः । 
कल्पतर्‌कारादिभिः- 
श्रा्यायसख समुट्रज्येष्टा चो ज्या "षोडश । 


ना = तामा म ण ------0--ाााा ाा  =  + 


१ 8 ब्रादइ--। । २.8 सुरे-- । 


ज्ल्यरनाकरः | २,७द्‌ 


इति भच्छपुराणएलिखितं ्राष्यायखखेत्यष्टो चः समसुद्रज्येष्टा 
दत्यष्टौ खड दति व्याख्यातम्‌ । 
प्रतिग्रहश्च तस्योक्तः पु चछदेभ महोपते! ॥ 
दूव्यतःपरम्‌ । । 
लत एव समौपे त॒ मन्लमेनसुदौरयेत्‌ , 
छृष्एछ ष्एा चलो देवः छव्णा जिनवर स्तया ॥ 
तद्‌ानाङ्तपाप प्रौयतां मे नमो नमः । 
जयस्तिग्रत्‌ पुराणानां वमाधारे यवखितः ॥ 
कष्णोऽसि मून्तिमान्‌ साचात्‌ कृष्णाजिन नमोऽस्त ते । 
खुवणेनाभिकं दद्यात्‌ प्रौयतां मे ठषध्वजः ॥ 
दूति म्ब्छपुराण एव लिखितं मन्त्रस्यास्य दानेऽपि 
विनियोगो दितः । | 
अतो मच्छपुराणे मन्त्र्‌ शरेनात्‌ कल्यतरुकारादि भिश्च तद्पा- 
दानात्‌ निबन्धान्तरेषु ;तदद्‌श्रेनमवाधकम्‌ । 
श्रायायखेत्यष्टो खच दत्यचाष्टमौ देवानामित्यादि समुद्र 
व्येष्टठा इत्यच्ाष्टमो यः पुरतो निरत इत्यादिका 
श्राभ्तसश्चवं यावत्‌ खग प्रप्नोत्यसं्रयम्‌ । 
न पितुः पु्रमरणं वियोगं भाय्येया सह । 
धनदे शपरित्यागं नेव चेहाधरुयात्‌ कचित्‌ ॥ 
छष्णाच्चतं छष्णम्डगस्य चम 
दला दिजेद्धाय समाहितात्मा) 


१ 1) तचोत्धितच्च । २ 8 तदष्टेनम्‌ । 


९७४ छ्त्यरनाकरः। 


यथोक्तमेतत्‌ मरणं न शोचेत 
प्राप्नोत्यभोष्टं मनसः फलञ्च ॥ 
अच यजमान उक्तानां ममयानामिच्छयाऽन्यतमे स्तात: 
ष्यचिगोमयोपलिक्ते श्रपनोतकेग्रकौटादौ गभिमागे सुरूपं 
यथाशक्ति कम्बलमास्तोय्ये तच सयुर सश्रटङ्ग छष्णाजिनमास्तौय्य 
सो वणेश्रङ्गरष्यद न्तपक्तिदयं सुक्रासर लाङ्गुलयुतं मध्यसानापित- 
सुवण छत्वा सव्वेतस्तिलेराच्छद्य वाससाच्छादयेत्‌ । 
ततः शक्या विगरेषतो रनगन्ेश्चालङकर््यात्‌ ततः पूर्वादि दिचु 
चलारि कांस्यपाचाण्ठन्यानि च गश्टए्मयानि पर्व्वादिदिच छत- 
चोरदधिमधुपृर्णनि दयात्‌ । 
एवं छला प्रदानग्रदे शाददिलिश्रे मण्डले सानयोग्ये प्रदेश 
चन्पकश्राखायां जलपणेमत्रणच्च कुम्भ पौतञ्च जौणेवस्तं ्रोभनं 
मरव्वाङ्गमाज्जेनाय इएभवचिन्तो निवेशयेत्‌ । 


ॐ यानि कानि च इति मन्त्रेण तिलपरूणं लौ हपाचं पञ्चा- 
दामप्रदेशे ्रारोपयेत्‌ । 

ॐ यानि पापान्यकाम्यानौतिमन्त्नेण मधुपूणे कांखपाचं ` 
पञ्चाद्‌ च्िएपादयो रारोपयेत्‌ । 

ॐ परापवारेत्या दिमन््ेण मधुपं तास्रपा्रमय्दकिणएपाद 
श्रारोपयेत्‌ । 

ॐ धान्यानृतमित्यादि मन्त्रेण तिलप्रणं रौष्यपाचं अयवाम- , 
-पाट्‌ श्रारोपयेत्‌ ।. 


क्यरनप्करः | १२७५ 


9 


ॐ जन््रजन््सदसेषु इति मन््ेणाच्तपूणं सौ वणेपाचे मध्य- 
स्थन श्रारोपयेत्‌ । 

ततो डेमसुक्ताविद्रूमदाडोमवोजपूरकानि तच च दद्यात्‌ । 
तथा प्रशस्ते पारे श्रवणएयोरंद्यात्‌ खुरचतुष्टयं श्टङ्गाटकयुत् 
कुर्य्यात्‌ । सब्वेशाकं फलानि च ययाखानं दद्यात्‌ । ततः 
प्रतियदवेदिनं विद्ांसं त्राह्मणएमभ्निद्ोचिण सातं वस्तयुगेनााद 
यथाशक्ति डमाङ्करोयकादिभिरलङ्कत्य छष्णाजिनपुच्छमदे े 
उपविश्य । 

ॐ लष्ण ङष्ण दत्यादिमन्त्सुदौय्ये सखुवणेनाभिक सोपस्कर - 
रष्णाजिनं, (त्म्यं) मरौयतां मे टषभध्वज दत्युक्रोदकपूव्वं दघ्यात्‌। 
ततस्तं ब्राह्यणं खग्गात्‌ प्रच्छ गन्धत्ला इति मण्डले स्लानं 
कुर्य्यात्‌ श्राचाय्यैः पूव्व्यापितकलश्माद्‌ाय यजमानमूरदधोपरि 
खहस्तोख्िप्त निधाय-- | 

ॐ श्रा्यायखेति खगष्टकं । ॐ समुद्रन्येष्ठेति गष्टकं 
च ज्वा पयेत्‌) ततो यजमानो जो ण॑पौतवासखा माज्जितो 
हते वाससौ परिघधायाचान्तः ्रटचिभेवति । ततस्तत्‌ पौ तवस्तरं 
कुम्भसद्दितं ग्रद्ौला चतुष्यये चेपनोयम्‌ । 
दलि कल्पतरूभ्पालयोरनुमतः प्रयोगः| 


(रिम 


कालिकापुराणे, 
 का्तिक्यामथ वेशाख्यामयनादिषु पव्वेसु । 
दला दौपान्‌ समुद्ोष्य देवस्याग्रे बलिं ततः ॥ 


९.७६ 


कछ्यर्नाकरः। 


गतानां देवदेवस्य राज्यादिषु भवेत्‌ खधोः। 
ख त्रतौ देवमामन्त्य खपेद्भूमौ हरि सरन। 
उपलिप्य दं गत्वा मिताहारो निशि खपेत्‌ ॥ 


. च्रपरेऽहनि पूर्वाह्ण गत्वा त्रैव मन्दिरम्‌ । 


कारयेत्त महास्नानं हराय विधिवच्छरण ॥ 

पञ्च विश पलं लिङ्घ श्रभ्यङ्खः कारयेदय | 

शिवस्य सर्पिषा खान प्रोक्तं श्रतपलेन च॥ 
तावता मधुना चेव दघ्ना चेव ततः पुनः। 
तावतेव हि चौरेण पञ्चगयेन वा ततः॥ 
ग्यः साद्धेसदखेण पलानामच्रेण तु । 

रसेन कारयेत्‌ लानं भक्या चोष्णाम्बना ततः ॥ 
शरो ताग्बना तथोदच्ये वस्लपूतेन मन्लवित्‌ ' 
खापयेद् कितो श्यो गन्धमन््रस्थितेन तु । 
विधिना स्लाप्य चानेन लिङ्घ रोचनया लिपेत्‌ । 
कुष्टकुङ्म कपूर चन्दनागुरुयुक्रया ॥ 

लेपयिला ततो लिङ्गमापोढटान्तं घनं प्रभम्‌ । 
नोलोत्यलसदहखेण मालां बद्धा प्रपूजयेत्‌ ॥ 
श्रलाभे त्‌ सहस्ताणामद्धाद्धना पि पूजयेत्‌ । 
उत्पलानामभावे तु पजर श्रौ तरो यजेत्‌ ॥ 


श्रो) तरो विंल्वश्य । 


पदेव चग्पक्र्वापि जात्या पारलयाऽपि वा। 
पुज्ञागेः कर्णिकारश्च श्वेतमन्दारजेरपि ॥ 


` कछव्यर नाक्रः | ९७७ 


द मने्मरवरीर्वापि शमो-शक्ताकं-नागरेः। 
ययालाभञ्च पर्र्वा नियग्खय च मलोज्दितेः॥ 
प्रपूज्य कार येद्धक्या सुगन्धि पुष्यमण्डलम्‌ । 
गग्गल छाज्यसयुक्तमरर्‌ वास्ति दहेत्‌ ॥ 
सम्यूज्य गौ रौभन्तारं गौतवादिचमङ्गलेः । 
श्रालिपिष्टोद्धतः सिद्धे रतपूर्ैः ससुज्लेः ॥ 
ततो नौराजनं दपः षटजिग्द्धिश्च कारयेत्‌ , 
सषपैदेधिमक्रेशच दूर्व्वागोरो चनाचतेः ॥ 
गन्धपुष्योदक दद्यत्‌ श्योऽष्यं चिन्त्य श्ङरम्‌ । 
चामर दपंणश्चेव दौ पटच प्रदापयेत्‌ । 
धूपं साधारणश्चैव खघ परणमेव च । 
वितानक-ध्वजौ दधात्‌ किङ्किलौवरकान्ितौ ॥ 
साधारणं शिवपरूजासाधारणं किञ्चिदपि प्रण घटं दथ्ादि- 
न्यः । 
श्रयाष्टाभिः चिलि पौद्य खाङ्गेभेकया तु दण्डवत्‌ ! 
ततः किञ्चित्‌ पठेत्‌ स्तोच शङ्करं भवश्ङ्रम्‌ ॥ 
प्रदक्विणं ततो गच्छेत्‌ नेनि मां ख्यवल्नेकः । 
परणम्यो स्ततः पश्चात्‌ नेवे्यञ्च निवेदयेत्‌ ॥ 
दौनान्धङृपण्णं सैव श्रागतांशच बुमुचितान्‌। 
तपंेद पानेन सर््बानासमगोचरान्‌ ॥ 
पलानां दे सदसे त मदाखञान प्रकौत्तितम्‌ । 
कुर्ययादेतत्‌ महा्ञानं विधिनानेन धम्मोविद्‌ ॥ 


१७८ छत्यरनाकरः | 


कारयेद्यः शिवे भक्तया तख पुष्पफलं श्ण । 

समुद्धव्य शतं सायं कुलानां पापवजिंतः ॥ 

भवान्तं ब्रद्मलोकान्तं भुक्ता लोकानगेषतः। 

ब्रजेत्‌ करौड़ापुरे तस्मिन्‌ विमानस्ोऽमरचेतः ॥ 

मुक्ता यथेख्धितान्‌ भोगान्‌ शिवसायुच्यतां व्रजेत्‌ । 

मायावितानसु्छन्य चान्ते योगमवाभ्रुयात्‌ ॥ 

केवत्तेनाप्ययाज्येन दध्ना गव्येन चेव वा। 

पयसा पञ्चगव्येन मधुनेचुरसेन च ॥ 

यः कारयेत्‌ मदास्तानं विधिनानेन मन्लविद्‌ । 

सोऽपि, तेनेव मागण गभिय्यति परं पदम्‌ ॥ 

विधिनानेन निष्टौयः सानं तोयेन कारयेत्‌ । 

नराणं विंशति यावत्‌ सोऽपि यास्यति तत्‌ पदम्‌ ॥ 

अन्तरा सियते यस्तु श्रपूरे नियमे तथा । 

सोऽपि गच्छेत्‌ पद्‌ तन्त भ्रिवभक्या त्रतद्धितः॥ 

एवभेव हि ध्यय राशिधेग्मेविवष्जिते । 

मन््युक्रो ऽचयेद्यस्ठ नातः पु्योऽस्ति ध्वन्‌ ॥ 

कूम्मपुरा णे । | 
वे शाख्यां पौणेमास्यान्त ब्राह्मण्णन्‌ सप्त पञ्च वा । 
उपोय्य विधिना श्रान्तान्‌ श्एचिः प्रयतमानसः ॥ 
पूजयित्वा तिलैः रष्णेमेधुना च विगरेषतः । 
मरोयतां धश्राजेति यदा मनसि रोचते\ ॥ 





१ 8 वन्नेते | 


छत्यरन्नाकरः । २७९ 


यावन्नौवङ्घतं पाप तत्षणादेव नश्यति । 
यद्वा मनसि रोचते दति दष्टदेवताप्रोतये वा ॥ 
महासान्पिविग्दिक ठक्ुरश्रोवोरेश्वरात्मज महासान्वि विय- 
दिक ठक्ुरश्रोचण्डश्वरविर चिते छत्य रत्नाकरे 


वैशाखतर ङ्कः । 





अथ चेष्ठछत्यम्‌ । 
तच महाफलमित्यनुदत्तौ विष्णुधर्मोत्तरे । 
टृषसंक्रमणे दानं गवां प्रोक्तं तयेव च । 
महाभारते । 
प्रपाः कार्य्याः पराथेन्त॒ नित्यन्त॒ दिजसत्तमाः ! । 
सुङ्केऽप्यथ प्रदौयन्ते पानौोयानि विशेषतः ॥ 
निदाघकाले पानौयं यस्य तिष्ठत्यवारितम्‌ । 
स दुगं विषमं छृत्ल न कदाचिदट्वाभ्रुयात्‌ ॥ 
सचैव । 
कचदानात्तथा च्यषट सर्व्वान्‌ कामान्‌ समन्ते । 
श्रन प्रज्ञा दिव्येष्ठमासान्तगेताभिमतदिवसो यद्यो मासो- 
` लेखात्‌ रष्णादयुपट्टम्कविर हाच । 
छवो पानदइयोर्दानात्‌ ज्येष्टं मासि दिजोत्तमाः। 
्रचय्य फलमाप्रोति नाकलोकञ्च गच्छति ॥ 
रादित्य पुराणे । | 
| चेष्टे मासि तिलान्‌ दद्यात्‌ पौणेमास्यां विशेषतः । 


९८० छ्वयरुन्नाकहरः ¦ 


च्रशचसेधस्य यत्‌ पुण्ं तत्‌ प्राप्नोति न संशयः ॥ 
विेषत इति वचनात्‌ च्येष्ठमाखमातेऽपि तिलदानं तत्पूरि- 
मायान्तु फलोत्कषेः ¦ 
कामलपुराएे । 
उदक्ुममाग्बेनुच्च तालदन्त सचन्दनम्‌ । 
चिविक्रमश्य प्रोत्यथे दातव्यं साधुभिः षदा ॥ 
ददुकूपाटः छत्यसमुच्चय-कामधेलु-कल्यतरपु प्रायो दृष्टः, कचित्‌ 
पुस्तके अदकुमञ्च धेनुश्च इति पाटः। तेनोदङ्म्भश्च धेनुश्चेति 
सागर उपचितः । उद कुम्भाग्ठधेतुमिति प्रायशो द्ग्रैनात्‌ तस्ै- 
वोपादेयलम्‌ः । 
यचच क्विदुदकुमभश्च धेनु्चेति दृश्ते त्र ख्पधेतुरेव 
सेनोमेष्यार्थाबाधात्‌ । तालटन्तं॑तालब्यजनमिति कच्यतरौ, 
तालपचव्यजनमिति पारिजाते, ताक्परिमाएएवहृन्तं व्जनमिति 
चापरे । अनुक्रमेण मासद्‌ानकथने वेश्राखानन्तरमासस्य विव- 
चितत्रात्‌ चिविक्रमदेवतलाच वयेष्ठस्य लाभः सदे त्यनेनायेवादे- 
नादरद्योतनम्‌ । 
भविय्यपुराण। | 
सष्वैदेवमयौ देवौ साच्चात्‌ शले व्यवसिता । 
श्रनुग्रहाय लोकानां तस्मात्तां नित्यमच्वयेत्‌ ॥ 
सुमन्तुरवाच । 
इन्त ते वद्धि परम रहस्य पापनाशनम्‌ । 


कछ्त्यरलाकरः। ४: 


धन्य, यग्रस्यमायु्यं सव्वेदेवेरनुष्टितम्‌ ॥ 
काष्ठं वा काञ्चनं वापि चिश्लं चण्डिकात्मकम्‌ । 
लपयिला तु तं भका कुद्ुमेन विलिप्यते ॥ 
खतैविकशितिः पुष्पैः पूजयित्वा प्रणम्य च । 
गजे रथे हये वापि षभ वा नर्‌ा्पि॥ 
आरोप्य तु महाबादहो मणिकाञ्चनम्द्षितम्‌ । 
नानावादि चनिर्घेवैनरद्यघोपैश्च पुष्कलैः ॥ 
नयेद्‌ायतने देव्याः कतगोभं समन्ततः । 
दुर्गायाः पुरतः खाथ्वं दिल्वपरंश्च प्रजयेत्‌ ॥ 
प्रणम्य शिरसा देवों स्ववा चापि चमापयेत्‌ । 
चनेन विधिना देवौ पूनयिला त चण्डिकाम्‌ ॥ 
नरह्नरविष्एरुद्राचेः प्राघ्तन्तु परमं पद्म्‌ । 
एवं मन्य॒जयेदेवौ चश्रलारूतिमाद्रात्‌ ॥ 
मुच्यते च नरः पापेविष्लोकञ्च गच्छति , 
एतन्बहाव्रेतं पुष्यं शलप्रजा ख्यसुच्यते ॥ 
भक्तस्य ते मयाख्यातं महापातकनाग्रनम्‌ । 
एतच्च प्ूजाप्रकरणे दृष्टतया पूजारूपमेव ॥ 

तया। छ्ृला हेममय शूलं हेमपाचादिषु खितम्‌ । 
युष्यमालापरि चिघ्न वितानःवरशोभितम्‌ ॥ 
ग्टहोला तू ब्रजेदोर चण्डिकायतनं वरम्‌ । 


थिम ~~ [2 8 स ` षि ष ए, 7 7. 1 ए ष 2 ए ए 7 शा 7. (1 


१ 7 धम्प्ये। २ + विश्एल-- 


4 कछ्व्यरल्ाकरः। 


धारयेच्छिरसा पाचं नानावाद्यगणेनृप ॥ 
र्थ्यात्‌ प्रदच्चिणएश्चापि प्रणम्य शिरसा शविम्‌। 
विन्यसेदिधिवदधौर दुर्गायाः पुरतो नुप॥ 
य एवं विन्यसेद्धोर चिश्टलं विधिवन्नेप ॥ 
स गच्छति परं खानं यच देवश्चतुसंखः ॥ 
तया। आलयः सबव्वे्टतानां निशूलं देवनिभ्मितम्‌ । 
तस्मात्तं पूजयेद्धौर ज्येष्ठे मासि विश्रेषतः॥ 
श्रचर शूलाधारदर्गापूजाख्य कम्मं घर्मायंकाममो चभाजनलं फलं 
विशेषत इति वचनादन्यच्ापि मासे पूजा फलोत्कषेस्तु च्येषटे । 
तया। शूलं पिष्टमयं कछला च्येषे मासि नराधिप । 
कत्वा च राजतं पद्मं खंन^ छतकणिंकम्‌ ॥ 
निवेद्य श्रद्धया बौर भगवतेऽ प्रपून्यताम्‌ । 
कामतोऽपि क्तं पाप ब्रह्महत्यादि यद्भवेत्‌ ॥ 
तत्‌सब्वं शूलदानेन देवौ नाग्रयति प्रवम्‌ । 
विमानवरमारूढो टे वगन्धेव्वेपूजितः ॥ 
कल्पको टिश्रतं साग्रं दुर्गालोके महौयते ॥ 
एतद्रतं पूजानन्तरं देव्ये शलयुक्तं पद्मं निवेद्यम्‌ । 
महाभारते । 
च्येष्टामूलन्त॒ यो मासमेकभक्तेन संक्िपेत्‌ । 
रेश्वय्येमतुलं श्रेष्टं पुमान्‌ सलौ वाऽभिगच्छति ॥ 


१ 7 सुवणं-- | 


कछव्यरनाकरः। ९.८द्‌ 


व्ये्टामूलं व्येष्टायुक्रप्ररि माव्यपदेश्वं॒व्यष्ठमासमेवं संचि- 
पेद तिवायेत्‌ । 
एतद्रतं भविष्येऽपि । 
पिष्टेन कञ्चकं छला च्येष्ठ मासि सवेदिकम्‌ । 
कञ्चक पद्यम्‌ । 
पातैः समज्य गन्धाच्छरनानामादविगश्टषितैः । 
इद्धस्फटिकसद्घा ग विमानः सन्वैकामिकैः ॥ 
वषकोटिश्नतं साग्रं सुग्येोके महो यते । 
क्रमादागत्य लोकेऽसिन्‌ राजानं पतिमात्रुयात्‌ ॥ 
एतदपि त्रतम्‌ । च्रचापि षष्टौदय सप्तमोदयान्यतरातिरिक्रमास- 
व्यापरैकभक्त॒चमाऽदहिसादिनिवम बह्मचय्ये रुड़ानमिश्रशाद्यन्न- 
निवेदन करबोर गुग्गलुधूपोभयस्तानम्रद्धाः काव्याः! 
देवौपुराएे । 
च्येष्ठे तु शङ्करो पज्या रक्ताशोककरुरुण्डकेः 
तथा देयश्च नेबेदयं छतपूर्णाश्च कन्यकाः ॥ 
भोजनोयास्तथा दचेद्ोश्ठदानं हिरण्यक । 
तथा देया जलक्ुम्भाः सुगन्देर्वासिताः ब्ररभाः । 
श्रनेन वारणान्‌ भोगान्‌ देवो चिप्र प्रयच्छति ॥ 
कुरुण्टक्रैर्वाएपुष्य विग्रेषेः टतपृणनेवेद्यमित्यचयः छतपूशेग्रब्दः 
पक्रान्नविगरेषवचनः दखेदिति दिरणदचिणं कन्याभ्यो दद्या- 
दित्यथेः । | 
शिष्टपरिग्यहो तवाक्यम्‌ । 


२.८४ छव्यरनाकर. | 


यो दृषवनिनि सवितरि श्िरोषवरबोजमेकमश्राति- 
स मानवः खगपतिखद्श्रो नागक्ुलेदुश्यते सततम्‌ । 
कौजवरत्वं कौ राद्य विद्धलम्‌ । 
यदहणएकमधिङ्त्य देवोपुराणे । 
व्येष्ठे तु कौशिकौ पुश्वा। 
स्ानदानादिना पुष्यडेत्रित्ययंः | 
महाभारते । 
ज्येष्ठे मासि विग्रेषेण प्रपाद्‌ानन्तु कारयेत्‌ । 
विश्षेणेतिवचनादन्यचापि तौन्रखमये दानं अ्राचारोपष्टम्भाच् । 
प्रपा पानौयशश्ालिका प्रथमदिने संकल्पः प्रत्यहं प्रपादानं खर्भश्च 
फोलमच ! व्रताधिकारे तचरेव । 
च्येषठे मासि दविजशेष्ठ ङष्णाष्टम्यां चिलो चनम्‌ । 
यः पूजयति देबेश्मोशलोकं व्रजेन्नरः \ 
ब्रह्मपुराणे । 
च्येठजष्णचतुदश्ां छष्णरक्ता तु रेवती । 
जाता जगति तस्मात्तां छष्लेः पुष्यः प्रपूजयेत्‌ ॥ 
अच छष्णाष्टमो च्येष्टक्तपक्तपूर्व्वा एवमन्यचापि तियिकतये 
यच शष्णपक्लानन्तरं शएक्तपच्छत्याभिधान मूले तच छष्णादिरेव 
माखो बोद्धव्यः कष्णपच्चानन्तर' च्येष्टर्क्तपक्चत्रतशत्याभिधानात्‌ । 
च्रचाख्याश्रुतफलस्य परूनादिकम्मण दष्टोपायताख्ितौ तचेषटषु 
भावाभावयो निंहपाधिसो पाध्योः- 


१ 7 अदधा ₹ 7 वअजनिककराः। 


छव्यरनाकरः। । ८८४५ 


अत्यन्तोत्छष्ट- तदितरयोमविस्य निरूपाधेरत्यन्तोत्छष्टस्य 
कल्पनालाघवात्‌ खगेस्येव फललम्‌ । 
यमः 
प्रक्र दशम्यां खात्वा तु पुण्डरौके तथेव च: 
सन्िदहित्याममावस्यां प्रभासे वा तथा पुनः। 
श्रोजसे तु नरः सञाला मुच्यते सब्वैकिख्विषे; ॥ 
दरएकरं च्ेष्ठे । 
ब्द्भपुराणे । 
च्येष्ठदटक्ताचतुर्थ्यान्त॒ जाता पूर्वमुमा सतौ । 
तसात्‌ खा तच सन्ृब्या स्तोमिः सौभाग्ये ॥ 
उपहारश्च विविधेर्गोतनृच्येः सवादितेः | 
होमैः पयोभिवंस्तेश्च कुन्दपुष्येः सुगन्धिभिः ॥ 
शिपि पूव्वेन्यायेन खगं फलम्‌ । 
राजम।न्तण्डे । 
च्येष्ठ मासि सिते पक्ते षष्टो चारण्यरुज्िता । 
व्यजनेघुकरास्तस्यामटन्ति विपोनं (ने) स्तियः ॥ 
रषुर्वीणः । 
भविष्ये | 
मासि ज्येष्ठे महाबाहो यः कुर्थ्या्धक्तभोजनम्‌ । 
सुज्ञानः पायसं वोर सर्पिषा मधुना सह । 
वौैरासनो निशायां स्वादः समनुव्रजेत्‌ ॥ 


वौरारनमनिषद्यासनं । 
४ 


९८ छत्यरनाकरः | 


हितकारी गवां नित्यं गवां हिंसा विवच्नितः । 
उभयोरपि सप्तभ्यां क्यात्‌ सलानादिक विधिम्‌ ॥ 
उभयोः पक्चयोरित्यथेः ! खानादिकं विधिं पकच्योः सप्तमो 
त्यादिना सव्वेभो गविवन्नितदत्यन्तेनाये पौषे वच्छमाणम्‌ । 
दरया धेनुं दद्याच्च धेम्व्णंमलङ्कुताम्‌ । 
नो लोत्पलसमप्र्ये्म॑हा यानेरनेकशःः । 
मदासिंहनिवद्धेश्च मोदते कालमचयम्‌ ॥ 
रतं मव्छपुराणे- 
च्येष्ठे पञ्चतपाः साचं होमधेसुप्रदो दिवम्‌ । 
यात्यष्टमौ चतुदेश्यो रद्र्रतमिद्‌ सतम्‌ ॥ 
` च्यैष्टवस्तियावदष्टमो चतुदश्यधिकरणं पञ्चाशितया प्रसिद्धं तरत- 
भिदं । सायञ्च हेः खरूपधनोश् दानं घेलुपदसुख्यताचुरोघात्‌ । 
समयप्ररौपे च्चेष्टपदसखने बौश्रपदपाठः ख लन्नातमूलः पुराणे 
निबन्धान्तरे च च्येष्ठपदस्येव द शेनात्‌ । 
तथाचाग्नेयपुराणे- 
चेष्टे पञ्चतपाः सायश्चतुदश्यष्टमोपु च । 
खः करोति सुवर्णस्य घेनुदानं दिजातये । 
स याति चाच्यं लोक रूद्र्रतभिदं सतम्‌ ॥ 
सुवणेस्य दानमित्यन्वयः । 
ब्रह्युपुरारे ज्येष्ठमधिक्कत्य । 
एक्ताष्टम्यां पुरा जाता शक्ता देवो महाशनिः । 
वधाय द्‌ानबेन्द्राणणं श्टुक्तपक्छे ततो यज्ञेत्‌ ॥ 


कछत्यर्नाकरः । | जें 


महाशनिरिति देवौनाम यजेदिति दैवं पूजयेदिव्यन्वयः । 
स्रगेश्चाचच फलम्‌ । 

भवि्ये । 
ज्येष्ठे मासि नृपश्रेष्ठ यः जुर्य्यान्नक्रभोजनम्‌ । 
शाख्यन्नमम्भसोपेतं भुञ्जानः पयसा सदह । 
उपवासपरो मह्या नवम्यां प्रूजयेद्‌ माम्‌ ॥ 

श्रष्टम्यां छतोपवासो नवम्यां पूनयेदित्ययेः । 
बरह्माणौमिति वे नाश्ना श्रेतरूपेण रूपिणोम्‌ । 
पद्मपचक्तणं भ्या नलिनेविंविधैरपि । 
कुङमागरक पृरधेपेनायरुणा तथा ॥ 
श्रशरो कवर्निप्रसुखे नानाभच्छेश्च परजयेत्‌ । 
कुमारो भजयेचापि खशया बाद्यमणौस्तथा ॥ 
गो चोर प्रा शनात्‌ प्रूतस्ततो भुञ्जीत वाग्यतः । 
भोजयिला स्ियः श्त्या कुमारोश्च विंेषतः ॥ 
प्रभया दित्यसङ्ाशस्तेजसा बद्धिसन्निभः । 

, विमानवरमारूढो ब्रह्मलोके महौयते ॥ 

श्रप्रोकवस्तिः पक्रान्नभेदः । 

महाजनपरिग्टहोतगोड्वाक्यानि- | 
चेष्टस्य प्रुक्तद श्रमो सवत्सरमुखौ स्मृता । 
तस्यां लानं प्रकुर्व्वौत द्‌ानञ्चेव विशेषतः ॥ 
यां का्चित्छरित प्राप्य दचाद्भंतिलोदकम्‌ । 
सु च्यते दशमिः पापेमंदापातकसंज्ितैः ॥ 


२ ८्ष्ट छ्त्यर्लाकरः | 


तया- चेष्टे मासि सिते पके दश्रमो हस्तसंयुता । 
हरते दश पापानि तस्ममादह्‌श्डरा खता ॥ 


तया- शगङ्गाश्ञानात्‌ सिता च्येष्ठे ग्रमो हस्तरुयुता 
हरते द्श्र पापानि तस्माद्‌श्दरा स्मृता । 

तया-- च्येषटे प्ररक्दश्म्यान्तु भवेद्धौमदिनं यदि । 
ज्ञेया हदस्तचंखंयुक्ता सव्वेपा पहरा तिथिः ॥ 

गाङ््ये- 
ज्येष्ठे मासि चितिसुतदिने श्क्तपक्ते दश्रम्यां 
स्ते ओेलान्निरगमदिवं जाह्छवौ मच्येलो कम्‌ 
पापान्यख्यां इरति च तिथौ सा दशेत्याह्राय्याः 
पुषे दद्यादपि श्रतगुणं बाजिमेधायुतस्य ॥ 


[1 


एतदाक्यपरामर्भान्मङ्गलबा र -दस्तयुक्त च्येष्ठष्रक्तद श्रम्यामेवंविधः 
युष्यसञ्चयो द्‌ श विधपापक्तयश्च फलं गङ्गायां । सरिन्मारे तु दश- 
विधपापनाप्रमाचम्‌ । कचिन््हापातकनाग्रनभिति पाटः । 
णि 
दश्पापानि भदिष्यपुराण- 
पर द्रयेव्वभिध्यानं मनखाऽनिष्टचिन्तनम्‌ । 
वितयाभिनिवेश्रश्च जचिविधं कम्मे मानसम्‌. ॥ 
पारव्यमनृतञ्चेव पेद्एन्यश्चापि सव्वेशः । 
श्रसम्बड प्रलापञ्च वाञ्यं श्याच्तुविंधम्‌ ॥ . 
* * 4 
च्रदतत्तानाद्खुंपादानं हिमा चेवाविघानतः । 
यरद्‌ारोपरसेवा च कायिकं चिविध सतम्‌ ॥ 


लछ्यरनाक्रः। १ 


विष्णरूवाच ` 
यसुनामलिले साला पुरुषो मुनिसत्तम ! । 
ज्येष्टं मास्वमले यक्ते इाद्‌श्यासुपवासष्त्‌ .॥ 
समन्यच्याच्य॒त सस्यद्वथुरायां समाहितः । 
अश्वमेधस्य यज्ञस्य प्राप्नोत्यविकलं फलम्‌ ॥ 
अ्रालोक्याधिमतोऽन्येषासुदितानां सुवशरजे । 
एतत्‌ किलो चुरन्येषां पितरः सपितामहाः ॥ 
क्िदसमत्कुले जातः कालिन्द पुलिने शतः , 
चवं विष्यति गोविन्दं मथुरायासुपोषितः ॥ 
ज्येष्ठामूलामिति प्ते समभ्यच्छौ जनाद्‌ नम्‌ । 
परां बृद्भिमवाष्यामस्तारिताः खङ्लो द्वेः ॥ 
धन्यानां क्रुलजः पिण्डान्‌ यमुनायां प्रदास्यति ॥ 
कस्िन्‌ काले समभ्यच्छे तच छृष्णं समाहितः ॥ 
उपवासकदित्यथादेकादण्यासुपवासः, ्रालोक्य भ्रसियित्यनु- 
मोयते कूलोद्धवेः समभ्यच्छै तारिता इत्यन्यः उटृश्वगतधन्यत्व- 
कोप्तेनेनोत्तरक्लोकः प्रशंसा एवञ्च यपिदतारण फले, तच्च 
मथुरायाम्‌ । | 
विष्एधर््मो्तरे- 
ज्येष्ठे मासि सिते पके दाद्श्वां जलधेनुका । .. 
दत्ता यथावदिधिना मौण्यत्यम्बश्ायिनम्‌ ॥ 
यथावदिधिना जलधेनुक्रदानविधिना श्रम्दशायिनं श्रसि- 
शायिनं विष्ण॒मेव । 


९.० छ्यरनाकरः । 


व्ये्ठमधिक्त्य ब्रह्मपुरणे- 
दादणश्यां एएक्पचस्य विशोका विष्णना पुरा । 
प्रतिष्ठिता शमैर्माच्येस्तसमात्तां तच पूजयेत्‌ ॥ 
-वि श्ोकलं फलम्‌ । 
शिष्टोपग्टदौलगौडाः- 
ष्ठे मासि सिते पके दादश्यां चम्पकैः प्रभेः। 
| प्ट चिरभ्यच्यं गोविन्दं नरो नेवाु शोचति ॥ 
श्रननुशो चनं फलं । 
वरादपुराणे- दुर्वासा उवाच । 
चये मासेऽप्येवमेव संकल्प्य विधिना नरः । 
श्रयेत्‌ परमं देवं पु्येरनाना विधैः श्एभेः ॥ 
एवमेवेति वराहपुराणोक्तमत्यदाद गोकयथितेतिकन्तेयतया । 
ॐ नमो नाराचणा्येति पादौ पै समचचैयेत्‌ , 
चिविक्रमायेति कटिं छतविश्वाय चोदरम्‌ ॥ 
उरः सुवत्छरायेति कण्ं संवत्तकाय च । 
सर्व्वास्लधारिणे बाह खनान्नाऽनरथाङ्गके ॥ 
सदसत शिरसेऽभ्यच्यं शिरस्तस्य महात्मनः । 
` श्रजरथाङ्गके शङ्खचक्रे । 
एवमभ्यच्ये विधिवत्रामबत्क् प्रकल्पयेत्‌ ॥ 
्राम्बत्‌ वस््युगच्छन्नौ सौव रामलक्षणो । 


न 


९ ब्रूले राघवाय | २ 8 छतकुम । 


छत्यरल्नाकरः । ` १९१ 


अयित्वा विधानेन प्रभाते ब्राह्मणाय तौ ॥ 
दातव्यौ मनसा काममोहता पुरुषेण तु । 
श्रपुचेए पुरा षष्टो राज्ञा दण्यथेन तु ॥ 
वशिष्ठः पुचकामाय प्रोवाच परमार्धिंतः । 
दृदमेव विधानन्तु कथयामास स दिजः ॥ 
प्राग्रहखयं विदिला तु स राजा कतवानिदम्‌ | 
तशय युचः खथं जज्ञे रामास्यो मधुद्धदनः ॥ 
चतुद्धां सोऽपश्डदिष्णः परितोषान्महासुने । 
एतदेहिकमास्यातं पारचिकमतः श्ट ॥ 
नश्यन्ति पापानि च तस्य पुसः 
कामानवाप्नोति ययाख्मोहम्‌ । 
निष्काम एतद्भतमेव चर्त्वं 
प्राप्नोति निर्वाणपदं सिरं तत्‌ ॥ 
दिव्यान्‌ भोगान्‌ शुन्नोत^ खमगेसंखो 
यावदिन्द्रा दश च दिदिसंख्याः। 
श्रतोतकाले पुनरेत्य मत्य 
राजराजो जायते यज्ञयाजौ ॥ 
दश् दधि द्धि सख्याश्चतुदेश इत्यथैः । 


दूति राघवद्वादशौत्रतम्‌ ॥ 








१ 8 भृश्चते। 


२९२्‌ छ्त्यर्नाकरः | 


राजमान्तैण्ड- 
टृषराश्िखिते सूर ष्रक्लयक्चे चत्तो । 
प्रोक्ता सद्राच्चनायैव सा चम्यकचतुरटश ॥ 
व्ये मासि चतुर्दश्यां सा विच्ौन्नतसुत्तमम्‌ । 
अरवेघव्याय कूव्वैन्ति स्यः सर्व्वाः समन्विताः ॥ | 
ब्रह्मपुराणे- 
श्रासलेषु वेदाः सकमूता पुरा व्येषठयां यद्‌ भुवि । 
तदा तान्‌ पूजयेनत्तच वित्तग््या प्रयन्नतः ॥ 
नवेयेवाननैः पिढमिः सह देवान प्रपूज्य च । 
ततोऽनलिप्तः खम्बो च नवतस्तो पशोभितः । 
्राह्मण्णन्‌ भोजयिलादोौ .कृतखस्ययनान्‌ श्टचौन्‌ । 
चरदेषरागिभियुक्तः परा्ुखः प्रा्रयेदयवान्‌ ॥ 
शास्त्रेषु इति निर्धारणे स्मौ घद्‌ा यतस्तदा . तत इत्यथः , 
यवान्नैः आद्धं देवप्रूनाच्च शलेत्ययेः ; श्रनुलिप्तः सुगन्धिद्रव्येण । 
देवोपुराण- 
मूलक्चं पश्टघातेन च्येषटे देवौ प्रपूजयेत्‌ । 
सर्वान्‌ कामानवाप्नोति भावश्टद्धेन कर्मणा ॥ 
चये ज्येष्ठपरणिमायां । . तयेव प्रक्रमात्‌ । भावशुद्धेन कम्मेणा 
प्रपूजये दित्यन्वयः । 
विष्णः- 
चेष्टो च्येष्ठायुता चेत्‌ सात्‌ तसां कचोपानद्‌ानेन गणएा- 
चिपत्यमाघ्नोति मनन्तरादिकेयं च्येठौति आद्धमप्यच । 


छत्यरनाकरः । २९ द्‌ 


विष्एघन्नीत्तरे- 
मोपवाशस्तथा ज्येष्ठे परं च शशल । 
उपानहौ तया चं दवलाऽत्यन्तं सुखौ भवेत्‌ ॥ 
मव्यपुरार- 
एतदेव यथा पद्ममश्द्धिरणएसय जगत्‌ । 
तद्न्तान्ताञ्रयं तद्वत्‌ पाञ्चमिव्युच्यते वृधेः ॥ 
पादं तत्‌ पञ्चपञ्चाशत्‌ सहखाएेह पद्यते । 
तत्‌ पुराणश्च यो दद्यात्‌ सुवणकमलान्वितम्‌ । 
वये मासि तिलेयुक्तमश्वमेधपालं लभेत्‌ ॥ 
अच च्येष्ठपौणंमास्येव दानतियिर्विगरेषाकाङ्गुमयां पूव्यैवाके 
वश्राखे पुराण्दाने पूणिमाया एवनेनो क्तलात्‌ भ्रन्वयौ चित्यात्‌ । 
ज्यो तिषे- 
टषान्ते मिथयनस््राद्‌ावश्चिदादहो दिनचयम्‌ । 
च्रम्बधोन्‌ संहतान्‌ भातुः पन्नमानपि ता पयेत्‌ ॥ 
रवौ रोद्रा्पादस्ये शमे: स्नायते रजः । 
तस्मादिन चयं तच श्स्यवाप परित्यजेत्‌ ॥ 
श्स्यवापं शस्याय बौजवापम्‌ । 
पद्मपुराण- 
व्येषठे मासि सिते पके पौणमास्यां यतत्रतः । 
स्थापयेद्त्रणं कुम्भं सिततण्डलपूरितम्‌ ॥ 
नानाफलयुत तच्च इ चृदण्डसमन्वितम्‌ । 








नक्‌ 





९ ए तद्त्‌ । 
२१ 


१९४ 
छत्यरनाकरः । 


तथा इचरसेनेव श्धयस्तेनोदकेन च । 
रोचनालेपने पूजा ग्रतपजिकया सह ॥ 
दौपो तेन धूपस्तु चन्दनं नख-गशकंरा । 
मेबेद्यं शाकव्तिंञ्च भोजनं कन्यकासु च ॥ 
्रात्मनस्तच् कुर्व्वौत दकिणणं खस्ि वाचयेत्‌ । 
विजया सुखदा नित्यस्तु मे चिन्तितानि च 
अनेन विधिना इक्र राजषुयसम फलम्‌ । 
लभते श्रद्धया युक्तो यतो देवोमयं जगत्‌ ॥ 
चेचाष्टम्यान्त्‌ ्ञायोत माटस्याने ग्टदम्बेभिः । 
देवौ तौर्थजक्लेः साण्ा लेषा मद्‌ विल्लेपनेः ॥ 
धूपं तुरुसखमौ भौर छतिसुक्रंख प्रजयेत्‌ । 
त॒रष्कं सिद्धक, श्रतिसुक्रर्माधवो पुष्पैः ) 
अजिता सव्वकामानां पूरणाय सुखाय मे ॥ 
नैवेद्यं शःलिभक्तञ्च ग्कराः कन्यकाखयपि ॥ 
श्रात्मनस्तच् वाच्यन्तु शक्तितो दकिणं ददेत्‌ । 
दति वाब्यमित्यनयः। 
विप्रान्‌ कन्याः ममच्छाद्य इेमदानफल लभेत्‌ । 
समाच्छाद्य वस््राणि परिधा) 
महहकारफलेः स्नानं वेश्राखव्यष्टमोषु च ॥ 
्र्मना देवताः साया मांसौ-वालकवारिभिः । 
ले पनं फालकपुरेधर पञ्चसुगम्धिकम्‌ ॥ 


[1 ककि गीिं 


१९ 8 नित्यं सुसुखा चेतमेति च। 


छत्यरलाकरः । १९१५ 


उपवासो पौणेमास्यामव्ययं ब्रह्म पूजयेत्‌ । 
फलमेकन्त सम्भ्राश्य शरव्या न्डतले खपेत्‌" ॥ 
तच चयो दग्रे मासि एतघेलुखमन्विताम्‌ । 
शय्यां दद्यादिरिञ्चाय सव्वीपस्करसंयुताम्‌ ॥ 
ब्रह्माणं काञ्चनं छता सावि राजतौ तचा । 
पद्माशरनः खष्टिकन्ता साविचौ तु फलस्य तु ॥ 
वस्तदिंलं सपन्नौक पूज्य भ्या विश्ठषरेः । 
शर्या गवाद्किक दद्यात्‌ प्रौयताभिन्युदोरयेत्‌ ॥ 
होमं शक्तं सिलेः कुर्य्यात्‌ ब्रह्मनामानि कौौन्तैयेत्‌ । 
गव्येन सर्पिषा तद्त्‌ पायसेन च कममेवित्‌ ॥ 
विप्रेभ्यो भोजनं दद्यात्‌ वित्तशा्चविवज्जितः । 
द्चदण्डास्ततो दद्यात्‌ पुष्यमालाञ्च शक्रितः ॥ 
यो ब्रह्मा स स्मृतो विष्णुरानन्दात्मा महेश्वरः । 
सुखार्थं कामरूपेण समरेत्‌र देवं पितामहम्‌ ॥ 
य: कुर्य्याच्च विधानेन पौणमा खियोऽपि वा । 
सव्व पापविनिशुक्तः प्राप्नोति ब्रह्य शाश्तम्‌ । 
दह लोके वरान्‌ युचान्‌ सौभाग्यं भ्रुवमन्रुते ॥ 
दति पुच्रकामन्रतम्‌ ॥ 
इति महासाश्िवि्दिकक्कर श्रोवोरेश्वरात्मज महासास्नि 
विग्रहिकटक्कुर ओ्रोचण्डश्वर विरचिते छत्यरन्ाकरे च्येष्टतरङ्गः ॥ 








1 त 1 1 पी ण त 1 पा 1 


९ ‡ सुपत्‌ । २ 8 शक्तया । ट ^ 8 स्मरन्‌ | 


१९६ क्रत्यरल्नाकरः | 


भ्रथाषादृरत्यम्‌ । 
तच वामनपुराण- 
उपानदयुगख कचं लवणामलकानि च । 
श्राषाद़े वामनप्रीतयै दातव्यानि तु भक्तितः ॥ 
दानखागरे तु लवणामलकानि चेत्यस्य स्याने नवकम्बलानि 
चेति पठित्वा नूतनकम्बलानोति व्याख्यातम्‌ । द्‌ानमेतह्ृद्यण- 
सम्प्रदानकम्‌ | 
स्कन्द पुराणे-त्रतम्‌- 
च्रषाद्ञ्चापि यो माखसेकमभक्तं समाचरेत्‌ | 
रान्ञोऽखौ मान्यतां प्राय कामानाप्नोति पुष्कलान्‌ ॥ 
मदहाभारते-तरतम्‌- 
पषादमेकभक्रेन सिल्ला माख्मतद्दितः । 
बह्धान्यो बड घनो बड्मान्यञ्च जाथते ॥ 
भ विव्यपुराणे- 
दितौयच्च तथा पद्ममाषाढ़े पौष्णसुत्तमम्‌ । 
सव्वैकीोजरमेः पूणं छला तु प्रभलचणएम्‌ ॥ 
नानाकेशरगन्धाद्छ सव्वेरन्नविभ्वूषितम्‌ । 
दसवां मेहायानेः सन्वेभोगास्वितेनैप ॥ 
वषेकोटिश्नतं साग्रं ूयेललोके मरौयते । 
सम्प्राप्य विविधान्‌ भोगान्‌ सव्वेलोकेखवतुक्रमात्‌ ॥ 
म्राप्येह सब्वेभो गाद तरणं विन्दते पतिम्‌ । 
अन्न का्यत्रतसाधारणक्षत्यानि कालिके तद्र तेऽनु सन्धयानि # 


क्त्यरलाकरः | १.९७ 


तचैव- 
माघे मासि समुयुक्तस्तिसन्ध्य योऽखयेद्र विम्‌ । 
लभेत्‌ षाण्मासिकं युण्छं मासेकेन न संश्रयः । 
यथा माघे तयाषाद मासमेकञ्चं कान्तिके ॥ 
देवीपुराणे ग्रहणप्रकरणे- 
श्राषाट तापिकानदौ युण्छेति प्रकरणान्मदायुण्फलप्रदेत्यथेः । 
तथा- 
श्राषाढृं मामि यो देवोमाषादृन्तं प्रपूजयेत्‌ । 
सर्व्वान्‌ कामानवाप्नोति ` देवलो कञ्च गच्छति ॥ 
तचेव- 
आषाढ़ तोयघेनुश्च यां दला लभते हि तान्‌ । 
इति वाक्यशेषः । 
विष्एधन्मततरे- 
दला चोपानहौ खगैमाषाद़ प्रुबमञ्रुते । 
श्रन्नाषाटृ क्राभिमतदिक्से दद्यादिति दानसागरे  तचाषाढ्- 
श्रज्ञप्रतिपदौत्येके | 
मदहाजनपरिग्टहो तवाक्यानि । 
बरूचिसित दिनकरवारे करमूसे बह्प्रूरिकम्‌लस्य । 
सपरिरिव सर्पाः प्रयान्ति किल दूरतस्तस्छ ॥ 
तया च 
श्रद्धायाः प्रथमे पादे सौरं पिवति यो नरः । 


१९८ छ्यरलाकरः । 


रपि ध्रोषगतस्तस्य तचकः कि करिष्यति ॥ 
चौरपानमाचारात्‌ । 
तथा- 
मूलं तण्डुलवारिणा पिवति यः प्रत्यङ्गिरः सम्भवम्‌ 
निष्यिष्टं शएविभद्रयोगदिवसे तस्वाडिभौतिः कुतः । 
दर्पादिव यदा फणौ ठश्रति तं मोहाच्ितो मूलपम्‌ 
स्थानं तेन स एव याति नियतं वक्तं यमस्याचिरात्‌ ॥ 
प्ररचिराषाद्ः । प्रत्यङ्किरा श्िरोषः , 
बरह्यपुराणे- 
ङष्णाष्टम्यामथाषाढ़ गाणपत्ये विनायकः । 
कतः पुज्यश्च तचैव सगणो मोद्कोत्करेः । 
उत्करः समूहः| 
भच्येरमाख्येस्तथा गन्धैः कुल्ाषेण तु श्ररिण । 
गौतवाद्चैः सुमधुर स्तथा ब्राह्यणएतपेणेः । 
कछष्णष्टमोषु सर्व्वासु विन्नं पूजयेच्च तम्‌ ॥ 
कल्माष ईषत्‌ खिन्नमाषः, यवण्ष्टिक इत्यन्ये । छष्णाष्टमोषु 
अर्व्वाखित्याषाद्पन्य्ृष्णाष्टमोपरम्‌ । 
जशिष्टानुमतवाक्यम्‌ । 
श्राषाढु मासि ताहे शिवं सम्यूज्य यत्नतः । 
सव्वेपापविनिमुंक्तः शिवलोके मदोयते ॥ 


१, श श, - ~~~ न~ न ~ न त भमा ० ज ~~~ न 


१ ए रोषान्वितः २ 10 प्रत्यङ्किरा। 


छत्यरननाकरः । १९९ 


भ्रताहः छष्ण चतुद प्रकरणात्‌ । 
बरह्मपुराण- 
श्राषाढृ श्रक्ञसप्नम्यां वित्खान्‌ नाम भास्करः । 
जातः पूर्व्वा तस्मात्त तचोपोय्य यजेत्‌ सदा ॥ 
रयचक्राङूतौ रम्ये मण्डले मब्वैकामदम्‌ । 
भच्छेभोव्येस्तथा पेयैः ुषयधरपविलेपनेः ॥ 
पूर्वासु पृष्वेफल्गनौषु तच सश्नम्यां यजेत्‌ । चरतः प्वेदिने 
उपवासः । श्र्न सव्वेकामद भित्यत्ुवादात्‌ सव्वकामावाश्धिरेव 
फलमिति । अदटैति वचनान्नित्याधिकार दति पारिजातबययाख्यान- 
मुपेचणौयं स्तावकमेवेदं सदे तिपद्‌, कल्यतरूर प्येवम्‌ । मण्डले 
रथचक्राङूतौ । 
तचेव-श्राषादृद्धक्तपके तु खातियोगे महावलः 
जातो वायुस्तथा पन्यो गन्धमादयेदिंजा्ंनेः ॥ 
शरि परमान्नेन शक्भिवि विधेस्तथा ! 
सुमनोभिविंकितरैख कुसुमैः श्रद्धया तथा ॥ 
परमान्नं पायसम्‌ ¦ 
देवौपु्तरे- नद्योवाच- 
एवमाचार युक्तात्मा सततं चक्धिंकारतः। 
म्राभ्रुधात्‌ सन्वकामांश्च यथे शितफलप्रदान्‌ ॥ 
राक्र उवाच- 
नित्यं भगवतौभरकतस्तेनेर दिंजसन्तम ! । 
कि काये किंन तेः काय्य वद्‌ लं प्रतो मम॥ 


न्‌ © €& कदययरनल्ाकरः | 


ज्रद्यी वाच । 
स्वैः सव्वेगता देवौ सव्वेदेवनमस्कता । 
द्रष्टव्या एएद्धभावेन अभिन्ना एयगेव सा ॥ 
नामभेदेन सा भिन्ना अ्रभिन्ना परमायतः | 
शिता नारायणौ गौरौ चच्धिंका विमला उमा । 
तारा श्वेता महाश्वेता श्रभ्िका शिवश्ासना ' 
यावद्भव्यं भवद्गतं तावद्धेवौ यवस्िता ॥ 
सा वन्द्या पूजनया च सततं भक्तिभावितः ¦ 
विजयायं नृपैः ख्ख कुरिका-प्पादुकापटे ॥ 
चाञ्युण्डा चण्डरूपा वा लिखिता वाऽथ पुस्तके । 
ध्वजे वा कारयेच्छवे स नृपो विजयेद्विपूम्‌ ॥ 
विग्रेषाद्ा रणारम्भे तस्याः पूजान्तु कारयेत्‌ । 
पवित्रारोहणं वत्स ! सव्वेशास्सेषु गयत । 
च्रग्ररथाश्ि-पव्वेत्योः कूुजास्य सुजगेषु (?) च । 
स्कन्दस्य मानोर्मादणणं दुर्गाधरमश्र गोपते ॥ 
विष्णौ; कामस्य देवस्य रुद्रस्य ब्रह्मणस्तया । 
पूजनया सदा देवौ चण्डा पापविनाभिनौ ॥ 
सव्यैकाखं दिवाराचौ नामितैः पुरन्दर ! । 
श्रयःकाषादृमासे तु आरावे वाऽपि कारयेत्‌ ॥ 
सप्तम्यां वा चयोदश्यामधिवासं नराधिप! | 
सर्ग्वोपहारमयुक्तो नन्दायां भक्तिमान्‌ स्यितः ॥ 





मी 


९ >» ए पारका--। २ 3 अथ साषाढ-- | 


चन्यरनाकरः । ०१ 


खष्मतन्तुमयं कायं पवितं ब्तन्तकम्‌ । 
यन्थिभिः सुविचिचाभौ रचितं मोक्तिकरैरिष। 
सुधौतं चितं छला रोचना-ग्थि-ङुङ्कमैः । 
तथा श्व्वाणि अव्यासि गन्धपुष्यफलानि च ॥ 
नेवेद्यानि विचिच्राणि वख्ाष्याभरलानि च । 
हेमानि तारपुष्याणि कुशाश्च श्टद्वस्तथा ॥ 
सु्ञातो मन्लविधिना श्रधिकाय्ये समाचरेत्‌ | 
तयाच पूजयेदेवौ मर्चायां शखण्डिलेऽपि वा ॥ 
पादुके वायवा खङ्गं कुरिका-काश्ुकेऽपि वा, 
दन्तधावनपूव्वन्तु पञ्चगव्यं चरं श्रपेत्‌ ॥ ` 
तारपुष्याशि निग्बेलयुष्पाणि निवेद्यानोति । सव्वेच सम्बन्धः । 
दना दिं बलिं वक्छ! का््ैञ्चेवाधिवासनम्‌ । 
द ेवंस्तपेर्वां ऋादयेत्त पविचकम्‌ ॥ 
शताभिमन्ितं छता ततो देच्ये निवेदयेत्‌ । 
रात्रे तु जागर जुर््यात्‌ सव्वैशोभाषमन्वितम्‌ ॥ 
नट-नन्तक-वेश्वानां संचानि विविधानि च 
तिष्ठन्ति वाद्यगेयानि निरतानि पुरन्दर ॥ 
प्रभातसमये वत्स ! प्रा दद्यात्‌ पुनबेलिम्‌ । 
्रत्युषे विधिवत्‌ चखाला तथा देवीं डताशननम्‌ ॥ 
इह्हयाऽय कन्याश्च स्रियो भोज्यास्तया दविजाः । 
पविचारोदण्णदयन्ते दचिणामुपपादयेत्‌ ॥ 


यथाग्रह्या भवेच्छक्र ! नियमः काय्येकारणे । 
२६ 


० 


क्रव्यरननाक्रर. | 


राज्ञा नानाविधा््क्ति रनुक्रोड़ा स्टगः विधेः । 
दिजाचार्ययश्च खाध्यायो न काय्य कषेणं कषेः । 
बणिभ्भिश्च न चार्थो दिनानि दश पञ्चच ॥ 
अयवा चौखष्येक वा दिनं यामाद्धमेव वा । 
देव्या वधापार श्राखक्तिः कन्तव्या खततं हरेः । 
तथा सम्णं कन्तव्ये पुनः ङुर््यात्‌ पवित्रकम्‌ । 
एवं यः कारयेदत्स ! तस्य पुण्टफलं श्टण ॥ 
सव्वैयन्ञवरतं दानं सव्वेतौर्थाभिषेचनम्‌ । 
्रा्ुयान्नाच सन्देहो यस्मात्‌ खव्वेगतापि सा ॥ 
नाधयो न च दुःखानि न पड़ा व्याधयो न च, 
न भय शरच॒जे तस्य न गहे पोद्यति कंचित्‌ ॥ 
सिध्यन्ति सव्वेकार्ययाणि शच्रपि यानि महान्यपि। 
नातः परतरं वक! भ्रन्यत्‌ पुष्यविषद्धये ॥ 
नराणएच्च नृपाणएच्च स््लोणाञ्चापि विशेषतः! 

सौ भाग्यलननं शक्र तव क्ेहात्‌ प्रकाशितम्‌ ॥ 
मयापि नृपतिश्रेष्ठ यथावदुपपादितम्‌ । 
अवणणद्यि पुष्छाय कि पुनः करणदिभो॥ 


दति पविच्ारोहणम्‌ ¦ 





१ 7 आयुधा । २ 8 अथिलं । 


क्द्रनाकरः | ० 


भवि्यपुराण- 


सुमन्तुरूवाच-- 
्राषाद्‌ मासि यः कुर्य्यात्‌ संयतो नक्रभोजनम्‌ । 


षष्टिकोद नसमिश्रं सरूदश्रोत गोरसम्‌ ॥ 
गां दद्याच्च महाराज भास्कराय प्रटभाननाम्‌ | 
षामान्यञ्च विधिं कुर्य्यात्‌ मरादुक्त यन्मया तव ॥ 
सामाग्य्रञ्च॒विधिभिति पौषमासकयित भविच्पुराण्णोयो- 
भयसप्रमोत्रतोभयपचोपवासा दि विधिमित्य्थेः । 
बद्धस्य टिकसद्काओे यनिवं दिंएवा नेः । 
श्रणिमादिशणेयुक्रः दय्येवददिचरे टि वि ॥ 


द दसुभयसप्रमोत्रतम्‌ । 





तचेव भविषे- 
अषाढ मासि राजेन्द्र यः कुर्ययान्नक्रभोजनम्‌ । 
सुच्ानः खण्डखाद्यानि पायसश्च नराधिप ॥ 
खण्डखाद्यानि खेष्डपाटितपक्रान्नानि । 
उपवासपरो भत्वा नवम्यां पच्योदंयोः । 
पूजयेच्छरद्धया दु्गामिन्धौनाकरा तु नामतः॥ 
ठेरावतगतां शशनां श्रेतरूपेण रूपिणम्‌ । 
ङला खणेमयों भ्या नानानयनभ्चूषिताम्‌ । 
नानापुव्यविग्ेषेस्तु भच्छर्नाना विधेस्तथा । 


९०8 क््यरनाकरः। 


यच्कदमगन्धेशच पुष्यः सागरुचन्दनेः । 
कपूरागुरु कस्टरी कक्धार्य॑क्तछदट्‌मो भवति । 
एवं सम्यज्य इन्नो कुमारोर्भोजयेत्ततः । 
सियो विप्रान्‌ यथाग्रत्वा ततो सुच्नौत वाग्यनः। 
पञ्चगव्यङतस्लानः पञ्च ग व्यञ्छता शनः । 
ध्यायमानस्तथा चेन सपेद्ुमौ नराधिप 
य एवं पृजयेदुगों \भक्ति-ख्रद्धासमन्वितः ॥ 
ेरावतसमारूढ्‌ न्द्रस्यानुचरो भवेत्‌ । 
दूत्युभयनवमो रतम्‌ । 
इदञ्च त्रतदयं मासख्व्यापि नियमभित्युपक्रमलिखनौयमिति 
तियिप्राधान्यपुरसकाराल्तिच्यनुसारेण लिखितम्‌ । एवं मासा- 
न्तरेऽपि क्रचित्‌ कवित्‌ । 
ब्रह्मपुराणे 
एकादश्यान्तु शएक्तायामाषाढ़ भगवान्‌ हरिः । 
भुजङ्गशयने शेते यदा च्ौराणेवे सटा ॥ 
तदा ततूप्रतिला काय्यं सब्वेलचणसंयुता । 
सुश्रा तु गेषपय्येङ्के गेलश्टद्धिः खुदारुमिः ॥ 
ताघ्रारक्रटरजतेस्तया चिच्रपटेषु वा । 
आरकूटः पित्तलम्‌ । 


ल्या उनसङ्गे स्ते च विन्यसचर णब्बृजा ॥ 


णनो त प मा त-ना ना ७७००००० 


छत्यसर्ना करः | २०४. 


नानाविधोपकरणेः पूज्या च विधिपृन्वेकम्‌ । 
उपवासश्च कन्तेव्यो राचिजागरणएं तथा ॥ 
तस्यां राश्यां यतोतायां दादश्यां पूजयेत्तथा । 
चयो दश्यान्ततो मृत्यं गौतवाद्यं निवेदयेत्‌ ॥ 
विष्णवे रङ्गजौ विभ्यो धनं दद्याञ्च शक्तितः । 
चत्देश्यामुपोयाथ पोणेमामौ यजेद्धरिम्‌ ॥ 
चिच्रपटेषु वा इति विचलिखिता परटलिखिता वेत्यथेः। 
रङ्गजोविनो नरादयः, श्रय निद्रोत्पन्तिरेकादण्यां तदवधि 
दिमपश्चक तनत्तत्‌परजादिकशषमयः। 
एकादश्यान्तु श्क्तायामाषादृ भगवान्‌ हरिः । 
दूत्यादिन्रह्यपुरा णात्‌ । | 
सुप्र तु सव्वेलोकेशे भक्रभोजौ भवेन्नरः 
सव्वेपापविनिसुंक्रः सव्वेलोकेश्वरो भवेत्‌ । 
तेलाभ्यङ्गच्च चत्वारि मामान्टेतानि वर्जयेत्‌ ॥ 
दृति वाक्येन माखचतुष्टयं विष्ण निद्रा दियवख्ितौ- 
ग्रपालसमुचये- 
कार्निकद्णक्तेकादश्यां विष्णोरत्थापनमिति प्रकरण्णेपसंदहारे- 
णषाद्श्क्ञेकाद श्वा सेव श्यनो चित्यादाचारोपष्टम्भाच । 
पारिजाते तु 
त्राषाढृमासे दादश्वामिति श्यनावसरे वरादपुराण्देनात्‌ 
कात्तिकष्एक्तदादश्वां जारटण्व जाग्टव्व चेति मन्तलिक्न च 
दादश्लोः श्चनप्बोधौ। निद्रां त्यजति काल्तिक्यामिति 


२०६ क्त्यरल्ाकरः | 


यमस्मतिदर्रेनात्‌ एकादश्या दि-कात्निकौपय्येना दिनपश्चके 
शयनप्रनोधा विल्यक्रम्‌ । तच्चाबलं, श्राषाच्चादिपदयोराषाट्‌- 
काल्तिकैकादग्योरपि योगतो मुख्यलात्‌ मन्तलिङ्गस्य खत्यपेच्या 
ऽबलल्ादाचार विरोधाच्च । 
न॒ चाषाद्ोपदस्यानुपधेः पूणिमायां शक्तिः, श्राषादुौ 
पूरफिंमेति सदप्रयोगदभरेनात्‌ । 
तथाच वामनपुराणमपि- 
नारद उवाच-- 
कथयसख सुरादौनां शयनं विधिमुत्तमम्‌ । 
‡ सर्वाननुक्रमेणेव पुरस्कत्य जनाद नम्‌ ॥ 
पलस्य उवाच- 
मिथयनाभिगते ख्य्यं प्एक्गपचे तपोधन ! । 
एकादश्यां जगत्‌स्रामिश्रयनं परि कल्पयेत्‌ ॥ 
शषा दिभोगपय्यैङ्ः कत्वा सम्यूज्य केशवम्‌ । 
"ला पविचरकञचेव सम्यकू सम्यूज्य च दिजान्‌ ॥ 
अनुज्ञां ब्राह्मणेभ्यश्च दाद्श्यां प्रयतः इ्टचिः। 
लन्छा पोताम्बरधरं खस्ि निद्रां समानयेत्‌ ॥ 
चयो दश्यान्ततः कामः खपते शयने श्टभे । 
कद्म्बानां सुगन्धानां ज्लुसुमैः परिकर्िते ॥ 
चतुर्‌श्यां तथा य्वा: खपन्ति सुखश्ौ तले? । 


१ ए छल्लोपकौतकञ्चेव । २ ^+ ¢ सुतले । 


छव्यर्नपकंर्‌,। २२०७ 


सौवणेपद्जलते सुखास्तौोर्ोपधानके ॥ 
पौणंमास्यामुमानायः खपते चश्येमस्तरे । 
वेयाघ्रं स जटाभारं ममुन्मश्याशएख्मणा ॥ 
ततो दिवाकरो(रे) राशिं सग्मयाति च कक्कटम्‌। 
ततोऽमराणां रजनौ मवते द्‌ङिणायनम्‌ ॥ 
ब्रह्मा प्रतिपदि तथा नोलोत्पलमये प्रमे । 
तस्ये खपिति लोकानां दशेयन्‌ मामेसु्तमन्‌ ॥ 
विश्वकर्म्मा दिनोयायां तीयायां गिरे: सुता | 
विनायकञ्चतु्यान्त पञ्चम्यामपि धर्मराट्‌ ॥ 
षष्याञ्च न्दः खपिति सप्तम्यां भगवाचविः। 
कात्यायनो तयाष्टम्यां नवम्यां कमलालया ॥ 
दशम्यां सुजगेद्धास्त॒ खपन्ते वायुभोजनाः । 
एकादश्यान्तु छष्णायां साध्याः ब्रह्मन्‌ सपन्ति च॥ 
एवं कमस्तः कथितो न भाद्रे खपते सुरः । 
सखपत्सु तच देवेषु प्राट्रटकालः समाययौ ॥ 

एवं शिवस्याषाद्पुखिमा-कार्िकपूरफिंमयोः श्रयनोत्थाने 

दति खिते। 

भविय्यपुराणएम्‌ । 

पौ णंमास्यामयाषादढः शिवं मश्यूज्य चनतः। 


उपवोतं रतौ दद्यात्‌ शिवभक्तांश्च प्रजयेत्‌ ॥ 


यानुना मम 9 ०-- जके , =च 


९१ 4 तु। २९; 3 आषाटस्य। 


र्‌ [. ह 


छत्यरनाकर. | 


पुनरेव च कान्तिक्यां पूजयिता चमापयेन्‌ ¦ 
यतोनां दचिएणं दद्यात्‌ सखुचवश्ादिकद्तिताम्‌ ॥ 
य एवं विधिवत्‌ इ््य्यात्‌ चातुर्मास पविचकम्‌ । 
कन्पकोरिश्नतं सायं रुद्रलोके मदहोयते ॥ 


खसयः- 


तोराम्धौ गषपय्यैदः श्राषाख्छां सुविशद्धरिः । 
निद्रां त्यजति कार्निक्यां तयोस्त पूजयेत्‌ सदा ॥ 
न्रह्भात्यादिक पापं च्िप्रसेव व्यपोदति । 
ददिमात्मक्तेश्च किं तस्य यज्ञेरन्येमं दात्मनः ॥ 
सुष्वापे द प्रबोधे च पूजितो येन केश्वः ॥ 


्रषाद्स्येयमाषादट्ो कार्तिंकययेयं कार्तिक तिथिः श्रकतै- 


काद्श्रौ मता! 


वरादपुराण- भगवानुवाच । 


च्रन्यत्तव प्रवच्छामि कम्मे सखारमोचणम्‌ । 
कदट्म्बः कुटजश्चैव धनको ऽन्नु नकस्तया ॥ 
एमिरभ्यक्वंन करर्व्यादिधिदुष्टेन कम्मण । 
ततः शुखापन छत्वा मम मन्लविधिः स्मृतः ॥ 


धनकः कपित्यः। सश्थापनमनन्तरोक्तकम्मेसमापनं नमो 


नारायणणयेत्युक्ता इमं मन््भुदौरयेत्‌ । 


पणष्यन्ति मेघान्यपि मेघश्यामम्‌ 
द्यपागतं सिच्यमान महोभिमाम्‌ । 


क्त्यरलाकरः | २०८ 


निद्रां भगवान्‌ गटहातु लो कनाय 
वर्षाखिमं पश्यतु लोकदटन्दम्‌^ । 
ज्ञात्वा च पश्येव च देवनायं 
मेधाश्चत्वारि वेकरुण्टस्य त्‌ पश्च नाय ॥ 
त्राषाठ्मारे इाद्श्वां स्वेशक्तिःकरं शिवम्‌ । 
यच तेन विधानेन श्रूमि मत्कम्मे कारयेत्‌ ॥ 
स पुमान्‌ न प्रणश्येत रुह्ारेषु युगे युगे ॥ 
विष्एधर्त्तरे- 
खास्तोणं श्यनं दला प्रणयेद्धो गश्नायिनम्‌ । 
्रषाद्ग्एक्तदादश्यां श्रतद्योपे महोयते ॥ 
श्र खास्तौणे शयनं दत्वा श्रेतदोपे मदहोयते इति सम्बन्धः; 
सखास्तोणे शयनं शोभनास्तरणएयुक्रद्धादि 
वरादपुराणे- दुर्वासा उवाच । 
आषाढेऽषयेवमेवन्तु संकल्प्य विधिवन्नरः । 
अञयेत्‌ परमं देव गन्धपुष्पै विधानतः ॥ 
वासुदेवाय पादौ तु कटिं सङ्कषेणाय च। 
प्रदयन्नायेति जठरं भ्रनिरद्धाय वे उरः ॥ 
चक्रपाणयेति सजौ कण्डं गोपत्ेर तथा । 
सखनाख्ना शङ्खचक्रे तु पुरुषायेति वे शिरः ॥ 


णि क) "~~~ 
न ~ ॥ 


१ 7 मेषदन्द्‌ | ₹ 4 शन्ति- | 
३ 2 भूपरतये। 
28 


२९.० क्रत्यरल्लाकरः। 


एवमन्यच्छे भे धावो प्राग्बन्तस्यायतो घटम्‌ । 
विन्यसेदस््सयुकरां तस्योपरि ततो न्यसेत्‌ ॥ 
काञ्चनं वाखुदेव्रन्तु चतुर्बाहव सनातनम्‌ । 
तेनाग्वच्ये विधानेन गन्धपुष्यादिभिः क्रमात्‌ ॥ 
प्राम्बत्तं ब्रह्मणे दद्यादेदवादिनि सुव्रते । 
अच मागेमासोत्रवरादपुराण्णयत्रतसय द्वादश्नौकथित सकल 
` साधारण कत्यान्वयः । 
एवं नियमयुक्तस्य चत्‌ युधं तच्छणव्व मे ॥ 
वसुदेवोऽभवद्राजा यदुवंश्रविवद्धंनः । 
देवको तस्य भार्य्यासौत्‌ समानत्रतधारिणतौ, ॥ 
सा त्वपुच्राऽभवत्‌ खाध्यौ पतिधश्रेपरायणा । 
तस्य कालेन महता नारदोऽभ्यागमन्तः ॥ 
वसुदेवेन भक्याऽसो पूजितो वाक्यमन्रवौत्‌ । 
कथयामास 'ध््ञो देवकगे-वसुदेवयोः ॥ 
तावष्येवविधं भक्तया चक्रतुः अद्भयान्वितौ । | 
तयोख्ुष्टः खयं विष्णुः पु लश्च जगाम इह ॥ 
एवमेषा पापहरा दादशो पुचदा समृता । 
रमासुपोग्येह तान्‌ विद्या वित्तं लभेत च ॥ 
रान्यद्च भरष्टराज्यस्दु पापिनः पापसंच्चथम्‌ । 
यथा भारोऽपनोतस् घरण्याः केशवेन वे ॥ 


१ ए चारिणो, 


कछीव्यर्नाकर्‌ः । न 


शतो विष्णपुरे रम्ये मोदते कालमच्यम्‌ । 

मन्वन्तराणि षट्ग्रत्ततः कालात्यये पुनः ॥ 

इइ लोके भवेद्राजा स्तवर्षांयुतानि च। 

दाता यज्वा चमायुक्रो षतो निर्वाणएमाप्रुयात्‌ ॥ 
इति छकष्ठद्ाद श्रौतम्‌ । 





अभिपुराणे- 
जलघेतुं प्रवच्छामि सबव्वैकल््षना शिनम्‌ । 
दत्तया म्रौयते राजन्‌ जलश्रायो जगत्पतिः ॥ 
जलकुम्भं सश्छङ्गार सु वणेरूप्यस्युतम्‌ । 
गभेखखानानि रनानि छला सप्त च मुख्यतः : 

` सप्तधान्ययुतं तदङ्गड्घेनुयेया पुरा । 

श्तिवस्तयु गच्छन्न दूव्वां पल्लवश्रो भितम्‌ ॥ 
मन्धपा्चेचैतं दिचु सितयन्ञो पवो तिनम्‌ 
सच्छचं सोप(पा)नत्कञ्च विस्तरः परिधारितम्‌ ॥ 
चलारि जलपाचाणि सुदिच्छौडम्बराणि च 
द्‌ धिपाचेण सयुक्त टतक्तौरवता सुखे ॥ 
दाद्श्यां शक्तपच् तु ्राषाद्ख नृपोत्तम । 
उपोषितः समभ्यद्य केश्रवं जलशायिनम्‌ ॥ 
गन्धपुष्प पारंश्च यथाविभवविस्तरैः । 
सकल्य जलधेनञ्च पूजयेदत्सकन्तथा ॥ 
सितवस्धरः ण्नन्नो धोरो विगतमत्सरः । 
दद्यादनेन मन्ल्ेए परोतये जलशायिनः ॥ 


२९२ छ्यस्तनाकरः । 


जलश्ायौ जगद्योनिः प्रौयताम्मम केश्रवः। 
पयोमया \£पयोवर्ता पथसामयनं इरे ॥ 
पयोधराि मे देव इह लोके परच च। 
इति नता जगन्नायं बिप्राय प्रतिपादयेत्‌ ॥ 
श्पक्तान्नेन वे तिष्ठेददहोराचमतः परम्‌ । 
अनेन विधिना दला जलधेनु यतव्रतः ॥ 
स्वान्‌ कामानवाप्नोति घे दिया ये च मातुषाः। 
कदा शरौरे नो बाधामाप्नोति पुरुषो नुप ॥ 
दला जलमयौं धेनु विष्एलोकञ्च गच्छति । 
स॒प्नरन्नानौत्यनेन सुक्ता-हौरक-गोमेटेन्रनोल पुष्यराग- 
वेदृय्ये-विद्रुममर कल-पद्मरा गायां मध्ये बज्कमूल्यसक्तरन्नग्रहणम्‌ । 
सप्नरधान्यानि परिभाषोक्रानि। गड़्धेनुयेया पुरा इत्याग्नेय- 
एुराणोक्षगडधेन्ववयालङ्कारप्रणं श्रौड्ग्बराणि तान्रमथानि । 
श्र वत्सो जलङुभचतुभागनिमितः गुडधेनौ तथा द्गेनात्‌ ) 
्राषादुश्रुक्तदादश्वां पू व्वेदिने कृतोपवासो यथाशक्ति गन्धपुष्यो- 
पहारः ““ के शवाय जलशायिने नमः ” दति मन्त्रेण केशवं जलंश्रायिनं 
समज्य गो मयो पलिप््डभागे कुशानास्तौच्ये तदु परि खन्यरुषणा जिन 
प्रसाय्यै चतुस्ताजिने जलकुम्भमयीं अङ्गार- खुबणरप्य-सप्तरन- 
चान्ययुतां शएक्रिकणमिचुपादां सुक्तालाञ्गुलेचणां सितख्ूच- 
शिरालां सितकम्बलगलकम्बलां तास्रपाचण्ष्टां भितचामररोमिकां 
विद्भुमौष्टयुतां नवनौतस्तनौ चौ मपुच्छां कांस्योपदोहा मिन्रनोल- 


१ ^ ए पयोवक्षँ पयसाश्यमं दरः | 


कछत्यरन्नाकरः | २१२ 


तारका नानफलसमायुक्तां गन्धकरण्डकन्राणां सितवस्तय गनां 
दुवा पल्ञवश्रोभितां गन्धपाचचतुषटययतां सितयज्नोपवो तिनौं 
खच्छचोपानत्‌कां विस्तरतिलपूेता ब्रपाचचतुषटयय॒तां दधिकौर- 
तपूणपा चसंयुक्रमुखौ = लष्वेणकाजिनस्छा पितङ्कभखधेनु चतुथं 
चथावद्धेलु विगेषणएविशिष्टवत्तरौं दद्यात्‌ । 
तदा तदहिनेऽपक्रानाशो भवेत्‌ । 
विष्णधर्रौत्तरे- 
आआषाद्यामन्नेदानेन प्राप्नोत्यन्नं नरो बड । 
भविद्यपुराए- 
पो णेमास्यामाषाट्स्य विधिवत्‌ पूजयेच्छाम्‌ । 
मोऽश्वमे धपंलं प्राप्य विष्णलोके मदहौयते ॥ 
तथा- पौणंमास्यान्तयाषाढ़े योऽचयेदम्बिकां नरः। 
सोपवासो महाभाग स याति परमां गलिम्‌॥ 
श्रच॒ सोपवाख दत्युपवासश्चतुदश्यां पौणेमाख्याम॑धेदिति 
सम्बन्धात्‌ । 
ब्रह्मपुराणे- 
्राषाढान्ते वैश्वदेवे नचचे सति गश्नोभने । 
दश तान्‌ परूजयेत्तच विश्वेदेवान्‌ महाबलान्‌ ॥ 
चच इखरस्पतिः- 
कतुदेच्वो वसुः सत्यं कालः कामस्तयैव च । 
धुरिश्च लोचनञ्चैव तथा चेव पुरूरवाः । 
च्राद्रेवाञ्च द्‌गेवेते विश्वदेवाः प्रकौर्तिताः॥ 


रर कछ््यरनाकरः। 


ओरामायणे भरतश्रपयेषु- 
्राषादौ कात्तिकौ माघो तिथयः पु्सम्भवाः । 
चरप्रदानवतो यान्तु य्वार्ययाऽनुमते गतः ॥ 
पुण्यसम्भवा इति प्रशंसा विशिष्ट॒पुणखजननतात्य्थिका । 
विष्णः- | 
| ्राषाद्याषाद्युक्ता चेत्‌ स्यात्तस्यामन्नदानेन तदे वाच्तथथ-- 
माप्रोति। * 
भविव्यपुराणे- 
नेरन्तय्येण यो मासं विधिना पूजयेद्रविम्‌ । 
पुण्यं तदेव सकलं लमेद्धिषुवदद्ंनात्‌ ॥ 
एवमेव च विज्ञेयं यहे चोत्तरायणे । 
सक्रान्तिदिनष्किटरेषु षड्शौतिसुखेषु च ॥ 
यदे ब भवेत्‌ पुश्यं विधिना पूज्य वै खग । 
तत्कात्तिक्यां भवेत्‌ पुण्यं समाराध्य दिवाकरम्‌ । 
पुष्छमेवश्च फासान्यामाषाद्पामेवमेव च ॥ 
श्रप्रेयपुराणे- 
एतच्छवाऽम्बरो षोऽपि वसिष्ठं प्रत्यभाषत । 
कथं टषेण धेनूनां द शानां फलमिग्यते ॥ 
सव्वेमेतन्ममा चच प्रवक्र' कुशलो हयसि , 
स तमाद वसिष्ठोऽपि श्टणब्वे वदतो मम ॥ 
त्वभमेकायमना श्रूला महं दानसुत्तमम्‌ 
यतो नातोऽधिकं किंञिचिषु लोकेषु विद्यते ॥ 


क्त्यर नाक्रः | २९४५ 


यदता दितिजोऽप्येष बलो राजा समादितः। 
रखातलगतो सुद्ध दिव्यान्‌ भोगाननुत्तमान्‌ ॥ 
वरांश्च टठषभान्‌ दला चथाऽसौ दिवि मोदते । 
यट्‌एनेन वरश्ेष्टस्तेलो केशवस्य हितः ॥ 
तथान्येऽपि च राजानो घ्त्येषु चे मताः । 
एनद्‌ानख माहात्याडताः पुण्यकृतां गतिम्‌ ॥ 
्राषाढ़ृपौणेमास्यान्त्‌ मिथुने दिवाकरे । 
अद्धघानेजितक्रो वैदेयमेतद्यया विधि ॥ 
जाग्बृनदशख श्ुद्स्य पलेस्ति्रतिभिस्तथा । 
तदद्धेमद्धेमरद्धंन ययाशक्रिपल्ेस्तिभिः ॥ 

तदद्धं पञ्चदश्रपलमयमभित्य्थंः । श्रद्ध सादेपलसप्तमयं शर्धन 

पादो नपलचतुष्टयेन वा कूर्य्यादित्यथैः । 

दाभ्यामेकेन वा कुर्या दषं स्व्वाङ्गशो भिनम्‌ । 
पलादूनो न कन्तेवयो दुःखशोकभयावदहः ॥ 
मण्डपं कारयेदहिख पराद्य पलितम्‌ । 
तन््ध्ये तण्डुलः छएक्ञेमेण्डलं कारयेच्छभम्‌ ॥ 

पराद्चंसुत्षृ्टतण्डुलमण्डलं देयं टषाधारः। 
ततः प्रभाते विमले समुत्थाय यतेदधिवः ॥ 
ष्क्ताम्बरधरः सातः इएक्तमल्दयानुलेपनः ॥ 
रेतनित्यक्रियः शएक्तरनमालाविश्डषणः ॥ 
नरोवा यदिवा नारौ दियखभोगामिलाषिणौ । 
सितवस्युगच्छननं स्थापयिला तथा इषम्‌ । 


२९६ 


छल्यरनाकरः । 


सौवशे मण्डले तस्मिन्‌ सुरनेवेसुभिशितम्‌ । 
चन्दनागुरुक पूरः सुमनोभिस्तथा सितः ॥ 
सन्यूजयेन्ततः सम्बडःमन्लेः पौ राणसम्भवैः । 
नमस्ते जगदाधार ! प्रियः पुण्यक्ृतामसि ॥ 
चदिद्ोने जगत्यस्िन्‌ न कच्चित्‌ श्रएभमश्रुते । 
नमस्ते धषोराजाय टषरूपधराय वे ॥ 

ल मामुद्धर देबेशर दुःखसंसारसागरात्‌ । 

यशः कान्निर्धनं घान्यं यदन्यदपि संस्तुतम्‌ । 
तत्‌ प्रयच्छस देवेश परच च ब़भाग्मतिम्‌ ॥ 
द्रति सम्पूज्यं विधिवत्तं देवं षर्ूपिएम्‌ । 
नेवेद्यं संस्तरेत्तच हविषा निश्रिट एएभम्‌ । 
कालोद्घवं ` मूखुफलं सन्डे देयं ममन्ततः ॥ 
हविव्यान्नेन भु्गौत भोजयिला द्विजोत्तमान्‌ । 
सायाङ्के तु ततः जुर्य्यात्‌ युष्यगेहमनुत्तमम्‌ ॥ 
सितयु्येः शमेगेन्धलम्-मधुकरालयैः 
फलमूलानि धान्यानि दोपाः एक्तद णन्विताः ॥ 


दशा व्िः। 


छतयपूर्णश्च कन्तयाः शम््र्योतितमण्डपाः | 
राचो जागरणं काय्यं देवदेवस्य सन्निधौ ॥ 
वारमुख्यासमा नाय्येः गन्धर्वान्‌ तिशौ स्यदान्‌ । 


ग म्धर्व्वान्‌ गायनान्‌ ! 


गौ तवा दि च्रश्रब्दन ब्रद्यघोषवरेण च। 


छ्त्यरनाकरः । २१७ 


नर्मालापेञ्च नृत्यैखं श्रमयेत्तां निभां ततः ॥ 
नर्म्रालापैः क्रौडावचमैः । 

अरूणोद्‌यवेलायां समुत्थाय जितेचियः | 

पूजयिल्रा दिजानच मोदहिरण्येनरोत्तमः ॥ 

टृषद्पं ततो धद प्रयतां इषभष्वनः | 

दत्युचाय्यं पर मन्लमाचार्य्खाय निवेदयेत्‌ ॥ 
निवेदयेद्रषरूपधम्नमित्यथेः । 

दला दानमिदं सव्व विधिनानेन पार्थिवः 

कू्ययाद्विभिजयं विप्रो वेदकं समारभेत्‌ । 

वैश्यः खमुद्रगमनं शद्रः कणे ययेश्ठितम्‌ । 

फाष्गुन्यामयवा दद्याद्‌ानमेतन्नृपोत्तम । 

रौद्रं स्वे विनिर्दिष्टं ब्रह्मण शङ्करस्य हि। 

श्रच च प्रकतार्याचुवादोपनोतानि फलानि योच्यानि 1 
मच्छपुराणएे- 

वरा हकल्यदन्तान्तमधिक्ृत्य पराश्रः- 

यदाह धर्ग्रानखिलान्‌ तदुक्तं वैष्णवं विदुः । 

तदाषाढे च यो दद्यात्‌ ठतघेनुसमन्वितम्‌ ॥ 

पौणंमासयाच्च पूतात्मा म पदं याति बारूणएम्‌ । 

चयो विंशरतिसाहसं तत्‌पुराणं विदुैधाः ॥ 
पापेभुंच्यत इत्यनदृत्तौ यमः- 

षायां ज्लानपूतोऽय आवण्वां सततन्तया । 


च्राषाच्छामय कालतिक्यां माध्यां चौन्‌ पञ्च वा दिजान्‌ | 
२ 


९. छव्यस्नाकीरः | 


पूजयेत्‌ पिदपूर्वन्तु तदश्याच्यसुच्यते ॥ 

महासन्धिवियहिक उद्धुर श्रोवोरेश्वरात्मज महासान्ि- 
वियहिक उद्र ओौचण्डश्वरविरचिते शव्यरनाकरे ्राषाढ्- 
तरङ्गः समाप्तः । 
अथ अ्रावशक्त्यम्‌ । 

ब्रह्मएुराए- 

यदा तु कक्वेटं याति भगवान्‌ चण्डदौधितिः । 

ततःप्र्टति कालः स्याद्‌ चिणायनसंन्ञकः ॥ 

तच प्राद्र खन्यूज्या फलपुष्याम्बृभिस्तया । 
तजेति ककं टसंक्रान्तिदिने । 

गोरसाक्तान्‌ तथा श्करन्‌ ब्राह्मणेभ्यो निवेदयेत्‌ ॥ 

दिमञ्च शकंराच्चैव शाकमूलफलानि च। 

उपानच्छचमाल्यानि जलधेतुञ्च शास्त्वत्‌ ॥ 

हिमं कपर । श्र खमेः फलं विश्वजिग्यायात्‌ । 
आतातपः- 

श्रयनादौ सदा देयं द्रव्यभिष्टं रुहेषु यत्‌ । 
श्राग्रेयपुराणे- 

य्चेन्धनं ददेदिमर वर्षादि चर ल ठन्‌ । 

छतधेनुप्ररोऽन्ते च पर ब्रह्माधिगच्छति ॥ 
तच्तैव- 

श्राषाढादि चतुमाखानभ्यज्ग वव्नेयेन्नरः । 


छल्यरनाकरः । 


सुखपरो तिकरार्याय ददाद्न्धञ्च बाषसो । 
पूणिमायां महाराज प्रीयतां पाव्वेतौपतिः। 
जनप्रो तिकरं नुष्णं प्रौतित्रतमिहो ते ॥ 
चातुर्माखं दचिचौरषटतञ्चैव तयेच्चवम्‌ । 
वश्जयिला ठु पाचाणि दद्यात्तन युतानि च! 
वस्त्रेव सुवर्णेन गौरो मे प्रीयतामिति । 
एतङ्ौरोत्रतं नाम मौरौोलोकम्रदायकम्‌ ॥ 
श्रचेव मदाफलानि चातुर्मासि प्रातःखाने । 
हेमानि कार्तिके दद्यात्‌ होमान्ते सप्तगास्तया ॥ 
एतत्ौरबरतं नाम सूय्यैलो कफलप्रदम्‌ । 
म्यपुराणभ्रेयपुराणयोः- 
श्राषाढादि चतुर्मासं प्रातःख्लायो भवेन्नरः । 
विप्रेषु भोजनं दला कान्तिक्यां गोप्रदो भवेत्‌ ! 
स वैष्णवं पदं याति विष्णत्रतमिदं स्मृतम्‌ । 
श्राषाढ्ादौत्यतङ्गुणसम्निज्ञानो बड्कन्रो हिः । 
आ्रेवपुराण- 
श्रयनाद यनं यावत्‌ व््लंयेत्‌ पुष्य-सपिषौ । 
तदन्ते पुष्यदानानि तपेन्वा सदेव तु ॥ 
दला शिवपदं खाति विप्राय छतपायसम्‌ ॥ 
एतच्छिवत्रतं नाम धनारोगखप्रदाचकम्‌ ॥ 
तथा ततैव | 
श्राषाद्छादिजतं यस्त॒ वन्नयेन्नखकभ्एम्‌ । 


२० चछब्यरनाकरः | 


कान्तिक्यां हेमसंयुक्तं दात्‌ स्पिमंधोधेटम्‌ ॥ 
नखकम्भेवन्जैनमेव ततम्‌ । 

शिवाय खद्रलोके तु वसेत्‌ कल्यं ततो नृप | 

शिवव्रतमिदं नाम सुखकामप्रदायकम्‌ । 
ङन्दोगपरिशिष्टे- 

यव्यद्यं ्रावणादि सर्व्वां नद्यो रजखलाः। 

तासु खानं न कुर्व्वोत वन्जेयिला समुद्रगाः ॥ 
अव्यो मासः, समुद्रगाः साचात्‌ प्रत्यभिज्ञायमानसमुद्रणमनाः। 

धनुःखदस्यष्टौ च गतिर्याखां न विद्यते ॥ 

न ता नदौग्रब्दवहा गर््तास्ताः परिकीर्तिताः ॥ 
धनुश्चतुरेस्तो दण्डः । 

उपाकश्मणि चोत्सगेँ प्रातःच्ञाने तथेव च । 

चन्द्र सुय्येयहे चैव रजोदोषो न विद्यते ॥ 
शिष्टाः- 

तपनखय सुता गङ्गा गोमतो च सरखतो, 

रजसा नाभिश्वयन्ते ये चान्ये नदसन्ञकाः ॥ 

च्रादो कद्ंटके देवौ यदहं यावद्रजखला । 

चतुर्थेऽहनि सम्प्रा श्टद्धा भवति जाहवौ ॥ 
महाभारते- 

ख्रावणं नियतो मासमेकभक्रन यः चिपेत्‌ । 

यच तत्राभिषेकेण युज्यते ज्ञातिभिधेनेः ॥ 
यत तच्रेति छ्चिमे चाक्ृचिमे च । 


छत्यरलाकरः | ९२९ 


एकभक्रमेवोपक्रम्य खन्दपुराणए- 
श्रावणे वापि यो मास तथेवाचरते नरः, 
६ ® (न्‌ 
सेनापत्ये सम्राप्य छनवानभिजायते ॥ 


भविग्यपुराणे- 
सव्वैधातुसमाकौणं विचिच्ध्वजश्ो भितम्‌ । 
निवेदयेत द्र्य्याय श्रावणे तिलपन्वेलम्‌ ॥ 
खक्छन्दमामिभिर्यानेः सब्वेभो गान्वतैनु प । 
वषैकोरिश्रतं साग्र स्येलोके सरौयते ॥ 
सम्प्राप्य विविधान्‌ भोगान्‌ बङ्काशच्येफलान्वितम्‌ । 
क्रमाल्लोकमिमं प्राप्य राजानं विन्दते पतिम्‌ ॥ 
बुद्धि शौलगुणे पेत कान्तितेजःप्रभाज्ितम्‌ । 
वेदबेदाङ्गतत्न्ञं स्व्वेशास्तविश्रारदम्‌ ॥ 


€ 
नाद्र उना कणरिन् [+~ ~ 1 ~ शा 77 





व्रतेऽनुषन्देयानि ] 


दति कामव्रतम्‌, 


५ 





ग्रहणकसु पक्रम्य देवो पुराण - 
श्रावणे सिन्धुनामा च पुण्छेति प्रक्रमात्‌ तच सानादिकं 
पुण्यदेतुः । 
विष्णुधर्मोत्तरे 
श्रावणे वस्त्दानस्य कन्तितं सुमहत्‌ फलम्‌ । 


रर क्त्यरनाकरः। 


वामनपुराण- 
उतत्तोरकुम्भष््च छतधेनुः फलानि च । 
रावे भरौधरपीले दातव्यानि विपश्चिता ॥ 
शतच दानं ्रावएणभोष्टदिन ट्ति सागरः। 
भ विय्यपुराणे- 
सग््रक्षे श्रावणे मासि यः कुर्य्यान्नक्तभोजनम्‌ । 
चोरबष्टिकयुक्रन सब्वेश्तद्िते रतः ॥ 
पौतवणाञ्च गां दद्यात्‌ भास्कराय महात्मने । 
सामान्यनिघमं कुर्य्यात्‌ प्रागुक्त यन्मया तव ॥ 
घामान्यं पोषमास्यं पौषमासे भविष्यपुराणोक्तोभयम्तमौ- 
कथितसामान्यनियमम्‌ । 
सुविचितरेमदायाने हंससारसयायिभिः । 
गत्रादित्यघुरं श्रोमान्‌ पर्वोक्तं लभते फलम्‌ ॥ 
जह्मपराणए- 
श्रावणे छृष्णपचे तु शद्रः प्रथमेऽखडेनि । 
चिपव्वेणा निश्चयेन चिसुखेन ग्रेण" त्‌ ॥ 
भ्यं लोह शङ्कुः । 
सुखानि चौणि चिच्छेद यज्ञस्य म्डगरूपिणः ¦ 
तैः शरिरोभिस्तपस्तप्तं वराः प्राप्ताश्च शङ्करात्‌ ॥ 
सुखान्खेव शिरांसि । 
स््लोभिः परन्यानि तानौह न मनुख्धेः कथञ्चन । 


छ्यरनाकरः | २२ 


मुख्यैः पुर्षेः । 
ग्ग शनोषंचय छता लिङ्ाकार श्च श्ण्सयम्‌ । 
चौरेण खपनोयञ्च प्रूजनोयम्‌ यथाविति ॥ 
अध्यैः पुष्येश्च धूपे नेवेयविविधेरपि । 
शाकैः सौ वच्चंनाभिश्च भच्यैः पिष्टमयै; एएमेः ॥ 
कांखभाजनवाेख्च पञ्चात्‌ काय्ेन्त भोजनम्‌ । 
सौवच्च॑ना ओषधिविगेषः । 

मन्छयपुराणे ब्रह्मोवाच- 
भगवान्‌ पुरुषस्येह स्तिया विर हादिकम्‌ । 
शोकव्याधिभयं दुःखं न भवेद्येन तद्वद्‌ ॥ 

ओरोभगवानुवाच- 
ज्रावणस्य दितौयायां हृष्णायां मधुखदनः । 
सौराणेवे सलच्छोकः सदा वसति केश्वः ॥ 
तस्यां सश्यन्य गो विन्दं सर्व्वान्‌ कामान्‌ समश्रुते । 
गो--दिरण्यदानारि सप्रकल्यश्तानुगम्‌ ॥ 
शरशन्यश्रयनं नाम दितौया सख्मकौलिता । 
तस्यां सम्यजयेदिष्णुमे भिमन्ते विशेषतः । 
श्रोवत्धारिन्‌ ओकान्त ओवास श्रौ पतेऽचय ! | 
गासं मा प्रणाशं मे यातु धर््माथेकामद्‌ ॥ 
्रम्मयो मा प्रणश्यन्तु देवताः पुरुषोत्तम । 
पितरो मा प्रणश्यन्तु मन्तो दाम्पत्यभेद तः९ । 


भजक म म, जि ००० अ ~ 
1 1 





१ माऽस्तु द्‌ाम्पत्यभेदनम । 


२९४ 


क्ल्यरनल्कीर, । 


लद्ठ्या विचुच्यते देवो न कदाचिद्यथा भवान्‌ । 
तथा कलचसम्बन्धो देव मा मे वियन्यताम्‌ | 
लच्स्या न शन्यं वरद यथा ते शयनं सटा) 
शय्या ममाघश्युन्यास्त॒ तयेव मधुखदन ॥ 
गभेतवादि चनिर्घोषं देवदेवस्य कारयेत्‌) 

चण्डा भवेद्‌ शक्तस्य खब्देवाद्यमयो यतः ॥ 

एवं समयन्य गपेविन्दमश्रौ धान्तेलवष्जिलम्‌ । 
नक्तमचारलवणएं यावत्तत्‌ स्याच्चतुष्टयम्‌ ॥ 


मासचतुष्टयमित्ययेः । 


ततः प्रभाते संजाते लच््ो पतिसमन्िताम्‌ । 


ततः म्रभात इति चतू्य॑माषदितौयानन्तरप्रभाते शय्या 


दानम्‌ । पारिजाते तु प्रतिमासं प्रतिमादानं प्र्याद्‌ानचचेत्यु्तम्‌ ¦ 
लव्य तिश्ब्देन सलष्डोप्रतिमाक-लच््ोपतिप्रतिमा विवक्षिता । 


वाणी 


दौ पान्नभाजनेयैक्तां श्थ्यां ददयादिलक्णाम्‌ ) 
पादुको पानदच्छच चामराखनसयुताम्‌ ॥ 
च्रभौष्टो पस्करेयेकां शुक्तपुष्याम्बराच्िताम्‌ । 
सोपधानकविश्रामां फलेनानािधेयेताम्‌ ॥ 
तथयाभरणधान्येश्च यथया श्रह्या समन्विताम्‌ । 
अव्यङ्गाङ्ाय विप्राय वैष्णवाय कुटुम्बिने ॥ 
दातव्या वेद विदुषे न? च कूष्येत कस्यचित्‌ । 
तचो पवेश्व दान्पत्यमलङकत्य विधानतः ॥ 





१ {3 भावेनापतिताय च। 


कत्धरनकरः। २२५ 


पल्या्वु भोजनं दद्यात्‌ भच्छभोज्यसमन्वितम्‌ 

त्राद्यणस्यापि सौवर्णोसुपस्कर खमन्विताम्‌ । 

प्रतिमां देवदेवस्य सोदङ्म्भां निवेदयेत्‌ । 

एवं यस्त॒ पुमान्‌ इूरव्यादशन्यश्रयनं हरेः ॥ 

विन्तग्रायेन रदितो नारायणपरायणः । 

न तस्य पल्य विरहः कदाचिदपि जायते ॥ 

नारी वा विधवा ब्रह्मन्‌ यावदन््राकंतारकम्‌ । 

प्न विरूपं न शोकानत्ते द्‌ाम्पत्यं जायते कचित्‌ ॥ 

न पच -पश्म-रनानि चख धान्ति पितामह । 

सप्रकल्यसदहस्ाणि सप्रकल्यश्र तानि च ॥ 

कुष्वन्नशुन्य यनं विष्ण लोके मदहोयते ॥ 

दृत्यश्न्यश्रयन ततम्‌ । 

भविव्यपुराण-- सुमन्तुरुवाच 

श्रशन्यग्रयनां नाम दितौयां श्ट भारत) 

याभुषोग्य न वैधं स्वौ प्रयाति नराधिप। 

पन्नो वियुक्तः नरो न कदाचित्‌ प्रजायते ॥ 
उपो येत्य चोपवसनसुपाखनं न पुनरनश्रनं श्रये नक्तं भु्चौते- 

त्यभिधानात्‌ । 
ओेदे अगत्यतिः छष्णः धिया साद्धं यदा नृप । 


~~~ तण न 





९ भूत्ते न विरूपौ न शोकार्त द्म्यतौ भवतः दाचित्‌ । 
२ ^ विमुक्त । रे ^ कदाचिदपि जायते। 
२९ 


रर छत्यरनाकरः | 


चरदून्यग्रयना नाम तदा राद्धा हि सा तिथिः। 
छष्णपक दितौयायां श्रावणे मासि भारत। 
इद सुष्ठारयेत्‌ प्रातः प्रणम्य जगतः पतिम्‌ ॥ 
्रेवत्खधारिणं ओरौ र भक्वाग्यच्यौ अवा सह । 
ओरौ वतससधारिन्‌ श्रौकान्त भौवा ओ्रौपतेऽवयय ॥ 
गारं सा प्रणाशं मे वातु चरशायेकामदम्‌ । 
एचयो मा प्रणन्तु मा व्रणशन्तु मे जनाः ॥ 
प्याम्यगाः मा प्रणश्यन्त्‌ मन्तो दाम्पत्यभेदतः । 
प्रचयो ऽग्रयः, याम्यगः पिलरः। 
ल्या विचुज्यते देवो न कदाचिद्यथा भवान्‌ । 
तया कलचसम्बन्धो देव मा मे विचुच्यताम्‌ ॥ 
लच्स्धा न शृन्टं वरद खथा ते शयनं सदा, 
शय्या ममाध्यश्यन्याऽस्त॒ तथाच मधृूदन ॥ 
कलचसम्बन्धो देव मा मे विचुज्यतामित्यच् मन्ले स्त्रौकन्त्‌ - 
केऽपि तत्मरयोगे कल्चपद खाने पुरूषपदोदहो न कन्ैव्यः स्तौ पुर्‌- 
षयोरुभयोरपि युमपद्धिकारविधानेन मप्रक्तिविङ्ृतिरपला- 
भावात्‌ । प्रसाद्येव्यपि नारुपपन्नमन्ययापि तदुपपत्तेरिति । 
एव प्रसाद्य पूजाञच्च छवा लद््यास्तया इरेः । 
फलानि दयाच्छय्यायामभोषटानि जगत्पतेः ॥ 
नङ प्रणम्यायतने इरि सुद्धोत वाग्यतः । 
नक्त भुद्ोतेत्यन्वयः ¦ 


९ ए खातः। ₹ 8 जामयः । ₹ ^ 7 निच्जैराः 


छत्यरल्नाकरः। २२७ 


ब्राह्मणय दितौयेऽङ्कि शक्या दद्याच्च दचिणम्‌ ॥ 
ग्रतानौक उवाच, | 
कानि तान्यभौष्टानि केशवस्य पलानि तु। 
योज्यानि शयने विप्र देवदेवस्य कथ्यताम्‌ ॥ 
किञ्च दानं दितौयेऽद्धि दातव्य ब्राह्यणस्य त्‌। 
सुक्तीनैरे टिंजश्रेष्ट देवदेवस्य शक्रितः ॥ 
समन्त्रका च । 
यानि तच महाबाहो काले सन्ति फलानि च। 
मधुराणि न तौन्नाणि न चापि कटुकानि च॥ 
दातव्यानि नृपश्रेष्ठ खश्र्या शयने नुप । 
मधुराणि च द्त्वा तु मनो प्वल्ञमतामियात्‌ ॥ 
योषिच्च इरुगादल ! भत्तुवेलभताभियात्‌ । 
तस्पात्‌ कटुकतौत्रा णि स्रौ लिङ्गानि च वन्जंयेत्‌ । 
रव्न रमातुलङ्गानि स्थितेन शिरसा सह । 
फलानि श्रयने राजन्‌ यनज्ञभागदहरस्य तु ॥ 
एतन्येव तु विप्र गाङ्गयसह्िताजि च: 
दितौयेऽद्कि प्रदेयानि भक्तया शय्या च भारत ॥ 
वासोद्‌ानं तया धान्यं फललेदानममन्वितम्‌ । 
ग) कयस्य विश्रेषेए दानं धन्यं प्रचच्ते ॥ 
स्थिनिन शिरसा विद्यमानेन इन्तनेत्ययेः यज्ञभागदरो चन्न- 
पुरुषः यगाङ्गयमच सुवणम्‌ ! 


१९ 23 दइरेः। 


५ ५५ ्त्यरलाकरः । 


एव करोति यः सम्यङ नरो मासचतुष्टयम्‌ | 
तस्य जन्मचयं कौर ररदभद्खो न जायते ॥ 
मासचतुष्टयं तदत्‌ छष्एद्धितो यायाभिति शेषः । 
चअशन्यश्यनश्च स्यात्तथा चर्माथंसाधकः९ ॥ 
भवत्यव्याहतेश्वय्येः पुरुषो नाच संश्रयः ¦ 
नारो वा राजन धश्मंन्ना त्रतमेतद्यथाविधि ॥ 
या करोति न शोच्यासौ बन्धुवगंस्य जायते । 
वेधं दुभेगनश्च भन्तं त्यागश्च सन्तम ॥ 
नाप्नोति जन्मचितयमेतत्‌ चोर्वा महाव्रतम्‌? । 
त्येषा कथिता राजन्‌ दितौया तिधिरुन्तमा ॥ 
यामुपोष्य नरो राजन्‌ इद्धिशटद्धिं भिय ब्रजेत्‌ । 
अच- फलानि दद्याच्छ्याथाममोष्टानि जगत्पतेः ॥ 
दत्यनेन श्रय्थायां फलधारणं विव्चितं न दानम्‌, श्रय 
दितौयेऽपि प्रदेयानोत्यनेन फलद्‌ानविधानात्‌ ¦ 
रच प्रतिमासं दकिणदानसुक्र न शय्यादानभिति कल्यान्तर- 
मेतत्‌ फलापकर्षात्‌ छरष्णादि श्च मामः, आचारोपष्टम्ात्‌ 
दत्य श्यन्यश्रयनदितोयात्रतं समाप्तम्‌ । 





देवोपुराणे- ब्रह्मोवाच 
श्रतः परं प्रवच्मि सर्ववाभ्यदयवद्धंनम्‌ । 
यत्‌ कला जायते राजा सावभौम इदेव च ॥ 


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१ ए धम्मेकामाथे स{धकः। २ 1 पाण्डुकुलोद्धद ! । 


लल्धरन्नाकरः | ९२९ 


मासे नभसि सन््ाप्त नक्राहारो जितेद्धियः। 
प्रातःचायो सदाध्यायो अद्धिकाय्येपरायणः ॥ 
देवो सन्यूजये्ञित्यं विल्व-पु्नाग-चम्पकतेः ¦ 
धृपन्त गग्गुल्‌' दयात्‌ नेवेद्यं तपाचितम्‌ ॥ 
त्ोरान्नद धिभच्छञ्च ्रयवा श्ाक्रयावकम्‌ । 
जपञ्च कुय्योन््न्लस्य सदहखमयवा शतम्‌ । 
देव्यास्तश्च ममघ्येत यावत्‌ परूणे्रतो भवेत्‌ । 
पर्ल त्रेते ततो वत्छ कन्याचाय्येदिनांम्तथा । 
भोजयेत्‌ प्रूजयेच्छत्वा डेम-श्च-वस््-गो-टषैः । 
श्रभावाद्य वित्तस्य जयः कार्य्यो ददिनोनलम ॥ 
यः कूर्ययासततं भत्वा सोऽपि तत्तृच्यताभियात्‌ ॥ 
न च व्याधिजेरा खत्यु ने भघं वारिसम्मवम्‌ । 
जायते देवोभक्रस्य श्रन्ते च पद्‌ मव्ययम्‌ ॥ 
अ्रच्र मन्त्रपदानि भवन्ति | 
ॐ नन्दे नन्दिनो सर्व्वाथंसराधिनौ नमः! मूलमन्तः ॐ नन्द 
दयाय नमः ददेयम्‌ । ॐ नन्दिनि भ्रिरसे खदा शिरः | 
ॐ स्वं नमः शिखा , ॐ प्र्थसाधिनो नमः कवचम्‌ । ॐ नमः 
दत्‌ फट अस्त ॐ ने चाय नमः नेचं । नन्दिनौ उपचार हदयम्‌ । 
दतो यायाञ्च पञ्चम्यां चतुथ्योमष्टमौषु च) 
नवम्यां पोणंमास्याच्च एकादण्याञ्च इादश्रम्‌ । 
षष्ट्या द्धेव विधौ पूजनौया विग्रेषतः ॥ 
नन्दासुदिश्य यौ दद्याच्छरावणे इषं सितम्‌ । 


२२० क्रा्यरनाकरः । 


स लभेदिष्टकामाश्चिं देवोलोक्श्च एाश्तम्‌ ॥ 
नभस्ये तां श्सुदिश्य दयाद्ां कनेक्ञ्च वा । 
स ब्रजेद्धूतपापस्तु नन्दालोकं तमक्तयम्‌ ॥ 
नभस्य भादर । 
श्राश्विने नवराचन्तु उपवासमयाचितेः । 
छता देवौँ प्रपूज्याय अषटम्यामपरेऽहनि ॥ 
हेमपुष्यं मणिस््ं नानादिच्विश्षणएम्‌ । 
दानञ्च काञ्चन देयं नन्दायै खगंशिद्धये ॥ 
विधूतपापसंघातः सब्देकामममन्वितः । 
गच्छते तन्त पे लोकं यच देवौ सुरारिहा ॥ 
व्षते कल्पको टोस्तु अष्छरोगणभ्च वितः 
नन्दते श्रागतश्चाच एथिव्यामेकराट्‌ भवेत्‌ ॥ 
कार्तिके पूजयिला तु देर्वौ जाति-गजाह्कयेः । 
अद्धयानं दद्दिप्रकन्यासु स्तोष्वपि वा ॥ 
श्वेतानि चैव वस््लाणि तथा देयानि दिए । 
मुच्यते सव्वेपायेस्त जन्मान्तर कतेरपि । 
द्डहैव जायते योगौ परच पदमव्ययम्‌ ॥ 
मार्गे च विधिवत्‌ खाता देवीं पूज्य च इङ्कमेः, 
नैवेद्ये छतपूणाख उेयाः कन्यासु च दिने! 
भोजयेदचयेदत्छ वसतेः कौ टङ्लोद्वेः । 
राप्ुयात्‌ सव्वैकामार्थान्‌ सव्वेपापेः प्रमुच्यते ॥ 
पौषे देवं सभासाध्य यवजेः सग्पररचंयेत्‌ । 


स्त्यरलाकरः | २२९ 


नेवेद्यं शरालिभकतश्च कन्याः सम्पूज्य द येत्‌ ॥ 
पोतवस्चेस्तया ग्या देये देयातिशेनना । 
अनेन विधिना वत्स साक्लादेवौ प्रसोदति ॥ 
ददाति कामिकान्‌ भोगरानन्ते च खपुर नयेत्‌ । 
माघे तु पूजयेदेवोः कन्दजसखग्भिराद्रात्‌ ॥ 
कुङ्कुमेन सदपल तथा समुप्लेषिताम्‌ , 
सद्पेण कष्ठरौषहहितेन ¦ 
लापितां विधिवत्यष्बा ततः कन्यास्तु पूजयेत्‌ ॥ 
दिनं चण्डिकाभक्तान्‌ विधिना तपायसेः । 
दकए तिलद्योमश्च यथाशत्या प्रदापयेत्‌ ॥ 
विधूतपापकलिलः मव्वेभोगममचितः । 
विश्वचुवेहपुचश्च जायते नरसत्तम ! ॥ 
देदान्ते नन्दिनलोकं सव्वेदेवनमखंतम्‌ । 
प्रयाति नाच सन्देहो अनेन विधिना नुप ॥ 
फारग॒ने पूजयेदेवौ खग्धिस्तु सदहकारजेः । 
तथा नेवेद्यभच्छाणि शक्ररा मधुना मह ॥ 
भोजयेत्‌ कन्यका विप्रान्‌ दव्चिला सितदाससौ | 
चरनेन जायते भोगौ देवलो कन्त्‌ गच्छति ॥ 
सम्मा चेजमासे तु देवो प्रज्याऽय किंष्एकेः | 
नेवे्ये लडका दे यास्या कन्याश्च भोजयेत्‌ ॥ 
स्तियश्च रक्तवस्तेश्च दच्वितया बयाविधि । 
अनेन सन्वेकामार्थान्‌ प्राप्रुयादषिचारितान ॥ 


१ 


सथर नकरः । 


देवोलोक त्रजेदत्छ यच भोगा निरन्तराः ॥ 
वेश्राखे प्ूजयेदेवौः रूग्भिवें कर्णिकारजैः । 
नेवेद्यं शक्तवः खण्डं कन्या भोज्याश्च दचयेत्‌ ॥ 
प्टभानि हेमक्चाणि देयानि दिजसन्तमे । 
देवोन्त॒ मरोणएयेदत्स ! मव्वेदेवेव्वलुनत्तमाम्‌ ॥ 
चये तु श्ङरौ पज्या रक्ताशोकङुरुष्टक्ैः । 
तया देञ्च नेषेद्यं तपूर्णाखच कन्यकाः । 
भोजनोधाश्तया द्वा गोभ्रदानादिभिः शरभः ॥ 
जलक्घुम्भास्तया देवाः सग्यू्णा वा सिताम्भस। । 
श्रनेन वारुणान्‌ भोगान देवो चिप्रं प्रयच्छति ॥ 
श्राषाढ़ प्जयेदेवौं पदचर्नौलोत्यलेदंलैः । 

नेवेद्यं शर्वराभक्तं दधिभक्तं सपायसम्‌ ॥ 

कन्या दिजाः स्यो भोज्या दच्तयेद्च तया च तान्‌ । 
नानादहेमाङ्गरागादये स्तिल-ग्दस्यश्च-मो क्रिकर: ॥ 
पूच्या भगवतो शक्या सव्ेकामप्रशिङये , 
नन्दा सुनन्दा कनका उमा दुगा चमावतो ॥ 
गौरौ योगेश्वरो श्वेता नारायणौ सुतारका । 
असम्बिकेति च नामानि ्रावष्णाद्‌ावनुक्रमात्‌ ॥ 
ये कौन्तेयन्ति उत्थाय तेन ते घौ तकल््रषाः । 
भवन्ति कुर्राहूल प्रयिव्यां धनसदङ्ुलाः ॥ 
एतानि पाथ संयामे रिपुपोड़ासु नित्यशः । 
सरस्तरति दुर्गाणि चच्चिकेति सुरोत्तमम्‌ ॥ 


` ्यरलाकरः । २६२ 


त्रतानां प्रवरं काथ्येमद्ध वा पादमेव वा, 
मासं वाय म्रक्रत्तेवये आवणादिक्मेण तु ॥ 
दूति नन्दात्रतम्‌ | 


श्रिष्टाः- 
सुप्र जनाहने कष्टे पञ्चम्यां भवनाज्ने । 
पूजयेन्मनसादिवौ कलहो विरपसंख्िताम्‌ ॥ 
करवौरः श्रतपचैः जातीपुष्यैः सचन्दनैः । 
लापयेदयपयसा तया शौतोदकेन च ॥ 
सषटतं पायमाप्ूप दयाूपच्च ग गशलम्‌ । 

मनदेवौः विषहरां, खौ भिजुरिति प्रसिद्धा | 

दारस्योभयतो लेख्या गोमयेन विषोल्वणः ॥ 
परूजयेदिधिवन्तास्तु दधिदर्वाङ्करेः कुभेः 
पिचमदस् पज्नाि खापयेद्धवनोदरे ॥ 
खयञ्चाःपि तद म्ौयात्‌ ब्रह्मण्णंञ्ापि भोजयेत्‌ । 
काम येच्जागर तस्या देयाश्वापि मदःत्सवम्‌ ॥ 

-पिचमदौ निम्बः तदश्नौयादिति पिचमदं भच्येदित्ययंः | 
च्रच च कल्पे मभयप्रदौपे प्रथमश्नोकमाच लिखिला तिक्त-कटु- 
कषाख-मधुराण्णं क्रमेण भचणएमाचरन्तोत्युक्रम्‌ । 

नद्य एराणए- 

आव रोदहिणणैयोगे कश्यपश्च प्रजापतिः । 
जातस्तचाथ पूज्योऽसौ देवस्यास्य प्रवर्तकः ॥ 
2 | 


२२४ क्लत्यरनाकरः | 


गन्धमादश्च नेवेदयेस्तया ब्राह्यणतपेशेः । 

पूज्या गावश्च रोदिष्यस्तया नाय्येः पनित्रताः ॥ 
रोहिण्यः प्रमापतिदेवताकनच्चाणि। 
भविय्ये- 

श्रावणे मासि पञ्चम्यां एक्तपक्े नराधिपः 

इारस्योभयतो लेख्या गोमयेन विषोल्वएाः । 

पूजथेदिधिवद्यौर दधिदूर््वा्ुरैः कुः? । 

गन्धपुष्पो पदारेशच ब्राह्मणानाञ्च त्पैणेः ॥ 

ये लरस्यां पूजयन्तोह नागान्भक्गिपुरःसराः । 

न तेषां सेतो वोर ! भौ तिभेवति कुच चित्‌ ॥ 
नागास्तु- वासुकि-तच्चक -कालिय-मणिभद्र-एेरावत-्टतरा़- 

करकाटक-घनञ्जयाः , 
दति सर्पाभयपञ्चमोत्रतम्‌ 





तत्रैव भविष्यपुराणे- 
सम्प्राप्ते आवे मासि यः कु््यांन्नक्तभोजनम्‌ । 
चतौ रयष्टिकयुक्तेन सब्देसत्वहिते रतः ॥ 
पौतवर्णञ्च गां दद्याद्धाख्कराय महात्मने । 
खामान्यमखिल कूर्यात्‌ प्रागुक्त यन्या तवर ॥ 
सुविचिते्म॑हायानेहस-सारसयायिभिः । 
गल्वादित्यपुरं श्रौमान्‌ व्यक्तं लभते फलम्‌ ॥ 


१ सूले-- कमात्‌ | 


छत्यरल्नाकरः । २३५ 


अत्र जितेद्दियत्व-स्वादिल-गोधूम- गोर सपान-सप्तमोदयोप- 
वाख-च्विसन्च्य रा ण्डिलियस ह्ितभा न्वे न-नित्याधःघ्रायितल सन्वेभोग- 
विवब्जेनानि स(मान्यमखिलं कुर्य्यादिव्यनेनोच्यन्ते : 

तत्रैव उमोवाच- 


मासपुव्याणएि मे ब्रूहि तेषु मासेषु यत्‌ फलम्‌ । 
पूजिते वयि देवैश्च तथा सखानफलं वद ॥ 


श्रौमहादिव उवाच- 


बटण देवि महापुण्ं मास पूजाफलं इएभम्‌ । 
पुष्याणि द तथा कद्ध तथा स्ञानफलं वरम्‌ \ 
श्रावण प्रटक्ञोपचसय अम्य ससुपोधितः । 
सापयेद्‌टत-क्तौ राभ्यां करवौ रेख प्रजयेत्‌ ४ 
छल भ्रिकाय्यं विधिवत्तया? ब्राह्मणभोजनम्‌ । 
कन्याकन्तित्‌ खचरेण कारयिला पविचकम्‌ ॥ 
छत्वा वि चिच्गन्धे्तु कुङ्‌मागरुचन्दनेः | 

छल पवास सप्तम्यामष्टम्यां वप्रभोजनम्‌ ॥ 
रोपयति यो भक्ता मोऽशिष्टो मफल लभेत्‌ ¦ 
पुनभेवति दे राजा श्वतले नात्र संशयः ॥ 
मासि साद्रपदेऽष्टम्यां इटक्तपचे वरानने , 
स्तापयिला ठु मां भका पयसा द छतेन च 
श्रपामारगेण पूजान्तु छेतवा देवि! विधानतः | 
इहसयानसमारूढो मम लोक व्रजेदिति ॥ 


स -~------- ~ न~ = ~~~ 


१ {2 विधिवद्धथो, 


२३६ 


णि, ता मा सा त प) मा त ना त स ~ न न "= [1 


री्यस्नाकरः | 


मासि चाश्वयुजेऽष्टम्यामकंयुव्यस्हु योऽचंयेत्‌ । 
खा पयेद्‌धिक्लौरेण छद्ुमेन विलेपयेत्‌ ॥ 
गैरिकं यानमारुद्य ष्वजमालाङ्घुलं प्टभम्‌ । 
युक्तं मथुरप्रवरेमेम याति समं दिवम्‌ ॥ 
कात्तिकस्य तु मामस्य शक्ताषटम्यान्त यो नरः । 
सञापयेन््धु-चौ रण्यं जानो पुष्येस्ठ पूजयेत्‌ ॥ 
कानक यानमारुह्य किद्भिणणेजालमा लिकम्‌ । 
सख यातिमे पर देवि गन्धरव्वा्छरखां प्रियः ॥ 
मागें त्‌ वे मासे पञ्चगव्येन यो नरः | 
सापयिलाचयेत्या चकं पुष्यैदेरानने 7 
ज्ञत्लोपवास सप्तम्यामष्टम्यां विधिवन्नरः । 
तच्चेलोक्यमतिक्रम्य यचा तत्न गच्छति ॥ 
पौषमासे तु योऽष्टम्यां भक्तया पूजयते नरः । 
उन्म्रत्तकस्य पुष्येस्तु स्लापयितलला एतेन च 

स यान दिव्यमार्ह्य पुष्पक नाम नामतः ॥ 
ममाल्यं समाष्ठाद्य मोदते शश्वतः माः । 
माघमासे तथाष्टम्यां विख्वपन्नेण योऽडयेत्‌ ॥ 
सापयिला ठु मां भका भदेवोभिचुरसन तु) 
ग्रभयाऽकंसमं यानं कान््याचेयसमं तया ; 
श्रारूढटो मोदते नित्ये मम लोके न स्ग्रयः | 
फाल्शनस्य तु मासम्य गन्धतोयेन यो नरः ॥ 


१ 1 दिव्येन ^ दिन्या। 


कछत्यरन्नाकरः। २२७ 


श्रचयेटरो ण पुष्येस्त॒ मडेन्द्रस्यासनं लभेत्‌ 

चेन मासि तथा देवि पुव्यतोयेन यो नरः॥ 
सतापयित्वा देयेन अ्रकपु्स्त सुन्दरि ) 

ब ृस्रणेस्य यन्स्य विन्दते स फलं महत्‌ ॥ 

ख यदा जायते चेदहं तदा पुचजाक्लभन्नरः । 
द्ेशाखे तू तथा मासे च्रष्टम्यां यस्तु भानवः ॥ 
कपररायरुतोथेन स्ञापयित्वा विधानतः , 
श्रयेष्छरेतमन्दारेरश्वसे धफलं लभेत्‌ ॥ 

गल्ला मम पुरे देवि क्रौडते च गैः सह । 
चेष्टे मासि तथाष्टम्यां द धिना स्ापयेत्तथाः ॥ 
रचयेत्‌ पद्मपुष्येस्त स गच्छेत्‌ परमां गतिम्‌ । 
श्राषाटं यो नरोऽष्टम्यां नानातौयौदकेवरेःर ॥ 
सापयिलाचंयेदहक्ता ु्ेधरस्ठर कस्य च । 
गन्धव्वोर गयतैश्च पूज्यमाने नरो दिवि ॥ 
करडते च मया साद्धं यावदिद्धाञ्तुरदश् | 
य एव वत्सरं देदि पारूयेद्टमौत्रतम्‌ ॥ 

न तम्य पुनरारत्तिः सत्यमेतद्ध वोम्यहम्‌ । 
नोलकण्ठं हरं शद पवये भौमं महेश्वरम्‌ ॥ 
विरूपात्त महादेवसुयं चम्बकमेव हि । 
ईश्वरञ्च शिव देवि सबव्वेल्लोकेधु पूजितम्‌ । 
एतानि सेम नामानि मारेष्वेतेषु कौत्तेयेत्‌ ॥ 


भि मन म ता्‌ म का 


१8 दघ्ना यः खापयेत्त्‌ मास्‌ । २ 7 नवैः। 


२६८ छ्त्यरन्नाकरः 


देवोपुराण- 
दै श्वर उवाच- 
प्रण वत्स प्रवच्छामि देयाराघनसुत्तमम्‌ । 
कम्मयन्नन्त्‌ यज्ञानां सुकरं सुमहत्‌ फलम्‌ ॥ 
साम्ब्छरौ यथा पूजा रफलेन समाचरेत्‌ ! 
नच्जबेदयादयुक्तो यो धद्य: कम्मेफलाथिनः ॥ 
यवः सर्पिः कुश्ागरञ्च गोमूचं इचि मोमचम्‌ , 
पवि्ं विदितं तन्ते श्रशक्तानाञ्च भागव! ॥ 
देवौन्रत प्रव्च्छामि सव्वैकामा्ंखाघधकम्‌ । 
श्रावणे श्एक्ञापच्े तु अष्टम्यां वायुभोजनः ॥ 
चात्वा भागेपटोरभ्रूला जितक्रोधः कमान्वितः | 
देवो श्क्लाप्य तोयेन युनः कौरेण स्त्ापयेत्‌ ॥ 
ततौ बग्गुलुधूपञ्च सतुरुष्कं प्रद्‌ पयेत्‌ । 
ततो मन्धो द्कस्नानं पुनस्तोयेन शरा पयेत्‌ । 
्रौखण्डेन समालभ्य विस्वपचेश्च परजयेत्‌ । 
पायसं दापयेदेब्या भेवेद्यं तेन भोजयेन्‌ + 
कन्या दिजांख श्त्या तु तेषां दद्याच्च ददङिणाम्‌ | 
कात्यायनौति चोचाय्ये प्रौयतं मम सव्वैटा ॥ 
परात्मनः पारणं तच्च कछला प्राप्नोति भागेव | 
अश्मेधफलश्चाग्यं देव्या लोकश्च गच्छति ॥ 

तथागत्य इमां भूमि एचिव्यां जायते नृपः | 


"री 





ज तक 


१ © सादपुटः। 


ज्ञत्यरन्नाकरः। २२९ 


तेन सछभते योगं श्रिवप्रा्चिकर परम्‌ ॥ 
मासि प्रौष्ठपदे शक्ते गोश्टङ्ग खहौतया । 
मटदया ह्यात्मनो दयङ्गशुपलि ह सापयेत्‌" ॥ 
अचाष्टम्याभित्यनुषच्यते ¦ 

१[ तथाचामलकेः खूाला शचि: सङ्गविवन्नितः । 
परजयेद्यूथिकाएुष्ये देगें चौरेण खाप्तिाम्‌ ॥ 
चन्दनोद्कमिशरेण कुङ्कुमेन विलेपयेत्‌ । | 
ततः पूपकनेवेद्यं कणंमो ट र्थ दापयेत्‌ ॥ 
शरगुरं धरूपने दचान्तिलतेलेन दौपकान्‌ ` 
तेन ता भोजयेत्‌ कन्या ददिजान्‌ सहन्तिनः सद्‌ा* ॥ 

तिन क्षौरे सह । पाखण्डान्नावलोकेत नौ चान्‌ परास्वरहिष्वोताम्‌, 
दचिण्णः शक्रितो देयाः खस्ि वाच्यश्च मङ्गलम्‌ । 
पार णञ्चात्मनस्तद्त्‌ सौ चामणिफलं लभेत्‌ । 

तत्‌ चौरम्‌ । 

प्रयाति किष्णलोकञ्च ततो विप्रोऽभिजायते । 
धनाच्छो महति गोच बेद्वेद्‌ङ्गपारे ॥ 
पुत्रवान्‌ धनवान्‌ भोगो सुखं प्राय भरिवो भवेत्‌ । 
प्क्ताष्टम्यामाश्चिने तु शटदा ञानं खमादरेत्‌ ॥ 
ततो देवों क्लापयेचच दघ्ना चेवोदकेन च । 

आलभ्य रोचनां मूद्धि देत्‌ धपञ्च वालकम्‌ ॥ 


न 








१ 8 उपल्तिपषन्त्‌ कारयेत्‌ । ₹ 1) [ ] चिद्कितांशः पतितः। 
रे 2 कणेवेष्टां । ४ 7 सद्ुन्निवक्षिनः 


दीव्यरल्ाकरः ) 


सनखं सितया मिश्रं पद्मपुष्ये सयाच्ंयेत्‌ । 
नखं नखोलि प्रसिद्धः सुमन्धिद्र यभेदः ॥ 
लेवें रौ द्दिं मांसमाजं श्राद्यकजन्तया । 
सोहिषं सोदहिषो हरिएविगेषः तदौयं, राजं क्ागोचम्‌ ॥ 
गोधूमविकतान्‌ भच्छान्‌ ठतयुक्तान्‌ निवेदयेत्‌ । 
तेन कन्यासु सभोचज्या दिजांश्चापि चमापयेत्‌ ॥ 
्रक्रिलो दिए देया श्रात्यनस्त भोजनम्‌ । 
गो सदखग्रदानस्य फलं प्राप्रोति मानवः ॥ 
्ररोगौ सुखवान्‌ धन्यो जातें चेह भानवः । 
दर्गानामालुक्कौर्े तस्या लोके महोयते ॥ 
का न्तिके दवममूलाभिष्डेद्धिः लाला ठू भार्गव । 
देवी गन्धोदकैः साप्य चभ्रौरः पच्य लेपयेत्‌ । 
धूपश्च षडरं देयं तिलतैलेन दौपकान्‌ । 
नेमे यावकं सविः कन्याविप्रेषु चात्मनः ॥ 
भोजनं खश्ति वाच्येत दचिएा म्रोयतां शवा 
श्रनेन विधिना इक्र विद्यादानफलं लभेत्‌ । 
बेद-वेदाङ्गतलज्ञस्तदन्ते शिवतां व्रजेत्‌ । 
मागें तथा मासि अष्टम्यां गिरिम्टत्सयः ॥ 
साला देकं ततः खाप्य तौयेतोयेन भागव , 
लेपयेत्‌ वालक्रेः कुः प्रजा जातौो-गजाङ्येः ॥ 
गजाङ्कयो नागकेशरः । 
धूपं छष्णागरं दद्यात्‌ इतेर्दौ पान्‌ विबोधयेत्‌ । 


छ्रदयरल्ाकरः। २४९, 


नेवेद्यं द धिभक्रन्त॒ कन्यास्तेनैव भोजयेत्‌ ॥ 
दिए शक्तितो देया आत्मनस्तव पारणम्‌ । 
तच्च दधिभक्रमेव 
उमा मे प्रयतां वाच्यं वाजपेयफलं लभेत्‌ ॥ 
दरहेव धनवान्‌ भोगी देहान्ते ब्रह्मणः पदम्‌ । 
पौषाष्टम्यान्त॒ दूव्विः लाला शएएक्ञपरिच्छदः । 
जितक्रोधः च्ञापयेच देवीं कपृरवारिणा ॥ 
विलेपेत्‌ कुङ्मेन मासौ -वालक-चन्दनेः । 
धूपश्च निदं हत्‌ पुष्पैः पूजनोया श्भुरण्टकेः ॥ 
छश्ररा गुडनेवेद्यं कन्या भोज्याख तेन वे ॥ 
त्रात्मनः पारस तच्च शत्या वे भक्तयेद्धिजान्‌ । 
नारायणय सद्‌ा परीता मम दैवो प्रसौोदतु ॥ 
कतेन यहराजेद् ! श्मिदानफल लभेत्‌ । 
सुभगौ घनसन्यन्नः पर च श्िवमाभ्रुयात्‌ ॥ 
माघे मासि गवां श्टङ्गब्छद्धिः स्ताला ठ्‌ भागेव) 
देवो तोयेन संकला तथा क्षौर-तेन च ॥ 
स्ञापयेत पुनस्त येकंपयेत्‌ कुङ्कुमेन च । 
धपं दौगेपवर दद्यात्‌ कुन्द युष्येश्च पूजयेत्‌ । 
ठतप्रणंञ्च नेवेद्यं कन्यां विप्रांश्च तेन वै । 
भोजयेदात्मनस्तचच दचिणा प्रोयतां जया ॥ 
मव्ेयागफलं शक्र लभते नाच संशयः । 
फारगने सषेपेः साला देवोनाच्ना फंलाम्बुना । 


8 क्त्यरनाकरः 


तथा इचरसेनेव श्धयस्तेनोदकेन च । 

रोचनालेपने पूजा ग्रतपजिकया सह ॥ 

दौपो तेन धुषस्तु चन्दनं नख-गशकंरा । 

मेवेद्यं शाकवर्तिंख् भोजनं कन्यकासु च ॥ 

्रात्मनस्तच् कुर्वत दकिणणं खस्ि वाचयेत्‌ । 

विजया सुखदा नित्यस्तु मे चिन्तितानि चः , 

अनेन विधिना इक्र राजष्ुयसम फलम्‌ । 

सलभते श्रद्धया युक्तो यतो देवोमयं जगत्‌ ॥ 

चे्रा्टम्बान्त कायत माटस्ाने च्छदम्बभिः । 

देवौ तौथेजल्लैः खञाणा लेया मद विलेपने: ॥ 

धृष तरुखमौभोर ह्य तिसुक्तश्च प्रूजयेत्‌ । 

तरष्कं सि्ठकं. श्रतिमुक्रर्माधवौ पुष्पैः । 

अजिता सब्वेकामानां प्रूरणाय सुखाय मे ॥ 

नैवेद्यं शःलिभक्तञ्च ग्वराः कन्यकाखपि ॥ 

श्रात्मनस्तच्च वाच्यन्तु शक्तितो दकिणं ददेत्‌ । 
दूति वाच्यमित्यन्वयः । 

विप्रान्‌ कन्याः ममच्छाद्य इेमदानफल लभेत्‌ । 
समाच्छाद्य वस््लाणि परिधाय । 

मह्हकारफलेः स्नानं वेश्राखेव्यष्टमोषु च ॥ 

्रत्मना देवताः साया मांसौ-वालकवारिभिः । 

लेपनं फलके धरपं पञ्चग स्थिकम्‌ ॥ 


ज जाम 


१९ 8 नित्यं सुसुखा चेतमेति च। 


छत्यरलाकरः | २४२ 


देव्याः प्रान्त ज्र्वौत केतक्या चभ्यकेन च । 
शकरा चौरनेवेद्यं कव्याविप्रेषु भोजनम्‌ ॥ 
त्मनः पारणां तच्च दशिणणं शक्तितो ददेत्‌ । 
श्रपराजितां भवानं शिवानान्ना ठु वाचयेत्‌ ॥ 
म्रोयतां सव्वेकालं मे ईश्ितन्तु प्रयच्छतु । 
सव्वेतौर्यामिषेकञ्चानेन प्राप्नोति भागेव ॥ 
य्येलोकं त्रनेदन्ते तत्त्यो जाथते सद्‌ा । 
श्रष्टम्यान्चेव ष्टस्य तिक्ते: साया दिच्चणः ॥ 
स्वेसङ्गपरित्यामौ देवो जातिफलाग्बृना । 
च्ापयेल्ेपयेत्तेन चन्दनेन सुगस्धिना ॥ 

ततो विजययुष्येस्तु पूजयेद्भहसन्तम । 

नेवेये श्रक्रवो देया शकंराःकन्यकाखपि ॥ 
दचिणा शकितो देया च्चिंकां खस्ि वाचयेत्‌ । 
लभते एएक्र यज्ञस्य सो चामणिसमं फलम्‌ । 
शरष्टम्यान्च तथाषाढे निश्रातोधेन सापयेत्‌ ॥ 
ततो देवों जेः कष्टे वैरदा-मंुक्ेन च । 
साप्य पुनस्तां कपूर- रोचना चन्दनाम्तृभिः ॥ 
भूपं चन्दन कपूर-वालक-सित सिह्कैः । 

द चयाच्छकरुर्णानि श्रुभानि पानकानि च ॥ 
दापयेत्‌ कन्यकाभोच्यं विप्राणं द्यात्मनस्तया । 
शक्तितो द्किणा देवया मह्िषच्नोति कौत्तयेत्‌ ॥ 
दौपमाला तेनेव स््वकामान्‌ प्रयच्छति । 


२४४ 


कछद्यरलनाकर, | 


मब्वेयन्न- महौ द्‌। न-सन्व॑तौ थेफलं लभेत्‌ ॥ 
एतद्तवर श्एुक्र विष्णना ब्रह्मणा मया । 
जगतो दितमिच्छद्विशचौणे दुर्गात्रतं मत्‌ ॥ 
भानुना यदद विष्वंखगमनेः च छतं पुरा , 

तथा देवासुरर्चच-नाग-किन्नर-मानवैः । 
श्रष्यमरोभिस्तया स्तोमिः सौभाग्यस्य विषद्धये ॥ 
छृतं वे यहशादख ! ये च कुध्येयेयाविधि , 
अवणणदस्य प्राप्नोति सब्वकामसुखानि च । 
दृष्टानि लभते मचय वन्ध्या पच प्रयते ॥ 

दूति दुर्गात्रतम्‌ । 





भविव्यपुराण- 


१1) 


-समरे | २ 8 ब्राद्यणं भक्तया । ३8 रौय- 


सुमन्त्रूवाच- 
श्रावणे मासि राजे यः क्र््यान्नक्तभोजनम्‌ । 
चोरपिष्टकभक्तन सव्वेश्रतदिते रतः 1 
उपवासपरो वीर नवम्यां परयोदेयोः । 
पूजयेद्धिधिवःद्क्या श्रद्धया चण्डिकां नुप! ॥ 
कौमारमिति वै नान्ना नामतः पूजयेत्‌ सदा । 
छवा ररूप्यमयो शक्या घोरां ते पापनाश्रिनोम्‌ ॥ 
~ १ > १ ॐ 

करवौरस्य पुष्येश्च गन्धेश्वागुरुचन्दनेः । 

क 4०५, भ 
धूपेन च महाङ्गन मोद्‌ कश्चापि परजयेत्‌ ॥ 


नि ७१०१०.) 
भ 4 क, 


चछद्यरनाकरः | २९४५ 


कुमारौमौजयेद्धक्या स्तयो विश्च शक्तितः । 
सुच्ोत वागतः पञ्चादिल्वपचछतः ्रनः ॥ 
एवन्त्‌ परजवेदेवों श्रद्धया परयाऽच्वितः | 
स याति परम स्थान यच्र ठेवो गृहः सितः॥ 
महाङ्खो धेपविगेषः 
तथाचोक्तम्‌- 
कप्रूर चन्दनं पुव्यमगुर्‌ चन्दनं तथा । 
व्यजन\ प्रकरा छष्णं मदाङ्ग सिहकन्तया । 
मदाङ्गोऽयं सतो धूपः प्रियो देवस्य मव्वेदा ॥ 
अच महाङ्ख मांगो कष्ण मरौचं ¦ कष्ण मरो च-लोदहयोरिति 
विश्वद शनात्‌ , 
प्रच च जितेन्दियत्त सत्यवादिल कामकरोधविवेजिंतत्व 
चेकालिकार्ययापूजाद्निक्षाय्ये शमिश्रय्या मासान्यभगवतोखान- 
महापूजा: कार्य्याः । च्रयञ्च विधिरधकः ङत्यस्यास्य प्रक्रमात्‌ । 
विष्णधम- 
श्रावणे शङ्कते तु दादश्ठां प्रौच्ते नुप । 
गोप्रदानेन देवेशो यत्य कथितं तव \ 
चत्पन्वं कथितभिनि विष्धक्ची कराल ङुतगवौ दानगहणम्‌ । 
तचेव दृष्टम्‌ - । 
छलतो पवासः सश्प्ाश्य पञ्चगव्य नरेश्वर । 
एतच्ौराभिषेकञ्च छता विष्णोः समाहितः । 


नि रे. 


०) 


१ मूलं -- ग्रञ्चनमर्‌ 


२४६ 


लव्यरन्ाकरः | 


समभ्यच्छे च गो विन्दं युष्यादि भिररिन्दम | । 
उद्ङ्ुखोमच्वंयिला तथा ष्टं पयखिनौम्‌ ॥ 
खपुचां वस््रुवोतां सितयज्ञोपवो तिनौम्‌ । 
खणश्रक्गोः इएभाकारां दिर ण्योपरिसंखिताम्‌ ॥ 
दिर णं वाचयिलाये ब्राह्मणायो पादयेत्‌ । 
द्मां लं प्रतिग्ोव्व गोविन्दः प्रोयतामिति। 


द्मां चं प्रतिण्ट्णोष्वत्यादि वाचयिता जाह्मणाय गौर्या 


हिर ञ्च दचिणमुपपादयेदिति सण्न्धेः। 


सम्यगृ ाथ्ये तं विप्रं गोविन्दं नृप ! कल्पयेत्‌ । 
श्रलुत्रजेच गच्छन्तं पदान्यष्टौ नराधिप ॥ 
्रनेन विधिना धेनुं यो विप्राय प्रयच्छति । 
गो विन्दग्रो णनाद्राजन्‌ विष्णलोकञ्च गच्छति ॥ 
सत्तावरास्तथा पर्ववान्‌ सतप्तात्मानश्च मानवः । 
सप्चजन्म्हतात्‌ पाप्रात्‌ मोचयत्यवनौपते ॥ 
पदे पदे तु यज्ञस्य गोखवस्य च मानवः । 
फलमाप्नोति राजेद्ध दक्ायेवं जगौ हरिः ॥ 
सब्वेकामप्रदा सा स्यात्‌ सन्वैकालेषु पार्थिव । 
भवत्यघापहाराय यावदि द्वावत्र ॥ 
सव्वेषामेव पापानां कतानामविजानताम्‌ , 
प्राय्चित्तमिदं प्रोक्तमतुतापोपर हितम्‌ ॥ 


श्रच ्रावणश्णङ्ञेकादश्वां छतोपवासो दादश्ां छतनिल्यक्रियः 


पञ्चगव्य प्राश्य विष्णो ठेताभिषेकं विधाय- 


कछत्यरलन्ाकरः | २४७ 


` समाहितन्तमभ्वच्छं उदद्युखौ पयखिनों सपुत्रां वस्वसम्बौ तां 
सितयज्ञोपवो तिन सुवणंष्टङ्ं एएभाकारं दिर ण्यपचापित खुर- 
चलुष्टयां सापयिवा- 
इमां लं प्रतिग्णक्तौष्व गोविन्दः प्रोयताम्‌- 
दति ब्राह्मणं स्षोध्य पटिला अरतुवादोपनोतफलकाम 
गोविन्दष्पतया ब्राह्यण चिन्तयिला तसे दला हिरण्यं द्कचिरण 
दद्यादिति वाक्याथेः। दला चानुद्रजनम्‌ ] 
वरादपुराण- दुर्व्वांषा उवाच- 
एवमेव वशे तु मासि सकर दादगोम्‌ । 
अर्वंयेत्परम देवं गन्ध-युष्य-विलेपनेः' ॥ 
बुद्धाय पादौ सम्यज्य श्रोधरायेति वै किम्‌ । 
पद्मोद्भवाय जठर सुरः स्व्सराय च ॥ 
खुयौोवायेति कण्डन्त्‌ दौ भुजौ विश्वबाहवे । 
्राम्बच्छस्ताणि सम्यूज्य शिरो वे परमा्डने ॥ 
एव मभ्यं सेधावौ तस्या पृष्वेवहरम्‌ । 
स्थ पयेन्तच सौवण वृद्धं छत्वा ति च्चणः ॥ 
तमणेवन्तु सम्ृज्य ब्राह्मष्णय निवेदयेत्‌ । 
श्रनेन विधिना पृष्व द्वादग्नौ समुपोषिता ॥ 
बद्धो दनस्य वुद्धोऽ्छत्‌ खयं पुचो जनार्देनः । 
महतश्च ियं प्राप्तः पुजपौ समन्वितः ॥ 


(निक णी का 0 कण श 


१.8 निवेदनः 


२४८ क्रत्यरनाकरः | 


युक्ता राच्यभियं सोऽय गतिं परभिकां गतः ॥ 
एवमेवेत्यादिना मच्छदाद शो सामान्यधेग्मातिदे ग्रः । 
दूति वुद्धदादभोव्रतम्‌ ॥ 
विष्णधन्नौत्तरे-- 
जलधेनुप्रदानेन श्रावण्यां खगेमाघ्नुयात्‌ । 
विष्णएधन्मोक्तविधिना जलघेनुमुपकर््य दद्यात्‌ + 
स च विधिः| 
जलधेनु प्रवच्छयामि मरौतये जलशायिनः | 
जलकुम्भं दविजखेष्ठाः रवणंरजतान्ितम्‌ ॥ 
काल्ययेद्रनगभेन्त॒ खापयेत्त यवोपरि । 
सब्वेधान्टेस्तया याग्येः समन्ताद पि धारयेत्‌ ॥ 
ग्राम्यस्व्वेधान्यानि परिभाषोक्रानि । 
सितवस्लयुगच्छन्न दूर्व्वापल्लव शोभितम्‌ : 
कुष्ट-मांसो-वचो भौ र-वालकामलकंयेतम्‌ ॥ 
प्रियङ्गु पचसहितं सितयज्ञो पवौतिनम्‌ । 
सच्छचो पानदश्चं मो ष्णोषं परिक ल्पयेत्‌ ॥ 
तिलपावैयतं छला हरणे चतर्दिंग्म्‌ । 
दध्योदनयुतेनाथ पाचेण खगितं सुखे ॥ 
कच्ययेद्‌ वमेवन्त्‌ वारिधानौन्त्‌ वच्छकम्‌ । 
उपोषितः समभ्यद्धों दिवेश्रं जलशायिनम्‌ ॥ 
एषो पडारेञ्च यथाविभवमादृतः । 


क्र्यरनाकरः | २४९ 


श्रहतामुपवोताय दद्यादिप्राय भक्तिमान्‌ ॥ 
जलश्ायो जगद्योनिः प्रौयताश्रम केश्वः | 

इति चोच्वाय्ये तां दद्यात्‌ प्रौणएयेत्‌ दिजदम्पतोम्‌\ ॥ 
अरहो राज्रोषितो दद्याद्यथाविधि मयेरितम्‌ । 
अपक्तान्नाश्िनां देयमद्रोराचमतःपरम्‌ ॥ 


प्रपक्रान्नाशिनामनध्िपक्रभो जिनम्‌ । 


अनेन विधिना दद्यान्नलघेतुं दिजोत्तमाः | 
सव्वान्‌ कामानवाप्नोति लोकानाप्नोति शाश्वतान्‌ ॥ 
मोक्तमाप्रोति पापेभ्यः रुष्वभ्यः स तथा नरः । 
सोभा महदाप्नोति रूपञ्च परमं तद्‌ ॥ 
पुरुषः स यदा याति यख्य यसय च द्ग्रनम्‌ | 
करोति परमाह्नादं तेख्य तस्य दिनोन्तमाः ॥ 
नित्याभिदटघ्नो भवति तथेव च निरामयः । 
सन्वबाधाप्रश्रमनं प्राप्रोति गतकल्मषः ॥ 
वार्ण लोकमाप्नोति सक्दला दिजोन्तमाः | 
दला तामसङूदिभरा लोकमाप्नोति वेष्एवम्‌ ॥ 
अआह्धाददहेतोः परमं पविचम्‌ 
दानं मयेदं कथितं दिजेनद्राः। 
धन्य यशस्य दुरितापहारि. 
कामप्रद लोकहितं प्रशस्तम्‌ ॥ 


[मी १ 1 [ षि षि ष! र स १ ~ ~~ ~~ ~~ ~ - ~ --~~----~ न ~ यन क ~ ण कानत त = ज म ~ = म न ०० 


2३२ 


१ 7 प्रौणयेण दिजोऽपि तम्‌, 


२५० | कद्यरनारकरः | 


उपोग्यापरदिने जलकुम्भमयों मुक्तोपकर णसदितां जलधेनु 
तत्पाखं तच्चलूचंभाग जलश्लवा रिध्रानौ मखमसुक्रोपकर एखदितं व्छञ्च 
खापयिला वासुदेवं ययागरल्वुपचारोः ^ ॐ जलश्णयिने नम * इति 
सन्ृज्य त्राह्मणयाक्धिताय वराम्बरधरायाकितां ॐ जलमयो - 
मित्यादि मन्तं पठिता विष्णधक्नक्जलधेनु दानफलप्रासिकामः- 

धेनु चतुरौ श्जलण्टतवारिघानौ मय सुबणंरजतान्वित रल्नगभं- 
यवस याम्य सव्वेधान्यपरिव रित मितवस्छयुगमच्छनां दर््वापल्व- 
शोभितां कुष्ठमांसो-सुरोग्रौोर वालकामलललक-प्रियङ्गुपचसदहितां 
सितयन्नोपवोतिनौं सकचो पानत्‌कां सोष्णोषां सदिरण्छतिलपाच- 
चतुषटययुतां दध्योदनयुतपाचखगितसु्ठौः जलधेनु दद्यात्‌ । 
प्रतियहोता जलगश्रायो गेश्रवः प्रौयताभिति वदेत्‌ । 

ततो यजमानोऽपक्रान्नाग्नौ तदिन नियतो नयेत्‌ । 


दति जलधेनुदानम्‌ । 


ब्रह्मपुराण- 
श्रावण्ां श्रावणे चेव प्व्यै हयशिरा इरिः। 
जगाद सामवेदन्त्‌ सव्वेकिंल्विषनाग्रनम्‌ ॥ 
भिन्धुनेदौ .वितस्तायां प्रदिष्टा तच्च चव हि। 
अतोऽयं वणे तच्न स्धानं स््वथिसिद्धिदम्‌ ॥ 
आवणे तच इति सामानायिकरणठंनतु नदौपरलरं तत्परत्वे 
“^ सर्वा नद्यो रजखलाः ” दति गाधसापेच्चला पत्तेः 


छव्यरन्ाकरः | २४९ 


स्तानन्त॒ यच ततनाछृतरिमश्रदधजले सिन्धनदौत्यादेस्तिधि- 
सतावकलात्‌ , | 
हत्वा सन्यजयेदिष्णुं शङ्खः-चक्र-गदाधरम्‌ ¦ 
श्रो तव्यान्यय सामानि पृच्छा विप्राश्च सब्वेदा ॥ 
त्रौ डितव्यश्च भोक्तव्यं तदेव सखजनेः मद । 
जलक्रोड़ा च कन्तेव्या नारोभिभेन्तुलसेये ॥ 
विष्णः- 
आवां अवणायुक्तायां जलधेनु सान्नां वासोयुगच्छन्नां 
दवा खगेलोकमवाप्रोति । 
वसिष्ठः- 
आवण्पयदहायण्योरष्टकासु च पिदभ्यो दद्यात्‌ ! 
याज्ञवष्क्यः-- 
श्रध्यायानासुपाकम्मे आवश्छां अवणेन वा । 
हस्तेनौषधिभावे वा पञ्चभ्यां आवणस्य तु ॥ 
पौषमासस्य रोद्दिश्छामष्टकायामथापि वा । 
जलान्ते छन्दसां, ह्च्ेरत्सगं विधिवदहिः ॥ 
श्रघौयन्ते इत्यध्याया वेदाः, तेषां संखारकमुपाकम्माख्ये कम्मे 
श्रावण्धां पञ्चम्यां दस्तन बेत्यन्वयः, श्रोषधिभावें शश्छसम्यन्तौ । 
अच यद्यपि तुल्यवद्धिकल्पो भाति तथापि तदुभयविदित 
नच्चचालाभे केवला पञ्चदश्येवादन्तैव्या केवलाया श्रपि तस्या चछव्य- 
न्तरेण विंहितलात्‌ ¦ 


भज 1 1 1) 


१ 1) कन्यसो. 


२५२ छत्यरन्नाकरः | 


तथाहि वसिष्टः- 
श्रथातः खाध्यायकश्रे आवष्छां पोरंमास्णां प्रौष्ठपद्यां वा 
श्र्चिसुपसमाधाचेव्यादि ¦! पञ्चमोद्क्तोपाधियुतेवाद्रणैया तस्याः 
केवसायाः केनाप्यनभिधानात्‌ , 
पौषमाससेत्यादिना उत्सर्गविधिः श्र च कालविकल्यः 
शखिभेदेन व्यवसितः । 
विष्णः- उन्सगापाकश्मेणो षये वेदाङ्गाश्ययनं कुर्यात्‌ , 
मनुः- 
्रावश्ां प्रौष्ठपद्यां वा उपाक्षत्य यथाविधि । 
युकरण्डन्दास्सधोयोत मामान्‌ विप्रोऽधंप्चमान्‌ ॥ 
पुष्ये तु छन्दसां कुर्य्याहदिरुत्सव्छनं दिजः । 
माचघष्एक्तस्य वा प्राप्रे पूर्वाह्ने प्रथमेऽहनि ॥ 
यथाशास्त्र तु छलेवसुत्सगे छन्दस वदः । 
विरमेत्पचिर्णो रां यद्रापयेकमदहनिं ग्रम्‌ ॥ 
श्रत उद्धंञ्च कन्दांसि श्एक्ञोषु नियतः पठेत्‌ । 
वेदाङ्गानि तु सर्व्वाणि छृष्णपक्चे त्‌ सपठेत्‌ । 
हारोतः- 
अ्द्पञ्चमान मासानधघोत्योकजति पञ्चा्धं षष्टं वा हमन- 
प्यायः पञ्जराचसेकेषां, उपाङत्य॒प्रतिपद्यधघोचौत अन्या 
वन्नेयेदिति । 
परिणो वत्तमानागाम्यदयुक्ता राचिः 
एवञ्चोत्सर्गानन्तरं पिणं राविभेकाहोराच वा छष्णपच्ादि- 


छल्यरल्नाकरः | ५२ 


कश्च॒ वज्जयिला उपाकरणाख्यकन्मंपय्येन्तं पूर्व्वाधोतवेदाभ्यसनं 
नत्पूरव्वाध्ययम काय्येसुत्सर्गानन्तर मुपा कम्मं पय्येन्तमटम्या दिवन्जनम्‌ । 
वेदाष्ययनखमय इति तात्पस्यायेः । 
उपाकरणस्याध्ययनाङ्गत्वेऽपि ग्यदस् कत्तेव्यतायामाचारः प्रसा- 
णम्‌ । उपाकश्नीत्सर्गो तु समृतिकारैरेव विवेचिते । 
यमः- 
कान्तिकसय तभिखे तु मघासु नवमेऽहनि : 
श्रहोराचोधिलः क्ञाला घश्मैराजाय भोजयेत्‌ 
विधिवद्भाद्यणएणन्‌ भ्या सखगेलोके महौयते ॥ 
दत्यनन्तरम्‌- 
श्रावण्षां पौणमास्यां वा सोपवासो जितेन्द्रियः 
नदौ ससुद्रगां प्राय तिलभक्लोऽयवा पुनः ॥ 
प्राणायामशतं कला मुच्यते सव्वेपातक्गेः 
मायच्यष्टसदसन्त्‌ जघा सुच्येत वा पुनः ॥ 
गायच्यष्टसहखन्तु तिलेदेला तदा दिजः । 
मुच्यते पातकैः सैयद न ब्रह्महा भवेत्‌ ॥ 
मव्यपुराण- 
श्रावण्धान्त बलिः काय्येः सर्पाणां मन्तपूष्वैकः । 
श्रयनारोहणश्चेव काय्यं सुखमभोष्यता ॥ 
च्च शनं पन्नगानां माग्ाञ्चोत्यानमये वाच्यम्‌ । 
तया- 
शवेतकच्पपरसङ्गन धन्नान्‌ वायुरिदात्रवौत्‌ ; 


२५९ छच्यरनाकर्‌, | 


यच तद्धायवोयं स्वाद्ुद्रमादहाव्यसयृतम्‌ 
चतुविंशरतिंषाहसं पुराणं तदिहोच्यते ॥ 
्रावण्ां आवे मासि गुड़धेतुसम न्वितम्‌ । 
यो दद्याट्‌धिष्युक्तं ब्राह्मणाय ङुटुम्विने; 
शिवलोके स पूतात्मा कल्पमेकं वरेन्नरः॥ 
महासान्धिविग्रहिकडक्षुर ओओवोरेशवर(त्मज साभ्धिविग्रहिक- 
ठक्कुर श्रोचण्डश्चरविरविते कत्यरनाकरे श्रावएतर ङ्गः ॥ 





अथ भाद्रकत्यम्‌ । 

तच वामनयुराणे- 

मासि भाद्रपदे दद्यात्‌ पायसं द्धिषपिंषा। 

इषे शप्रो णनां लवणं मगडोदनम्‌ ॥ 
ग्रहणक मधिकत्य देवोपुराण- 

भाद्रपदे च गण्डके पुष्छेत्यधिकारः । 
स्कन्दयुराण- 

यस्तु भद्रेपदे मासि एकभक्त समाचरेत्‌ | 

ख तेन क्म्मेणा देवयो धनवानभिजायते। 
श्रोमहाभारते- 

मौटपचन्त्‌ यो मासमेकाहारो भवेन्नरः । 

गवाच्छं स्फ तमचलमेश्वय्ये प्रतिपद्यते ॥ 
भविथ्यपुराणे- 

हला भाद्रपदे मासि योमश्रालिमयं नृप 


छव्यर्नाकीरः | "१४ 


वितानष्वजवस्लाख्ं नानामाद्यविश्चषितम्‌ \ 
निश्राकरकरग्रश्येर्मदहायानेः सुश्रोभनैः। 
वंकोष्टिसदहस्ाणि रथ्येरोके महोयते ॥ 

अचर सुर्याय निवेदयेदिति ओ्रावणणोक्तमनुषन्यते । 
सम्प्राप्य विविधान भोगान्‌ सर््वानुद्ध 'फलास्तया । 
क्रमादागत्य लोकेऽस्मिन्‌ राजानं विन्दते पतिम्‌ ॥ 

श्र मासव्यापकेकभक्तादि-साघधारणल्त्यानि कान्तिकोक्र- 

कामत्रतेऽनुमन्धेयानि । 
दति कामव्रतम्‌ ॥ 


1 । 


तया- 
बौर भाद्रपदे मासि यः कुर्ययान्नक्रभोजनम्‌ । 
ङतगषं हविदंयात्‌ टृमृलसुपाथितः ॥ 
खप्याद्‌ायतने राचौ सव्वेभ्रूतानुकम्पकः ¦ 
दद्यादा तरणः वौर भास्कराय महाद्मने । 
निग्राकरकरप्रश्यैः बज्र. वेदूख्येचिचितेः । 
चक्रवाकस्मायुक्तेविंमानेः सव्वेका मिकैः ॥ 
गत्वादित्यपुर रम्यं मसुरासुरवन्दितम्‌ | 
मोदते स महायानेर्यावद्‌ाइतसंक्षवम्‌ ॥ 
श्रच्रापि पौषवच्छमाए भविव्यपुराणौैय मामव्यापि नक्तत्रत 
माघधारणोभयसप्रम्युपवासादिक्कत्यानि वोद्धब्यानि । 


न ~ न= = = 
ननि ममम ०० का मि 
1 का 1 


१९ 1) बद्छ-- | 


२५६ सत्यरलाकरः 


विष्णघश्नात्तरे -- 
कगे नतित सुमहत्‌ फलमित्यधिछत्य- 
पौष्टपद्ये तथा मासे प्रदानात्‌ फाणितस्य च! 
फाणितं खण्डमस्केति प्रसिद्धमिति दानसागर 
देवलः - 
्रयुग्प्रास्तिययः स्न्वा युगमाभ्यः परिपूजिताः 
कालतः पूजितौ मासौ माघ-मौष्ठपदौ तया ॥ 
'पक्तयोः प्क्तपच्श्च शकुनेः परिपूजितः । 
भविष्ये सुमन्तुरुवाच 
नरो भाद्रपदे मासि यः कुय्यान्नक्तभोजनम्‌ । 
मुच्ानः पायसं वोर कालशाकञ्च अद्भया॥ 
उपवासपरो नित्यं नवम्यां प्योटेयोः । 
पुजयेदष्णवः भक्ता शङ्खन्वक्रासिधारिणोम्‌ ॥ 
जातौ पुष्पैमदावाद्ो ! गन्धैः ओ खण्डमिधितेः । 
श्रौ खण्डागुरुकपूंरः सिद्धकेन च धूपयेत्‌ ॥ 
नैवेद्यं ठतक्प्रणं तया श्या निवेदयेत्‌ । 
मासेन प्रणनं तस्यास्ततः पज्याश्च कन्यकाः ॥ 
मो शरङ्घत्रा्च विधिवत्‌ ततो सूुन्नौत वाग्यतः, 
प्रणयिता दिजान्‌ भक्तया यो षितश्च नराधिप ॥ 
य एवं पूजयेद्धकया तष्णवं सततं नरः। 
विमानवरमारूढो विष्एलोके महो यते ॥ 


१ > पक्षयोः ्रल्ल पच्तातत्‌ बहलः च्राद्धपूजितः 


छ्यर्नकररः। २५७ 


गो शङ्त्‌ गोमयम्‌ ¦ इत्युभयनवमौत्रते मासव्याणेकभक्ता- 
दिकं पौरुषमसुन्नेयम्‌ । 
ब्रह्मपुराणे- 
श्रय भाद्रपदे मासि हृष्णाष्म्यां कलौ युगे । 
अष्टा विग्र तिमे जातः कृष्णोऽसौ देवकौ खतः ॥ 
भारावतारणाथांय च्च्रियाणणं चयाय च। 
तस्मात्‌ स तच मन्यृज्यो यशोदा देवको तथा ॥ 
गन्धर्माच्यस्तथा धूपेयेवगो धूम सम्भवेः । 
सगोरसेभच्छभोच्येः फलेश्च विविधैरपि । " 
राजौ प्रजागरः कार्यौ नृत्यगौतसमाक्ुलः ॥ 
अ्ररणोद यवेलायां नवम्याञ्च ततः स्ियः । 
रक्तवस्ताटताः सर्व्वाः युष्यमाच्येरलङ्कताः । 
नयन्ति प्रतिमा दह्ेषां महाविभवसम्भवाः ॥ 
एषां प्रतिमाः कंष्ण-यश्नोद्‌ा-देवकप्रतिमाः , 
नदोतोर शभं रम्यं विविक्त" वा महत्छरः। 
तन्न लानं प्रज्रुव्वेन्ति सापयन्ति च तास्ततः ॥ 
ताः प्रतिमाः । 
ततः अ्रविश्छे च ग्टह तान्न सुन्नतेच ताः। 
ताः स्यः | । 
युक्त मिच्विकारेखच मध्वाज्य-मरौचेः सह ॥ 


पि 99 
स त ति शा शा त म भ माणा मो ० ०० 


१९ 1 विभक्त। । 
३३ 


२२५८८ सव्यरलाकरः। 


स्वौपुंखमामान्याधिकारमेषेदं कृष्णा दि प्रजनं तच सड्ो चक- 
विरद्धात्‌ । प्रतिमानयनादेरङ्गस्य श्लो कन्तैकल्वाभावेऽपि मामा- 
न्याधिकारे बाघाभावात्‌ । 
दयश्चाष्टमो रो हिणौनचचमनपेच्छैव फलप्रदा बोद्धव्या रोदिणौ ` 
योगाञ्रृतेः । 
भविष्पुराणे- 
रोदिणणे च यदा कष्णपच्ले्टम्णां दिजोत्तम । 
जयन्तो नाम सा प्रोक्ता सव्वेपापदरा तिधिः॥ 
यद्धाल्ये यच्च कौ मारे यौवने बाद्धकेऽपि यत्‌ । 
सघ्रजन्द्रकत पाप खलं वा यदि वा बहक ॥ 
तत्‌ चालयति श्वतेरं तस्ामभ्यच्छे भक्तितः । 
होम जप्ादि दानानां फलञ्च श्रतसस्मितम्‌ ॥ 
सन्प्रन्नोति न सन्देहो यच्चान्यन्मनसेश्धितम्‌ । 
उपवासश्च तचोक्तौ महापातकनाग़्रनः ॥ 
विष्णधक्नी तरे च्छते श्भिति स्थाने गोविन्दमिति पाटः, 
भाद्रकष्णे प्रायग्र दयं रोद्िष्ष्ट मो भवति अन्यत्रापि यद7 लभ्यते 
तद्‌ा पुण्यैव विगरेषानभिधानात्‌ । 
श्रच देवीपुराण-देवयाः प्रक्रमप्रजायां भद्रक्त्यानन्तरम्‌-- 
अष्टम्यां रोददिणौयोगे सोपवासस्त परजयेत्‌ । 
विष्णलोकमवाप्नोति सव्वेकामसष्टद्धिदम्‌ ॥ 
गोडोयनिवन्धे- 
शरद्धेराचिके रोद्दिष्य्टम्योर्योगो रोरिण्छष्टमो नाम पुणतमः 


छव्यरनाकरः। २५६ 


कालः । ्रन्न चोपवास-जागर- विष्णपूनादिं प्रगस्तं तिथि-नक्न- 
योगान्ते पार णमभि्युन्तम्‌ ॥ 


अदय रययब्घा। 

भविव्यपुराण--शतानौक उवाच । 

रथया कथं कार्य्या कस्िन्‌ काले तिथौ तथाः 

दुर्गाया दिजशादुख कश्चा् विधिरुच्यते ॥ 
सुमन्तृरूवाच । 

मासि भाद्रपदे देव्याः छष्णपच्े खश्चक्तितः । 

क्त्या सा ततो यात्रा दुर्गायाः श्रद्धयान्वितः ॥ 

शरस्तद्‌ारुमय हत्वा रथ दृढ्परि च्छदम्‌ । 

नानारूपगणाकोणें सुदृढः दट्रूपकम्‌ ॥ 

सिंहष्वजपताकाच्छे शेतच्छवो पशो मितम्‌ । 

मयूर पच्रघण्टाच्छ नानाशोभाभिराटतम्‌ ॥ 

धनाना सुगन्धपुष्याच्छे नानाचामरग्धषितम्‌ । 

च्रधिवास्येद्रय देव्या श्रष्टम्यां विधिवन्नृप ॥ ` 

छलाभ्िकाय्यं विधिवत्‌ प्रूजयिला द्विजोत्तमान्‌ । 

पुचरकांश्च यथाग्रत्या मातरश्च तथा नुप॥ 

नवम्यां भोजयिता तु ब्राह्मणान्‌ विधिवत्पुनः । 

रथमारो हयेदुगे शण्डिलेयं प्रपूज्य च । 


१ 0 सुगन्धपुष्यधपाद्यं | 


छव्यरल्नाकरः | 


शिष्टञ्चाश्याः पञ्चशिखं वामतः परिकन्पयेत्‌ ॥ 
श्रस्या वामत दत्यन्वयः। 
श्रङ्ख-दर्ये-निनादेश्च मेरौ पणएवनिखनेः | 
ब्राह्मणानान्त्‌ घो षेश्च बूमः प्रर्चण केस्तथा ॥ 
नृत्यमानैः पुच कश्च पूज्यमाना दिने दिने । 
तिष्टद्धगवतौ दुगं रथारूढ्ा महामते! ॥ 
यावन्महानवम्यन्तं नवम्याञ्चालयेन्नृप । 
अष्टम्यां भोजनं द्त्वा ब्राह्मणानां मरोपते ॥ 
दत्वा च ग्रह्ना रजेन दौनान्धेक्ृपणेषु च| 
पुच्रकेषु च विग्रोषेण तला च विधिवदहलिम्‌ , 
महानवम्यां भ्रामयेद्रयारूढां चिश्लिनोम्‌ ॥ 
समेन वत््ना वोर यन्नतो श्ामयेद्रयम्‌ । 
्राद्यसैः सो पवासैश्च भक्तिनतरैदिजो तम ॥ 
सच्छाल्य सव्वैतो यन्ता रयच्चाश्चैः सुण लिभिः | 
टृषमैवां खुबलिभिनेगरम्यान्ततो नुप ॥ 
भ्रामथेदे पुरं रम्ये विधिवन्तां प्रदचविरम्‌ । 
विधिनानेन ते वद्धि समाकषात्‌ कुरुनन्दन! ॥ 
नानाविधं बलिं वौर भक्ता मांससमनितम्‌ । 
खङ्गहस्तो ग्टहोला वे चिपेत्‌ पृब्वेदिश्रासुखे ॥ 
नृत्यमानेरवौर रेतो नानायुधो दयतेः । 
खदङ्के विकोषैः कौरव्य! पट्टिश खष्टिमिस्तथा ॥ 
वाणेखच भिन्दिपालेश्च तथान्येरायुधेनेप । 


क्त्यरल्लाकरः | २९६९ 


तथा वाद्यसनेर्वोर नृत्यमानेश्च रूपकेः । 

एवं बलिं तिनिःचिष्य पुरे याति रथी नृप । 
न्माणौ प्ष्ठतस्तस्यास्ततो माहेश्वरो नृप ॥ 
वाराहौ देष्णवौ सेहो कोमारौ बज्जिणो तथा । 
एताः पुरो रयारूढा गच्छन्ति प्रथम विभो ॥ 
नानाविधैः प्रेचणएकेः शङ्खवाद्यखनेः शभः । 
ततो भगवतौ देष परज्यमाना दिजोन्तमैः ॥ 
प्रमं बहकचेवोर ततो वाजसनेयकः | 
खामजैश्च ततो कौर! वि्रेरायव्वैशेस्ततः ॥ 
ततो राज्ञा जनैशान्येः सव्वेनगरवासिभिः । 
पूब्वेद्ारः समासाद्य पूज्यमाना चतुष्यये ॥ 
तिष्टेदेकदिनं राजन्‌ ततो गच्छेत द्किणणम्‌ । 
दिनमेकञ्च तचापि तिष्द्राजन्‌ प्रपूजिता ॥ 
तस्माद्गच्छत पञिमाञ्च दिभमेकश्च तिष्ठति । 
पूल्यमाना घान्ययवैम्तश्माद्रच्छनत्तयोतत्तराम्‌ । 
तापि पृच्यते शुदे विधिवत्‌ कुरुनन्दन ॥ 
श्यद्रमारोपयेधस्ठ रये देव्याः नराधिप । 

स गच्छद्रौरवं नाम नरकं नात्र संग्यः। 

यः कुरय्यात्व्वैकालेषु महहायातराप्रवन्तेनम्‌ ॥ 
दुर्गाया रथयाचायां नगरान्तपरिभ्वमे ! 

महा विचध्वजेः इएमैः किङ्किएौरवकान्वितेः ॥ 
वितानघ्वजमालाभिधेष्टाचामरश्वषणेः 


रहर 


कात्यरनलाकरः | 


शङ्कनमे््या दिमिलित-गौतवाद्या दि मङ्गलेः९ ॥ 
लेष्यदारुमयेयेन््े माहरचोगणदिभिः । 

उद कायरेयमन्त्े् बह्ाश्चर्येरनेकग्रः ॥ 

स्तौ दोलाचक्रवन्तैश्च राजदासोषु शोभितम्‌ । 
उद्यानद्धानपानायमहाखय्यसमायुतम्‌ ॥ 
महाजनसमाकौणं यथा विभव विस्तरैः । 

स सर्व्वद्‌ानपुण्यानि शव्वेयज्ञफलानि च ॥ 

लब्धा नरवरः श्रौमान्‌ दुर्गायानाप्रवन्तनात्‌ ॥ 
ब्रह्मलोके महाभागो मोदते देववत्‌ सरा । 
भ्रामयन्ति रयं ये वे नराः भक्तिसमन्विताः ॥ 
णष्ठतः पुरतञ्चैव ये च भक्ता भ्रमन्ति वे। 
कववेन्तो याचनां दुगांधास्ते यान्ति परमं पदम्‌ ॥ 
नृत्यमाना विगरेषेण गायमाना विगरेषतः । 

ये पश्यन्ति नरा भक्या ते यान्ति परमाङ्गतिम्‌ ॥ 
तिष्ठमानां रथे द्वो यो नमख्छुरुते नृप । 
सुच्यते स नरः पापैर्वाजपेयञ्च विन्दति ॥ 
छल्वा प्रदच्चिण यस्तु प्रणमेद वनो क्गतः । 
सव्वपापविनिभुक्तः स याति चिदिवालयम्‌ ॥ 
चन्दनागुरुकापूरः कुङ्कुमेन विलेपयेत्‌ । 
योऽम्बिकां रयमाष्द़ां सोऽश्वमेधमवान्नुयात्‌ ॥ 


णको ना 


१ --खु्कलेः | 


सेद 


क्त्यरलाकरः | २६३ 


नानापुव्यरजोभिञ्च यथा देवौ समचयेत्‌ । 
सेह कामानवाप्याग्यान्‌ विष्ठलोके महोयति ॥ 
स इहेति पदभेदः, रेष राजा युधिष्ठिर दत्तिवत्‌ 
नाना विधेभेच्छभोच्यर्यस्त॒ पुजथतेऽभ्िकाम्‌ । 
सोऽश्वमेधफलं विन्दइृद्यलो कञ्च गच्छति ॥ 
नानाविधैः प्रचणकैः दुर्गाथाः पुरतो नृप । 
प्रजागरन्त॒ यः कुर्य्यात्‌ न्रद्धयलोके मरौयते ॥ 
ये वहन्ति नरा दुगों श्रद्धया परवान्िताः। 
तेऽश्वमेधफल प्राय विष्णलोक त्रजन्ति दि ॥ 
नानाविधैः प्रै्णकरर््राह्मणानाञ्च भोजनः । 
याचां कुव्वेन्ति ये भक्तया दुर्गायाः कुरुनन्दन ॥ 
गोद्‌ानैः खणंदानेख पाककानाञ्च तर्पणे । 

ते प्राप्य विविधान्‌ भोगान गच्छन्ति परमं पदम्‌ ॥ 
भङ्ग कुव्वेन्ति ये मृढा वाचाया: पुरुषाधमाः 
गच्छन्ति नरक घोर ब्रद्यदहत्यासमन्िताः ॥ 
तस्मात्‌ प्रयन्नतः कार्यां याचा भक्तिषमन्वितैः। 
मदिषाजगिरोभिस्तु नानाबलिसमन्विताः ॥ 
इत्थं भ्राम्य रयं देव्याः खस्यानन्तु ततो नयेत्‌ 
तच्राणेकं दिनं दुर्गां तिषठेत्ला तु मदौपते ॥ 
श्रपराहे ततः लाला चतुदश्यां महोपते। 
कला नौराजनं राजस्ततो गदग्टदं षित्‌ ॥ 


२६४ कत्यरनाकरः | 


पौ णेमास्यान्ततः कुर््याट्ाः प्रीत्या महं नेप । 
नानाविपेरमच्छ-भोज्येस्तथा प्रेचणकरैः शभः ॥ 


दति दुगदेव्या रथयात्रा । 


नद्धपुराणे- 
युगाद्येषु युगान्तेषु ओ्राद्भमचयसु्यते । 
दत्युपक्रम्य- 
अय भाद्रपदे छष्णचतुदश्याञ्च दापरम्‌ । 
उक्तं रथयात्यां युगादिवयवखायाञ्च मारुपरि खिित्युक्नन्यायात्‌ 
ष्क्तादिमासक्रमेण ङृष्णपच्चो बोद्धव्यः । 
तथा- 
खय्येस्य सिंहस्करान्यामन्तः छतयुगस्य च । 
गोतमः- 
अरय प्रौष्ठपदे मासि तिच्ययुक्ते च रुंस्ठिताः । 
ङन्दोगा मिलिताः कुच्यः प्रातरौत्सनिकीः किया: ॥ 
तिथ्यः पुष्यनच्चच्रम्‌ , 
ततः प्रति सर्व्वेषां छन्दसां षसुदौरणम्‌ । 
हस्तेन यावत्‌ संयक्तसुपाकरणएवासरम्‌ ॥ 
कद्मप्रदोपे- 
चषोणां भिच्यमानानामन्तरालं समाथिताः | 
संपिवेचुः शरोरेए पषेन्मक्तजलक्टाः ॥ 


लछत्यरलाकरः | २६५ 


विद्यादौन्‌ ब्राह्मणः कामान्‌ पुचादौन्‌ ना्येपि भ्रुवम्‌ ) 
च्ामुञ्भिकान्यपि सुखान्याभ्रुवन्ञाच संशयः ॥ 
खिच्यमानानां तथ्येमाणानां पर्षन्मुक्तजनक्ृटाः तपेणकरतुगण- 
सुक्तजलविन्दुन्‌ । नाहम दत्यपलचणं य द्त्यनेन सरव्वाधि- 
कारिकथनात्‌ । अतएव खषितपेणानधिकारिणामप्यना धिकारः, 
एतच्च नाय्येपि इत्यनेन वक्रम्‌ । 
रच गाग्यैः- 
गएक्तपक्ते च हस्तायासुपाकम्भापराह्िकम्‌ । 
तदुभयमपि यामाददिः प्राच्यायुदौच्यां वा नाभ्चद्धेनले साला 
कन्तेव्यमध्ययनाङ्गलेऽप्यस्याचारात्‌ खातग्त्यमपि । 
भाद्धसुपक्रस्य ब्रह्मपुराणे- 
श्रमावस्यायां पिच्य तु नचचे सति संयुताः । 
सप्र प्रकाराः पितरो जाताः कमलसम्भवात्‌ ॥ 
तेभ्यः पूजा तु कन्तैवथा तच सर्व्वात्मना वुधैः | 
पिण्डो देयस्तयाष्टाङ्गः आद्धं काय्य सुसम्पद्‌ा ॥ 
दूमासेवामावस्यां आवणणैयां पुर्खत्य श्रक्तादिमासरोत्या 
मरोचिः- 
मासे नभस्यमावस्या तस्यां दभेचयो मतः । 
्रयातयामास्ते दभा विनियोज्याः पुनः पुनः ॥ 
मत्छपुराएे श्वर उवाच- 
ष्टणव्वावदहिता देवि तथेवानन्तपुष्डङत्‌ 
नराणामय नारोणामाराधनमनुन्तमम्‌ ॥ 
२8 


२६६ 


क्रत्यरन्ाकरः । 


नभस्ये वाय वैशाखे पुण्छे मागेशिरसय च। 
शएक्ञपङे तीयायां र्ल्ञातः मन्‌ गौर सषेपेः ॥ 
गो रोचनं सगोमूचमुष्णं गोश्ङत तया । 

द धि-चन्दनसभ्मिश्रं ललाटे तिलकं न्यसेत्‌ ॥ 
सौ भाग्यारोग्यज्चदयस्मात्‌ खदा च ललिताम्रियम्‌ । 
प्रतिपच्चं ठतोयासु पुमानापौतवाससौ ॥ 
धारथेदय रक्तानि नारौ चेत्‌ पतिस्युता। 
विघवा धातुरक्तानि कुमारो श्एक्गवासुसौ ॥ 
दे वच्वौ? पञ्चगव्येन ततः रौरेणए केवलम्‌ । 
लापयेन्मधना तदत्‌ पुष्पगन्धोद्केन तु ॥ 
पूजयेच्छक्तपु्यस्त फालेर्नाना विधेरपि । 
धान्यकःजाजिरं लवण गुडक्षोरटताज्वितेः ॥ 
प्रक्ताच्चततिलेर्च ततो देव्याः सदाइंयेत्‌ । 


श्ह्व॑† प्रतिमां शएक्गाक्तताः सिततण्डलाः । 


पादाचभ्वक्व॑न छ्रर्य्यात्‌ प्रतिपक्च वरानने ॥ 
वरदाये नमः पादौ तथा रल्फौ नमः अभिधे" । 
- प £ ॐ 

्रग्रोकाये नमो जक पाव्वत्यं जानुनौ तया ॥ 
|~ १ > न 

उरू मङ्लकारिे वामदेयये तया करिम्‌ । 

पद्मोदराये जठरमसुरः काम्यं नमः। 

करौ सौभाग्यदायचिन्ये बाह इरसुखभिये । 


१ 7 सुस्ातः- २ 81) देवोन्त्‌। 
₹ ^+--जाति | ४ ^ श्रिय । 


क्रत्यरल्नाकरः । २६७ 


मुखं दर्प॑णवासिन्ये सरदाये सितं नमः ॥ 
गौं नमस्तथा नासासुत्पलाये च लोचने 
तष्य ललाटमलकान्‌ कात्यायन्ये नमस्तथा ॥ 
नमो गौर्ये नमः पुषे नमः कान्तये नमः भिये । 
रम्भायै ललिताये च वासुदेव्ये नमो नमः॥ 
एवं समज्य विधिवदग्रतः पद्ममालिखेत्‌ । 
पचेद्‌ श्रभियुक्तं कुङमेन सकणिकम्‌ ॥ 
पष्वेण विन्यसेद्भौ रौोमपर्णणञ्च ततः परम्‌ । 
भवानं दचिणे तद्द्रद्राण्णेञ्च ततः परम्‌ ॥ 
विन्यसेत्‌ पश्चिमे सौम्यां खदा मदनवाभिनोम्‌ । 
वाये पाटलामुयामुत्तरेए ततोऽष्युमाम्‌ । 
मध्ये ययाखमागशासु मङ्गलां मुदां सतौम्‌ । 
भद्रश्च, मध्ये संस्था ललितां कणिकोपरि ॥ 
कसुमेरचताभिंवा नमस्कारेण विन्यसेत्‌ । 
्रकतासिस्तष्डुलेः । श्रच्चता यवा दरति, पारिजातः, 
गो त-मङ्गलघ्योषच्च कारयिला सुवासिनौम ॥ 
पूजयेद्धक्तवासोभो रक्रमाच्यातुलेपनेः। 
चन्द्रं सानप्रणञ्चः तासां शिरसि पातयेत्‌ ॥ 
खानपूणे खानो यदरयपूणे कुङ्मम्‌ 
सिन्दूर-कुङ्कमखानमतोवेषटं यतस्ततः ॥ 


१ सद्रश्च। २ 1) क्ञानचूण | 


२६८ 


क्द्यरल्नाकरः | 


तस्यो पदेष्टारमपि पूजयेत्‌ यन्नतो गरम्‌ । 
न पृल्यते गुरुखै नरे'स्तचा फलाः क्रियाः ॥ 
नभस्ये पूजयेद्नो रसुत्यलेरसितेः सद्‌ 
बन्धुजौवर शरयुव्यां कार्तिके शरतपचचकः ॥ 


श्राश्वयुज्या माशचिनहतोयायां प्रकरणात्‌ ॥ 


जातेपुष्ये माभेभ्नोषं पौषे पीते: कुरुण्टकः । 
{> ९ कि क 

कुन्द पुष्यः खुवर्णद्येद वौ माघे तु पूजयेत्‌ ॥ 

सिन्दुवारेण जात्या वा फा्ानेऽप्यचेद माम्‌ । 

म, > द क ॐ, 

चेच तु मल्िकाशोकं वश्राखे गन्धपारसतंः ॥ 

व्येष्ठे कमलमन्दारेराषाद च जयाम्बजेः, । 


जया जयन्तो 


कदम्बेरथ मालत्या शरावे पूजयेत्‌ सद्‌ा ॥ 
गोमूच गोमयं कौर दधि सपिंः कुशोदकम्‌ । 
विल्वपचाकंयुष्यञ्च यवान्‌ गोग्रटङ्गवारि च ॥ 
पञ्चगव्यञ्च विल्वञ्च प्राशयेत्‌ कमगश्रस्तया । 
एतद्धाद्रपदाद्न्तु प्राशन मसुद्‌ाइतम्‌ ॥ 
प्रतिपचच्च मिथुनं ठतौयायां वरानने । 
भोजयिलाचयेद्धक्या वस्-माच्य-विले पने: ॥ 

पुमः पौताग्बरे दद्यात्‌ स्याः कौ सुम्मवाससौ । 
निष्यावाजाजिलवणएमिचृदणष्डगणात्ितम्‌ ॥ 


जान निन क म म जनान नका न 


१ 1 सर्व्वाः | २ ए जवाम्बजैः । 


कछत्यरल्लाकरः | २६६ 


तस्ये ढद्यात्‌ फलं पुसः सुवौत्यलमंयुतम्‌ ॥ 
यया न टवि! देवेशस्तं परित्यज्य गच्छति । 
तथा मासुद्धराग़रेषदुःखमसारमागरात्‌ ॥ 

कुमुदा विमला नन्दा भवानो वसुधा शिवा ॥ 
ललिता कमला गौरी तौ रम्भाऽच पावती 
नभस्यादिषु मासेषु प्रोयतामित्यरोरयेत्‌ ॥ 
त्रतान्ते श्रयनं दद्यात्‌ सुवणेकमलान्वितम्‌ । 
मिथुनानि चतुविंश्ान्‌ ादशरेवाधवाच्येत्‌ ॥ 
अष्टो षड्धाप्यय पुनखानुमामं सम्च॑येत्‌ । 

प्व दत्वाथ गुरवे शेषानभ्यद्ंयेदधः ॥ 
उक्तानन्तहतोयेषा षद्‌ानन्फलप्रदा । 
सव्वेपापहरा देवौ सौ भाग्यारोग्यवद्धेनो ॥ 

न चेनां विन्तशारेन कदाचिदपि लक्गेत्‌ । 
नरो वा यदि वा नारो विन्तशाखात्पतत्यधः ॥ 
गर्भिंएणो खलिका नक्तं कुमारौ वाप्य रोशि्ौ। 
यद्‌ाऽश्टद्धा तदान्येन कारयेत्‌ प्रयता खयम्‌ ॥ 
दमामनन्तफलद्‌ं यस्तृतोयां समाचरेत्‌ । 
कल्पको टि श्रतं सायं शिवलोके मद्योयते ॥ 
विन्तहौनोऽपि क्रु्ववौत वषेच्रयसुपोषणेः । 
एुष्यमन््र विधानेन सोऽपि तत्‌ फलमाभ्रुयात्‌ ॥ 


न ~ ना या मा ज 0 = ७४१५०१७० 


१ ^ यतः। , २8 वा रजखल्ला। 


२७० छत्यरन्नाकरः | 


नारो वा क्षुरतेया तु क्रुमारौ विधवा वा। 
सापि तत्‌ फलमाप्नोति गोच्यैनुग्रहलाल्िता ॥ 
दति पठति श्टणोति वा थ इत्यम्‌ 
गिरितनयाव्रतमिन्दुलोक^सखः । 
मतिमपि च ददाति सोऽपि देवै- 
र भरवधृजनकिन्नरेख पूज्यः ॥ 


दूत्यनन्तत्रतदतोया ॥ 


ढतोयां प्ररकत्य भविव्यपुराण- 
माघे भाद्रपदे वापि स्रौं धन्या प्रच्चते। 
तया- 
यड प्रपासवु दातव्या मासि भाद्रपदे तया ॥ 
दलोयां पायस वापि वामदेव प्रोतये ॥ 
मन्न्तरादिश्चेयं तोया | 
श्िष्टाः- 
्रक्तपक्ते चतूर्थ्यान्तु सिंहे चन्द्रस्य दभेनम्‌ | 
मिश्याभिश्पं कुरुते तस्मात्‌ पश्येन्न तं तदा ॥ ` 
अन्न ब्रद्यपुराणमपि पठन्ति । 
नारायणोऽमिग्रप्रस्त निशाकरमरोविषु | 
खितञ्चतुश्यांमद्यापि मनुव्यानापतेच्च सः ॥ 





पि ककय 


१ 8 इन््रवास--। 


व्रत्यरन्नाकरः। २७९ 


श्रतश्चतुश्या चन््न्त म्रमादादौच्छ संयतः । 

पटेद्धा चे यिकावाक्ये ्रा्मुखो वाण्ुदद्मुखः ॥ 
धाचेयिकावाक्यं विष्णपुराणे- 

- सिंहः प्रसेनमवघोत्‌ सिंहो जाम्बवता इतः । 

सुक्कमारक! मा रोदोस्तव देष स्यमन्तकः ॥ 
तया शिष्टाः- 

भाद्रश्रक्तचतरथ्यान्त्‌ दरय्यालो नाम या मता। 

पूजयेत्‌ पाष्वेतौं तस्यां सौभाग्यं न विदन्यते ॥ 
भविव्यपुराणे- 

शिवा शान्ता इभा राजन्‌ चतुर्यो चिविधा मता । 

मासि भाद्रपदे शक्ता शिवलोकेषु प्रूजिता॥ 

तस्यां स्लानं तथा दनसुपवासो जपस्तथा ! 

क्रियमाणं श्तगृणं प्रमाद्‌ादन्तिनो नृप ॥ 
दन्तिनो -गफपतेः । 

गड-खवणए-तानान्त्‌ दानं श्टुभकर स्मृतम्‌ । 

गूड़ापूरैस्तया कीर । पुश्छ ब्ाद्यणएभो जनम्‌ ॥ 

यास्स्यां नर शादेल पूजयन्ति सदा स्ियः । 

गड़-लवणए-पूपेश्च श्वश्रु शवश्एरमेव च ॥ 

ताः सर्व्वाः सुभगा वे सयरवित्नेशस्यानुमोदनात्‌ , 

कन्यका तु विगरोषेण विधिनानेन परूजयेत्‌ ॥ 
कन्याकनतु कपूजायां शवश्रु-शण्टरपूजा नास्ति तस्यास्तदभावात्‌ 

गणएपतिरच प्रधानतया पज्यः। 


२७९ कछत्यरनाकरः। 


ब्ररक्तपचसुपक्रम्य भविष्यपुरार- 

खमन्तरुवाच- 
नया भाद्रपदे मासि पञ्चम्यां अरद्भयान्ितः। 
यश्चालेख्ये नरो नागान्‌ कृष्णवणि वेके: ॥ 
परूजयेद्न्धयुष्यस्त॒ मपिगुग्गल-पायरेः । 
तस्य तुष्टि समायान्ति पन्नगास्तच्कादथः॥ 
आसन्नमात्‌ कुलात्तस्य न भय नागतो भवेत्‌ । 
तस्नात्‌ सव्वप्रयनेन नागान्‌ सभ्यूजयेन्नरः ॥ 

दत्यालेख्यनागपञ्चमोत्रतम्‌ ॥ 

तच्चकाद्यद्तु नागा श्रष्टौ श्रावणपञ्चम्यासुक्ताः ॥ 


चोषाककायेोकी 


ब्रह्यपुराण- 
बरुक्तायामथ पञ्चभ्यां नलो नागपतिः पुरा । 
सतोद्द' प्रविष्टश्च तस्मात्तं तच्च पूजयेत्‌ ॥ ` 
माच्ेवस्तो पडारेश्च देवाभिद्रुत्पणेः । 
गृत्यगौतेस्तथा वाद्यैः पुष्पैधुपान्नसम्बदा 
स्थाननागांख विधिना पजयेच्चापि सव्वद्‌ा ॥ 
स्थाननागाश्च भविष्यपुराणोक्ताः। 
तया- 
ये केचित्‌ एथिकौतले ये ऽधस्तान्महोदषेःर, । 
हिमाचले च धे विन्ध्ये येचान्तरोके दिवि खिताः । 





९ + --टेद। २ हलिषदो ऽधस्तात्‌। 


क्रत्यरन्नाकरः | २७द्‌ 


ये नदोषु तया नागा ये सर्‌ःखयपि भोगिनः) 

ये वापौषु तड़ागेखिति , 

युण्छा भद्रपदे मासि पञ्चमो नागपञ्चमो। 
चोरल्तानपूजा दिभिर्नागपरोतिहेत्‌र्नांगपञ्चमौ समाख्यानम्‌ । 
भविव्ययुराण एव श्तानौक उवाच- 

नागदृष्टः पिता यस्व भ्राता वा दुहिताऽपि वा। 

माता पुचोऽथ भार्य्यां वा कन्तेव्यन्तददख मे॥ 

मोच्ाय तस्य विप्रेन दानं ज्रतञुपोषितम्‌ । 

बरूहि मे दिजण्ाहंल येन तदै करोम्यहम्‌ । 
सुमन्तुरुवाच । 

उपोग्या पञ्चमो राजन्‌ नागानां पुष्िवद्धनौ । 

खमेकमेक राजेन्द्र विधानं श्ण भारत ॥ 

मासि भद्रपदे या तु श्ररक्तपच्े महोपते। 

सातु पुण्ा मवा प्रोक्ता गाद्याऽसौ मतिकाम्यया। 

ज्ञेया दाद श्र सम्बन्तं पञ्चम्यो भरतषभ ॥ 
दादश पञ्चभ्यो ज्ञेया इत्यन्नयः, सम्बर्ता वत्सरः ¦ 
कल्यतरो तु- 

ज्ञेया दाद शमासस्य जपं जप्यञ्च भारत !॥ 

दति पाठः ॥ 
चतूर्थ्यामेकभक्द्च तस्यान्त प्रको न्तितम्‌ । 
श्रूरिभारमयं नागमयवा कालघौ तकम्‌ ॥ 


अरिभारमयं इवणंभारमयम्‌ । कालघौतकं सेष्यमयम्‌ । 
३१५ 


२७४  क्व्यरनाकरः। 


त्वा दार्मयं वापि अथापि ब्दएमय नृप । 
षरक्तयपेच्या विकन््यः | 

पञ्चम्यामच्येदधक्ा नागं पञ्चफण नुप । 

करवोरैः श्रतपैः जातौ पुष्येश्च सुत्रत ॥ 

तथा गन्यप्रधूपेश्च पूज्य पन्नगमु तमम्‌ । 

नराह्मणान्‌ भोजयेत्‌ पश्चात्‌ त-पायम-मोदकेः ॥ 

अनन्त वासुकिं पद्मं शद्धः कम्नेलमेव च । 

तथा करकोटिकं नागं नागमश्वतरं नृप॥ 

छतराष्ट शङ्खपालं कालिय तच्चक तया । 

पिङ्कलच्च महानागं मासि मासि प्रकीौ्तितम्‌ । 

सम्बर्ताने पारणं स्यान्महान्राद्मणएभोजनम्‌ ॥ 

द्तिहासविदि नागं ^गैरिकेण छतं नृप ! । 
गेरिकेण सुवणन । | 

तथाच्जनो प्रदातव्या वाचकस्य मरौपति ॥ 
अरन्नुनौ गौः । 

एष पारणके चापि विधिः भक्तो वुधेनेप । 

तव पिचा कृतश्चैव पितुौक्ाय भारत ॥ 

सखभमेकमुख्या वे वोर पञ्चमो भरतषभ । 

सुव्रणेभारनिष्यन्न नाग दला तथा च गाम्‌ ॥ 

व्यासस्य छुरग्रादल पितुरानृष्ठमाप्तवान्‌। 


१ 8 काञ्चनं रत्रचिचितम्‌। २ 23 रष वै नागपञ््ाः 


कछ्यरनाकंरः | २७४ 


तव पिचा कृतेत्येव पञ्चस्योपासते नृप ॥ 
उपासते लोकाः पञ्चम्या करणश्डतया । 

उत्सृज्य नागतां वौर तव प््वेपितामहः ॥ 

पुख्धेतप्रसदो यातस्तथा पुसो नुप । 
पुखेतर-पुग्यशब्दौ खभिविशेषवचनौ । 

सुनासोरसटो गल्ला तथा भागंसदौ गतः। 
सुनासोरसदः दनद्रसभां, भागेसदः सुखेखभाम्‌ | 

खरसद स्ततो गला कञ्जस्य सदो गतः ॥ 
कञ्चजस्य नद्यः । 

श्रन्येऽपि ये करिव्यन्ति इदं त्रतमनुत्तमम्‌ । 

दष्टक मोचते तेषां ्एभं सानमवाष्यते ॥ 

यश्चेदं श्टणयान्नित्यं अरद्धाभक्तिखमनितः। 

कुले तस्य न नागेभ्यो भयं भवति ज्गुचचित्‌ ॥ 


दति दष्टोद्धरणएपञ्चमोत्रतम्‌ ॥ 


शएक्तपचप्रकरणे तचेव- 
सुमन्तुरूवाच । 
येयं भाद्रपदे मासि षष्टो स्याद्धरतषेभ ! 
पुण्या चेयं पापहरा शिवा शान्ता भष्रुभा नृप ॥ 





९ 8 पुष्योत्तर-- | ९ 8 गदधप्रिया। 


२.७६ 


कछयरनाकरः। 


सरानदानादिकं किच्चिन्तस्यामच्यसुच्यते। 
येऽस्यां पश्यन्ति गाङ्गेयं दचिणपयमासितम्‌ ` 
ब्रह्म दन्य दिप पेस्ते मुच्यन्ते नाच सग्रयः। 
तस्मादस्यां मदा पश्येत्‌ का न्तिकेयं खदेव हि ॥ 
पूजयन्ति गु येऽस्यां नरा भक्तिसमन्विताः । 
प्राप्य ते बूभान्‌ लोकान्‌ गता हद्रखलोकताम्‌ ॥ 
यस्तु कारयते गेहं सुदृढ सुप्रतिष्ठितम्‌ ॥ 
दारे लमथं भक्तया क्वा श्रद्धासमन्वितः । 
गाङ्गेयं यानमारुह्य गच्छेद ङगंयसद्य वे ॥ 
समपाज्जेनादिकं कमम कुर्याद्गे ग्णहे नरः । 
ष्वजम्यारो हणं राजन्‌ स गच्छेदुदरदा वै। 
चन्दनागुरुकपंरः यस्तु पूजयते ग्रहम्‌ । 
गवाश्चरययानाच्छं सेनापत्यमवान्रुयात्‌ ॥ 

राज्ञां पूज्यः सदा प्रोक्तः कार्तिकेयो महौपते | 
कान्तिकेयादृते राज्ञां नान्यः पृञ्यः प्रचचछते ॥ 
सद्खगम गच्छमानोऽपि पूजयेत्‌ छ्तिकाख्तम्‌ । 
म शरचृन्‌ जयते वोरो यथेद्धो दानवाचणे ॥ 
तस्मात्‌ सब्वेप्रयनेन पूजयेच्छङ्करात्म जम्‌ । 
पूजमानस्ल॒ तं भक्ता चम्पकं विं विधेनेप ॥ 

मुच्यते सव्वेपापेभ्यस्तया गच्छेच्छिवालयम्‌ 
तेलं षष्ठयां न भुद्धौत न दिवा कुरुनन्दन ॥ 
यस्तु षष्ठयां नरो नक्तं कु्याद्भरतखन्तम 


कऋत्यरन्नाकरः | २७७ 


सब्वैपायैः स निमुक्तो गाङ्गेयस्य सदो बजेत्‌ ॥ 
चिः छ्ेत्व( दलिणामाशां गला यः श्रद्यान्तितः। 
पूजयेदवदेवेशं ख॒ गच्छच्छा न्तिमिन्दिरम्‌ ॥ 


दति षष्ठोकल्पः । 


एतस्य षष्टो कण्यस्य सर्व्वैमच्तयसुच्यते ॥ 

दत्यन्तसेकटे शमाचमेव समयप्रदोपे लिखितम्‌ 
सानदानादिकं सब्वेमस्यामच्यसुच्यते । 

दति पाठे सत्येवास्यामिति शेषो दत्तः। तच हेतुने सम्यक 


गो पाल-लच्छ्लो धरा दि भिश्चेतत्‌-कर्यमध्ये विद्यमानः- 


षष्ठयां तेलं न भुञ्ौतेव्यादिमा द्ेश्लो कः । 
षष्ठयां फला शनो राजन्‌ विशेषात्‌ कार्तिके नृप । 
दूत्यादि षष्ठोकन्पे-स नक्रन तौ भवेदित्यस्याय खरग च 


नियतं वास इत्यस्य पश्चाल्िखितः, गेषन्त्‌ तत्मतिपाद्यं कम्मेजातं 
न लिखित) तत्रापि हेतुर्नास्ति पनेन तु साद्धश्षोकेन साङ्ग 
षष्टो नक्रत्रतमत कच्पे प्रतिपाद्यते । अनेन तु त्रतषपं स्ञानदानादि 


काल्तिकेयपूजादि च प्रतिपाद्यते इति परमा्ैः। 


भाद्र श्एक्ञसुपक्रम्य बह्यएराणे- 
षष्ठयान्तु माघवः क्तं लबधेवान्‌ देवकसुतः । 
स्थाननागः कुमारश्च गावो श्रताश्च भूतले ॥ 


२७८ क्व्यरल्नाकरः | 


तस्मात्ते तज सम्यूज्याः शकंरासम्भवेः फलः । 

मध्वाज्यमरौचोपेतः ुव्येधू पेवेधाक्रमम्‌ ॥ 
परिपक्रैरिति श्वपाल-ङत्यषसुच्चये पाठः । 

गत्य -मिच-कलचन्यो दला श्श्धमैत तान्यपि । 
भविथ्यपुराणे ब्रह्मोवाच । 

मासि भाद्रपदे बौर शक्तपच्चेऽच थो भवेत्‌ । 

षष्ठयां गणक्ुलश्रेष्ठ ? स भद्रः परिकौत्तितः ॥ 
यो भवेद्धविवार इत्यः | 

तच नक्तञ्च यः कु््यादुपवाश्मयापि वा) 

इसयानसखमारूढो याति इहंससलो कताम्‌ ॥ 
उपवासाश्क्रौ नक्तं । दस भ्रादित्यः। 

मालतौक्सुमानोह तथा शतच्च चन्दनम्‌ । 

विजयञ्च तथा धूपं नेवेद्यं पायसं परम्‌ ॥ 
विजयनामा धूपः परिभाषोक्तः । 

पूजायां भास्कर स्येतत्‌ कुर्य्या्तिपुरनन्दन । 

इत्थं समन्य देवेश मध्याङ्े सुवनाधिपम्‌ ॥ 

दला तु दच्चिएण शल्या ततो शुद्धोत दाग्यतः। 

पायसं गणशादूल सगङ़ं सर्पिषा सह ॥ 

य एवं पूजयेद्वादरे मानवस्तिमिरापद्म्‌ । 

सर्व्वान्‌ कामानवाप्नोति पुच्दारधनादिकान्‌ ॥ 


मी 1 


९ 8 भक्तया 


क्रत्यरन्नाकरः २.७९ 


विसुक्रः सव्वेपापेभ्यो याति वरघ्नसलोकताम्‌ । 
एष भद्र विधिः प्रोक्तो सयाऽयन्ते गणाधिप । 
ङंलवा श्ुवा भ्मव्वेपापान्् ते मानवो सुवि॥ 


अदिव्यवारकल्य भटर विधिः । 





ब्रह्मोवाच 
शक्ञपक्चे तु सप्तम्यां मासि भाद्रपदेऽच्यत ¦ 
प्रणम्य श्रिरसादिल्य पूजयेत्‌ सप्तवाहनम्‌ ॥ 
पष्य-धुपादि भिर्वौर क्रुतपानाञ्च तपेणेः । 
कुतपाना ब्राह्मणानाम्‌ । 
पाखण्ड़ादिभिरालापं न कुवन्ति यतात्मवान्‌ ॥ 
विप्राय द्चिणं दला नक्र भुञ्ौत वाग्यतः। 
तिष्ठन्‌ त्रजन्‌ प्रशितश्च चुत-प्रखलितादिषु ॥ 
श्रादित्यनामस्रण जूर्य्यादचारण तथा । 
अनेनेव विधानेन मासान्‌ द्वादभ वे क्रमात्‌ ॥ 
उपोष्य पारणे पूरणं समभ्वच्छ जगहुरम्‌ 
पुण्छेन. खरवणेनेह भ्रौ णयन्‌ पुष्टिमाप्रुते ॥ 
एवं यः पुरुषः कुर्य्यादादित्याराधनं शविः, 
नारौ वा सखगेमभ्येत्य द्यनन्तफलमश्रुते ॥ 


द्त्यनन्तफलसप्तमो ¦ 








१४8 च यत्‌। 


२८० सत्यरलाकरः । 


देवो एुराणे- 

मरुर्वाच- 
यदौच्छति खभरत्तारभिदड जन््रनि चापरे, 
कन्या दुर्यान्नपशरष्ट विष्णुना कथिते त्रतम्‌ ॥ 
सव्वंपा पर युण्ठ स््वकामफलप्रदम्‌ | 
उमामादहेश्वर नाम कन्तेययं विधिना यथा ॥ 
प्रौष्ठाञ्चिने तया मागं ष्टगे भाग्येऽचवा पुनः| 
मैवे शाकरोऽथवा काय्यैमष्टम्यामय श्राङ्करे ॥ 

प्रौष्टो भाद्रमासः, ग्डगे स्डगशिरसि, भाग्ये परव्वैफार्णुन्यां, मैच 

च्रनुराधायां, श्राक्रे च्येष्ठायां, शाङ्करे श्राद्रायाम्‌ | 

रववऽद्कि च सपन्नौकं दाग्यत्यं एएभसंयुतम्‌ ॥ 
एकभार्य्यारतं वत्स ! सब्वेधश्मत्रताज्ितम्‌ । 
श्रामन्लयाम्येष युवां प्रातः काय्येसवनु यदहः ॥ 

श्रच च मन्तप्रयोगे नरनारौकन्तैके दटसेव वाक्यं प्रयोक्तव्य 

स्यधिकारस्य नरो वेत्यनेन^ पुरुषस्याघयेऽधिकार कथनात्‌ । 

मुदा ज्वितस्तया करुय्यांत्‌ कलिः इन्दविवष्जिंतः । 
मधुरान्नेन भोच्यन्त्‌ चौरे चुयवश्ालिभिः॥ 
सितद्च््े तथा रक्त श्टभे देये च वाससौ । 
निमेले सदगे वस्ते देवदेवो प्रसाधके ॥ 

सिति देवाय रक्तं देव्ये 
साला उमेश्वर पच्य खण्डिले प्रतिमासु वा । 


कासा न भ ना माना ०५ = 
1 ~~~ ~+ [0 १.7 11 | 


९ 4 वेत्यबाधेन | २ ^ 8 काल्म्‌- 


छन्यरला करः | 


कला दिशां बलिं दला वितानमवतारयेत्‌ ॥ 
चतुर ख चतुदार गोमथेनो पलेपयेत्‌ । 
चतुष्कं श्रालि- गोधरूमवरकेरुपभो मितम्‌ ॥ 
दौपमालान्वितं कत्वा दाम्पत्यं भोजयेत्ततः । 
शरद्ुःर मनसा ध्यायेत्‌ शक्र! भक्तिसमन्वितः ॥ 
देवश्चन्दनकाशनोर कथूराशरुधूपितम्‌ । 
जानो-पुन्नाग-मन्दार-शतपत्तैः सुमानितम्‌ ॥ 
माप्य युग्मं सम्बोतं चधा कंवा प्रदकिएम्‌ । 
युग्मं खोपुंसौ । 
सुखालापेन सम्भोज्य ध्यायन्तो तमुमेश्वशम्‌ ॥ 
श्राचम्याघेपाचन्त्‌ दद्यादन्धोदक तथा । 
सहिरण्यं सवत्सन्त्‌ पुनदला चमापयेत्‌ ॥ 
भ्राचम्य श्राचमनं कारयिल्ा- 
परोयतां मे उमेश्रस्तु सव्वेदेवपतिः पतिः । 
उमामन््ेए चोभे ई श्रमन्ल्ेण शद्रौ ॥ 
पूजिता सव्वंकामार्यान्‌ प्रयच्छत्य विचारतः । 
नेन प्राभ्रुयान्नारौ च्रवियोगं सुरेश्वर ॥ 
दूइ जन्मनि सौभाग्यं घनधान्यसुखानि च। 
ग्रता याति परं खानं शङ्रोमाषमन्वितम्‌ ॥ 
तच भुक्ता महाभोगानिहायाता महाङ्ले । 
सहन्ते इद्धि सम्पन्ने पतिं विन्दति श्नोभनम्‌ ॥ 
लावण्छरूपसम्पन्ता भन्तुखेष्टा सदा भवेत्‌ । 
३६ 


+ + कृद्यरन्ाकरः। 


श्ाघनोया समस्तस्य विभवान्तःपुरस्य च ॥ 

सुयुजा जौववत्छा च अआधिद्याधिषिवन्निंता। 

सक्ता यथंश्पितान्‌ कामान्‌ इद्भले पतिपूल्विकाः ॥ 

दिव यान्ति सुरभेष्ठ शङ्रोमाव्विंकाः स्तिः । 

नरो वानेन विधिना नारौएणं भवते पतिः॥ 

सम्बद्धः सब्वेश्तानां परतिलमसुपगच्छति । 

शङ्धरोमाजतं शक्र लतया पव्वंमनुष्ठितम्‌ ॥ 

रत्या देव्याऽरन्धत्या च रोहिण्या सुरसन्तम ! । 

छतमासौत्‌ उखखायन्त्‌ ताञ्च सुञ्ञौत तत्‌ फलम्‌ ॥ 
दत्युमामहेश्वरत्रतम्‌ । 





देवोपुराण- इन्द्र उवाच- 
कथितं शङ्रोमाद्यं बतं मनसि तुषिदम्‌ । 
श्रोतुमिच्छाम्यहं तात विष्णुश्रङ्र संज्ितम्‌ ॥ 
मनुरवाच- 
यथा उमेश्वर तात तया काय्यैमिदं त्रतम्‌ । 
तथा काय्यैमिति पूववीक्तभाद्रमासादौनां सर््ेषामतिदे शः! 
किन्तु पौतानि वासांसि केश्रवाय प्रकस्पयेत्‌ ॥ 
गन्धपुष्यं तथा धूपं सुगन्धश्च जनादने । 
काय्यं पूजनसम्भारे डका दधिभकंरम्‌ ॥ 
एवं तौ पूजया तु प्रतिमाख्ण्डकेऽपि वा । 
श्राङत्य त्रादह्यणौ वन्ध वेद विद्धान्तपारगौ ॥ 


छत्यरननाकरः | रष 


यती वा व्रतसम्न्नौ जटाकाषायधारिणौ । 
तौ भोजयेदिधानेन शूलपाणि-जनादनो ॥ 
समाप्य विधिना वत्स सव्वेकाम-प्रसाधको । 
हेम तु द्चिएा विष्णोर्मोक्रिकं शङ्करस्य च। 
दलानुनन्य तो लोकौ क्रमादेहचये त्रजेत्‌ ॥ 
त लोकाविति वेष्णव--शाङ्रो 
भुक्ता भोगांस्तया शक्र इदहायातो नरेश्वरः 
कुले भवति भ्रूपानां सुख-पुत्रादिसंयुतः ॥ 
पष्वेभावाद्धवेद्धक्तिः शिव-विष्ण॒प्रसाधके । 
योगं प्राप्य परं याति बन्तत्‌स्थानमनामयम्‌ ॥ 
दूति विष्णशरङ्करयोत्ैतम्‌ । 
भविग्यपुराणे - विष्णुरूवाच-- 
बरह्मन भाद्रपदे मासि श्रक्ताष्टम्यासुपोषितः। 
पूजयेच्छङ्ःर भत्वा यो नरः अद्धयाज्ितः | 
स याति परमं खानं यच देवस्तिलोचनः।॥ 
गणेशं पूजयेद्यस्तु दुब्वेया सहितं भुने । 
फलानां मकलेद्रवयेः गन्धपुष्यविललेपनैः ॥ 
फलानां सककेर खण्डफलैः ¦ 
खच्छर-नारिकेलेश्च मातुलङ्गफलेस्तथा । 
पूजयेच्छङ्करं भत्वा दृव्वेया विधिवद्भज ॥ 
दध्यचते दिंजथेष्ठ श्रध दत्वा चलो चने । 


0: 


छव्यरनाकर., | 


र््वामो गञ्च सशयच्य यन्नतः अ्द्भया दिज ॥ 

लं दूरवद्टतजन््माऽमि सव्वैदेवेस्ठु वन्दिता । 
पूजिता द्‌ ह तत्सव्वं यन्मया दुष्कृतं छतम्‌ ॥ 

एवं सम्यूज्य देवेश दर्व्वाञ्च ब्रह्मनन्दन 
ब्राह्मणेभ्यः फल' दद्यात्‌ नारिकेलादि सत्रत!॥ 
दधि प्राश्य गहं गच्छत्‌ चमयिला चिलोचनम्‌ । 
दुर्व्वा गौरौ सुता ब्रह्मन्‌ शङ्गरस्त॒ फलानि वे ॥ 
यस्तु तस्यां तिथौ ब्रह्मन्‌ एजयेच्छङर नरः! 
सहु गच्छेह रम्य दिव्य-गन्व्वसेषितम्‌ ॥ 
त्वो पवासं सक्तम्यामषट्या पूजयेच्छिवम्‌ | 
एववौक्तेन विधानेन सव्वेकामान्‌ स विन्दति ॥ 
विद्यां प्राप्नोति क्यौ युचाथौ युचमाश्रुवात्‌ । 
धनार्थो धनमाप्नोति भार्यार्थं लभते च ताम्‌ ॥ 
मनसा वद्यदिच्छत तत्तदाप्रोति मानवः। 

य एवं पृजधेदरेवौः ्टतेशं मानवः पलः । 
समस्जन््मपापौ घान्मुच्यते नाच्च संश्रयः । 
कृतोपवासः सप्रम्यामष्टम्यां पृजयेच्छिवम्‌ 
दूर्व्वाममेतं वि्रद्र दध्यच्तफलैः एएमैः ॥ 

ततः सन्यूजयेदधिभ्राम्‌ फलेर्नाना विधेदिंज ॥ 
अन्निपक्रमनश्नोयादन्न दधथिफलं तथा । 
च्रचारलवणं ब्रह्मन्नन्नौ यान्मधुरानितम्‌ ॥ 

दद्यात्‌ फलानि विप्रभ्यः फलाहारः खयं भवेत्‌ । 


छव्यरल्एकरः । + ओ 3 


प्रणम्य शिरसा दूव्वों शिवञ्च श्िवमात्रुयात्‌ ॥ 
य एवं ज्रुरुते भक्तया महादेवस्य पूजनम्‌ । 
गणत्वं यात्यसौ ब्रद्धान मुच्यते ब्रह्महत्यया ॥ 
एवं पुणा पापहरा अष्टमो दू्वेसंज्लिका । 
चतुर्णामपि वर्णानां स््ौजनस्य विशेषतः ॥ 
दति दृरव्वाष्टमौत्रतम्‌ । 
ब्रह्मपुराणे 
जमादेनश्च दुर्गा च धनदौ वरुणस्तथा । 
वनसतिख् पञ्चैते नवम्धान्त्‌ छते युगे ॥ 
उत्यादयेयुरगाधूमासतष्ययभिंह दे दिनाम्‌ । 
तस्मात्तान्‌ पूजयेत्तच भच्छेगोधमसमवेः । 
एड़ाज्यमरौचोपेतेः पुण्यधूपैयेथाक्रमम्‌ । 
गोधूमेसतपेयेदन्ि गोधुभे खाये रम्‌ ॥ 
तन्निवेदितशिष्टानि भच्छानि प्रयतात्मवान्‌ | 
दत्वा विप्राय विप्रेभ्यो दचात्तान्येव द्किणणम्‌ ॥ 
सुसं्ञनायां नदयाञ्च सुधुश्पे च जलाश्रये। 
आरामे टचवडले पञश्च्ुखोत तान्यपि ॥ 
दिवोषुराणे- 
ततः कड लौ चुद्‌ ण्डेन पताकाश्च समुच्छरयेत्‌ । 
अन्याश्च विविधाः शोभाः शक्रकेत्‌सयुच्छरये ॥ 
प्रौष्ठपदे तथाष्टम्यां ए्क्तायां शोभने णे । 
श्राश्धिने वाय श्रुक्घायां श्रवणे वाय चोन्छरयेत्‌ ॥ 


२०६ छव्यरनाकरः | 


विष्ण धक्नान्तरे- 
मासि भाद्रपदे श्रटक्कनवभ्यां दिजपुङ्गवाः। 
गोधूमभक्तान्‌ सरुड़ान्‌ दत्वा पुष्छमवाभ्रुयात्‌ ॥ 

ब्रह्मपुराण- 
नभस्यान्ते दग्म्यान्त॒ कश्छपो सभ्धवान्‌ वरम्‌ । 
श्रवतारं वितस्तायाः सतौदेहे पुरातने ॥ 
एकाद ान्ततो रद्र: सतौ भार्यखणामरे श्यत्‌ । 
रसातलगता सा च इाद्‌श्यां श्ङ्रान्ञया॥ 
श्रय जाता चयोद्श्णां शूलभेदाद्रखातलात्‌ । 
चतुदेश्यां पुननष्टा पौणमास्यां ससुत्थिता ॥ 
प्रतिपद्य निक्रान्ता फणामार्शण सा नदौ | 
दश्रम्यामादितः क्ञाला दिवसेष्वपि सुप्रसु। 
पश्येत्‌ सम्पूजयेत्‌ ध्यायेत्‌ पिवेत्‌ लायाच् सब्वेदा ॥ 
गन्धेर्माच्येश्च नेवेयेधृपदौपेः सुशोभनैः । 
शरङ्गरागेश्च वि विधेव्तैः पुष्ये विंलेपनेः ॥ 
रक्रद्धओः कङ्रैश्च स्त्ौणामाभर रस्तथा । 
पालेमलेस्तया शाके्ेि त्राद्धणतपेणेः ॥ 
पूजनया विशेषेण वितस्ता - सिन्धमङ्गमे । 
महया वोत्सवः काय्येः पृज्याञ्च नरनन्तकाः ॥ 

भविय्पुराण- 
मासि भद्रपदे शक्ता दादश अ्रवणान्विता | 
महतो दादौ ज्ञेया उपवासे महाफला । 


, कत्यरनाकर्‌ः। ९८७ 


च्ररयिलाऽच्य॒तं भक्तया लभेत्‌ पुखं द शाब्दिकम्‌ । 
फलं ठानञ्चतानाञ्च तस्य लच्तशुणं भवेत्‌ ॥ 
विष्ण॒धर्न- 
यद्‌ा तु एएक्घदादण्यां नचचच ख्रवणा भवेत्‌ । 
तदा सा त्‌ महापुण्छा दादश विजया सता ॥ 
तस्यां खातः मव्वैतोयं क्नातो भवति मानवः 
ममयज्य वषेपरूजायाः सकलं फलमश्नुते ॥ 
एकजष्यात्‌ रहस्य जघ्रस्याप्नोति तत्फलम्‌ । 
स्नानं सदसरगुणितं तया वे विप्रभोजनम्‌ । 
हो मस्तचोपवासञ्च सहसूटाख्य फलो पमः ॥ 
नद्यापुराण- 
विजयद्वादगौँ प्राप्य पूजयेन्त्‌ जनादनम्‌ । 
मासो भाद्रपदः शएक्दादश्रौ खवणे बधः । 
प्रशस्तः सोदयः कालः सिंहशस्थो दिवाकरः, 
शिंहान्ततौयद्रेक्ताणः प्राटनदोख् सङ्गमः ॥ 
देकाणणेराशरेखतोयमागः । 
नाह्मणो बेदशन्यणः पाच हदयनन्दनः । 
जितन्त इति मन्त खधश्ापाल्निंतं घनम्‌ । 
युगपद्रादगेतानि दुलभानि सुरैरपि । 
दाद गात्मा इषौकेशो येषां दैवतमुच्यते ॥ 
सिंखिते तु मात्तेण्ड श्रवणएख्ये दिवाकरे । 
सवधा दादौ शक्ता न स्वाद्वाद्रपदादृते।॥ 


+ शेः 


छीव्यरलाकरः। 


खवुधा बुघवारसडिता । 


खुदुलेभा च सा पुण्छा विजया द्वादश्रौ शभा । 
्नु्रदाये मर्यं कदाचिद्छान्ने नित्यशः ॥ 
च्राकसिर्कौं तु तां ल्छा सव्वेसम्मारन्भृतः । 
एकादश्वामुपोययादो इादश्यां सुसमाद्ितः ॥ 
प्रयागादिषु तोर्यषु नदौनां सङ्गमेषु च। 

छला सखानन्तु विधिना इषौकेशं प्रपूजयेत्‌ ॥ 
जले खलेऽम्बरे मूर्ता कुम्भे वा कमलोपरि 
बह्णो विप्रे गवि शुसो पित््वैपि च मातरि ॥ 
आह्यासन-पुण्ाह-खागतैरथ विस्तरः । 


श्राह धावाइनं छत्रा । 


पाचाश्ये युष्य-धूपेश्च दौ पालङ्कार -चामरेः ॥ 
अङ्गरागेः सुगन्धश्च पयसा पायसेन च । 
भच्छेमल कलेः ्राकेमी सेः श्द्धेमनोरमेः ॥ 
मधुपक दधि चौरमधुभिः साक्तेस्िलः । 
~ ॐ € ९, प 
माचया च तचा लाजेमनोनज्ञेद गसम्भवेः ; 


माचा परिक्दो वादः । 


पविजेः पानके तनत्यः स्वाद्कैः 
स्तोचेरनेकैः पौराणेवदमन्ते सस्ते: ॥ 


सु संर्तेरध्ययनसछ्तेः । 


पौरषेणय सक्तन सूत्रैरनश्च ष्तः । 
इषोकेगं समनभ्यद्यं द दान्नलमयौख गाः ॥ 


छत्यरलाकरः 1 २९८ 


जलमयं; जलघेनूः । एकवचनान्तख्च पाठः पारिजातोय- 

इत्यससुद्चयादिपाठटविसम्बादादुपेचितः । 

यया ग्र्या च विप्रेभ्यः अद्भापूतेन रेतसा । 

मौवर्णोीः राजतौ तां रङ्गजां श्ण्योञ्च ताम्‌ ॥ 

श्रतमानान्त्‌ मरिकां जलपूं सुशोभनाम्‌ : 

तस्वान्तु जलपूर्णायां सवं राजतञ्च वा ॥ 

ताखरङ्गमयं पाच खएमयं वा सुशोभनम्‌ । 

सम्ब परमान्नेन दधि-सर्पिंगुडेसतया ॥ 

ग्रकंरा-चोर-मधृभिस्िल-चामो कराम्बृभिः । 

सेवितं मन्तपूतञ्च द द्यादाच्छछदनं शएभम्‌ ॥ 

जलें सवत्छान्तां, नवेन सदग्रेन च । 

सपविषेण श्द्धन वस््ेणदङ्छाद्य यनतः ॥ 

ङबेए च सुग्रुद्धेन सव्वमाक्ाद्य शास्त्रवित्‌ । 

वियच्रइतादो षाद्रचेद्नौमा वेद्युतात्‌ ॥ 

जितन्त इति मन्ल्ेण हषोकेश्र सरल्निह । 

ब्राह्यणन्यः परां अद्धामाभित्य सुसमाहितः ॥ 

द द्यादुपानदहौ तद्वत्‌ पादुके तदनन्तरम्‌ । 

रजतं गां तया श्ूमि सुवणं रत्नमेव वा ॥ 

दस्यश्वर ययानानि गरहारि श्यनानि च । 

आसनान्यथ भाण्डानि वस््राण्छाभरणनि च ॥ 





१ ^ 7 सपचान्तां । 
२ 4 वियच्वरछतान्‌ रौ षावरेद्धौमां श वैदयतान्‌ । 
३9 


| 


१, 


वक्रीत्यर्लाक्रर्‌ः , 


| अ | {~ १ क 
उद्धिश्य स्वांश्च पिदन्‌ पटकान्‌ माटकांस्तया । 


भार्य्या-मिज-गुरूणान्च ये केचित्‌ पितरञ्च तान्‌ ॥ 
गोच-नाम-खधाकारेः पिदयज्ञविधानवत्‌ । 
पिदणभ््खान्नमचय्यमिद मसिति सुञ्जपेत्‌ ॥ 
श्रथान्नदानाद्धगवान्‌ प्रौतौ भवति केश्वः । 
शड-चौर-छतवैसतेः प्रीतो भवति चन्रमा: ॥ 
जलदानात्त बरुणः सुप्रसन्नो भवेत्‌ सद्‌ा । 
रजतेन प्रदत्तेन प्रीतः स्याच्च मद्ेश्वरः ॥ 

सुवर्णन तु दतेन बद्किनित्यं प्रषौदति॥ 
दर्यश्वरययानेश्च मघवा श्राषनेस्तया । 
शरायनेरव॑श्यभिरममव्कचेणाकंश्च तुष्यति ॥ 

उपानद्यां चमो गोभिः सौरभेयः कपदिनः ¦ 
पादुकभ्वां प्रदत्ताग्थां पञ्मयोनिश् ठुव्यति ॥ 

श्रल ङरेस्तथा माच्येजंगन््ाता च पाव्वेतौ । 

दानं दोमो जपः पूजा तथा ब्राह्युएतपेएम्‌ ॥ 
नदौनां सङ्गसे स्नाने तया विप्रेषु दकि । 
सदखगशुणितं तच सव्वैमचयसुच्यते ॥ 

यः प्रौणाति इषोकेश्ं तच श्रद्धाखमन्ितः । 

स मव्वेलोकान्‌ जयति याति विष्णोः पदञ्च तत्‌ ॥ 
तारयेच्च पिन्‌ सर्व्वान्‌ दशपूर्वान्‌ द्‌ शावरान्‌ । 
तस्मिन काले तु सश्मापषे वितस्तां सिन्धुसङ्गताम्‌ ॥ 
सुश्ोतलेन पुण्न जलेनालोद्य सत्तिकाम्‌ । 


छ्त्यरनाकरः | २९२१ 


सुगर लचणोपेतां सङ्गमस्रानयुश्दाम्‌ । 
तामालभेत यन्नेन खानकाले सदेव हि ॥ 
मणिका मणिरिति प्रसिद्धो जलाधारविश्रषः । 
मणिका-पाचयोः गशत्वपेच्या सौवणैलादिविकन्यः । 
जितन्ते दूति मन्लेए- 
जितन्ते पुण्डरोकाच्च जितन्ते विश्वभावन ! । 
ममस्तेऽस्त॒ हषौके्र महा पुरुषपूव्पैन ! ॥ 
दुत्यनेन दषोकेशं स्मरन्‌- 
गो च-नाम-सखघाकारेः पिटयन्ञविधानवत्‌ । 
इत्यनेन श्राद्धान. पिचादौनां लभते, कपर्दिनः सौरभेयः 
शिवटषः । होम दृत्यग्रिमानुवादबलेन होमः पष्वेमनुपन्यस्तोऽपि 
्रस्यानन्तफलदः । ग्रतमानां श्रतसभ्मितां गतसख्यामित्य्यैः । 
द द्याज्जलमयोश् गा दति वचनात्‌ । 
लिङ्घपुराणए- 
अतः परन्तु स्वेदय गङ्गावरणसङ्गमम्‌ । 
श्रवणादाद शौयोगे बृधवारो चदा भवेत्‌ | 
तदा तस्मिन्‌ नरः साल सन्निहित्याफलं लभेत्‌ । 
श्राद्धं करोति यस्तन्न तस्मिन्‌ काले श्खिनि,। 
तारयिता विदन्‌ सर्व्वान्‌ विष्एलोकं म गच्छति ॥ 
मन्निदित्या नदौविशेषः । तसन्‌ गङ्गा-वरणानद्योः सङ्गे । 
विष्णधर््ोत्तरे- दाद ्ोमुपक्रम्य- 
गोदः प्रयाति गोलोकं भसि भाद्रपदे दिजाः। 


२९२ कत्यरन्नाकरः । 


तया भाद्रपदे मामि ख्वण्न तु मयता ॥ 
नरचयुक्राखेतासु तथा दानमुपोषितम्‌ ! 
सव्यं महाफलं ज्ञेयमनन्तं दिजसन्तमाः ॥ 
दत्यन्तेऽभिधानादच गोदानादिकमनन्तफलमित्यथेः । 
ब्रह्मपुराणे 
इन्द्रो भाद्रपदे मासि एएक्ञापक्त तु सव्वेदा। 
निमुक्तः मर्व्व॑शस्यानि त्रौहोखेव फलानि च ॥ 
्ओोषधो बेञ्रहस्तश्च ताडयेत्‌ पातयत्यपि । 
लद्भयात्तानि सर्वाणि बद्धंयन्त्यखिलं जगत्‌ ॥ 
तस्मात्‌ म त्न स॒नय्यः सभाच्श्च दिने दिने, 
सगणः सायुधञ्चेव सानुयात्ः सवाहनः ॥ 
पटभित्तिकृतो देवो राज्ञा प्रज्यो विग्रेषतः। 
भचेऽरन्नेः फलेम्‌ लेनेवेवंस्वेः सुधूपनेः | 
तसुदिश्याद्धयेदिप्रान्‌ तथा रङ्गो पज विनः ॥ 
दरक्तपके दिने दिनदत्यन्वयखितौ श्एक्तपक्त व्याष्यः 
प्रत्य परजा | 
श्िष्टास्तु- 
दरन्रोत्यानदिनादारभ्य विसज्जनं यावदिचदण्डादिनिर्ितं 
श्रचो जयन्तसहितमिन्रमच्ेयन्ति अवणाद्यपादे शकरोत्यापनं भरण्यां 
विसव्जनमिति वदन्ति । 
फलमिद्ानुवादिकं चओ्रोषधोपाकादि, गक्रमुदिश्य चाक्ख॑येत्‌ 


सस्मानयेत्‌ । 


क्रत्यरनाकरः | २८६द्‌ 


ज्योतिःशास्त्ते- 
दादश्थां भाद्रमाखस्य सिति प्ते विग्रोषतः | 
शक्रसुत्था पयेद्राजा शक्र-श्रवए-वासवेः ॥ 
विश्वे समुत्थितोऽश्चिन्यां वणे यमदेवते । 
वासवे छृत्तिकायान्त॒ निशि शक्रन्तु वामयेत्‌ ॥ 
इादशोन्त्‌ परित्यज्य तियावन्यच् कुच चित्‌ । 
शक्र उत्थापितो दन्ति राज-विग्र-रृषोबलान्‌ ॥ 
सौ रि-श्मिजयोर्वारे द्ूतके शतके तथा । 
भ्मिकन्यादिकोत्याते शक्रं नेव प्रवासयेत्‌ ॥ 
यूजामन्त्रः- 
एय हि सर्व्वामर सिद्ध साध्ये- 
रभिष्ुतो बज्चघरामरेश । 
ससु त्थितस्त्वं ्रवणद्यपादे 
ग्टहाण पूजां भगवन्‌ नमस्ते ॥ 
ठेरावनसमारूढ्ो बच्हस्तो महाबलः । 
शरतयनज्ञाधिपो देवस्तसे इन्द्राय ते नमः॥ 
बज्जहस्तः सुरारिघ्न वह्नेः पुरन्दरः 
रचां सव्वैलोकानां पूजेयं प्रतिगद्यताम्‌ ॥ 
दति इन्दरोत्यानद्ाद्शौ । 





२६४ कचद्यरनाकर.ः । 


श्रय जिष्टाचारपरिग्दोतानन्तन्रतम्‌ । 
सम्यजिते मन्द्रं त्‌ ष्वजाकारासु यष्टिषु । 
भाद्र श्टक्षचतुदश्यामनन्तं पूजयेद्धरिम्‌ ॥ 
श्रनन्तं द्भेमयं छता वारिधान्यां सखा पयेत्‌ । 
पूजाडेल कमन्तस्द॒- 
अनन्तससार महासमुद्र 
मग्नान्‌ समभ्युद्धर वासुदेव, 
अनननरूपे विनियो जयख 
रनन्तरूपाय नमो नमस्ते | 
अनन्कथामप्यच ब्रटएवन्ति । 
मन्छयुराणे- नारद उवाच- 
कथमधेप्रदानन्त्‌ कन्तैखं तस्य वे प्रभो । 
विधानं यद गरत्यस्य पूजने तददख मे ॥ 
दैश्वर उवाच | 
रतयूषसमये विद्वान्‌ कुर्य्यान्तस्योदये निशि । 
कान शक्ञतिलेस्तदत्‌ श्ररक्ञमाच्याम्नरो गौ ॥ 
स्थापयेदनण कुम्भ माद्यवस्लविश्वुषितम्‌ } 
पञ्चरन्नसमायुक्र टतपाचेण संयुतम्‌ ॥ 
नानाभच्छफलेयेक्तं ता्पाचसमन्वितम्‌ ॥ 
श्रङ्गटमा च पुरुषं तथेव 
खौ वणंमत्या यतवाहृदण्डम्‌ । 
चत्सुजं कुम्भ्ुखे निधाय 
धान्यानि सप्नान्बरसयुतानि ॥ 


छव्यर्न करः | २९४५ 


स कांस्यपाचाचतदूएक्रियुक्त 
मन्त्ेए दद्याद््िजपुङ्कवःय । 
उल्क लम्बोदर दौघबाड- 
मनन्यचता यमदिक्ुख्यः९ ॥ 
शताच्च दद्याद्यदि शक्रिरम्ति 
रोष्येः युरेहंमसु खों सवत्साम्‌ । 
धनुं नरः चौरबतीः प्रणम्य 
सवस्लघण्टाभरणणं दिजाय ॥ 
धनुं हेममुखोः सुवणषरटङ्गो मन्यत्त द्‌ शनात्‌ । 
श्रासप्तराचाद्‌ द येऽघंमस्य 
दातब्यसेतत्सफलः नरेण । 
यावत्समाः सप्त दग्रायवा ख॒- 
रथो द्धेमप्येव वदन्ति केचित्‌ ॥ 
काश्नपुष्यप्रतौकाश ! श्रग्निमारुलसम्भव ! । 
मि चावरुणयोः पुच ! कुभयोने ! नमोऽस्तु ते ॥ 
प्रत्यब्दञ्च फलत्यागमेवं कुर्क सौदति। 
होमं कलवा ततः पञादन्नेयेन्मानवः फलम्‌ ॥ 
अचागस््याघेदानमन्तः- 
काग्रपुष्यप्रतोकागश्र श्रग्निमारुतसम्भव । 
दत्यादिरेव बोद्धव्यो मन्त्रान्तरानुपदेश्ात्‌ । गन्धादिकञ्च ॐ 
अगस्याय नम दत्यनेन द्‌ातव्यम्‌ । सामान्यप्राप्तलात्‌ विगेषातुप- 





१ ए -दिद्॒ख्ठः सन्‌ ९ म्रूले--सकललं | 


२९६ चछव्यरलाकरुः । 


देगाच्च। श्रधेदानन्तु सतो यश्ङ्खेन सितपुव्याचतेः कायै नरह ` 
पुराणे- ्रगस्याघं एव तथयाकथनात्‌ । मफलमिति पाठे तु 
तेवं फलान्वयः । 
भक्तप्विस्वाचतरैः पुष्येदं धिदूर््वाढुगेसिलेः ` 
सामान्यः सव्वेदेवानामर्घोऽयं परिकीर्तितः । 
द्रति देषौपुराणएवाक्यादेमिद्रंयेरघेदानं तस्य संवत्सरमण्डल- 
बलिहरण एव तदहेवानामेव कथितलात्‌ । 
अरच- 
बौजपूर नारिकेलं रम्भां जातोफल तथा । 
खल्जुर-चूत-द्‌ाङडग्यः फलान्येतानि वन्लेयेत्‌ ॥ 
दति शष्टवाक्यात्‌ प्रतिवषं क्रमेण फलत्याग दूति | 
चरनेन विधिना यस्तु पुमानघं निवेदयेत्‌ । 
दद्रलोकमवा्नोति शूपारोग्यसमन्ितः॥ 
पञ्चरन-सप्तधान्यानि परिभाषायामनुसन्धेयानि यमदि्मुखस् 
दति खष्वेच कमपि कुमभस्छापनादौ प्रयो गाङ्गकन्त घश्मल्ात्‌ , 
सप्तैव लोकानाप्नोति सपर्यान्‌ यः प्रयच्छति । 
यावदायुश्च यः करुय्थांत्‌ पर ब्रह्याधिगच्छति ॥ 
दरति पठति श्टणोति वा य एतत्‌ 
'वसुयुगलप्रभवस्य सम्प्रदानम्‌ |. 
सदपि च ददाति सोऽपि विष्णो- 
भेवरनगतः परिप्ज्यते नरोौधेः ॥ 


नतत ०० 





[1111 





१ 7 रक्त-- गन्ध-- ९ } युगल्लसुनिप्रभवाषे-- | 


छ्यस्नलाकरः। ८७ 


प्रन चैवं क्मः- प्रथमं ययोक्तन्लारं ययोक्तङकरुमभस्थापन 
यथोक्तसौ वणेपुरूषस्थापनञ्च ततोऽगस्पूजाऽघेदानच्च महाव्या इति - 
भिराच्यदयोमः खथमाचाय्यैदारा वा, ततः फलत्यागः मौवणे- 
पुरुषद्‌ानं मम्पन्तौ घेनुदानञ् श्रासप्तराच्रादेवमयमयेः | 
यस्सिन्नगकेऽगस्योदयः तस्मात्‌ परश्तो चः सप्नमोंऽशरम्ततः 
प्रागर्घ्यो दातव्य इति। 
श्रगस््योदयास्तमयो च प्रति नद्धपुराणम्‌- 
रगो द चिलामाशामाश्चित्य नभसि खितः । ` 
वरुणस्यात्मजो योगौ विन्ध्यपाद विमदनः ॥ 
कन्याभ्यः पञिमेग्यः षडभ्यः प्रारभ्य सुख्यया ' 
दरान्‌ द्वाविंशतिं यावत्‌ भुक्ते खर्ये्ठ॒ रागिषु ॥ 
दासप्ततिमिति कल्पतरौ पाठः | 
उदेति तावद्धगवानगस्यो व्योज्ि तौयभुक 
खक्ांगरभ्यः पञ्चमेभ्यः षड्भ्यः प्रारभ्य पूर्ववत्‌ ॥ 
षड्‌ चिंशतन्त्‌ यावच्च भुक्त भातुयेथाक्रमम्‌ ! 
तावच्छ्रान्तश्ठ पाताल प्रथात्यस्तसुपेति च ॥ 
तथा तदेव 
छतो पवासः सग्यश्येदगस्यमुदितं सुनिम्‌ । 
सव्वैकामप्रदं पुण्छं सव्वेका प्रबद्ध नम्‌ । 
स्रवतः स च भगवान्‌ श्रद्धाभक्रिसमन्विनेः। 
पूणङुम्भैः सक्द्माण्डे येवे घन्ि तेन च ॥ 


१९ 1) अ्चिंतव्यख भगवान्‌ । 
डे ट 


२९८ क्त्यरल्नाकरः | 


जातौ पद्मोत्पलेः एएभरेशचन्दनेन सितेन च । 

श ८ (> मि ५, 
गव्ये तेस्तया वस्ले रने: सागरषस्मवेः। 
उपानच्छच्दण्डेख पाद्‌ काञ्जन वस्वलः ॥ 

न~ ~ १ ग, 3 
रिणा परमान्नेन फलः पुष्येख शोभनः 
> £ => र £ ॐ 
श्रन्यप्रकार भच्येख होमव्राद्यणत परः ॥ 
आग्रास्य च इएभ कामसुदिश्च च मनोगतम्‌ । 
यद्यदं प्राघ्रुयां कामं भगवन्‌ मनकषेश्पितम्‌ 1 
लत्मसादाद्‌ विघ्नेन ततस्तां पूजयाम्यहम्‌ ॥ 
त्युक्ता पूजयेत्‌ पञ्चादे वन्ञांश्च रूथ । 
ब्रह्मणन्‌ भोजयित्वा तु ततो सुच्धौत वाग्यतः ॥ 
नरभिदपुराण- 
यदागस्योदये प्राप्ते? तदा स्तु राविषु । 
श्रगस्ाय दद्‌ात्य्चे नला पुष्ट विद्ये ॥ 
शङ्ख तोयं विनिःकप्य सितयुष्याच्तेतम्‌ । 
मन्लेणानेन वे दद्यात्‌ श्वेतयुष्यसमच्ितम्‌ ॥ 
कागशपुष्यप्रतीक्राश्र भरयिमारुतसम्भव। 
भिचावरुण्योः पुच करम्भयोने नमोऽसते ॥ 
अनेनाचं दला पठेत्‌ । 

'च्रातापो भक्तो यैन वातापौ च महासुरः । 
समुद्रः शोषितो येन स सेऽगस्तयः प्रसोदत्‌ ॥ 


मिमान मा ७ ००७५ =-= सीप 111 कक 





१ मूले ख्ातापिः-वातापिश्च-- । 


कल्यस्ल्नाकरः | २६८६ 


एवन्त्‌ यो दद्‌ात्यघेमगसयाय महामुने । 
सव्वेपापविनिसुक्तः मव्य तरति दुगेततिम्‌ ॥ 
कन्यां ग्रकप्राचोनषड्ष्टकादिश्वतां ्रकादारभ्य दाविश्रतिमंगश्कान्‌ 
यावदगस््यो दयस्तच प्रथमोदयदिनादारभ्य मप्तदिनाभ्यन्तरेक- 
दिवसेऽगसत्याघं श्राचारात्‌ । एवञ्चोद्यप्रतिपाद कन्नद्यपएुराणएस्यःप्य- 
मेवाथेः। अतः- 
च्रप्राप्रे भास्करे कन्यां सचिभागे स्िभिदिनेः। 
दत्यादिवाक्यं वच्योतिःशास््लौयमनादेयं चश्चेशास्रस्य ततो 
बलवतात्‌ ब्रह्मपुराणथेपरलेनेवानेतव्यं यथायथं कल्पचयच्चेतत्‌ 
फलान्यपि भिन्नान्येव 
एवञ्च -- 
कन्यामनागते सूयं अर्घो वे सप्तमाददिनात्‌ । 
कन्यायां समनुप्राप्रे सुैऽधेः सन्िवन्तेते ॥ 
दति सखागमदयं खरसमेव मन््ान्तरञ्च वेदिक धम्बेशासत्र- 
रनिवन्पृव्यासेन पौराणिकं मन्त्रमच् लिखताः सामान्याधिका- 
रिकमधें कथययताऽनादृतमिति सब्बैवणंसाधारण एव पौराणिक- 
मन्लान्य दूति। 
कामधेनौ त्‌ नरिंहपुराणएलिखनं मूले तद्शनेनेवा दतम्‌ । 
विष्णः- 
मरौष्टपद्यां तचुक्रायां गोदानेन सव्व॑पापविनिमुक्नो भवति । 


[1 क 
~ ------~----- ^ > ० ० 
"~~~ ---~ --~-- ~ ~~ नानाम ०००१. 


१ 7 निवन्धे। २ ^ लिखितम्‌ | 


द © © क्रव्यरनलनक्र्‌ः | 


तद्यक्तायां पूव्वभाद्रपरोत्तरभाद्रपदयोरन्यतरनच्चयुक्तायाम्‌ 
दानसागर पारिजातावष्येवम्‌ ! 
ब्रह्मपुराणे 
पूव्व॑भाद्पदायोगे पौणमास्यां पितामहः । 
श्क्रा्चि-यम-जालम्भो-वायु-विन्तेश्र-श्ङरान्‌ ॥ 
लोकपालांस्तु रचा चेलो क्यस्याभ्यसेचयेत । 
एयथिव्या धारणार्थाय तथानन्तञ्च भोशिनम्‌ । 
जात्‌ राचः । 
~ * £ 
तस्मान्तच लिखत्‌ पद्ममष्टपचं शकणिकम्‌ । 
क णिकायां लिखेत्तच सानन्तं कमलो जवम्‌ ॥ 
प्राच्यादिषु च पन्ेषु वासवाद्यांख्च सायुधान्‌ 
ग्रहान्‌ नागान्‌ करेणेव यथार्ूपान्‌ समाल्खित्‌ ॥ 
ततः क्रमेण तेनेव खापयेत्‌ कलसान्‌ शुभान्‌ 
पश्चात्‌ सन्यूननौयास्ते भका ब्रह्मादयः सराः ॥ 
शरष्येपाद्यादिभिः सम्यक्‌ धूपमा्यानुलेषनेः ¦, ` 
# १ € = € = २ ¢ & "२, 
वस्त्रः सव्वेफलभच्छ दाम त्राह्मएतपेणेः ॥ 
मनोज्ञः सगुडः चोरः स्व॑ प्रस्यसमुद्धवेः । 
~ ९ गँ ४ ५ ट € कन 
नृत्यरगो तेस्तया वाद्यैः सव्वकामायेसिद्धये । 
विप्रेभ्यश्च बन्धुभ्यो घाना देवाश्च शस्वत्‌ । 
बौ धानाः खयं भच्छाः संयमस्र्वितेकिभिः ॥ 
धाना ष्ट्वा बङ्कुरिति' प्रसिद्धः| 


मी 
0 "न न भक 


१ 7) बत्तु: 


्लत्यरलाकरः | ३०९ 


दुर्गाधिकारे देवौपुराण- 

ग्रो षठपद्यां प्रकर्तव्या पूजा जागरणं निशि । 

महोक्वविघानेन मौचामणिफलं लभेत्‌ ॥ 
विष्णुधर्मोत्तरे 

गो दानच्च ग्रौषटपदे पौणमास्यां महाफलम्‌ । 
महा फल मित्यस्यान्यत्रोक्तदानफला तिरि क्र फलदा यक मित्ययेः ; 
मच्छपुराण- 

यचा धिरत्य गायचौँ वण्डेते धमरे विस्तरः । 

टृ्लासुरवधो पेतं तद्भागवतमुच्यते । 

लिखित्वा तच्च यो दद्याद्धेमसिंहसमन्वितम्‌ । 

पौणमास्यां प्रौष्ठपद्यां स याति परमं पदम्‌ ॥ 


महासान्विविग्रहिकटक्करग्रौवो रेशरात्मज महाखास्धिविग्रहिक- 
ठङर-भ्रौचण्डेश्वर विर चिते हत्यरन्नाकरे भाद्रतरङ्गः ॥ 


था श्चिनङत्यम्‌ | 
भविच्यपुराण- सुमन्तुरुवाच-- 
ओमानाश्वयुजे मासि यः कुर््यान्क्रभोजनम्‌ । 
श्रता श्ननञ्च भुच्ानो जितक्रोधो जितेन्द्रियः ॥ 
दद्याद्वा पदवर्णाभां भानोरमिततेजसः। 
दि याभरणएसम्पन्नां तरुणेद्च पयखिनोम्‌ ॥ 


१९ 13 मिताशनम्‌ । 


०९ 


छत्यसर्नाकर्‌ः | 


एुच्छमो क्तिकसङ्कागेरिद्नोलो पश्ोभितेः ` 
जोवश्मौ वकसंयुक्तेविमानेः साव्वैकाभिकैः । 
गच्छद्धानुखलो कल्यं तेजसा रविसन्निभः । 
कान्त्या विधुखमो राजन्‌ प्रभयाऽण्डजसन्निभः ॥ 


अच सप्तमो दयव्यतिरिक्रयावद्‌ाश्विनदिवसे नक्रभोजनं मत्य- 


चादिं गोधूमगोरसल्लानं पच्योः सप््युपवासः चिसन्ध्यं शण्डि- 
लेयसहितभान्वचेनमघःग्रयनं सब्वेभो गवज्जनञ्च॒पूव्ववत्‌ लगति । 


त प्रधानमग्रनं ठताग्नन दद्याद्वा माषान्ते, अण्डज श्रादित्यः | 


= 
तन्नव- 


राजन्नाश्वयुजे मासि यः ज्ु्ययान्नक्रभोजनम्‌ । 
शङ्दनन्त्‌ सुञ्जानो जितात्मा संयतेन्द्रियः ॥ 
उपवासपरो श्वतला नवम्यां पक्योदंयोः | 
माहेश्वरो पूजयेत छता रुक्रममयों एमाम्‌ ॥ 
टृषभञ्च तया बौर श्रेतपुष्यो पलेपनेः। 

धूपेन च महाङ्गन खण्डखाद्यादि भोजनः ॥ 
अ्रजानां मह्िषाणद्च सगाणाञ्च तया बघात्‌ | 
मरौ णयेदि चिवद्रेगेः मांसशोणिततरप्पणेः ॥ 
कुमारोर्भोजयेद्धत्ण ब्राह्मण्णन्‌ योषितस्तथा । 
भच्छभोच्येर नेकैश्च मांसे विधेनु प ॥ 
पजयिला तु तां दुगा विल्वपत्रैः खद्रोएजैः । 
विस्वपच्राश्ननात्‌ प्रूतस्ततो सुच्नौत वाग्यतः ॥ 
एवं सम्यूजचिला तु भका माहेश्वरी नृप । 


क्रत्यरल्ाकरः) र०द्‌ 


श्रश्वसेधमद्दरूस्य फलं प्राप्य दिवं व्रजेत्‌ ॥ 
दिजाङ्प्रभया तुख्यः कान्त्या पुष्पायुधस्य च । 
पुष्यक यानमारूढो मोदते शश्वतौः समाः । 
महाङ्गो धूपः परिभाषायासुक्रः, दिजाङ्खन््रमाः । 
्ञख्िनप्रकरणे ब्रह्धापुराणे- 
प्रएज्ञपच्वे नव धान्यं पक्त ज्ञाता सुश्रोभनम्‌ , 
सुतिथौ च सुनच्चचे सुमुहन्तं सुश्रोभने ! 
गच्छत्‌ रेचो विधानेन गौतवाद्यपुरःमरः। 
तच वद्धिं च प्रज्वा वान्ये: सस्तौय्यै शरास््रवत्‌ ॥ 
शास््रवदिति खग्टद्योक्रविधिना । 
छवा होम तनतःप्खाननयेद्धान्यञ्च भ्दषितम्‌ । 
युष्येवस्तेः पफलेगेलेदेस्ष्ठरय गस्ितम्‌ ॥ 
तेन देवान्‌ पिद्धन्‌ बन्धरम्तपंयिला यथाक्रमम्‌ । 
विभन्याश्च यथाग््या देवजनाः शष्यर चिणः ॥ 
नववस्तराटृतः सग्बौ अनुलिप्तः खलङ्कतः , 
भ्थितः पूव्वेसुखस्तुष्ठो बरद्धघोषपुरःसरः ॥ 
प्रएवन वाद्यरव तुष्टो मङ्गलालभनान्वितःः | 
पराञ्नोयाद्‌धिसयुक्ं नवं विप्राभिमन्तितम्‌ ॥ 
कतादारख कुरूते गो तवादे म॑द्ोत्सवम्‌ , 
चोरोदसागरात्‌ पूव्वं मथ्यमानात्‌ पुरातनात्‌ ॥ 
श्वामा देवो समुत्पन्ना सम्वेलच्चणसंयुता । 


णय न८००० 


९ ^+ 8 कें विधानेन त्य -- । २ 1-- अालननादन्‌ | 





०8 छ्ल्यर्नाक्ररः। 


नारायणान्या सा च सुङ्घमारा यश्रश्िनो ॥ 
मतोदे समुद्धता सला परमशोभना । 
तां दृष्टा चकितास्तच ततः सव्वं सुरासुराः । 
मनोज्ञा सुमुख केषा इन्त द्रच्य्ामदडहे वयम्‌ ॥ 
एवमुक्ता वचस्ताञ्च ददृश्डः खष्वं एव ते। 
चक्र्नाम च तस्यास्ते द्रारुति भुवि विश्रुतम्‌ ॥ 
अतोऽयं सा सुपक्ता च पूजितव्या प्रयत्नतः । 
युष्यधूपान्नभच्छादेस्तथा ब्राह्मणतपेेः ॥ 
दो बालौ रच तथा रद्ध सम्पच्यो तदनन्तरम्‌ , 
धमाथकाममो स्मुदिश्य इटौरके ॥ 
स्तौ महायेन कृष्णेन (?) श्वत्य-मितसुतेः सडह । 
्रनुल्लिपेन विधिवत्‌ सग्विना च सुवाखमा ॥ 
निवेदिता ुरुभ्यञ्च खच भक्तया न चान्यथा । 
उत्छवश्वा पि कन्तैव्यो गोतनुत्यसभाक्रुलः ॥ | 

दति नवान्नद्राच्चाभरुणविधिः । 


1 ११ 


देवोपुराण- 
एकाहमपि ये भक्या कन्धार दिवाकरे । 
पूजयिला भिवाचक्र दौोपान्‌ मम्बोधयन्ति च ॥ 
शिवातरक्र दुमाषमू दः, सम्बोधनमुदौपनम्‌, एतदेवाच प्रधानम्‌ । 
ते लभन्ते श्रुभान्‌ लोकानायुरारोग्यसम्पदः । 








९ 7) केषाम्‌ | 


च्रल्यरन्करः | २०५४. 


सन्ध्याकाले तु सम्प्रप्रे पूजयिता तु मातरम्‌ ॥ 

ये ददन्ति छतेर्दोपानुत्करं पललावितम्‌ । 

न तेषां दुरित किंञ्चिदिद्यते सुनिसत्तम ॥ 
उत्कर भक्र, पललं मांमम्‌ 

रुद्रो ब्रह्मा तथा ईशः स्कन्दो विष्णयेमो हरिः । 

परे च विघ्रसद्िताः स््लोरूपाः मन्त सुखिताः ॥ 
परे स्यादयः, विघ्नो विनायकः) 

माहं पूजनादिप्र! सव्व देवाश्च पूजिताः । 

निष्कल सकलं वाथ एकं पञ्चकमेव वा॥ 

पूजयेत्तत्र कन्याखे चणएं पूजां न लङ्गयेत्‌ । 
निष्कलं चन्द्रकल्लाशून्यतियिरमावस्या, सकलम्‌ पूर्णिमा कन्याखे 

स्यं चणं पूजां न लङयेदवित्यसय चणमपि पूजां क्या दित्यथेः । 

तया- 

षृएसयों प्रतिमां छत्वा विवे वा यस्तु पूजयेत्‌ । 

अत्म विन्तानुषारेण स लभेन्मौ लिकं फलम्‌ ॥ 

मौ लिकं साच्षाद्धगवतौ प्रजाजन्यम्‌ । 

एकं वा यदिवा दैर्वौँ देवं वा वल्वकोकरम्‌ । 
वल्वको वोणा दें महादेवम्‌ । 

गजाननयुतं पूज्य सुन्वेकामफलप्रदम्‌ ॥ 

ब्रह्माण वेष्णवोः वापि कौमारी शक्रवन्दिताम्‌ । 

पूजयेद्यः ख श्राप्नोति दै ्ठितं फलमुत्तमम्‌ ॥ 


टरषारूढां महादेवो चिनेचां शएलधारिणोम्‌ । 
३९ 


क्रव्यर लाकर: | 


पूजयेद्यः म श्राप्नोति यद्यन्मनसि स्ख्ितम्‌ ॥ 
तया प्रसङ्गात्‌- 
चन्दनागुरुकपूरनखं धूपे वरं खतम्‌ । 
नखं सुगस्िद्रयविगश्रेषः- नखोति याख्यातम्‌ । 
मधुकपूरकाशौर रोचना च चतुष्टयम्‌ । 
एतेन लेपयेदेवौ सब्वेका मा नवाभ्नयात्‌ ॥ 
जातौ कल्लोलपचैला कुष्ठ -कुद्मपचिकाः । 
जातौ फललताः ख्याताः स्ानगन्धाः सदा वराः॥ 
नागकेशर कप्ररं सुरा मांसो सवाल्िका। । 
सुरा मोर्डष्व दूति प्रसिद्धा बालिका वार इति प्रमिद्धः 
उदन्तेने समाख्याता मादरणां स्वेतः प्रियाः ॥ 
मणिमौ क्रिकमालाश्च वितानञ्च दुकूलजम्‌ । 
घण्टादि स्वेदा दत्वा हेमपुष्यफलं लभेत्‌ ॥ 
ुण्यैररण्स्भूतः प्चेवां गिरिसम्भवैः 
अपय्यैषित-निष्डिटरेः प्रो षितेजेन्तुवच्छिंतेः । 
च्रात्मारामोद्वेर्वापि पुष्येः सम्यूजयेच्छिवाम्‌ । 
पुष्यजाति विगरेषेण भवेत्पुण्यं विशेषतः ॥ 
तपःष्लगुणोपेते पाचे वेदस्य पारगे, 
दश सुवणन दल्ला च यत्‌ फलं कुसुमेषु तत्‌ ॥ 
मादणाञ्च सछद्ला लभते नृपसत्तम । 
तस्मात्‌ पुष्पाणि वच्छामि पचाणि सुरमणि च॥ 


१९ 1 भोखतर। 


छत्यरलाकरः । ३०७ 


केतक चातिसुक्रञ्च बन्धक बङलान्यपि । 
कदम्बः किकारस्त॒ िन्वारः सष्छदये । 
पुन्नागचम्पकेसेव यूथिका वक-मल्िका । 
त गरान्जुनमल्लो च हतो शतपतिका ॥ 
सुरसा शव्वेरौ भद्रा सुरभो नवमल्लिका । 
दमनो मरूपचञ्च प्रतघधा युण्यदद्धये ॥ 
कदम्बेरचयेद्राचौ मल्िका उभयोः प्रभा । 
दिवाशरेषाणि पुष्याणि यथालाभेन पूजयेत्‌ ॥ 
केशकटापविद्धानि भौणेपच्यषितानि च। 
स्रखंपतितपुष्याणि त्यजेदुपहतानि च ॥ 
मुकुलेर्नादधेदेवो मपक्तः न निवेदयेत्‌ । 
फल क्रथितविद्भञ्च कालापक्रमपि त्यजेत्‌ ॥ 
विष्णः- ्राश्िनं सकलं मासं त्राद्यणेभ्यः प्रत्यहं छतं प्रदाया- 
शिनौ प्रणयिता रूपभाग्मवति । 
श्रचेव यमः- 
ठतमाश्वयुजे मासि नित्य दद्याद्िजातये। 
प्रौणयिलाश्चिनौ देवौ रूपभागमिजायते ॥ 
्राञ्चिनानुवृत्तौ विष्णः- 
तस्मिन्नेव मासि गोरसे्ाह्मणान्‌ भोजयिला ्रारोग्यभाग्मवत्ति । 
सन्द एराण- 
योऽपि चाश्वयुजं मासमेकभक्तेन तिष्ठति, 


1 नि 
१ 4 7 कणमल्िका,। 


इ ०८ क्रद्यरनलक्ररः। 


वाणिज्यं लभते तस्य कषिः पद्रूगणस्तया ॥# 
महाभारते- 

तचेवाश्चयजे मासमेकभक्तेन य. क्िपेत्‌ । 

स्जावान्‌ वाहनाच्छीश्च बह्कपुचश्च जायते । 
गजा एएद्भिः ' 
भविषे- 

कलवा चाश्वयुजे मासि विपुलं चान्यपव्वेतम्‌ । 

सुवणेवस््रगन्धाच्छं दय्येस्याये निवेदयेत्‌ ॥ 

सु विचिचे्महायानेवेरभोगसमन्ितेः । 

बषैको टि सहस्राणि द्य्यलोके महौयते ॥ 

श्रस्मिन्‌ लोके पुनःप्राप्ता राजानं बिन्दते पतिम्‌ ॥ 

श्रच चेकभक्तादि काल्तिकवद्ोद्धव्म्‌ । 
वामनपुराणे- 

तिलास्तुरङ्गवृषभं दधिताब्रायष्ादिकम्‌ | 

्रोत्ययं पद्मनाभस्य देवमाश्रयुजे नरः ॥ 

्रादिपदेन विद्यमानाभौष्टश्टचिद्रव्यपरिग्रहः। 

देवौषुराणए- 

एताभिषेकं यः कर्य्या होरा नराधिप!) 

खच्माधारेण भाण्डेन भवगत्या तरिचक्रः ॥ 

मासि चाश्वयुजे वौर सब्वैपापेः प्रमुच्यते ॥ 
विष्णुधर्माचरे- 

प्राशने छतद्‌ानेन रूपवानभिजायति । 


क्रत्यरन्नाकरः । २०८ 


ग्रहणसु पक्रम्य देवोपुराणे- 
श्राश्धिने सरयूः ओष्ठा खानदानादिक्श्मणि ) 

नन्डिपुराण- 
अयवाश्रयुजं मासं व्नेयेन्म घभक्तएम्‌ । 
मासषड्भकृतं पुण्यं लमेताश्चयुजे नरः ॥ 

मासषट्ा वच्छिन्न मां सवन्जनंनजन्यपुष्ं लभते इत्यथः । 

न्रद्यपुराणे - 
छष्णा शयुकूटतौोयायां पूल्वेन्त॒ बरुणो दसत्‌ । 
तसात्‌ ख तच समयच्यो यथा विभव विस्तर; ॥ 
स चक्तः ग्रह््पश्नौ तु निधौ लेभे घनेश्वरः। 
चतुश्यां तेन तचासौ सन्यञ्यो ब्ाह्मणालुगः । 
पञ्चम्यां वसुधा देवौ पातालादुद्ूता पुरा ॥ 
वराहेणाय सा तच पन्या दिङनागसंच॒ता । 
षष्ठयां कुमाराः सन्ताः पौराणाः केविदेव इहि । 
तानुद्दिश्य कुमारास्छ॒ पुचाः पृ्याः खलङ्कताः ॥ 
मप्तम्यामभिमानस्तु खर्वौँययांल्नितवान्‌ जगत्‌ । 
तसुददिश्यात्मनः प्रजा कार्य्या स्तोबालकेषु च ॥ 
च्रशोका योगिनौ सिद्धा कृष्णाष्टम्यां पुरा यदा । 
तदा सा त्र सम्यज्या योगनिद्रा त्‌ वेष्एवौ ॥ 
विग्रेषेण हंतसतानेः सुवस्तेश्च खलदुतिः । 
सिन्दुरकद्‌ माजेपेः नृत्यवाद्युरःमरेः ॥ 


णा न = ~ 


१ 4 8 सं यक्तेशः | 


३९० छत्यरल्नाकरः । 


श्त्या ग्रय्यासने तस्ये निवेद्य मोत्तरकदे । 
ुष्यान्नरस्लधृषन्तु त्रौ डितव्यञ्च न्वेटा ॥ 
गडाज्यमरोचोपेत यवान्नं भच्चयेत्ततः ॥ 
ब्रह्मणनुगो ब्राह्मणलुयायौ, दिङ्नागा दिशां नागा 
ेरावतादयः, भिन्दुरकदमालेपेजेलालोडितसिन्दूरलेपेः । सोत्तर- 
कदे सोपरिवसने पुष्यान्न-वम्त्-धृपन्तृ निवेद्यभिति वचनपरि- 
णामेनान्वयः | 
भविव्यपुराणे- विष्णरुदाच-- 
कन्याङ्गते खषवितरि छष्णएपचेऽष्टमो च या । 
खा च युष्या पापद्रा शिवस्यानन्दबद्धिनौ ॥ 
सानं दानं जपो होमः पिदढदेवामिपूजनम्‌ । 
सव्वं प्रोतिकरं स्याद्र प्रौते तस्मिन्‌ चिल्लोचने ॥ 
अष्टकाश्रा मष्यच । 
देवौपुरार- ग्रक्र उवाच । 
येनो पायेन रुव्वंषां देवौ सब्वेफल प्रदा । 
तर्‌ इ श्रोतुमिच्छामि नवम्यामाभितं फलम्‌ ॥ 
ब्रह्मोवाच 
श्राश्चिने वाऽय माघे वा चैचे वा श्रावेऽपि वा। 
छष्णादारभ्य कन्तेव्यं व्रतं श्क्तावधि इरे ! ॥ 
छष्णएपच्तः श्क्तपच्मवधि यावत्‌, इरे दन्द्र। एतच्ोक्र- 
सामान्यतम(?) मासेषु वच्छमाणप्रकारेण कष्णाष्टमोमारभ्य श्एक्ता- 
एमे यावत्‌ कत्तेव्यम्‌ । | 


कछत्यरल्ाकरः | ३९१ 


आश्धिनोमष्टमोः छष्णामे कभक्तन कारयेत्‌ | 
मङ्गलारूपिणौः देवोमयवा रुरुघातिनोम्‌ ॥ 
पूजयेन्नवभेरेन गन्धमाद्यनिवेदनेः । 
कन्यका भोजयेचत्स देवोभक्तांश्च मानवान्‌ ॥ 
नक्तन नवमो कार्य्या श्रयाचौ दशमो ङिपेत्‌। 
एकाद भौसुपवसेत्‌ पुनरेष विधिभवेत्‌ ॥ 
पुनरेष विधिरिति यथा कष्णाष्टम्यादिदिनचतुष्टयमेक- 
भक्तनक्ताया चितो पवासेरेवमपरमपि दिनचठुष्क्रयं नेतव्यमित्यथेः ; 
तेन चतुष्कचतुष्वेण जतभिद शभ्पद्यत इति । 
यावच्छज्ञाष्टमो शक्र उपोष्या तु विधानतः। 
विधानत दत्यनेनान्यचोक्रोपवासयुणानुवादः। 
दानं होमो जपः प्रजा कन्याभोच्यन्तु प्रत्यहम्‌ ॥ 
कन्तैव्ये जितरोषेण देव्या भक्निरतेन च । 
नवधा पश्रटुघातन्त्‌ मदिषादि श्रजाविकम्‌ ॥ 
कन्तंव्ये श्तवेताल्े नचेवात्मचिकौष॑या । 
कन्या अलङ्ता स्तद द्विजा देवोपरायणणः ॥ 
नवधा नवप्रकारेण शतवेताल्े श्तवेतालाये नचेवात्मचिकौ- 
षेया नात्मोपभोगविकौषेया श्रलद्ःताः कन्तेव्या इत्यन्वयः । दिजः 
दृत्यत्नापि तयेवान्वयः । 
नटमन्तेन प्रेचचणएकं रययाचा प्रजागरम्‌ । 
दानं देयं सदा भक्या सव्वघामपि शक्तितः ॥ 
महाभेरवदूपेण य न्थिमालाधराश्च ये । 


३१२ छत्यरनाकरः । 


पूजनोया विश्षेण वम्तशोभा पुरादिषु ॥ 
कर्त्या सिद्धिकामायंप्रापणाय सुरोत्तम । 
अनेन विधिना शक्र यथेष्टं लभते फलम्‌ ॥ 
मङ्गला भेरवौ दुर्गां वाराहौ चिद्शश्वरौ) 
उमा हैमवतो कन्या कपालो कैटमेश्वरौ । 
कालौ ब्राद्मौ महेशो च कोमारौ मधुखदनौ । 
वाराहौ वासवो शर्व्वां नामान्टेतानि वै जपेत्‌ ॥ 
धूजयेद्धोजयेत्‌ कन्याः शास्त्रदृष्टेन कम्मण । 
वस््रालङ्ारकण्ठटादिकरकाः करिद्चनकाः ॥ 
दातवयाश्चात्मनः शत्या देवया भक्रैः सुखा्धिंभिः। 
श्रयवा नवराचन्त्‌ सत्तपञ्चचिकनेऽपि वा ॥ 
अथवेति विकल्पः पूजयेदित्यादिना मन्पद्यते । 
तेन- 
प्रत्यहं भोजयेत्‌ कन्याः शश्वदृष्टेन कम्मण । 
वस््ालङ्खार कण्टादिकटकाः कटिद्का द्‌ातब्याः । 
श्रयवा नव-पञ्च-सप्त-चिदिवसेषु शक्यपेच्या- 
एकभक्तेन नक्नन तथेवायाचितेन च, 
पयेत्‌ स पुमान्‌ शक्र यावच्छक्ञा तु चरष्टमो ॥ 
पूजयेन्मङ्गलां तच मण्डले विधिवत्‌ सद्‌ा ॥ 
मङ्गलां रुरुघातिनों चत्यपि द्रष्टव्ये तथेव प्रक्रमात्‌ । 
सम्वेसम्भारसभ्यन्ने सब्वैविधिविधायके । 
सव्वेकामप्रदे शक्र सव्वेकामानवाप्रयात्‌ ॥ 


क्रत्यरल्लाकरः । ३९२ 


अथेकामस्ायदन्तु राज्यकामस्य राज्यदम्‌ । 
्रारोग्ययुचद्‌ वत्छ मदापातकनाश्रनम्‌ ॥ 
सव्वेवरणेश्च कर्तव्य पु-स्तो-वाल-नपुसक्ः । 
नाधयो व्याधयस्तस्य न च गशचुभयं भवेत्‌ ॥ 
सङ्गरेष्वजितो जित्य महानेकोऽपि जायते । 
अवणात्‌ सव्वेकार्य्याणि सिध्यन्ति नाच संगरः ॥ 
एतच्च ब्रते नवमोमाजितं फलमिति प्रकरे दर्ेनात्‌ रपाल 
हत्य समुद्धये नवमोत्रतमित्युपसंहतम्‌ । 
अष्टमोमाश्िनों छष्णामिति जतो पक्रमे दग्ेनादष्टमोज्रतमिति 
कल्पतरावुपख्डतम्‌ । देवोपुराणे तु चरष्टमोनवमोौत्रतमितयुक्तम्‌ । 
बस्तुतस्तु-- 
शर्टम्यादि क्ञाष्टमो पय्यन्तेन यावान्‌ दिनप्रचयस्तावदिनसमाय 
चटोपच्े नवमोमपि यावत्‌ कतिः, शअष्टमौ पदे विधिसंकोचा- 
ज्वमोक्रनमित्युक्तम्‌ । 
वस्तुतस्ु-- ~. भ्यादि पदौ शएक्ताष्टमं यावदिति चतुष्कचयं 
पुनरावन्तेते दति कल्यतरुव्यास्यानं न सहत दूति । 
तदनुखारेणतच वयवच्ा साघोयसौ- 
्ाञ्विनवन्भमाधे चेच आवणेऽपि लिखितप्रायमिद मूदनोयम्‌ । 
जताङ्गमे कभक्तञ्चाच सप्तम्यामषटम्यां प्रातर्ययाविधि व्रतग्रद्णम्‌ । 
० व 
१ 8 1) अन्तिसकृत्य-- । 
© 


२९.४ छत्यरनाकरः । 


भवि्यपुराण- सुमन्तरूवाच - 
छलेवा ्वयुजे मासि छष्णएपच् नराधिप ।' 
नवभ्यासुपवामौ तु दुगेदेवौँ प्रपूजयेत्‌ ॥ 

५ ६ ०.५ 
धूपयुष्यो पदहारेश्च ब्राह्मणानाञ्च तपणः। 
पूजयिता रथं कला नानावस्त्ोपश्नो मितम्‌ ॥ 
श्नोभितं ष्वजमालाभिश्छवचामरद पणेः । 
नानायुष्यखजोभिश्च भिंहेयेक्त मनोरमम्‌ ॥ 
छला खणंम्योः दुगे महिषे शूलग्ोभिताम्‌" । 
विन्यम्य रथमध्ये तु पूजयेत्‌ छतलचणणम्‌ ॥ 

* ^ (ष्‌ [> १ 
तद्रधं राजमागंण शङ्खभय्यांटिनिखनः | 
नवम्यां भामयिला तु नयेदु्गालये नृप ॥ 
तच जागरपूव्वन्त्‌ प्रदौ पाच्युपश्नोभितम्‌ । 

भ चएकैर्वौर [ > 
नानाप्र नृत्यमानेश्च पुचकेः ॥ 
जागरं कारयेद्यौर पूजमानश्च चण्डिकाम्‌ । 
प्रभाते खपनं कला तङ्धक्रानाञ्च भोजनम्‌ ॥ 
रथं श्नोभासमायुक्तं भगवत्ये निवेदयेत्‌ | 
सुक्वा च बान्धवेः सद्धं प्रणम्यार्य्यान्‌ गहं व्रजेत्‌ ॥ 
सव्वे्रतानां प्रवरं खुव्वेपापप्रणा प्रानम्‌ । 
नवमो रयत्रताख्ये सव्वेका माथ साधकम्‌ ॥ 
सव्वेयन्नेषु यत्पुण्यं सव्वेदानेषु यत्‌ फलम्‌ । 

तत्‌ फलं खकलं बिन्देन्ञवमोव्रतपालनात्‌ ॥ 


पि 


१ 8 मददिषासनशोभितांम्‌ 


0 श त 11 


क्रत्यरल्ाकरः | ३९५४ 


कल्पकोटिशतं खाग्रं विष्णलोके महोयते । 
पुनरेत्य मर्ह राजा सार्न्वभौमो भवेदिह ॥ 
रन्ो पकरणेयक्तां '्दन्तदारुमयौँ प्रभाम्‌ । 
श्राय्यां निवेदयेचयस्तु भगवल्ये नराधिप ॥ 
सम्यूज्य गन्ध ुष्यायेवेस्लालङ्कार षणः । 
भच्छभोज्येर गेषेश्च विधिवच्च ण्डिकां नुप ॥ 
द्‌कूलद्धलवस््राणां परिसा तु यावतौ । 
तावद्रषेसदखाणि दुर्गालोके महोयते ॥ 
टषं शएलाङ्धितं यस्तु भगवत्य निवेदयेत्‌ । 
श्रासक्तमं स तु कुल परज्य देवालयं ब्रजेत्‌ ॥ 
दत्लोभयमसुखो माञ्च भगवन्ये सुशोभनाम्‌ । 
सप्रदौपाणेवां दला यत्‌ फलं तद्‌ त्ा्रुयात्‌ ॥ 
पदट्दयं शिरोऽद्रेञ्च याददत्छस्य निगंतम्‌ । 
तावद्गौः एयिवौ ज्ञेया तद्‌ाता खान््रहोप्रद्‌ः ॥ 
नवमोरथव्रतम्‌ । श्रच श्रक्तादि मांसः । 


परय मघाचयोदशो | 
मनुः- 
यत्किञ्चिन्मधना मिश्र प्रददयात्त्‌ चयोटगोम्‌ । 
तदष्यचयमेवाड्ध 'बर्घासु च मघासु च ॥ 
्रपिनः स क्रुले जायाद्यो नो दद्याच्योदश्नौम्‌। 
पायसं मधुसर्धिभ्यों प्राक्काये कुञ्जरस्य च ॥ 


१ 98 रेवद्‌ारू-- | २ 3 खव ख्यात्‌ 


२३९६ छत्यरला करः । 


यान्ञवसरक्यः- | 

्रमावस्याष्टका इद्धः कष्णपचोऽयनद्‌यम्‌ । 

द्रवयं ्राह्मणसन्यज्तिविधुवतसयेङ्कमः ॥ 

व्यतोपातो गजच्छाया गरहणं चन्द्रसय्येयोः । 

आद्धं प्रति र्चिशेव श्राद्धकालाः प्रकौत्तिंताः॥ 
-वसिष्ठः- 

पिता पितामदश्चेव तयेव प्रपितामहः । 

उपासते सुतं जात ग्करुन्ता दव पिप्पलम्‌" ॥ 

प्मधु मांसेन खङ्गन पयसा पायसेन च। 

ऋष द्‌खति नस्ति वर्षासु च मघासु च॥ 
विष्णः- 

अथ पिदमौते गायं भवतः- 

अपि जायेत सोऽस्माकं कुले कञथिन्नरोत्तमः | 

प्राटरर्कालेऽसिते पके जयोदश्छां समाहितः ॥ 
अलिति कष्णे । 

मधुक्षतेन" यः आद्धं पायसेन षमाचरेत्‌ । 

कात्तिक मकलं वापि प्राकुक्ाये कुच्नरस्य च ॥ 
ओमहाभारते- 

अपि नः स कुले जायाद्यो नो दद्याच्योदशौम्‌ । 

मघायां सपिषा युक्त पायसं दक्षिणायने ॥ 





१ 8 पिप्पलान्‌ कुला इव । २ 8 मधुमां सेख श्रकै । 
इ ८7 रष न्ते दस्यति राद्धम्‌ । 8 मधूत्तरेण । 


छत्यरनाकरः । ३१९७ 


अजेन सव्वेलोदहेन मघासु च यतव्रतः । 

हस्तिक्षायासु विधिवत्‌ कणब्यजमवो जितम्‌ ॥ 
पेडोीनसिः- 

छागेन सव्वेलोडेन वर्षासु च मघासु च। 

पुचो वा यदि पौबोयो नो दद्या्योदग्ोम्‌ ॥ 

दूति पितरः समुद्रौ चन्ते मव्वैखलोडेन शव्वेलो हितवएंन छागेन । 
तयाच इविग्यप्रस्तावे देवललः- 
क्ागो वा सब्वलोडितः। 

याज्ञवसर्क्यः-- 

यद्‌ दाति गयास्छख मव्वेमानन्त्यमस्नुते । 

तया वर्षाचयोद्श्वां मघासु च विशेषतः ॥ 
शराः 

मरौपद्यामतौतायां मघायुन्नां चयोदशोम्‌ ।. 

प्राय श्राद्धं हि कन्लेवय मधना पायसेन च ॥ 
ब्रह्मपुराणे- 

्रश्वयुन्यान्त्‌ कृष्णायां चयोदण्यां मघासु च । 

प्राटृडतौ यमः प्रेतान्‌ पिदश्चापि यमालयात्‌ ॥ 

विसन्नंयति मानुख्ये कृता शून्य खकं पुरम्‌ । 

चुधात्ताः कोत्तयन्तख्च दुष्कुलन्त्‌ खयं छतम्‌ ॥. 

पथस युच्पौचभ्यः काङ्खन्तो मधुमयुतम्‌ । 

तस्मान्तांस्तन विधिना तपेयेत्‌ पायसेन च ॥ 

मध्वाज्यतिलमिश्रेण तया शतेन चाम्भसा । 


2९८ छत्यस्लाकरः | 


ग्रासमातच परणग्दाद्धक्र यः प्राघ्रुयान्नरः॥ 
भिक्वामाचेण यः प्राणान्‌ सन्धारयति वा `खघम्‌ । 
यो वा मंबदधंयेदेदं प्रत्यहं खात्य विक्रयात्‌ ॥ 
श्राद्धं तेनापि कन्त तेतद्रेयेः सुसच्चितेः। 
चयोदश्यां प्रयन्नेन वर्षासु च मघासु च॥ 
नास्मात्‌ परतरः कालः श्राद्धष्वन्य विद्यते । 
यच मान्त पितरो ग्टहन्तयण्टत म्यम्‌ ॥ 
श्राडकालं प्रत्य विष्णः- 
प्रौष्ठपद्या ऊद्धं छष्णचयोद्गनौ । 
ङष्णच्रयो ट श्रौ -मघयोः प्रच्येकमेव निमित्तलं नेरपेचश्रृतेः, 
मिलितयोर पि ब्रह्मपुर णनुसारात्‌ विशिष्टफले निमित्तलव, पुचिणि 
अस्यावश्यकश्राद्धस्या निषेधात्‌ सपु्ापु्योदंयोरष्यधिकारः । 
पिण्डवत्येव खाद्ध- 
तचापि महतौ पूजा कन्तेव्या पिहदेवते । 
चे पिण्डप्रदा नन्त जष्पु चौ विसन्जैयेत्‌ ॥ 
दति देवोपुराणे केवलमघानिमित्तकस्य आद्भस्य सपुचा- 
युचयो विधानात्‌ ज्येष्टपुच्िणएि च पिण्डदाननिषेधात्‌ पिण्डर हितं 
श्राद्धं च्यष्टपुचिणापि केयम्‌ । न च पिण्डदाननिषेधसुखेन 
श्राद्धनिषेधः, श्राद्धं विढधत एव च्येष्टपुचधिणि तन्निषेधकलान्‌ । 
तथाच पिण्ड विनापि नित्यश्राद्धवत्‌ ओआद््‌फलम्‌ । 





९ मुले चान्व्दं | 


क्व्यरन्ाकरः। २२८ 


गजच्छाया तु- 
योगो मघाचयोदण्यां कुन्जरच्छायस्लितः। 
भवेन्मघाथां मस्थे च श शिन्यद्क करे स्थिते ॥ 
दति ब्रह्मपुराणे यत्पादिता। एवं प्राककाये कुच्नरस्य 
-चेत्यच्रापि गजच्छायोक्ता \ 
यच्च व्यासवचनं कणंव्यजनवोजितं सोऽनुवाद दति हलायुधः । 
कच्यतर्‌-पारिजातयोः-प्राक्‌ङाये कुञ्जरस्य चेति प्राचोसुप- 
गतायां इस्तिच्छायायामिति वयाख्यातम्‌ । तद निमित्तान्नरलेन 
समाधेयम्‌ । यक्तङेतत्‌ । 
तदुक्तं वायुपुराणे 
क्ायायां इस्तिनश्चेव ठल्वा आद्धं न शोचते इति। 
एवश्चानयोमंते कण्यजनवौजितमित्यपि समयव्यतिरि क्रमेव 
निमित्तं गजच्छायायाख समलेन लिखनेऽपि यान्नवरुक्योये प्राक्‌- 
काये कूच्ञरस्य चेत्यनेन निभित्नान्तराभिधानेऽविरोधघात्‌ | 
ने च्छत्तयोद शौ श्राद्धं पुचवान्‌ यः सुतायुषे । 
तथा आद्धं नेकस्य वगंस्य चयोद्श्यासुपक्रमेत्‌ । 
न तु ठप्नास््यो यख्य सुता हि सन्ततिश्च ते।॥ 
इति वाक्यदयाननिषेधः चयोद ग्ौश्राद्भखेति तु न वाच्यम्‌ । 
श्ननयोर्वाक्ययोर मो लिकवात्‌ । 
ब्रह्मुपुराणे- 
स्तकरे तके वापि ग्रस्तो न्द्र खूय्यंयोः । 
कायायां कुश्चरस्याय भुक्ता तु नरकं ब्रजेत्‌ ॥ 


२२० छत्यरल्ना करः ¦ 


सक्ता प्रमादादिमरस्व सम्यकू चान्द्रायणं चरेत्‌ । 
तया 
अ्श्वथुकूश्ृष्णयक्ते तु आद्धं देयं दिने दिने । 
चिभागदोनं पच्ठं वा चिभागं वद्धंमेव वा॥ 
दिनि दिने दति सब्वेस्िन्नेव दिने निभागद्ोनं पचमिति 
पञ्चमोतः प्रति भ्रपरपचश्राद्धं कुर्वत । 
्राचतुरथ्यां यदहः सम्पद्यते तदहरिति क्यायनात्‌ | 
श्रयवा- आद्धममावस्यायां दद्यात्‌ पञ्चमौप्रति वा अ्रपर- 
पच्चस्य यथा श्राद्धं समब्बेस्िन्नेव । इति गोतमवचनाच | 
चिभागमिति दश्मोतः प्रति । 
कृच्णपर दग्रम्यादौ वन्नयितला चतुद गनौम्‌ । 
आदधे प्रश्नस्तासिथयो यथेता न तथेतराः ॥ 
दूति मनुवाक्यात्‌ । एवच्च चरिभागपद दइयार्यो वक्रोऽपयादन्तैवयः । 
अद्धेमिति श्रष्टमोप्रगटति । 
एके तु श्रद्धभिति खण्डमाचवचनभिति एकड्यादि दिनेऽपि 
श्द्धकरण विहित बोद्धव्यमिन्याह्कः। 
शरत्तयपेचया चायं विकल्पः । अचाश्विनक्छष्णपच्चलमेव तन्तं न 
तु कन्यामतलं निरपेरश्रवण्णत्‌ । 
्राषाट्ौमवधिं छला यः खात्‌ कृष्णस्तु, पञ्चमः । 
अच आद्भु प्रङ््व्वोत कन्यां यातु न यातु वा॥ 
दति जातुकणेवाक्यद्‌ शेनाच्च, श्रतएव तथाचारोऽपि । 


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11 "= 


९ 8 पच्च | 


क्त्यरल्नाकरः | २२९. 


एषु सव्वेपच्ेषु चाज चतुद त्यागः । 
ष्णपक्ते दश्रम्यादौ वल्नयित्वा चतुद म्‌ । 
श्राद्धे प्रशस्तासिथयो यथेता न तथेतराः ॥ 
दति मनुवचनात्‌ । 
ब्रह्माण्डपुराण- 
कन्यां गते सवितरि यान्यहानि तु षोड्श्न। 
करतुभिस्तानि तुद्यानि तेषु दत्तमयाच्यम्‌ ॥ 
श्र कन्यागतषोड शदिनसेव तन्तं तच्च तिथिदद्धिक्रमं विनापि 
लभ्यते श्रतस्तिथि्टद्धिविषयकमेतदि ति कस्यचिद्धचनमयुक्तम्‌ । 
तथाच ब्रद्यपुरण- । 
आ्राद्धन्त्‌ पौणमास्यां वे छत्रा पणंफलं लभेत्‌ । 
प्रतिपद्धनलाभाय दितोयाऽर्थाय चपरा ॥ 
दतोयायां वरार्थाय शचुनाश्राय चापरे । 
पञ्चम्यां धनलाभाय आद्ध कुर्य्यात्‌ प्रयन्नतः ॥ 
षध्यान्त्‌ बालर काथं स्यां बन्धद्भये । 
हृद्धिकामस्तयाष्टम्यां स््लोकामो नवमेऽहनि ॥ 
दग्स्यां ब्रह्मतेजोऽ्यो खन्तत्यर्यौः तथापरे । 
दादश्यां जयलाभाय चयोद श्यां विश्रूतये ॥ 
म्रायानेशनशस्लाभ्ि विषोदन्धनिनान्तथा । 
चतुद श्यां भवेत्‌ पूजा व्यर्थमिति निखयः ॥ 
श्रमावख्यान्त सर्गाय भलया सन्तपयेत्‌ पिद्न्‌ ॥ ` 


तेन॒ न्रह्मएुराएकयितभ्राद्धे परिमासहिताश्धिनहष्णपचः 
४१ | 


३२ छ्त्रनाकरः । 


ज्रह्भाण्डपुराणणेयवाक्ये षोड्ग्रदिवखाः। तथाच कन्यागतादित्यत 
मादायेतेष्वेव प्रशंसा तेन यणएते पूणिंमासदिितरुष्णपचचरूप- 
घोड्श्रदिवसास्ते कन्यागतादित्यमासाद् क्रतुतुख्या भवन्तोत्ययेः । 
ब्रह्यपएराणे- 
यावच्च कन्यातुलयोः क्रमादास्तं दिवाकरः । 
तावक्छ्राद्धस्य कालः स्याच्छूनय प्रेतपुरं तदा ॥ 
यतः कुतश्चिन्निमिन्तात्‌ कन्यागतापरपचे आद्धं न सम्पन्न 
तं प्रति यावत्तलाख्यः सविता तावान्‌ आआद्धस्य कालोऽभिहितः । 
भविय्यपुराण- 
येयं दौपाज्विता राजन्‌ स्याता पञ्चदशो भुषि। 
तस्यां दद्यान्नचेदत्तं पिदणान्त्‌ महालये ॥ 
कन्यागतापरपच्ो महालयः। रच चामावसखामाच्रराद्- 
प्राप्नावपि कन्यागतापरपक्ते आरद्धाकरणेन यः प्रत्यवाचस्तत्परी- 
हारबोधनमिति न वैफ, श्रनयोख ब्रह्मपुराण-भविय्यपुराण- 
वाक्येयोरेकवक्तुकयोः कन्यागतापर पचश्राद्भकरणणभावे का्तिका- 
मावस्यायां तत्काय्येबोधकलं पुराणमेदा्रयनादपौनर्क्रम्‌ । 
यावत्तलाख्ः सविता तावान्‌ आआद्धकालः । 
दति पू्वेवाक्य्यास्यानं कल्यनरोः सद्ग चनौ यम्‌, यदि च पूर्वण 
कन्यागतापरपक्े श्रसम्भवे तुखापर पचविधिः । भ्रनेन च तदसम्भवे 
कान्तिक्यमावस्याविचधिः। तदा सामान्यविगेषमादाय पौनरुक्र 
मन्तव्यम्‌ । तेनेकेन तत्काय्येऽयिमपचविधिरत्तरेए तत्कार्य॑ऽमा- 
वस्याविधिरिति विकल्प एव श्क्चपेच्चया । 


छ्त्यरल्नाकरः | ३२२ 


केचित्त महाशलयश्न्दे नामावस्यायामेव महान्‌ जयश 
मसोऽस्यामिति योगतो विवच्वां गोचरौ कत्य पूर्व्वामावस्याकाय्यं 
श्रमावस्यान्तर विधिमेव मन्यन्ते । 
श्रय प्रसङ्घात्‌ काम्यानि) 
तन्न कात्यायनः- 
| च्यः प्रतिपदि दितौयायां स्तौजन्म 'अरविसृतोयायां 
चतुर्थो चुद्रपशवः पुराः पञ्चभ्यां ष्या यूतविजयः, चछद्धिः 
छषिः सप्तम्यामष्टम्यां वाणिच्यमेकशफं नवम्यां गावो दग्रम्यां 
परिचारका एकादश्यां दादश्वां धान्यं कुं ज्ञातिश्च चयोदश्यां 
युवानस्त॒ वियन्ते शस््हतस्य चतुद श्याममावस्यायां स्व्वेम्‌ । 
मनुः- 
दुव्वेन्‌ प्रतिपदि द्धं सुरर्पाललभते सुतान्‌ 
कन्यकाञ्च दवितौचायां टतौयायान्तु वन्दिनः ॥ 
पशन्‌ चुद्रंशतूर्थ्थान्त पञ्चम्यां शोभनान्‌ सतान्‌ । 
षष्ठयां चतं छषिञ्चापि सप्तम्यां लभते नरः ॥ 
श्रष्टम्यामयपि वाणिज्यं लभते श्रादटः षदा 
स्यान्नवभ्यामेकखरं द्‌ गम्यां दिखखुर बड़ ॥ 
एकादश्यां तथा रूप्यं ब्रह्मवच्ंखिनः सुतान्‌ । 
दादण्यां जातरूपञ्च रजत ङष्यमेव च ॥ 
ज्ञातिगरेषठयं चयोदण्वां चठ्श्यान्त॒ सुप्रजाः । 
प्रौ यन्ते पितरञ्च ये शस्त्रेण इता रणे ॥ 





१ 7 खशाः 


३२४ रेव्यरनाकरः। 


पचत्थादि विनिद्िष्टगन्‌ विपुलान्‌ मनसः प्रियान्‌ । 
श्राद्दः पञ्चदश्धान्त सर्व्वान्‌ कामान्‌ समस्नुते ॥ 
वन्दिनः स्तावकासतेः सत्यो भवतौत्यथेः । यतं दृतय कष्य 
खुवणेरजतातिरिक्त ता्ादिकम्‌ । पचत्यादौ ति पचतिः प्रतिपत्‌ | 
म्रतिपदादिकयिततिधिफलं ओभनं सव्वेममावस्यायामित्यथैः । 
रच सर्व्वानित्यनेनेव प्रखतफललाभे पचन्यादि बिनिरि्टा- 
निति पुनवेचनात्‌ तत्तत्‌ ख्‌ णंपालकामघ्याधिकारः। न तु स्वेभ्यो 
दभेपौणेमासाविति योगसिद्न्यायेनान्यतमफलकामस्सेति । 
आपस्तम्बः- 
प्रयमेऽहनि क्रियमा शे स्तो प्रायमपत्यं जायते । 
क्रियमाणे अद्ध स्तौबहलं, दितौये सेनाः ठतोये 
नद्मवच्चस्िनः चतय चुदपश्एमान्‌ पञ्चमे पुमान्‌ बहपत्यो 
नचानपल्यः प्रमोयते, षष्टे्वश्रोलोऽचशोलख, सप्तमे रषिच्छद्धि- 
रष्टमे पुष्टिः, नवमे एकखुराः, द श्रमे व्यवहारहद्धिः, एकादभे 
रृष्णायसं चपशौसं दादे पष्टुमान्‌ चयोदश्वां बरूपुचो बड- 
भिन्नो दभेनोयापत्यो, युवमारौणएश्च भवन्ति । चते श्रायु- 
द्धिः, खद्धिरिति संसिद्दिरित्ययेः पञ्चदशे पुषिः स्वौप्राय- 
मपत्यम्‌ । 
सततं श्राद्धं कुबवन्नान्नोतौत्यधिकारे विष्णः- 
`ग्टहेऽभिरूपाः खियः प्रतिप्रदि, . कन्यां युतां दितौयायां, . 





१ 2 सिदिः। २ शूले आआयुधनदिः। 








छत्यरल्लाकरः | २२५ 


| सन्वेकामान्‌ हतौयायां. य ग्रतुर्या, अय पञ्चम्यां दत विजयं | 
वयां रषिं सप्तम्यां वाणि्यमष्टम्यां पशून्‌ नवम्यां वाजिनौ 
दशम्यां पुत्रान्‌ ब्रह्मवचंखिनस्ले का दश्यां कनकरजते द्वादश्यां 
सौभाग्यं चयोदण्यां सर्व्वान्‌ कामान्‌ पञ्चदश्याम्‌ । शस्तानां 
आद्भकमेणि चतुदश प्रश्रस्ता । 
श्राद्धः कुर्ययादित्यधिकारे हारौोतः- 
पञ्चमो पुचकामः षष्ठो घनकामः सप्तमो पश्एकामः, अष्टमो 
श्रस््हताय आरोग्यकामोः नवर्मों सेनालायाभिजित्कामः 
दशमोमन्नादिकाम एकादशष्ठद्धिकामो दादर ओओकामः 
चयोदप्रौ यश्रस्कामः चतुद्रेणं शतिकामः खस्तिकामो वा 
च्रमावस्यायां सव्वेकामः, चतुदष्यां शस्त्रहतस्यैव सखस्तिकामेन 
ग्वतिकामेन ओआराद्ध कन्तव्यम्‌ । 
वायुषुराणे- 
पुष्टिं प्रज्ञां सतिं मेधां युचानेश्वय्यैमेव वा । 
कुव्वाएः पौणेमास्यान्तु सम्य फलमश्ते ॥ 
प्रतिपद्धनलाभाय लब्धं वापि न नश्यति । 
दितोयायान्त्‌ यः क्खाद्धिपद्‌ाधिपतिभेवेत्‌ ॥ 
वरायिनां दतौया स्यच्छचप्नौ पापनाशिनो । 
आद्ध चतुण्यां छ्ूर्ग्बाणएः शचोण्डिद्राणि पश्यति ॥ 
पच्चभ्याञ्चेव कूर्व्वाणः प्राप्नोति महतीं अियम्‌ । 
षष्ट्यां ्राद्धानि कुव्वाणो दिजास्तं पूजयन्त ॥ 


1 


१ ॐ पश्यखतुर्याम्‌ । 





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२९६ कत्यरल्नाकरः । 


कुरते यस्तु सप्रम्यां श्राद्धानि सततं नरः| 
महदासन्नमवाभ्नोति गण नाञ्चाधिपौ भवेत्‌ ॥ 
स्ूर्णाषटद्धिमाप्रोति योऽष्टम्यां कुरुते नरः । 
शराद्धं नवम्यां कन्तेयमेश्चखं स्तौषु काङ्कता ॥ 
कुष्वेन्‌ द शम्यान्तु नरो जादौ भिवमवाश्रुयान्‌ । 
वेदास्तथा रयात्‌ सर्व्वान्‌ विप्राणां समतां तथा ॥ 
एकादश्वां पर दानमेश्चय्यं सन्ततिन्तया । 
दादश्यां जयलाभच्च राञ्यमायुवष्नि च ॥ 
मरन्द्धि' पशएन्‌ मेधां खातन्त्य पुष्टिञुन्तमाम्‌ । 
दौधेमायुर यश्य बुर्व्वा्णसु चयोद म्‌ ॥ 
युवानञ्च शता यस्य ग्ड तेषां प्रदापयेत्‌ । 
शसेण तु इता ये वे तेषां दद्याचतुद्‌श्नौम्‌ ॥ 
अमावस्यां प्रयनेन श्रां दर््याच्छचिः सद्‌ा । 
सन्वन्‌ कामानवाप्नोति ब्छगेञ्चानन्यमश्नुते ॥ 
रच स्तन-युवमरणादावपुचतख्या तदोषमदिष्णोरधिकार दति 
कल्पतस्ः । यः (श्वेना दिया गविच्चयो ) उल्गयितश्रास्लः सेनादि 
कामयते तं प्रतोदं णस्लमित्यन्यः । 
पुचगतानिष्ट्रवणा द्‌पुच्रस्य पश्वादि फलकामस्याधिकारः, 
श्रनुवाद कस्यायधिकारि विगशेषोपदश्ेकतया सार्थकं विध्यविरोध- 
कलञ्चेति पारिजातनिबन्धः। स तु सङ्गतः। 
नह्यपुराणे- 
प्रा्यानश्नग्रस्लाग्मि विषोडन्धनिनान्तया । 


क्रत्यरलाकरः। २२७ 


चतुदश्यान्तु कर्तव्यं द्यथेमिति निश्चयः ॥ 
प्रायो महापथगमनम्‌ | 
मरोचिः- 
विषशस््रश्वापदाहि तिब्येगत्राद्यणएघातिनाम्‌ । 
चतुरटश्वां किया कार्य्या श्रन्येषाञ्च विगता ॥ 
विषति विषादिप्रयुक्तशस्तघातभाजा मित्ये: । एतच्च सव्व 
कृष्णचतुदं शरौ विषयं श्स्बरविषम्टेतानां दष्ययेत्वे श्राद्धस्य ब्रद्धपुराणे 
विदिते श्रचन तदश्चवणेऽपि काम्यवमपि न तद्ाक्यविषयांश्र 
एव काम्यत्वं श्रवेषभ्येना चापि फंलकज्यनस्योचितलात्‌ । 
देवोपुराणे- 
आहवेषु विपन्नानां जलसा्चिश्वगुपातिनाम्‌ । 
चतुदश्वां भवेत्‌ पूजा श्रमावस्यान्तु कामिक ॥ 
ञ्रमावस्यान्त॒ कामिकौत्यमावस्योक्तफलायेः, शस्तघातिना- 
मपयमावस्ायां आराद्धं काय्येमिति हलायुधः । 
श्रमावस्वान्त कामिकोति अवणच्चतदेश्वां नित्यं आद्धम्‌ ) 
एतच काम्यं नित्यञ्च स्तिया श्रपि कत्ेव्यं वि्रषाश्चुतेः । 
न योषिद्धः एथग्दद्यादि तिनिषेधान्नेति चेत्‌ । 
तदि 
येऽखपिण्डौशृताः प्रेता नैव तेषां परयक्‌ क्रिया । 
दति शतातपवचनात्‌ पुंसोऽपि न स्यात्‌ । विगरेषविषधेः करण- 
भिति चेत्‌ त्यं सिया श्रपि, विगश्रेषविधिः पुंस्येव चरितार्थ- 
दति चेत्‌ न, वेपरोत्यप्रषङ्गगात्‌ | पुसलश्रते विनिगमना दति 


३२८ छत्यरल्ाकरः । 


चेत्‌ न तस्वानाकाङ्कितिलेनोपादेेऽपयविवकितलान्निमिन्तकोरिलव 
त॒ सुतरामिति पारिजातः) 
श्र प्रस्लहतशास््ेयावद्रचनं हि वाचनिकमिति न्यायात्‌ 
यावन्तो वचनदिषयास्तादतामेव निमित्तवमायाति, केखिदा- 
चारानुरोधाद्माधिद्यतिरेकम्डतलं श्रस्रहततं विवकितमतः स्तिया 
श्रपि प्रसवाभिघातन्डताया श्रचेव आद्धमित्यक्तं अरत उपसगे- 
म्डतलं चतुद शौ श्राद्धे निमित्तवम्‌ । 
वायुपुराए- 
युवानस्तु गहे यस्य ग्डतास्तषान्तु दापयेन्‌ । 
श्रस्त्ेण वा इता ये वै तेषां दथाचत्दगोम्‌ ॥ 
अच यौवनं षोड्ग्रवघापरि चिंश्दषेपय्येन्तं शास्तान्तरोक्रम्‌ । 
नलाषोड्श्राचयुवानः मपततयद्धं खविरा दत्यतुसारात्‌ षोडश्- 
वचौपरि सप्ततिव्ष॑पय्यैन्त, न वा प्रथमे वयसि नाधौयितमिति- 
वचनात्‌ पञ्चविंश पञ्चाश्दषेपय्यन्तमिति श्राचारबाधात्‌ । 
ग्रह दृत्युपलच्णं बहदिमेरणेऽपि विधिग्रन्तेः । च्रन्यथा खग्टडे 
म्टतयूनो ऽसखगोचस्यापि श्राद्धप्रसङ्गात्‌ । 
प्रस्तर हतश्राद्धञ्चेदं काम्यं क्रियमाणं पा्व्वएविधानेन कन्तेवयम्‌ । 
कामाय विहितं काम्यमभिप्रेताथेसिद्धये । 
पाव्वेणेन विधानेन तदप्यक्रं यथाक्रमम्‌ ॥ 
इति गश्रालातपवचनात्‌ । 
पाव्वेणविधानं पाव्वैेतिकन्तैव्यताक विश्ेदेवावाहनाभ्रौ करणानि 
एतदेव तु नित्यतया च्ियमाणमेव न तु पाव्वेएविधानक- 
माचारात्‌ । | 


क्द्रल्ाकरः। २९ 


चतुदश्यान्तु यच्छ्राद्धं सुपिण्डोकरण छते । 
तदे को दिष्टविधिना कन्थं ग्रस्लघातिनाम्‌ ॥ 

डति गौड्वाक्यद्‌ शेनाच्च । 
वत्त 

श्रोरस-चखेचजो पुत्रौ विधिना पाव्व॑एन तु। 

्रत्यन्दभितरे कु्येरेकोदिष्टं खता दग्र ॥ 
दति जावालल्वचनम्‌- 
तया-- ततः प्रति संक्रान्तावुपरागादि पव्वंसु | | 

चिपिण्डमाचरे च्छराद्धं वल्नै यिता सटताइनि ॥ 

एको दिष्टं परित्यज्य पा्वेणं यः समाचरेत्‌ । 

सदेव पिदा स स्यान्मादभ्रादविनागश्कः ॥ 
तथा- शहताडे पाव्वेएं कुव्वेन्नधो याति च मानवः । 

सम्य द्याक्ुलौोभावः प्रेतेषु तत्ततो नयेत्‌ ॥ 
तथा-- यच्र यच प्रदातव्य सपिण्डोकरणात्‌ परम्‌ । 

पाव्वेणेन विधानेन दैयम्चिमता सदा ॥ 
दति मक्छप्रुराणएवाक्यानि च लिखिलाऽच च ब्टतादहइ एव 
पाववैरेकोदिष्टविकल्ये प्राप्ते व्यवस्था सा्निभ्यामौरसचेचजाभ्धां 
पुचाभ्यां पाव्वेणं विधेयम्‌ । 
जावाल-मच्छपुराणएवाक्यपरामर्षाल्निरभ्िसकलपुतैः साभ्रि- 
-भिश्ेतरपुतरेरेकोदिष्टं काय्यैभमिति रसएतिमराणेवप्रकाश्कार दति 


कल्पतरौ लिखितमन्येश्चानुमोदितं तल्घु । 


तथाहि मक्छपुराणं तावन््रातामहे पाव्वेणनिषेधकं तच 
४२. 


२३० छ्यरनाकरः । 


च श्छताह एव पाव्व॑णश्राद्धविधायकं भवत्‌ साञ्चिषुज्रविषयतया 
न खवख्यःप्येत । 

"न च-- पाव्वैफेन विधानेन देयमिति वाक्यं पाब्वेणं विधन्त 
दति निश्वितभितिकन्तंव्यतामादायार्थंषन्देहात्‌ पाव्वेएविघधानेन 
पाणं देयमित्यभिघानापातात्‌ ठतौयानुपपन्तेश्च वैपरौत्यात्‌ । 

तथाच- विरोध ण्व न श्रोतः करतो विषयव्यवस्था यदातु 
पाव्वैरेन विधानेन पाव्वएेतिकन्ते्यतयेवा जाह नाभ्नौ करणएविश्वदेव- 
रूपेण ललितं आ्रआद्धमश्रिमता देचमित्य्थैः स्यात्‌ तदा न विरोधे 
न वा, सद्धोचः सब्वैचयाहेषु दयभिमतः पाव्वैणेतिकत्तव्यताक- 
्राद्भविधानात्‌ । 

एवच्चानयैवोपपत्या - | 

्रमावस्यां चयो यस्य प्रेतपच्चेऽथवा पुनः । 
सपिण्डोकरणादूष्वेन्तस्योक्तः पाव्वेणो विधिः ॥ 
इत्यत्रापि पावव॑णेतिक्तव्यतयेको दिष्टबोधनमेव तथेवाचा- 
रोऽपि दृश्यते पारिजातखखर सोऽप्येवम्‌ । 

पाव्वेणएश्राद्ध विधेरनन्तर मनुः- 

अनेन विधिना श्राद्धं चिरब्दस्येह निवपेत्‌ । 

हेमन्त-योश्न-वर्षासु पाञ्चयान्नोकमन्द्म्‌ ॥ 

न पेचयज्ञोयो होमो लौकिकेऽ्नौ विधौयते । 

न देन विना आ्आद्धमाडिताग्मदिंजन्मनः॥ 
चिरय सवन्छरे वारज्रयमयञ्च खाग्रिनिरथिखाधारणः, तेन 


[1 मामका 


९ 7 नक्तापिच। 


क्रत्यरन्नाकरः । ररर 


मवत्सरमध्ये यत्कन्तव्यत्वेनोक्ं तख कुत सिल्िमित्ताद्रव्यासम्पत्यारे 
रकरणेऽयं कर्मः । । 
पाञ्चयन्ञौखं पञ्चयज्ञान्त्तं राद्धं तत्‌ प्रतिदिनसुदकादिनाऽपि 
कन्तेव्यम्‌ । अतएव पाव्वेणख्राद्भमभिधाय देवलेनापि- 
एतेन विधिना आरद्धं ज्ुर्य्यात्‌ सवत्छरं सरत्‌ । 
दिश्चत्वां यथाश्राद्ध मासे मासे दिने दिने॥ 
दति भक्तिसम्भवासम्भवतारतम्येन बहवः कल्पाः प्रद शिताः । 
हेमन्तगो वर्षासु तदनुष्टोयमानं श्राद्ध कन्याक्घुम्भदरषसखेऽकं 
छष्णपरे यस्यां कस्याञ्चित्तियौ कर्तव्यम्‌ । 
श्रनेन विधिना श्राद्ध चिरन्दस्छेह निब्वेपेत्‌ । 
कन्याङ्घुम्भदषस्थेऽकं छष्एपकत तु स्वेदा ॥ 
दति मच्छपुराणानुखारात्‌ एकमूललातुरो घाद्च । 
अ्रहिताश्िना तु दशे एव एवञ्च 
न दर्शेन विना श्राद्धमादिताप्नेदिंजन्मनः । 
द्त्यनेनायं कल्पः सा्रेदशे्राद्ध एव बोध्यते नतु यशां 
कस्याञ्चि्तिथौ कन्या क्रुभटषस्येऽकं कष्णे, तथा च दश विनापि 
सभ्मौनां तच तच आद्भमविषहद्धम्‌ । 
केचित्त- 
न देन विना आद्भमाहिताग्मेदिंजन्मनः। 
दत्यौत्स्भिंकमेतन्तेनान्यचापि विगरेषबोधकमानमाभित्य सा्ि- 
कन्तकं अराद्धम्‌ । 


इद्‌ छत्यरन्ना करः । 


श्रन्ये तु- छष्णपक्चं यच्छ्राद्ध विदहतं तद्ग एव साञ्चिना 
कर्तव्यमित्यस्यायमाड्कः । 

दलायुधेन तु-न देन विना इति न द्‌्ँतिकन्ते्यतां विनेति 
व्याञ्चतं । अचर च द्शंपच्च लच्षएणा स्यादित्यपरे 

कनच्यतरौ तु- 

श्राहिताभ्रिना तु तवेव द्रे एव दइ्यक्ता यस्मात्‌ श्राद्धाङ्ग- 
गूतचेदयन्नोयशब्दो पात्ताग्नौ करणडोमाङ्श्रतलो दकिणाग्निने दभ्र 
व्यतिरेके नास्ति निमित्तान्तरात्‌ यदष्टकादिश्राद्ध तदत्‌ किञ्चिद्िप्र- | 
पाण्छा दि निष्याद्याम्नौकरणाङ्गकमेव काय्यैभिति लिखितम्‌ । 

तस्य चायमभिप्रायः- 

किञ्चिद्धि आद्ध खम्भवदमावस्याकं यया हेमन्त योश वर्षा 
खित्यादिसाघारणविधिविषय शष्णपच्त वा किञ्चिच आद्ध- 
ममावस्यां विलनवर विधौयते । 

तथाष्टकान्वष्टकाश्राद्माख्िनङृष्णपचचश्राद्धं वा तच दिने दिने 
दति वोश्राश्चुतेरमावस्यान्यसमयमनादाय विधेरपय्थैवभानान्ततः 
पूष्वेस्मिन्‌ श्राद्धेङ्ग्डतदहोमाधारदचिणा्िनेरपेचस्य सति सन्भवे- 
ऽनंला दिधेरमावस्याभादायेव साचि ्रत्यपपत्तेः 

उन्तरन्तु राद्धं सां प्रति दकिणाभ्रेरवश्यं बाधात्‌ संछ्रता- 
म्यन्तर मपेच्छते न तु लौ भिकमपि तच पेठयन्नञोय दत्यनेन सर्व्वथा 
निषेधात्‌ । | 


श्रतएव आद्धकर्पेऽन्वष्टकायां बहो वेति पुनर्विधाना- 


सय 





९ ^ विलद्खन न 


, क्त्यरन्नाकरः .. ररर 


लनो किकाग्निबाधमभिधाय इदिश्थाद्चिएग्िवाधात्‌ तदन्यस्ख्त- 
बद्किमादाय साग्नेरधिकारो व्वखापितः शोभते एवञ्च त्रौडि- 
यवपाकाद्धावपि षमयवोधके सम्भवत्यमावस्येव भानि प्रत्यादन्तव्या 
अवाधादपि दचिणाग्नेस्तदधिधेरमावस्या मादायोपपन्तः । 
तथा प्रूिमाश्राद्धऽपि साग्निं प्रत्यवश्ं दचिएाभ्निवाध एवेति 
संछताग्यन्तरमाचार इति । 
लिङ्कपुराण- 
पिदपचे चतुदेश्यां पूजयिला तयेश्वरम्‌ । 
म्राणते पिदलोकस्तु क्रडते मुदितस्व तेः ॥ 
पिद पच्छ श्रा श्िनङृष्णपक्चे--तयेवो पक्रमात्‌ । तैः पिहमिः ॥ 
व्यवद्धारपरिग्टरोतनो राजनविधिः ॥ 
श्र्वयुक्‌श्क्तपक्त(तिथौ) दितौयादिस्तराचन्तु वड़्वासपेणेका 
खातिः दुथ्यैस्य वहति रये सा भारेणातिक्रान्ता कंद्धा यान्‌ 
यान्‌ वौ चते वादान्‌ तेषां तेजश्च वलं छसनं निग्टाति सञ्जायन्ते 
सोगास्तत उपसंगेः समन्विता वादाः । 
तस्मात्‌ खात्युपतापे वाजिनि पोड़ा भवेन्महतो एवच्च सप्तराचं 
खातेः सन्ताप एष निष्ठः । तच तच दिवाकरकिरणैरस्य॒ष्टा 
वाजिनो इचवान्‌ श्रालास्तत्नो पलिपेत्‌ मनोरमां वच्ितान्च रषि- 
किरणैः नानाकारैः पु्येरलङ्तां धूपितां कुर्य्यात्‌ । 
तस्यां खातास्तुरगाः सुपूजिता श्रिता दितौचायां पुरूषेशच 
स्वहस्तः सप्ताहं रचितव्यास्ह॒ गग्गल दिङ्गुवयस्छाः । 
सवचापामागे तण्डुलं लोहं सिद्धा ये लखान्‌ ब्नोयाद्वाजिनः 


३२8 लत्यरल्ाकरः । 


कण्डे वयस्था श्रामलकनै चेलं वस्तं, वेदौञ्च कन्ययिला \्विधानेन 
यावकं जुद्धयात्‌ सायं प्रातश्च एचिश्च ` पुरोहितो ब्रह्मचारो स्यात्‌ 
्ालिदहोचोदितेन मन्तेणानेन होमयेत्‌ । 
रोदह्िताश्च महाभाग हव्यवाह सुरोत्तम । 
ध पश्वज करतुद्ार खस्य प्रथितः पथः ॥ 
उल्तिष्ट होमं गर्हम शान्तिरस्ठु हयेषु च । 
सखादहति चाच मन््ेए दापयेत्‌ प्रथमाह्तिम्‌ ॥ 
ततः प्रजापतौन्राभ्यार सोमाय वरूणाय च। 
विवंस्ठते कुवेराय वसु-शेषाश्वगशायिने ॥ 
्रादित्यानामयाश्िन्यां ख्द्राणणं वसुभिः स्ह । 
विष्णोख विश्वदेवानां साध्यानां मर्द्धिः सह । 
खाहाकारेए ज्यात्‌ ददितौयेन ता श्नम्‌ ॥ 
एवमन्येषामपि च खाहाकारेणए होमयेत्‌ । 
दुबेलानोह रचचांसि प्रत्युषे ब्रह्मतेजसा ॥ 
भवन्ति तस्मात्‌ ह्ये पाययेत्‌ सञापयेद्ध यान्‌ । 
पुरो हतस्तु दिःकालं तपेयिला दिजोत्तमान्‌ ॥ 
पुष्ा इं वाचयेननिक्छं खस्या भौ मेङ्गलेयैतम्‌ ॥ 
नरनन्तकगन्धर्व्वाः सुत-मागघ-चारणाः । ` 
तुरङ्गालुपतिष्टेयुः सप्ताहं शान्तिकारणात्‌ ॥ 
मनोज्ान्‌ मधृरान्‌ शब्दान्‌ अला गच्छन्ति वे गहाः । 
वादित्रं वाहना गावस्तस्मा न्नित्यं प्रयोजयेत्‌ ॥ 


१९ ^ धवि च। २ ^ 7) प्रजापतोन्द्राय | 


हव्यस्नलकरः। 


९1 
९) 
^~ 


अतिक्रम्य च सप्ताहमष्टन्यां सापयेद्धयान्‌ । 
वरूणाय वलिं दला पश्चात्तोयेऽवगा दयेत्‌ ॥ 
विश्वषयेच्च माला भिस्तत शेवाधिवासयेत्‌ । 
ततः श्रक्तनवम्यान्त्‌ निक्रम्य नगरादह्िः ॥ 
- दशि प्रव्वौत्तरायान्तु देशे प्राक्रणे श्रटचो । 
तच तोरणसुत्याप् दशरनिसमु च्छरितम्‌ ॥ 
विस्तारेऽ्टौ समाख्यातं ष्वजमा लाविभ्चूषितम्‌ । 
सुरचितं चायुधौयेः प्राड्ुखं तन्मनोर मम्‌ ॥ 
प्रद्धखातास्ततो वादाः सान्नाडहिकपुरःखराः । 
पुण्ठाह-ब्रह्मघोषेश्च गौतवादिचनिखनैः ॥ 
खूत-मागघ- गन्धर्वैः खयमानाः ` खलङताः । 
गन्धर्वैः गायनैः । 
पुरुषैः शस्तहस्तेख तयेवाश्चोपजो विमिः । 
नेतव्यः रच्छमाणाश्च तच तोरणसन्निधौ ॥ 
द चिणएस्तमभनिकटे, गल्वाम्मो च पुरोहितः । 
दिशं बलि ततो दता खस्ति राज्ञे निवेदयेत्‌ ॥ 
उल्कराभौरूणि र्तसि न वे हिंसन्ति वादनम्‌ । 
उल रज्वालयेत्‌ तस्माद्‌ चिणोन्तरपाश्वेयोः ॥ 
अष्टौ मनुव्यानव्यङ्गानुल्कादस्तान्‌ दिधाख्ितान्‌ । 
तेनाश्नियतिरेकेण क््यादुलकाप्रदौ पनम्‌ ॥ 
हविःगरेषेए खात्यश्वः प्रोचयिला तु तपंयेत्‌ ॥ 


ण ज 


९ ^ खसत्यञ्च | 


२२६ कछरत्यरनाकरः | 


श्रय राजयुरोधाम्त॒ विष्णस्ते पुरतः खितः । 
वरूणः पा ग्रदस्तस््वां पृष्टतो परिरच्चत्‌ ॥ 
वेवसवत-क्रुवेरो च पाश्चैयोरभिर दताम्‌ । 
चन्द्रादित्यौ प्रष्टवंशसुदर एथिकौधराः ॥ 
रचन्तु वक्तं गन्धर्व्वा बलमन्ध ददातुते | - 
हविःग्रषभिमं प्राश्य विजयश्च महोपतेः ॥ 
ततस्हु प्राशिते चासन्‌ जपेच्च भिषजां वरः । 
कणेजाष्यमिदं चास्य दिणे अवणे न्यसेत्‌ । 
कुला भिजनजात्या च लचणस्याच्नने सितम्‌ । 
भत्तारमभिरक् लं शिवस्तव भवेदिति ॥ 
अ्रङ्गदण्डमनिष्टानि चमख तुरगोन्तम । 
एवच्च मन्तितो बाजौः ब्रद्यघोषनिनादितः । 
, सिच्यमानः कुशो तष्टेवा रि भिमेन््रसंछ्तेः । 
ततस्तोरणएमध्येन मन्त्रिभिः सह पाथिंवः। 
निगेच्छत्त जयेत्युक्ता गेषेरतुगतो येः ॥ 
खातोसभ्पाताध्याये एको नोराजनविधिः । 


स नम 


अपरस्तु श्राश्चिनाधिकारादाश्िनस्य- 
शक्ञपच्े दितोयायां शालां संवेश् रचयेत्‌ । 
्रादित्यरश्ितो वाहान्‌ कर्रवश्ता दिकेस्तथा ॥ 
श्रस्तङ्गते दिनकरे कटा दौ न्यपकषेयेत्‌ । 





१९ 8 राञजा। 


छत्यरल्नाकरः । ` ३२.ॐ 


प्रवाता्थै मुनदंद्यात्‌ यावत्‌ घन्ध्या न जायते॥ 
ग्रालाम्रवेश्र विदितां रचां कण्डे प्रदापयेत्‌ ॥ 


रखा ठु 


लोहकः निभ्वपचाणि गुग्गुलं खषेपान्‌ ठतम्‌ । 
चेले बद्धा वचां दिङ्ग बक्नौयादाजिलाङ्गले ॥ 
चर्षेणं भ्रामणच्चेव तथाचेवोपवन्तैनम्‌ । . 
निग्रारेषे प्रकन्ैव्ं यावर दिवाकरः ॥ 

एतन्‌ प्रतिदिन ज्यात्‌ सप्तराचमतद्धितः । 
कारयेहाद्यण्णं सेव श्रान्तिं खस्ययनानि च ॥ 
ख्षराचे अतिक्रान्ते चौ रतान्‌ छापितांस्तया । 
श्रितान्‌ कसुमेगेन्धस्ततो नौराजयेदुधः ॥ 
ततो वादिज्रनि्धीषेनंतव्या य्ामतो बहिः । 
दिशं पूव्वामयोदौचीः गला विपरैरधिष्ठिताम्‌ ॥ 
बह्धौ हला ददिजो मन्तरवंदो दिषटेयेधाक्रमम्‌ । 
श्रे श्रान्तिं तुरङ्ाणणं ततो इष्टः प्रदापयेत्‌ ॥ 
प्रदकिएं ततो बद्धः कारयित्वा दिजोत्तमेः। 
पुनरेत्य म्रवेष्टव्यास्तोरणान्तरनिगंताः ॥ 
श्रघेमाच्येश्च गन्येश्च भोजनायैखयेव च । 
ग्टहागतेषु वादेषु श्रध दचान्नराधिपः ॥ 
ततस्तेनैव विधिना सर्व्वानाूच्यः श्रालिभिः । 
नाना चापि नेवेद्यानि रेवन्ताय प्रदापयेत्‌ ॥ 


ना - ाा ००००-५७- क 


१  शरावान्‌ मूय्ये ¦ 


॥ 


कछव्यर्नला करः 1 


श्रचिंतेषु ततो वेद्यः कणेजापभिमं वदेत्‌ .! 
कोोत्तितं मुनिभिः पूवव वाजिशशस्तायवेदिभिः ॥ 
ववे देवमय तवं हि सर जातिं दयोत्तम । 
व्यै यलात्वथा रच्छं मम भन्तः सुखाभव ॥ 
कणेजापं भिषग्द्ला यथाख्यानं ततो हयान्‌ , 
स्थापयेत्‌ कतमङ्गल्यान्‌ इष्टान्‌ कंल्मषवच्छितान्‌ ॥ 
नाचयेज्नलजेः पुष्पेर्वाहानर्धविधि प्रति । 
सौगन्धिकं दिष्रषेण तेषां दद्यान्न सव्वेद्‌ा ॥ 


एको नौोराजनविचिः | 
अपरस्य 


सखातौ नाम रेः पनौ वड़वारूपिणौ रथम्‌ । 
वदन्तौ चाश्चिने मासि सु्येरश्मिसमाथचिता ॥ 
सप्ताहं पोडयेदादान्‌ ततः खाता्धिंता ग्ट । 
रेवन्तं पूजयिलाय बद्धा पोडालिकां गले ॥ 
सुरायोऽरिष्ट दिङ्गया पञ्चरनाज्यमषपेः । 


सुरा भोरउर इति प्रसिद्धा श्रयो लोहं अरिष्टं हरिट दः 


स्यात उयं वचा॥ 


देषो निम्बाच्य-सिद्धान-श्धतकेणो-वरा(दो)दिभिः ॥ 
द्वितो यादि नवम्यन्तं शक्तपकेऽकतेजषः | 

सप्ताहं तान्‌ कटे तस्मात्‌ परेर्वावद्य रचयेत्‌ ॥ 
वातायोहाटनं राचौ कारयेश्ुष्डना दिकम्‌ । 
माषञ्ुल्प्ाषमांसादयेदंो दि च्‌ बलिनिंशि ॥ 


क्त्यरल्लाकरः । ` २३९ 


ॐ लो कपाल-ग्रद-नच्च-खरासुर-गन्धव्वं -राचस-विद्याचर- 
गङ्ड-महोरग-गज-देवता- तिचग्त-पि ग्रा च- कर व्याद्‌-मनुख्भ्यो- 
ऽयमाहार दममादाय समन्तादु पश्ास्यन्त सुरालयं गच्छन्त सादा । 

शान्तिदहोमौ ततः कुर्य्यात्‌ खाप्याश्च दृषधन्वजाः । 
अजग्डागाः | 
दति खालोपाताध्यायः॥ 





हस्तद्वाद श्र विस्तो णंमेशान्यां यागमण्डपम्‌ । 
पराङ्ुप्रतोचोसुखं कुर्खात्तोरणएदयसंयुतम्‌ ॥ 
नानाध्वज्ञपताकामिधेनमाच्याद्चलङतम्‌ । 
शास्लविन्निपुणः स्नातः श्णुक्तमाल्याम्बरः इएचिः ॥ 
उपवासो यतो वेद्यः कनकाङ्गलिग्डषितः। 

शेतं पौतं तथा रक्र छष्णञ्च हरितं कमात्‌ । 
पञ्चवणेरजः छता पातयेदेकमानसः ॥ 
श्रविच्छनाः एभा रेखा मध्याङ्गलिमिताःखमाः । 
भवभस्मरजः शेतं यहान्‌ दन्यरुणं गणान्‌ ॥ 

पोतं रचोऽरान हृष्णं समस्तं विश्रूपकम्‌ । 
शाने शान्तिकं चक्रं चतूर्वाहषमाय॒तम्‌ । 
चतुर खं चतुरददारं सव्वेतोभद्रमण्डलम्‌ । 
चतुरस्तायतं वाष्टौ षोड्श्ारन्नि वा श्भम्‌ 1 
गजेन्धवाहनं पौतं शक्रं बञ्ञायुधं तथा । 
प्राच्यामेतं लिखेदोरो विदिश्वभिं लिखेत्‌ पुनः ॥ 


२४० 


छीव्यरल्ाकरः | 


आरक्रमजारूदुञ्च भ्रक्तिहम्तन्तु वा भिषक्‌ । 
यमं दण्डायुधं शामं मदहिषस्धश्च द किणे ॥ 
प्रतस्यं खञ्ग स्तन्तु कृष्णं विदिशि नेशटेतम्‌। 


` सपाशं वर्णं श्णक्त प्रतोच्यां मेघवाहनम्‌ ॥ 


वाय विदिशि धूम्राभ गगारूढ्ङ्कुगशायुधम्‌ + 
कवेर इरित्य॒दो च्यां विमानखं गदायुघम्‌ ॥ 
ठषभखं चिशूलेन पाशानां श्ेतवणेकम्‌ । 

विदि श्वेवं लिखेतव्वं लोकपालेष्वयं क्रमः ॥ 
चिभागमण्डलात्प्वं पद्मात्युष्करमालिखेत्‌ । 
इष-धेनु-मख-लाजान्‌ मल्छ-ङक्कट-शायकान्‌ ॥ 
प्रशस्तान्‌ स्थापयेत्त च ॐ सखाडान्तगेतान्‌ यजेत्‌ ॥ 


ऊकार खादहाकारमध्यमतानिव्ययंः । 


लोकेश्ान्‌ वस्त्रगन्धायर्नानाद्यन्नपिष्टकैः । 
सुवर्णायुधदिकयालान्‌ सोपानच्छवपोठकैः ॥ 


ुवणायुधदिकपालान्‌ खकोयासाधारणवएेवतस्तया विधायुध- 


वतश्च तानित्ययेः । 


डेमान्‌ हेमाम्बुनेः श्रान्तः खातो-सपतौश्वरौ खरान्‌ । 
प्राङ्मुखो व्याप्रच्नेश्स्िठदराजोपदोत्यय ॥ 
चो रतण्डुलखपिं भिंदिंजः पाते चरं श्रपेत्‌ । 
विधिवत्‌ पावकाश्रायामाडतौलैह्यात्चतः ॥ 


'ब्रह्माण्मभि. सोमञ्च विषएमिन््ं प्रजापतिम्‌ | 





९ $ मातैष्डम्‌ | 


ज्त्यरनाकरः | २४१ 


र शानं विश्वकर्म्ाणएमश्धिनौ वरुणं यमम्‌ ॥ 
चद्धनुदरं सया दि त्यान्‌ विश्वावस्ु-मरह्णान्‌ 
साध्यान्‌ खातोमय मघां नचचं गरड़ोरगान्‌ ॥ 
शक्रे इरस्पतिश्वेव वृद्धिं मेधां सरखतौम्‌ । 
सिद्ध-गद्यक-गन्धर्ववान्‌ दिङ्खदो-नद्‌-सागरान्‌ ॥ 
गणेशान्‌ दिग्गजान्‌ शेलान्‌ यहानप्यरसो सुनोन्‌ । 
वनस्यत्योषधौस्तारा अन्तरो चतलस्थितान्‌ ॥ 
सुरानसुरांख ॐकार खादान्तगेतान्‌ यजेत्‌ । 
दण्डवद्यस्तु गन्धोयरुच्ो विश्वोदिजा(ग)करः । 
विप्रकोणेशिखो व्यक्रवण धूमाङ्लः वितः ॥ 
-चिरोत्थायौ च दुगेन्धः सप्नाङ्गराच्यनाश्ननः। 
होढदाहो च धनदो गजहा शक्रचापवत्‌ ॥ 
अद किणावन्तेशिखो विधूमः काञ्चनप्रभः । 
-चो र-लाजान्नग्ड्‌-मास्दय-इ विग स्पिजेयावहहः ॥ 
अभ्चिपरोच्चा । 





अथाभिषेकः। 
कास्यं ताब्रं तया श्रङ्कः गन्धमाद्यार्घधारकम्‌ । 
्र्येकं तोरण्दारे पूणेकुम्भान्‌ न्यसेच्छभान्‌ ॥ 
-अप्रखूनगन्धमास्यपराद्यक्कच विश षितान्‌ । 
ठुरगान्‌ चौ रितान्‌ खातान्‌ इयान्‌ राजघुरःखराम्‌ 
यागागारं नयेत्‌ सर्व्वानभिषेकोक्रमाचरेत्‌ । 
अद्ङिएच्य रता व्यजेहौोप्रो खया इएभम्‌ ॥ 


१९६२ 





हीव्यरनाकरः। 


करोत्येवं हि यस्तस् चिवगेफलमिच्छति । 
ल्म विश्वषणएञ्चायुरुंभते स सुखं ध्रः ॥ 
नृपतेस्तोरणे भग्र पतिते मज्िणो वधः । 
सक्रयादे कुमारस्य ससपं च पुरोधसः ॥ . 
भद्र मश्वङ्लोद्धूत वयःखं सुप्रमाणएकम्‌ । 
सव्वेलचणमम्पन्नं वरेकम भिषेचयेत्‌ ॥ 
वकम विचित्रवणंम्‌ । वि 
मङ्गलालङ्कतं नौला नद्यां कमम. समाचरेत्‌ । 
दध्यन्नश्रेतमाच्याचयेमंन््ेए वरुणं जपेत्‌ ॥ ` 
७ .प विच, मङ्गलं श्वतं पा ग्रस्तं जलासनम्‌ । 
जोवनं प्रतोच्यां खमासौनं सन्वैसलानामण्टतसम्मवं खाहा 
ददर षक्वाव^व्ोक राजवेश्याङ्नान्‌ खदम्‌ । 
नदो भदन्त-गोश्टङ्गादादायालेपयेत्‌ कमात्‌ ॥ 
दृद्रेति शष्रस्ानम्‌ ; 
दरें शिरः कणौ इदयं शिश्रमेव च ॥ 
पराकुपञ्चाच्छोऽपुच्छादोन्‌ वेधः श्टचिविग्रषणः। 
खापयेवच्छोपुधिकराङ्ग दधि चोर ठताम्बभिः॥ 
वचा-विस्वाऽषटता-देवौ सहा चैवापराजिता , 
देवौ चोरमर्रिति प्रसिद्धा सहा चिखङ्मारौति प्रसिद्धा । 
पिषटोन्माञ्य(?) ततः एतं जलोत्यमलुमा्लैयेत्‌ । 
साचतेवेन्धनेः पिष्टः चोरण्टचमधकजेः ॥ 





१ 7 कुल्माष | 


कछत्यरन्ाकरः । ' ३8द 


ओल-पियङ्ग-सिद्धाये लो प्रापामागंतप्डलः । 
ततस्तं खापयेदश्ं प्राङ्मुखं कुशस्तरे . स्थितम्‌ ॥ 
सौव राजतेस्ता्ेः परैव ण्मय घटेः । 
पूरितं साहतच्ौमं श्वेतचन्दनच्धिंतम्‌ ॥ 
रचान्वितं सदहोपाश्वं नयेत्‌ सूग्दामग्दषितम्‌ । 
सदहोपाश्च सानुचराश्चम्‌ । | 
राजा गलोत्तरे यागग्टद. छ्चला यथाविधि ॥ 
दूतः प्रश्ठति वाहानां दयराजस्वमग्णणैः | 
श्रभिषेकं प्रतोच्छखेत्य॒क्ता तोर णएमष्यगम्‌ ॥ 
। श ५ 
म्ाञ्ुखं वयाप्रचमस्यं पञ्चरन्राचतेयुतान्‌ । 
वचादि-सलौ-शिला-ताल-भद्र-दन्तौ -निश्रा-मदान्‌ ॥ 
चायन्तों सोमराजोञ्च समङ्गामच्जनं वरोम्‌ । 
पिष्टा इम्भाम्भखि भाश्च ्राखामौदुम्बरौ सपेत्‌ ॥ 
वचाटि- 
वचा विच्वाग्टता देवौ सदा चैवापराजिता) 
दति पूव्वकथिता, स््लो दरिद्रा, शिला मनःशिला तालौ 
इरितालः, भद्रं सुस्तक दन्तो दान्नोति म्रषिद्धा निशा दार 
हरिद्रा, मदः कष्ठरौो जयन्तो तिला सोमराज जोवाणडजि- 
रिति प्रसिद्धा समङ्गा मज्जिष्टा श्रञ्ननः शोभाञ्जनः, वरौ श्तावरे। 
नृपोऽय पूजयेत्पदमेः- काञ्चनेभिंषजा सह ॥ 
मन्त्रपूतं चरं भोज्य शौ चयित्रानुलेपयेत्‌ । 


१ 4 -- मयान्‌ । 


छत्यर्नल्करः 1 


गन्धेस्ततोऽचचयेत्‌ पुष्पैः स्थ लजेजंलजेविंना ॥ 
ब्रह्माण्ठे च नमख्छत्य सुनये कश्यपाय च । 
इविःगरेषं बलिं ष्टङ्धन्‌ कुरुष्व विजयं प्रभो ॥ 
वैद्योपनौत पिण्डं चेदतिजिच्रति वा इयः । 
जयक्तेमसुभिचाय दचिणक्किञ्च वजेयेत्‌ ॥ 
बद्धवित्ते शरूवद्यां केगेऽक्ञा वरुणो, इदि । 
्रावन्तं दिक्‌ दृर्रौन्दकौ कणेयोरश्िनौ वचः ॥ 
जिहायाच्च जवे वायुन्ले विष्णु रदे यमः । 
पाश्वं रुद्राः खधा वेदे वैनतेयः पराक्रमे ॥ 
नागष््ठन्तु पृष्टे स्छात्‌ विश्वेदेवाश्च मश्रे 
खुराणे पन्नगा धर्मा गोवायामनलो सुखे 
कंचावध्वा रतिः ओश्णां मारतो आनुसन्धिषु ॥ 
याद दषते चो्वोरोषध्युरसि वासुकिः ! 
विन्यस्याङ्गे सुरान्‌ कणं जपेदचिएतो भिषक्‌ ॥ 
सार गन्धव्वेराज लं शटणव्य वचनं मम । 
गन्धववङ्धलजस्वञ्च माश्ठः कुखविदूषकः ॥ 
दिजानां सत्यवाक्यानां सोमस्य भास्करस्य च । 


, शद्रश्य वर्णस्येव पवनस्य बलेन वा ॥ 


ताश्नस्य दोघ्याःच खर जातिं त्रक्गम। 
सर राजेन्द्र प्र लं सत्थवाक्धमनुसरन्‌ ॥ 
खर त्वं वार्ण कन्यां सर लं कौस्ुभं मणिम्‌ । 





१ & रङ्कना। 


ऋत्यरलाकरः । , ३.४५ 


बौरोदसागरे चेव मथ्यमाने सुरासुर: ॥ 

तजर जातोऽसि गन्धव्वै नाच्ना उद्धेःषवा इयः । 
तज देवकुले जातः खङ्खं९ प्रतिपालय ॥ 
कुले जातसवमश्चानां मिच मे भव शाश्वतम्‌ । 
यस्य मिचलभेतच्च सब्वे सर्व्वे सव्वधा ॥ 
ययादं सर्व्वभूतानां तया मां प्रतिपालय । 
श्रचयञ्चाव्ययञ्चापि श्रावडहे सिद्धिमावड ॥ 
मण्डलं दशशयितला तु पुनमेन्त् जपेन्छरुतौ । 
यु्तयष्टं समारद्य इता रत्याः सरः पुरा । 
अधुना लां खमार्दय रिपुं जयतु सत्भुः ॥ 


कणेजापमन्लः । 





रासं समयं न्यस्तसुटोच्यां दरिणाभुखम्‌ ) 
रक्रयुष्यां रकं विप्रो इदि श्येन ताडयेत्‌ # 
खण्यव्धारद्च चारन निग च्छन्तोरणान्तरे । 
पार्थिवो मन््संपूतेः सिच्यमान: कुशोदकैः # 
अजयेव्यागिषमादाय वै्ामात्यपुरोधसाम्‌ । 

६4 % भ्य्वैये 
ख तयेव गड गत्वा इयानग्यच्येत्‌ सुरान्‌ ¦ 
भिषकुपुरस्तान्‌ रृष्णान्‌ यथास्थानं समादिशेत्‌ ॥ 


अभिषेकविधिः। 





१ ^ नुकुलम्‌ 


३९६ 


` कछव्यस्नक्ररः। 


अथ वरुणपूजा । 
वरुण इहागच्छ ॐ वरूणाय नमः| 
एहिं दव जलाध्यच्च यःदोगणमहेश्वर । 
नागदेत्योरगगणेः सततं सेविताच्युत ! ॥ 
नमोऽस्त ते वारिचरशेष्टठ पाश्रधर ग्रह। 
मरोपालं जग॑त्छाश्चं रख च शतं समाः ॥ 
ये ओष्ठा भुजगा दिया भुवि अष्टा जलाश्(ल)याः ॥ 
भगवद्भो नमस्तेभ्यो जले रचन्तु वाहनम्‌ ॥ 
या नद्यः सागरं यान्ति पूव्वेगाः पञ्चिमाश्च याः 
याश्चापि दचिणं यान्ति ये च स्व॑ जलाशयाः 
तानहं प्रतः सर्व्वान्‌ प्रणमामि कताञ्ञलिः ॥ 


वरुणपूजामन्तः- 


यां गतिं ब्रह्महा गच्छत्‌ पिदा मादा तथा ) 
ब्रज त्वेतां गतिं चिप्रं तच्च पापं भवेत्तव ॥' 
विषति धदि गच्छस्तं युद्धेऽध्वनि तुरङ्गम । 
रिपुं विजित्य समरे सह भरवां सुखो भव ॥ 


कणंजापमन्तः- 


नमो रेवाधिदैवाय तुरङ्गवनव्ारिणे। 


' खथ्येयुत्राय देवाय तुरङ्गाणां हिताय च॥ 


तुरक्गपरिषद्यस्य ब्धगयोपरि धावति । 
साश्वमश्चाधिप रच शरण तवां बजाम्यहम्‌ ॥ 
चे वन्तपुजामन्त्ः । 


क्रत्यरन्राकरः । - २९७ 


ब्रह्मएुराण- 
्रश्वयुक्‌ष्रक्ञापच्छे तु खातियोगे सुशोभने । 
पव्वैसुचेः्रवा नाम अयमं रूरखैमावरत्‌ ॥ 
तस्मात्‌ साश्वेनंरेस्तच्र पून्योऽखौ अद्धया सदा । 
प्ूजनोयाश्च तुरगा नवमौ यावदेव इडि॥ 
शान्तिखस्ययने कायं तदा तेषां दिने दिने) 
धान्य भल्लातकं कुष्ठं वचां सिद्धाथेकं तया ! 
पञ्चरङ्गण खचेण कण्ठे तेषान्त्‌ बन्धयेत्‌ । 
वाययरवारुेः सौरः शाक्रेम॑न्लेः सविस्तरः ॥ 
वेश्वरे वैस्तथाग्रेखे हमः काची दिने दिने। 
तुरगा रच्णौयाश्च युरुषेः शस्त्रपाणिभिः ॥ 
न च ताद्याः कचित्तचर न च वाद्याः कथश्चन । 
च्येष्ठायोगे पुरा तच गजाश्चाष्टौ महावलः ॥ 
एयिवौ मवडन्‌ पूव्वे सगेलवनकाननाम्‌ । 
कुसुदेरावण्णे पद्मः घुष्यदन्तोऽय वामनः ॥ 
सुप्रतोकोऽच्ननो नोलः तस्मात्तान्‌ तच पूजयेत्‌ ॥ 
शाकरादृच्वात्‌ समारभ्य नवम्यन्तञ्च पूव्वेवत्‌ । 

ग्धो तिःशास्त पूजामन्तः- 
पान्त वो वसवो रुद्रा ्रादित्याः समरन्गणाः 
भत्तारं रच नागेन्द्र समयः प्रतिपाद्यताम्‌ ॥ 
अवाप्तो डदि जयो यद्धे समये खस्ति नो व्रज 
श्रोते शोमाद्लं रृष्णात्‌ तेजः स्याट्‌ जवोऽनिलात्‌ 


2४८ छव्यरलाकरः । 


खेच भेरोजंयो रद्राद्यरो देवात्‌ पुरन्दरात्‌ । 
यद्धे रचन्त॒ नागास्तां दिशश्च सह देवतः ¦ 
शरश्विनौ सदह गन्धर्वैः पान्त लां सव्वेतः सदा + 
दति गजाष्टकप्रूजा । 
जद्यपुराणे- 
ष्ररक्ता यक्‌चतुर्थ्यान्त जहौ देहं जक्ते सतो । 
तस्मात्‌ सा तच सनयव्या स्वे सौभाग्यवद्धिनौ ॥ 
र्यः पुष्येश्च दोपे धृपे्मा्येशच कङ्कणः । 
कङ्कण शिन्दरम्‌ । 
कुङ्कमाश्जनवस्तं च नितज्िन्यपयोगिभिः । 
लवणालक्रकाभ्याञ्च गुड़ाट्रंकफलेस्तया ॥ 
नामुदिष्छ तु नाय्यषठ पूच्याः सर्जो वभनत्तकाः । 
भगिन्यो मातरश्चैव तथा नाः पतिव्रताः ॥ 
अविव्यपुरारे- | 
तया चाश्वयुजे मासि पञ्चम्यां कुश्नन्दन । 
रुला करश्रमयान्‌ नागानिन्राश्वा षडह पूजयेत्‌ ॥ 
'हतोद काभ्यां पयसा खापयिला विशान्पते । 
गोधुमेः पयसा खिन्ते भच्येश्च विविधैस्तथा ॥ 
यश्लस्यां विधिवन्नागान्‌ एएतिभेश्या समन्वितः 1 
` 'ूजयेत्‌ रथाद तश सेषादयो नृप ॥ ` 
नागाः मरोता भवन्तौह शाज्तिमाभ्नोति वे प्रभो 
इति शान्तिपञ्चमोत्रतम्‌ ॥ 





छत्यरल्नाकरः । ३8९. 


अथ मूत्तिपुजाव्रतम्‌ । 
भवि्यपुराणे- 
मासि चाश्वयुजे वोर शएक्तपचे तरतं श्टण । 
छलेकभक्तं पञ्चम्यां षष्ठयां नक्त समाचरेत्‌ ॥ 
रया चितन्त्‌ सप्तम्यासुपवासमतःपरम्‌ । 
उपवासपरोऽष्टम्यां पूजयेचण्डिकां बुधः ॥ 
पद्मपचेचणां सौम्यां पूणचन्द्रनिभाननाम्‌ । 
चतयुजां शूलधरां खङ्ग -घण्टायहस्तिनोम्‌ ॥ 
दन्तेषु मौक्तिकं न्यस्य विद्रुमं चोष्ठयोदरेयोः । 
खङ्ग-घण्टाय्हस्तिनो खद्ग-घण्टाग्रसमुद हदस्ताम्‌ ॥ 
शतलालिणौ बच्रमये दौो्घापाङ्गं नराधिप । 
खन्ञप्रहरष्णदटोनि नानावर्णीनि विन्यसेत्‌ ॥ 
बञ्जमये होरकप्रकतिके । 
कार्पासिकेरण्डजेश्च वासोभिः पूजयेदुमाम्‌ । 
वि विधेरभच्छभोव्येश्च फलसेनाना विधेस्तथा ॥ 
भोजयेडाह्मणएणन्‌ भक्या तथा भागवतान्‌ नुप । 
भोजयिला तु तान्‌ मह्या दुर्गायाः पुरतो न्यसेत्‌. # 
श्रण्डजेर्वासोभिः पट्रवस्तेः । भागवतान्‌ भगवतोभक्तान्‌ 
एवं थः पूजयेदचौं दुर्गायाः श्रद्धयान्वितः । 
स नरः सव्वेयन्ञानां फलं प्राप्य दिवं व्रजेत्‌ ॥ 
पुनरेत्य महाभागो राजरानाधिपो भवेत्‌ । 
दाता सुरूपः सुभगः पुचवान्‌ धनवान्‌ भवेत्‌ ॥ 


० क्त्यरनाकरः : ` 


्रहयपुराण- 
तचाष्टम्यां भद्रकालौ दच्यन्नविनाशिनो । 
प्राद्श्वता महाघोरा योगिनोकोटिभिः स ॥ 
अतोऽयं पूजनोया सा तस्िन्नहनि मानवेः । 
उपो पिते-वैस्त-धूप-माच्य-रन्नानुलेपनेः ॥ 
दौपेरन्ये्था भच्छेः परजेगलेशच धान्यकः । 
श्रामिवेविविधेः शाकै हने ्राह्मएतपेणेः ॥ 
विल्वपत्रेः मरो फलेश्च॒चन्दनेन तेन च । 
पश्रटुभिः पानक्रेदेये राचिजागरणेन च ॥ 
दुर्गाण्टहे तु शस््लाणि पूजितयानि पण्डितैः । 
वाद्यभाण्डानि चिद्भानि कवचान्यायुधानि च ॥ 
रातौ च श्िन्िभिम्तानि खानि पूज्यानि स्वेदा । 
नवस्यान्त्‌ छतलतानेः सर्व्वैः पूज्याश्च ब्राह्मणः ॥ 
भुक्ता तु शान्तिः कत्तेव्या योगे गोधूलिनामनि । 
यदुक्तं शालिदोत्रे च च्योतिःशास्ते च -चन्मतम्‌ ' 
अरथव्वेबेदे यत्‌ श्रोक्तं तच्च तच्च समाचरेत्‌ ॥ 
शलिहोचे श्रश्वश्िच्लाग्रास्लविशेषे । 
चिवा सङ्क्षटं काग ह चिमे दारूवेश्लनि । 
अवणे चाथ सन्ध्यायां निदत्त ग ततः ॥ 
नि्दंद्यमानौ तौ तच निगेच्छन्तौ विभावयेत्‌ । 
दिशं शान्तां प्रदीप्तां वा दग्धां वा तत्‌फलप्रदाम्‌ ॥ 
दर टव्याश्चात्तश्रस्लाश्च राज्ञां नोराजने जनः ॥ 


ल्मत्यरल्नाकरः । २५१. 


य देवोपुराण- 
आश्िने मासि मेघान्ते मदिषारिनिवद्दिणणेम्‌ । 
देवौ तां पूजयिता तु श्रद्धरादेऽष्टमौषु च ॥ 
घातयन्ति पश्यन्‌ भक्या ते भवन्ति महाबलाः ¦ 
बलिञ्च ये प्रयच्छन्ति सब्बेग्रतविनाग्रनम्‌ ॥ 
तेषान्तु तुष्यते देवौ यावत्‌ कल्यन्त्‌ शाङ्रम्‌ 
क्रोडन्ति विविधेमागे देवलोके सुदुलभे ॥ 
तया- 
कन्यासंस्ये रवो वत्स श्रुक्ताष्टम्यां प्रपूजयेत्‌ । 
स्मेपवासो निग्राद्धं तु महाविभवविस्तरेः ॥ 
पूजां समारभेदेव्या रचक्चं वारिमेऽपि वा। 
पशो घातः प्रकन्तयो \गवलाजवधस्तया । 
बलिच्ेपस्तु र केभ्यः कायैः सर्व्वाधिश्नान्तये 
रचकच्चं मृलनचते वारिमं पूर्व्वाषाढानचजं गवलो मा द्िषः ॥ 
्रगमान्तरे- 
आश्विनस्य सिताष्टम्यां मदहिषासुरनाशिनो । 
प्रादुश्धेता महाघोरा योगिनौकोटिभिः मह ॥ 
श्रतोऽयं पूजनया सा तस्मिन्नदनि मानवैः । 
उपो षिते- वस्ल-माच्े धृप-गन्धानुलेपनेः । 
दौपेबेड विधे्भच्छेः फलेमूलेश्च धान्यक्गेः । 
श्रामिषे विंविधेेव बङ्धि-बाह्यणएतरपैकेः ॥ 


पिपरि गगणे 


१ ^ गवल्लाजस्य वाप्यथ] 


२५२ छत्यरलाकरः । 


विश्वपदेश्चन्दनेश्च कुङ्कुमेन तेन च । 

पशुभिः पानके राचिजागरण्न च ॥ 

सर्मांसरुधिरेदत्ते दवी तुष्वति वै खश्‌ । 

दर्गाग्टे तु श्रसखाणि प्ूजितव्यानि मानवैः ॥ 

वाद्यभाष्डानि चिन्धानि कवचान्यायुधानि च। 

राच्ौ च शिल्पिमिस्तानि खानि पूज्यानि यनतः ॥ 
ॐ दुगं दुगे रचणि खादा । 

जयन्तो मङ्गला कालो भद्रकालौो कपालिनौ । 

दुगां शिवा चमा धातो खाहा खधा नमोऽस्तु ते ॥ 

श्रब्ठतोद्धवं ओरौ टं महारैवप्रियं सदा । 

विल्वपचं प्रयच्छामि पवितं ते सुरेश्वरि ॥ 

चन्दनेन समाजे कुङ्कुमेन विलेपिते । 

विल्वपच्ररृतापोड़ दुर्गेऽहं शरणं गतः ॥ 

एभिमन्ते द्वोणएपुष्य-विल्वपच-जात्यादिभिः पूजयेत्‌ । 

कपूरागुरुचन्दने विलिप्तं गगगुलु चन्दनादिभिरधपं दला वस्ते- 
शाच्छाद्य नेवेद्यं दद्यात्‌ । . 

पश्च न्मदिषमजं मेषं वा लचणणन्ितम्‌- 

ॐ कालि कालि वञ्चेश्वरि लोददण्डाय नम दति ज्वा विजनच- 
कामः खद्घन घातयेत्‌ । 

ततश्च तद्रक्रमां साभ्यां माकौ गरिकमन्त्राभिमन्तिताभ्यां नैशत्यां 
दिशि-ॐ पूतनाये नमः, वायव्यां ॐ पापराचख्ये नमः, रेशन्यां 
७" चरक्ये नमः, भव्यां ॐ विदाथ नमः, एमिरमेननेवलिं दद्यात्‌। 


छ्त्यरल्नाकरः । २५३ 


माकौ शिकमन्तस्ठ- 
७ॐ कँ ॐ खरु ॐ कुल्व २ ॐ धुन २ ७ॐ गुल्‌ २ ७ 
तुल्‌ २ ॐ धुलु ९ मारय ₹ विभ्वामय २ कन्य २ कम्पातय २ 
पुर ९ पूरय द्र ७ अभर फट्‌ पाट्‌ मदंय ९ ॐ 
ह ॐ द । चरनेन श्र पिष्टमयं खङ्गेन धातयिला सम्रणवेन 
सखनान्ना सकन्द-विग्राखयो दला सातम्‌ ॥ 
ॐ श्रसिविश्रसनः खज्गस्तोच्एधारो" दुरासदः । 
श्रौगमौ विजयद्धैव धर््माधारस्तथेव चर । 
इत्यष्टौ तव नामानि खयसुक्तानि वेधसा । 
नचचं छन्तिका तुभ्यं रदवो महेश्वरः ॥ 
हिर ्वञ्च शरौरन्ते देवतन्त्‌र जनार्दनः । 
पिता पितामहो देवस्वं मां पालय सव्वेदा ॥ 
द्यं येन टता चौणौ तख मदिषासुरः । 
तोच्एधाराय इएद्धाय तस्मै खङ्गाय ते नमः ॥ 
दूति खडपूजा । 
सर्व्वायुधानां प्रथमं निश्मितासि पिणणकिना । 
शूलायुधादिनिष्कु्य इला सुषि श्भम्‌ ॥ 
चण्डिकायां प्रदन्तासि सर्व्वाश्भनिवदंणौ । 
तया विस्तारिता चासि देवानां प्रतिपादिता ॥ 


1 1 





१ 7 विकर्मा च। ९ ^ घश्मेपालस्तथेव च । 
२ 8 धाता देवो) 
४५ 


२४8 





छत्यरनाकरः | 


सन्वैसत्वाङ्गभ्य लाऽसि सव्वेदटनिवहंणो । 
कुरिके रच्छ मां नित्यं शान्तिं यच्छ^ नमोस्तु ते ॥ 
दति इुरिकापरूजा । 
रचाङ्ानि गजाकच् रच्च वारि धनानि च । 
भम देहं खदा रचे कटड़ारक नमोऽस्तुते ॥ 
दति कड़ारकपूना । 
सर्व्वायुधम माच सव्वेदेवारिषदन । 
चाप मां खमरे रक्त शाकं शरवरेरिह ॥ 
तं छष्णेन रच्ायं खंहारायं हरेण च । 
चयोमूत्तिंगतं देव धनुरस्त नमाग्यदहम्‌ ॥ 
दति धनुःपूना । 
दुनदुमे लं खपननानां घोषाद्धदयकम्यनः । 
भव मिपसेन्यानां तथा विजयद्धेनः ॥ 
यथा जमूतघोषेण इध्यन्ति वरवारणाः । 
तयास्त॒ तव घोषेण दर्षोऽस्नाकं जयावहः ॥ 
दूति दन्दुभिपूजा । 
तसुम्बखवो रद्रा वायुः मोमो महषयः । 
नाग-किन्नर-गन्धव्वे-यच्च-श्वत महोरगाः ॥ 
प्रमथाश्च सद्दा दित्येशवतेशा माभिः सह । 
शक्रसेनापतिः खन्दो वरुणश्च खितस्लयि ॥ 


पी गो) न 


१ 4 शान्तिं रेदि | 


छव्यरन्ाकर्‌ः। २५४५. 


कालनेभिवधे यद्वत्‌ तथा चिपुरघातने । 

हिर ण्छकभिपो वृद्धे युद्धे देवासुरे तया ॥ 

शनो भिताऽसि तथेवाद्य शोभसख समयं सर\ । 

नोलां रेताभिमां दृष्टा नश्वन्तवाश् ममारयः ॥ 
दति पताकाप्ूजा 

शन्मप्रदस्वं समरे वन्मेन्‌ सेन्ये ग्रोऽद्य मे । 

रच्च मां रच्णोयोऽहं तापनेय नमोऽसते ॥ 
दूति वश्मेपूजा ` 

प्राणान्‌ पातय शचोस्वमनया लोकमायया । 

ग्टहाण जोवितं तेषां ममाशास्यञ्च वच्छताम्‌ ॥ 
दति कुन्तपूला 

श्रश्ाङ्ककरसङ्काश्र श्रङ्कडिण्डोरपाण्डर । 

प्रोव्छारय लं दुरितं चामरादि विश्षितः॥ 

यथाम्बृदग्छादयते श्रिवायेनां वसुन्धराम्‌ । 

तथा मां च्छाद्य कच युद्धेऽष्वानं श्तं सटा ॥ 
दति कचपूजा । 

पुण्वस्तं शङ्खः युण्छानां मङ्गलानाञ्च मङ्गलम्‌ । 

विष्णुना त्वं तो नित्यमतः शाज्िं प्रयच्छ मे ॥ 
दति शङ्खुन्पूजा । 

विजयो जयदो जेता रिपुघालौ भियङ्करः । 

द्सस॒हो धम्मदः शान्तः सर्व्वारिष्टविनाग्रनः ॥ 


९ क्चित्‌-- गोभखास्मां ख संस्र । 


५६ 





दछंव्यरनाक्छरः | 


९दृत्यष्टौ तव नामानि यस्मात्‌ सिंहपराक्रमे ¦ 
तेन सिहासनेति लं नान्ना दैवेषु गोयसे ॥ 
नमस्ते सव्वेतोभद्र भद्रो भव महौपतेः | 
चेलो क्यजय सर्वैस सिंहासन नमोऽस्तु ते ॥ 
दूति सिहासनप्रूजा। 
दूति महाष्टमो । 


भ विव्यपुराणए- खुमन्त्रवाच- 


नवम्यां ओरोसमायुक्ता देवेः सर्वः प्रपूजिता । 
जघान मर्दिषं दुष्टमवध्य देवतादिभिः॥ 
सब्धाभिषेका वरदा शक्त चाश्वयुजख तु । 
तस्मात्‌ सा तच सन्यज्या नवम्याञ्चण्डिका वृधेः ॥ 
मलं हि यतः प्राप्ता तज देवौ सरखतौ । 
ञ्रतोऽयं महतौ मोक्ता नवमोचं सदा वृधेः ॥ 
पूजयित्वा महदादिके नवम्यान्तच चण्डिकाम्‌ । 
महत्वं प्राप्रवान्‌ वोरो ब्रह्मा विष्णस्तथामराः ॥ 
तस्मादियं महापुण्या नवमो पापनाशिनौ । 
उपोय्था तु प्रयनेन सततं सव्वेपार्थिंवेः ॥ 
मूलोत्तरेण छष्ेण संयुक्ता विधिवन्नप । 
विशेषतो ध्यानजयेर्बाल्टद्धैः सयोवतैः ॥ 
ब्राह्मणः चतय वेशः शप्रैर खख सेवकैः । 
शच दानानि देयानि सोपवासेनेरेनेप ॥ 





९ मूले- इत्यष्टौ सन्निधी प्रोक्तास्तव सिंहा महाबलाः । 


छत्यरन्नाकरः । | २५७ 


गोसुवणादि राजेच्ध वस्लाशि विविधानि च। 
खममांसरुधिरेदत्ते दवौ तुव्यति वे ग्रम्‌ ॥ 
मददिषौ-क्ाग-मेषाणणं रुधिरेण तथा नप । 
समे कमेक वरटा ठश्रा भवति चण्डिका ॥ 
सहसत दरप्तिमायाति खदेदरूधिरेण तु । 
तर्पिता विधिवदूर्गां भिला बाहरुजङ्गके । 
नारेण शिरा वौर पूजिता विधिवन्नृप । 
प्ता भवेदभशं दुर्गां वषार्णां लच्छमेव च ॥ 
एवं नानानञेच्छगणेः पन्यते सव्वैदस्यभिः । 
श्रङ्ग-वङ्ग-कलिङ्गेश्च किन्नरोवव्वेरः शकैः ॥ 
मासि चाश्वयुजे रक्ता नवमौ या नराधिप । 
तस्यां यत्‌ क्रियते वौर नरः खानादिकं प्रभो । 
तत्सव्वैमच्चयं तेषां तदे सिद्धिकरन्तथा ॥ 
देवोपुराणे-- ब्रह्मोवाच- 
इते घोरे महावोरे सुरासुरभयङ्रे । 
देव्या उपाख्का देवाः प्रश्ता राच्सास्तथा ॥ 
श्रागताः घातितन्दृद्वा मद्दिषं तं सुदु्नंयम्‌ । 
बरह्म -विष्ण-सुरेगाना इन्ध-चन्द्र-यमानलाः ॥ 
श्रादित्या वस्वो र्द्रा यहा नागाः सद्रद्यकाः। 
समेत्य स्वं देवास्ते देवों भलया प्रतुष्टबुः ॥ 
वरश्च सव्वेलोकानां प्रददौ मयनाशिनो ॥ 
बलिन्दद्ख्च श्रतानां महिषाजाभिषेण च । 


३५८ छव्यरल्लाकरः। 


पवेयुः शङ्खभेध्यैख शत प्रोऽय सहसश्रः ॥ 
कला दुन्हुभिनादांखच पट्रणब्दान्‌ समदेनान्‌ । 
पताका ष्वजच्छचादि घण्डा-चामरशोभिताः ॥ 
तददिने कारयाश्चकरे देवोभक्तः सुरोत्तमः । 
एतस्िश्च दिने वत्स ्तपेतसमाकुले ॥ 
छता देवेश्र दवेश्च महापूजा च शाश्वतो । 
श्राथिने मासि मेधान्ते मह्िषारिनिवरंणम्‌ । 
देवौ सम्यजयिला तु श्द्धराचेऽष्टमौषु च । 
घातयिला पष्ठं भ्या ते भवन्ति महाबलाः ॥ 
बलिच्च ये प्रयच्छन्ति सव्वेश्रतविनाशकम्‌ । 
तेषान्त तुब्यते देवौ यावत्‌ कश्यन्त्‌ श्राङ्रम्‌ ॥ 
करौडन्ते विविधैमौगे दवलोके सुद्लभे । 
नाधयो वयाधयस्तषां न च शरचुभयं भवेत्‌ ॥ 
न च देवा ग्रहा दैत्या नासुरा न च पन्नगाः} 
बाधयन्ति सुराध्यच् देवौपादौ समाभितान्‌ ॥ 
यावद्ूरयवाकाश्रं जल बद्धि-शशि-्रहाः । 
तावच्च चरण्डिकाप्रजा भविष्यति सद्‌ा भुवि॥ 
प्रा्र्‌काले विशेषेण श्राश्चिने ष्टमोषु च । 
मदहाग्रब्दो नवम्यान्त लोके ख्यातिं गमि्ति ॥ 
एतत्ते रेवराजेन्द्र खगेवासफलप्रदम्‌ । 
परापर विभागे तु क्रियायोगेन कौ््तितम्‌ ॥ ` 
भागवतपुराणे देव्यवतारे नवमौ कियादुचनमष्ट- 
चलारि शोऽध्यायः | 


क्रत्यरन्नाकरः | ३५९ 


तच्चैव ब्रद्मोवाच- 
एव महाबलं श्रक्र पुरा देवारिकण्टकम्‌ । 
हत्वा देवो वर दचुविंष्ादौनां प्रतोषिता ॥ 
दध॒दंदा विल्यधः । | 
दद्र उवाच- 
आश्चिनस्य शिते पक्त नवम्यां प्रतिवत्छरम्‌ । 
ओ्रोतुभिच्च्छाम्यदं तात उपवासव्रतादिकम्‌ ॥ 
ब्रह्मोवाच- 
ष्टण शक्र प्रवच्छामि यथा लं परिष्च्छसि 
महासिद्धिपरदं धन्छं सव्वेश्ननिवदेणम्‌ ॥ 
सव्वैलोकोपकाराथं विगरेषादसिदत्तिषु९ । 
कन्तेवयं ब्राह्मणस्तु चचिये लौकपालने ॥ 
गोधनायं तथा वेष्टैः शूद्रः पुचद्ुखार्थिंभिः । 
सौभाग्या तथा स्तौ भिरन्येश्च धनकाङ्िभिः ॥ 
मावत महापुण्टं श्दङ्ःरादेरनु्टितम्‌ । 
कन्त देवराजेन्द्र देवोभक्तिसमन्वितेः ॥ 
कन्यास रवौ शक्र श्रक्गामारभ्य नन्दिकाम्‌ । 
्रयाचौ एत्ययवेकाश्नौ नक्ता लय गोप्रद्‌ः ॥ 
प्रातःखायो जितदन्दस्तिकालं भिव पूजकः । 
जप-होम समायुक्रः कन्यकां भोजयेत्‌ सद्‌ा ॥ 


~~ त भाता जनना पा ५.० ००9- णड म भानाव 


९ सले अतिदृषटिष्‌ । २ ^ .7) दुग्धपकाशौ। 


छव्यर्नकर.ः | 


अष्टम्यां नवगेदानि दारुजानि एएभानि च । 

एके वा विन्तभावेन कारयेत्‌ सुरसत्तम ॥ 
तस्िन्‌ देवौ प्रकन्तेवया हेमौ वा राजतौ तथा । 
सुग्धाकौ लक्षणोपेता खङ्गं शूले च पूजयेत्‌ ॥ 
सव्व पहारसन्यन्न वस्त रन्रफलादिमिः । 
कारयेद्रयदोलादौन्‌ प्राञ्च बलिदैविकौम्‌\ ॥ 
पुष्ये द्रोण ` विल्वा जाती पुन्नाग-चभ्पक्रैः । 
विचिचां रचयेत्‌ पूजामष्टम्याञ्च उपासयेत्‌ ॥ 


उपाखयेत्‌ श्राराघयेत्‌ । 


दुर्गांरतोः जपेन्न््रमेकचित्तः समा डितः । 
तदङ्धेयामिनौ रेषे विजयायं नुपोन्तम ॥ 

पञ्चाब्दं लच्षणोपेतं रमददिषञ्च सुपूजितम्‌ । 
विधिवत्‌ कालि कालोति जघ्चा खङ्गेन घातयेत्‌ ॥ 
तदुत्ध रुधिरं मांसं गदोला पूतनादिषु । 
नेतेभ्यः प्रदातव्यं माकौ शिकमन्तितम्‌ ॥ 
तस्यायतस्तथा चखायाच्छच क्वा च पिष्टम्‌ । 
खङ्गन घातथिला तु ददात्‌ खन्द-विशाखयोः ॥ 
देवौन्तु खञापयेत्‌ प्राज्ञः चौर-सर्धिजैलादिभिः । 
कुङ्मागरु-क प्रर चन्दनेशच प्रधूपथेत्‌ ॥ 

डेमादि पुष्यरन्ानि वाससि सहितानि च 


९ 6 --देवकाम्‌। २ 7 ---दुर्गाग्रतः। 
द ^ 8 गन्धपुष्यसुगन्धितस्‌ । 


छव्यरलन्नाकरः । २६९. 


नेबेद्यं सुग्रश्चतञ्च देयं देव्याः सुभावितेः ॥ 

देवौभक्तांश्च पूच्छेत कन्यकाः प्रमदाडि च) 

ददिजादरौनथ पाखण्डानन्नदानेन तोषयेत्‌ ॥ 

नन्दाभक्ता नरा ये तु महाव्रतघराश् ये। 

पूजयन्त न्विशरेषेण यस्मान्दरूपमनिका ॥ 

मातराणाञ्च देवोनां पूजा कार्य्या तदा निशि । 

ष्वजपनच्-पताकादि उड्येच ण्डिका'ग्दे ॥ 

रथयात्रा बल्लिचेपं पटुवाद्यरवाङ्ुलम्‌ । 

कारयेततव्यते येन देवौ पष्टुविघातनेः ॥ 

श्रश्वमेधमवाग्रोति भक्तितः सुरसत्तम । 

महानवम्यां पूजेयं सव्वेकामप्रदायिका ॥ 

सर्वषु वत वषु तव भका प्रकौत्तिता । 

छलाभ्नोति यश्रो राच्यं घु चायुधनखन्यदम्‌ ॥ 

शक्तामारभ्य नन्दिकामित्यनेन षष्टोतः प्रति नवमोपध्येन्तं 
जतमित्यक्त तेन पञ्चम्यामेकभक्तं ततः प्रातःखकल्यः, षष्ठो सक्नम्यष्टमो 
नवभमौषु ययाक्रममयावितेकाशित्व नक्राश्चित् गोप्रदत्रानि , 
जितदन्दो इन्ददुःखेव्वनुदिभ्रः चतु्वेपि दिवसेषु जपेन्मन््ं दुगा- 
देवताकमेव, नृपो त्तमेः प्रदातव्यमिति व्यवहितेनान्वथः। पञ्चाब्दं 
पञ्चवर्षो यम्‌ लचणोपेतम्‌, महाकौ शिकमन्त्रस्त॒ महाष्टभ्यां कथितः। 
्राश्चिने दुगामधिङ्खत्य शिष्टाः पटन्ति । 


णी 
[गिरि 1 1 ए त 11 


१ 1 च्िका--। 


३९२ 


छ्ल्यरनाकरः। 


कन्यायां छृष्टपच्ते लु प्रूजयिल्ादटरेमे दिवा , 
नवम्यां भोजयेदटेवौ गो तवा दिचनिखनेः ॥ 
णक्तपच्चे चतूर््ान्त॒ दे वौकेश् विमोचनम्‌ । 
प्रातरेव तु पञ्चम्यां लपयेच्च प्भेजंलेः । 
सभ्तम्यां पचिकाप्रूजा अष्टम्याञ्चाप्युपोषणएम्‌ । 
पजा जागरणञ्चैव नवम्यां विधिवदलिः ॥ 
सम्मेषणं द्‌ ्रमयान्तु क्रोडा कौ तुकमङ्गलेः । 
नोराजनं द्‌ गभ्यान्त्‌ बलद्धिकरं महत्‌ ॥ 


क्रोड़ाप्रकारमाहः- 


भगलिङ्गक्रियावाश्मि क्रौड्येयुरलं जनाः › 

यञ्च नाचिष्यते तच यञ्च नाक्चिपते परान्‌ ॥ 
द्धा भगवतो शापं दद्यात्तस्य सुदारणएम्‌ । 
मूलेन सफलां विल्वस्य शाखा मादइत्य पूजयेत्‌ ॥ 


मूलेन मूलनच्चेण । 


पूजयिला रवणेन प्रातरेव विसन्लेयेत्‌ । 
महाष्टमो-महानवम्योनेवपूजाविषिस्तु शिल्यशास्त- 
नवपद्मात्मकखाने पूज्या दुर्गां सुमूत्तिभिः । 
च्रादौ मध्ये तयेनद्रादौ नवतलाचरैः क्रमात्‌ ॥ 


श्रादौ प्रथमम्‌ । 


दुगे दु रणि खाहेति नव तलाच्राणि । 
श्रयञ्च प्रणवादि: पटनौोयः ॥ 


छव्यरन (करः | २३६द 


ष्टा द्‌ श्रभुजेकान्तपौनवच्तःस्तनोरुका । 
मूद्धेजं खेटकं घण्टा माद शे तन्नंनं धनुः ॥ 
घ्यनं डमरुकं पाशं विभ्रतौ वामके ततः 
प्राज्न सुद्धर श्एलञ्च वज्ज खद्मयाङ्कुशरम्‌ ॥ 
श्रं चक्रं शलाकाश्च एतैरेवायुधे॑ता । 
खेटो वघफल दति प्रसिद्धः ॥ 
श्रषाः षोड्शदलशाओ तञ्जेनो डमरं विना । 
मध्यसिता उयचण्डा श्रष्टाद शभुजा कार्य्या ॥ 
्नन्यदि गवस्थितास्तु षोड शदस्ताः । 
रुद्रचण्डा प्रचण्डा च चण्डो्रा चण्डनायिका । 
चण्डा चण्डवतो चेव चण्डषपातिचण्डिका ॥ 
नवमो चोग्रचण्डा च मध्यस्था च प्रकौत्तिता । 
गौ रोचनारण छष्णा-नोला-द्क्ञा च धूचिका। 
पोता च पाण्डरा रक्ता श्रालोढस्था दरिस्यिता। 
्रालोट्ो घतुःस्थानविगशरेषः, हरिः सिंहः । 
महिषोऽथ पुमान्‌ शस्तो तत्कचय्रदहमुष्टिका । 
मड्दिषो महिषासुरः, श्रय देव्यग्रे मह्िषशरोरे ख पुनजातः 
खज्गहस्त द्त्ययेः । तत्कचयहमुष्टिका तदौयोद्धंकचे कतदृद्सुष्टिः। 
खाप्या इत्तेन पङ्कया वा रल्यक्तं खकन्दयामले । 
ता देव्यो मण्डलाकारेण वा खजुपद्कूया वा धार्य्या, 
स्कन्दयामल श्रागमविग्रेषः । 


२६४ 


छत्यर्नाकर,। 


पूजने स्वुतिपाठटः- 
मद्दिषनच्नि महामाये चासुण्ड सुण्डमालिनि । 
१दर थमा रोग्यविजय देहि देवि नमः सदा ॥ 
रूपं देहि यशो देहि रभाग्यं भगवति देडि मे, 
पुच्रान्‌ देहि धनं देहि सर्व्वान्‌ कामान्‌ प्रयच्छ मे॥ 


वरादपुराणए- श्रगस्य उवाच - 


्रविद्यो लभते विद्यां भोरः शोर्ययञ्च विन्दति । 


श्रतःपर प्रवच्छामि शौ यये्रतमतुत्तमम्‌ । 

येन भौरोरपि महाशौय्ये भवति तत्षणात्‌ ॥ 
मासि चाश्वयुजे ईश्एद्धां नवमो समुपोषितः । 
स्म्यां कतसकल्यः ध्िलाष्टम्यां निरोदनः ॥ 
नवम्यां पराश्येत्पिष्टं* प्रथम भक्तितो नुप । 
ब्राह्मणान्‌ भोजयेद्धक्या दे वोश्चेव प्रपूजयेत्‌ ॥ 
दुगो देवों महाभागां महामायां महाप्रभम्‌ । 
एव संवत्सर यावदुपोग्य विधिवन्नृपः" ॥ 

व्रतान्ते भोजयेद्धिम्रान्‌ यथाश्रह्या कुमारिकाः । 
हेमवस््ा दि भिस्तास्तु शषयिला खश्क्तितः ॥ 
पञ्चात्‌ चमापयेत्तान्त॒ देवो मे प्रोयतामिति 
एवं कृते भ्रष्टराज्यो लभेद्राच्यं न संग्रायः ॥ 


"~= ~----------~न~ ~ 0 =, 


१ 8 खायुः। २ ^ भगस्‌ । 
₹ म्रूले-- श्रद्धा नवमौ समुपोषितः 
४ ^ ¢ पिण्डम्‌ | ४ ^ --तु विधानतः। 


लव्यरन्नाकरः | २६५... 


ष्णद्धां श्एक्गां तेन एएक्ञनवमोमाचे ब्रतमिदं। निरोदनो निरा- 
हारः, निरोदनं निराहारमिति मविषे ओदनपदस्य श्राहार- 
परलद शनात्‌ । नवमौ समुपोषिल दति नवमौत्रतत्ख्यापना्यं- 
मन्यया पिष्ेप्राश्ननविधिविरोघात्‌ । 
 एवमन्यत्रापेकाद श्यपवासपूव्वेक दाद्‌ शौकालोन विष्णुपूना- 
त्मकद्दादशोत्रते द्वादशौ समुपोषिता इति बहशो विधानं 
वरादपुराणे । 

दूति गो््यैनतम्‌ । 


अरय श्िष्टाचारपरिप्राप्रदशम्यपराजिता। 


ॐ श्रपराजिताये नमः । ॐ क्रियाग्रत्वे नमः । ॐ उमारे 
नमः । दति प्रतिष्टामन्न्ः । 
चतुयुंजां पौतवस्तां सर्व्वाभरणश्रषिताम्‌ । 
खङ्गचश्मेवराभयदहस्तां चिनेचामौषन्म्हसितवद नाम्‌ ॥ 
ध्याला ॐ दो ्रपराजिताये नमः ॐ अपराजिताददयाय 
नमः ॐ हौ असलञाय फट्‌ ततो दचिणे ॐ नमो जयाये नमः 
इति प्रूजयेत्‌ । वामे ॐ विजयाय नम इति पूजयित्वा हरि द्रा- 
वस््रेए दर्व्वासिद्धायेकं वद्धा देव्या हदि टला श्रमिलषितकाम- 
नया खाङ्गन धारयेत्‌ । 
ततः प्रयातक च्र्यात्ततः ॐ कारमुचारयन्‌ प्रद्किणं कला 
मसाद्यानेन मन्त्ेए विसन्नेयेत्‌ । 


२६६ छत्यरनाकरः | 


द्मां पूजां मया देवि यथाश्त्या निवेदिताम्‌ । 
रक्षां लं समादाय ब्रज स्वस्थानमुत्तमम्‌ ॥ 
दूत्यपराजिताप्रूजा । 





य खञ्ननद्‌ शनम्‌ । 
च्यो तिःशास्ते- 
दादश्वामष्टम्यां कात्तिकश्रुक्ञपञ्चद्‌ण्वां वा आश्वयुजे वा कुय्या- 
न्न 1राजसल्िकां शान्तिम्‌ । 
नो राजनेऽतिटत्ते यया दिशा खञ्जनं नृपो यान्तम्‌ । 
पश्चेत्तया गतस्य च्तिप्रमरा तिवश्मुपैति ॥ 
दृश्यते स॒ किल दम्तगतेऽके रोदिणौभुपगतेऽस्तसुपेति । 
खश्ञनको नामायं विदहगस्तस्य द शेनेन प्रथमे प्रोक्तानि यानि 
फलानि मुनिभिस्तानि प्रवच्छामि । 
सूलोऽभ्न्नतकण्ठञ्च छष्णगलो भद्रकारको भद्रः । 
श्राकण्टसुखात्‌ छष्णः सन्ये, पूरचत्याभ्राम्‌ ॥ 
ष्णो गलेऽस्य विन्दुः सितकर चरणणान्तः स ॒चिचकछत्‌ । 
श्रतिरक्तः पौतो गोपोत इति क्वेशकरः खच्नो दृष्टः ॥ 
खच्जनविभाग शच्रागमान्तरम्‌- 
समन्तभद्रस्तदनु प्रभद्र 
ततोऽनुभट्रौऽम्बरभद्र एव । 
एषां चतुनांमपि खञ्ञनाना- 
मचच्छहे सम्मति लचणानि ॥ 


छ्व्यरल्लाकरः । 8 


यः कन्धरोरःशिरसां खमन्तात्‌ 
विभति काष्ण्ये स समन्तभद्रः । 
रष्टेन युक्तः शिरसोरसा च 
भवेत्‌ प्रभद्रः सितकण्टष्ष्ठः ॥ 
कण्टोरसो यस्य तु खञ्जनस्य 
कष्णे भवेतां स मतोऽनुभद्रः । 
कृष्णा भवेत्‌ कण्ठगतेव रेखा 
यस्य त्वसावम्बरभद्रनामा ॥ 
मध्यादमोषां ्टभकाय्यैसिद्ध 
यो यो भवेत्‌ पृव्वेतरः स मुख्यः । 
श्राकाग्रभद्रो गलमाचकृष्णः 
सिताननो काय्येविनाश्नाय ॥ 
स्याद्यो दरिद्रारसस्न्निकाशो 
गोमूचनामा स तु खञ्रोरः। 
निरोचितः प्राग्द्िविसे प्रश्तम्‌ 
दुःखोद्धव शंसति यावदन्दम्‌ ॥ 
श्राञ्यमधिङ्कत्य वरादसंहितायाम्‌ । 
श्रय मधुरसुरभिफलक्रुसुमतर्षु सलिललालयेधु दण्ठेषु 
करि-त्रगमू्िं प्रासादोद्यानहर्म्येषु गोषट्ट-सतसमागम यन्ञोत्सव 
पाथिवददिजसमोपे इस्तिबन्धनप्त्राला-च्छच-ष्वज-चामरादेषु देवर 
समो प-सिताम्नर-कमलोत्परूपूजितोपलिप्ते च~ तथा- 


क ह 1 


१ 7 तुरङ्गम । २ 0 डहेम। 


२९८ छ्यरनाकरः | 


दधिपाच चान्यकूरेषु भि ख्ञनः कुरूते । 
पङ्कं शाद्रलाक्षिगारसमभम्यञ्च उषगोमयोपगते ॥ 
शाद्वलगे वस्तरात्निः सकरस्य देगरविक्रयः । 
ग्टहपरटलेऽथ श्वो वक्तं बन्धो प्रडचौ भवति रोगः ॥ 
ष्ठे वजा विकानां प्रियसङ्गममावहत्याष्र । 
मदिषो प्र-गद्‌भाखि-श्मग्ान-ग्टहकोण-श्रकंराद्ष्टः ॥ 
प्राकार भस्म केशरेषु चाश्भो मरणङ्ग्भयद्‌ः । 
पच्चौ धन्वननश्टुभः पिवन्‌ वापि वारिवाहख्थः ॥ 
स्य्थोदये प्रणम्तो नेष्टकरः खञ्ननोऽस्तमये ॥ 
वारिवाहो जलप्रणड्का । 
तस्िजिधिभवति मेयुनेति यञ्िन्‌ 
य्छिंस्तु छटेयति तच तज्ञेऽस्ि काचः । 
अङ्गारमण्यृपदि शन्ति पुरोषणेऽस् 
तत्‌ कौतुकोपनयनाच खनेद्धरि चम्‌ ॥ 
ग्रत विकल विभिन्न रोहितः सुतनु समानफलप्रदः । 
घनञ्ृद्‌ भिनिलोयमानको वियति च बन्धुसमागमप्रदः ॥ 
च्रभिनिलोयमानकः खाकाशाद्भूमौ पतन्‌ ॥ 
आगमान्तरे- 
\अ्रलञेषु गोषु गज-वाजि-मद्ोरगेषु 
` राच्यप्रदः क्ुशरलदः प्रठविशादलेषु । 


णगि म न कथक रायि 11 1 क 


९ 1) अलासु। 


क्रत्यरला करः । २६९९ 


भस्मा स्विकाष् ्नखलोमतुषेषु दृ्टो 
"दुःखं ददाति खल्‌ ख्नकोऽब्दमेकम्‌ ॥ 
गजाविशालोपवनान्तरेषु 
माखारहम्म्यायखिताम्बरेषु | 
दध्या दिभाष्डेपयुपलिघ्श्डमौ 
सवणेराजान्तिकचामरेषु ॥ 
सद्छाय डुद्याम्नर पचपुष्यफलावनघेषु एएएभद्रुमेषु । 
येनोपविष्टः ्रथमेऽङ्कि दृष्टस्तस्य भियं खज्ननको ददाति॥ 
नद्यादितोराम्बज-गो करौष- गो पुच्छ-दूर््वा-नृपमन्दिरेषु । 
श्रह्वाल जम्बालफल प्रवाल चोरद्रुमोपस्कर-तोरणरषु ॥ 
एतेषु चाद्येऽदनि खच्नरौटो दृष्टोऽतिदष्टः सदसोपविष्टः। 
तोयान्नपानप्मियगोऽश्ववस्तलाभाय रोगोपश्रमाय चेष्टः ॥ 
तुरङ्ग मातङ्ग महोरगेषु 
सरोज गोपुच्छ उषेषु येन । 
पू््वेच दृष्टोऽदनि खन्ञरोरो 
निःसंश्रयं तस्य भवेन्नुपलम्‌ ॥ 
पूव्वेचाहनि पूर्व्वा । 
धान्यानुलब्धये महिषायजादौ ख्याङ्गोमये गोरसषलाभदेतुः । 
वस्तस्य लाभाय च श्रादलादौ लाभाय गेदस्य च नावि दृष्टः ॥ 
भद शितेऽन्येन च ख्रोटे स्यादन्यनार््या सद सङ्गलाभः । 





१ 8 तुषलोमदटणेष। 
१ कचित्‌- रिष्टं ददाति बङश्टः खलु खञ्चरौटः। 
29 


२७० ल्त्यरल्लाकरः । 


विवाहलाभाऽनखातश्चुमो चान्यस्य रा श्रावपि धान्यखाभः । 
भवेत्‌ प्रभाते परियशक्गमाय स्ादन्धेसङ्गाय तथान्तरौ चे ॥ 
न्ने घनाथावतरन्नभस्तः खादन्‌ पिवन्‌ भोजनपानलब्थे । 
एवं प्रकारेषु मनोरमेषु खानान्तरेषूक्तफलान्तरा णि ॥ 
इच्छानुरूपाणि ददात्यवश्यं पूरव्वेच दुष्टोऽहनि खज्नरोटः । 

बल्लो दुषत्‌ कण्टक प्रएष्कटच- 

दग्धाखिश्ूलागडतलाभमेषु ? 

शून्यालये लोमसु गेहकोणे 

तुषे पलाशे सिकतासु युपे । 

एषु प्रदे शेव्वय चापरेषु" 

नदो तरेषुपदहतेषु दृष्टः । 

कुमूत्तिचेष्टः स तदा करोति 

न्यक्ारभो रन्‌ कलहाननर्थान्‌ ॥ 
बन्धो वरचासु द्रचौ च रोगो गटदच्छरे स्याट्‌ विणस्य नाश्रः । 
निरो चिति वाऽदिशि टेश्रभङ्गो निद्रा सिश्तेऽतिभवेच रोगः ॥ 

खरो द्र-कौलेयक ष्र्टयात- 

न्डिन्दन्‌ सुपचौ विदधाति श्टवयुम्‌ । 

पक्तौ विधून्वन्‌ दिवसस्य चान्ते 

बद्धो ब्टतो वा न प्रुभः कदाचित्‌ ॥ 

ष्ठयातः ष्ष्ठप्राप्तः कौकेथकः श्वा । 

यादुश्यवखा शक्ुनेरसुव्य इएभाऽष्एभा वा प्रथमेऽङ्कि दृष्टा । 
खस्यापि तादृ्वुपलचणोया तदिस्तरेणालमिदहापरेण ॥ 


छत्यरलाकरः | ३७१ 


पूव्वा क्रमे तच्छल्लन प्रशस्तं 
याचादिकार्ेष्वपि तुल्मागेः । 
परत्यच्चमाश्वय्येमिदग्तिहास्य 
स्वौ जनः पश्यतु ख्ञनस्य ॥ 
दृष्टो दितेऽगस््यसुनो प्रदेशे 
ख चेष्टित खञ्नको विदध्यात्‌ । 
मन्त्रेण पूजा शिरघा प्रणमः 
तत्सृचितख्टफलस्य सिद्धे ॥ 
खच्छनस्य परिकोन्तैनम्‌ इएभम्‌ 
दशनं भवति मङ्गलप्रदम्‌ । 
यात्यसौ चदि पुनः प्रदक्िणम्‌ 
तत्करोति पथिकस्य बाज्डितम्‌ ॥ 
दशने पठनोयमन्तः- 
लं योगयुक्तो सुनिपुचकस्व- 
मद्श्यतासेषि श्रिखोद्धमेन । 
विलोक्यसे प्रापि निगतायाम्‌ 
लं खच्छनाखचय्येमयो नमस्ते ॥ 
कुचेष्ितो यः कुवपुः कुदेशे 
निरोकचितः खञ्जनकः कदाचित्‌ । 
दष्टा विशेषात्‌ परितोषधेन्तम्‌ 
घाताय तत्‌ सूचितदुष्कृतस्य ॥ 


३.७२ छ्य रलाकरः । 


मांसं न श्ञ्नौत श्यौत शमो 
स्रियं न सेवेत दिनानि सप्त 
स्ायान्नपेत्‌ सजुह्याच्च बहौ 
चेष्टं पुमान्‌ खश्जनमच्चयेच ॥ 
वराहस्डितायाम्‌- 
नृपतिरपि श्रटुभं भ्रदभप्रदेश 
खगमवलोक्य महौतले विर्ध्यात्‌ । 
सुरभिकुसुमयुक्रमधे इएभ- 
मभिनन्दितिमेवमेति खद्धिम्‌ ॥ 
श्रदूभमपि विलोक्य ख्छरोरम्‌ 
द्िजगुरुमाधुसुरांनेऽनुरक्तः । 
न नृपतिरश्रभं प्राभ्रुयात्‌ सः 
यदि दिनानि न सप्त मांसभोजो ॥ 
्रावर्षात्‌ प्रथमदश्ने फलं प्रतिदिनन्त्‌ दिनेषे दिकूश्थानं 
मूनिलभ्मचं श्रान्तदोप्रदिभिश्चोद्यम्‌ । 
तच्च वस्न्तराजे- 
दग्धा दिशुक्रा दिननाथयुक्ता 
विवेखदाप्रा भवति प्रदौप्ा । 
सा धूमिता चां सविताभ्यपेता 
शेषा दि गन्ता: किल पञ्च णान्ता 
दग्धा दिनेश ज्वलिता दिगेद्धौ 
धरुमाच्विता चानलदिक्‌ प्रभाते 


क्द्यरलाकर्‌ः | २७द 


प्रत्येकमेव प्रहराष्टकेषु 

शुक्ते दि ्रोऽष्टौ मविता क्रमेण ॥ ` 
दग्धेषु दग्धं ज्वलितं ज्वलतु 

फलं जनिय्यत्यय धचूमितेषु । 
दिशां विभागेषु विभव्य जातः 
काय्थोद्यतानां कुश्स्ते सदेव ॥ 


दति खच्ननद भनम्‌ 





वराहयुराणे दुर्वासा उवाच 
तद्दाश्वयुजे मासि दादश सितपचिणोम्‌ । 
सङ्कल्य्ाभ्यचंयेदेवं पद्मनाभं सनातनम्‌ ॥ 
पद्मनाभाय पादौ तु करि वरै पद्मयोनये । 
उदर सव्वेदेवाय पुष्कराक्षाय वै उरः ॥ 
श्रव्ययाय तथा बाह प्राम्बदस्लाणि पूजयेत्‌ । 
मरभवाय शिरः पूज्य प्राग्बदथे घटं न्यसेत्‌ ॥ 
तस्मिन्‌ हेममयं देवं पद्मनाभश्च विन्यसेत्‌ । 
तसमेवमेव सश्यज्य गन्धपुष्पादिभिः क्रमात्‌ ॥ 
प्रभातायाञ्च श्रव्वेश्यां त्राद्यणाय निवेदयेत्‌ । 
रासत्‌ तयुगे राजा भद्राश्वो नाम वौय्यैवान्‌ ॥ 
यस्य नान्नाऽभवदषे भद्राश्वं नामनामतः । 
-तस्छागस्यः कदाचित्तु गहमागत्य पतेः ॥ 


२७४ 


छत्यर्नलाक्रर, । 


उवाच पञ्चराचन्त्‌ वसामि भवतो र्ट्हे । 

तं राजा शिरसा नला खोयताभित्यभाषत ॥ 
तस्य कान्तिमियौ नान्ना भायां परमशोभना । 
तामगश्यस्तथा दृष्टा रूपतेजोऽज्वितां एएभाम्‌ ॥ 
सपर्न्यञ्च॒ भयान्तस्याः कुव्वेन्यः कम्मं शोभनाः । 
साधु साधु जगन्नाय स््लो एष्ट साधु साधिति ॥ 
एवमुक्ता ननर्तोदेरप्गस्यो राजसन्निधौ । 


राजोवाच- 


विं हषकारणं ब्रह्मन्‌ येनेवं नृत्यते भवान्‌ । 


गस्य डउवाच-- 


दूयं रान्नौ वदौयाभरत्‌ दारौ वेश्यस्य वैदिशे । 

नगरे इरिदत्तस्य लमस्याः पतिरेव च ॥ 

तस्येव कब्मकारोऽग्द्वद्रो विन्ध्येति नामतः । 

वेष्ो वाश्वयुजे मासि इाद्‌श्ां नियतः एविः ॥ 

खयं विष्णवालयं गला गन्धपुष्यादिभिहरिम्‌ । 

अभ्यद्य खग्णहं प्रायाद्धवन्तौ रच्पालकौ ॥ 

स्थाय दइावपि दौपानां ज्वालनायथं महामते । 

गते तख्िन्‌ भवन्तौ तान्‌ दौपान्‌ व्वालयन्तौर सितौ # 
यावत्‌ प्रभाता रजनौ निःश्रायेन नरोत्तम । 

ततः काल्ञेन महता ग्डतौ दावपि दम्पते । 


१९ ^ अथ अगस्यः | २ 1 श्यद्वः। 
३ गरले तदोपग्रन्वाने । ४ 4 ] सूतौ । 


क्रव्यरन्ाकरः | २५५. 


तिन पुण्येन ते जन्म प्रियत्रतग्टडेऽभवत्‌ । 
दूयञ्च पल्ली ते जाता वेश्यद्‌ास्यभवत्‌ प्रियाः ॥ 
पारक्यस्यापि दौपस्य ज्वालितस्य दरेगेडे । 
दयं व्यष्टिः परा जाता भक्तिग्रङसख ते पुरा॥ 
खेन यः पुनर्यन विष्णमभ्यच्ये दौपकम्‌ । 
ज्वालयेन्तस्य यत्‌ पु तत्‌ सख्यात्‌ न शक्यते ॥ 
च्च प्रामदित्याद्यतिदरेश्कपदेवरादपुराणणेववच्छमाणएमागे- 
दाद शोधनम यथाययमतिदिश्वन्ते । 


पदनाभदादश्नत्रतम्‌ । 





विष्णध्मात्तरे- 
प्रोणएयेदश्वशिर समश्वन्दला तथाश्चिने । 
एतचाशिनएएक्तदादश्यामेवं दानं तयेव प्रक्रमात्‌ । 
नह्मपुराणे- 
सोपवासश्च कन्य एकादश्यां प्रजागरः । 
द्वादश्यां वासुदेवश्च पूजनौोयश्च सब्वेदा ॥ 
याचोत्छवख कन्तेवयस््रयोद श्याञ्च विष्णवे । 
उपवासश्चतुदेश्यां पौ णंमास्या इरि यजेत्‌ ॥ 
श्राखयुज्यां पुरा विप्रैः काम्यो इदोमः प्रवस्तितः । 
महाभयेषु राथ इारोपान्ते इताग्रनः ॥ 


वै 


१ 7 पुरा 


२३७६ क्रत्यरत्नाकरः | 


यवाचतदटतोपेतैस्तण्डकलेश्च सुतपितः । 

पूर्नदुः पूजितश्वापि पक्र्धान्येः फलेस्तथा ॥ 
देवदारूवने न्नः स्तभलिङ्गे दिगम्बरः । 
सभाय्यैः पूजितो विद्रैः स्कन्द-नन्दिगणेचतः ॥ 
देवैर श्वपतिश्वापि रेवन्तः प्रूजितस्तदा । 
सुनिभिगौस् सुरभिगौमद्धिः सुरपूजिता ॥ 
कागरूपश्च मुनिभिः पूजितोऽच्र इताश्ननः । 
श्रौरभ्ररूपौ देवस्तु पूजितस्ठ जलाधिपः ॥ 
विनायकेन ख्ष्टास्तु वर्णाद्या महावलाः । 
कान्तारे दौ पदानञ्च विष्णएना संप्रकौत्तितम्‌ ॥ 
कश्यपेन निकुम्भस्य युद्धादागमनं छतम्‌ । 
युगपत्तच कन्तेव्या द्वाद्गेते महोत्सवाः ॥ 
आश्वयुज्यां पूणिमायां निद्खम्भो वालुका णेवात्‌ । 
श्रायाति सेनया सद्धं रला युद्ध सुदारुणम्‌ ॥ 
तस्मात्त नरे्मागाः खगेहस्य समो पगाः । 
श्रो धितव्याः प्रथनेन श्षितव्याश्च मण्डलेः ॥ 
पुष्याघेफलधृपान्ञसषेपप्रकरस्तया । 

वेश्छानि श्वितव्यानि नानारङकेविं गेषतः ॥ 
सुखातेरतु लिप नरैरभाव्यं सबालक्रेः । 

दिवा त्न न भोक्तव्यं मनुखेश्च विवेकिभिः ॥ 
स्तोद्धमूखे-बालेश्च भोक्तव्यं पूजितैः सुरः । 
यून्याख सपालेः पचेस्तया दारोद्धंभिन्तयः ॥ 





छ्व्यरनाकरः। ` ` २७७ 


इारोपान्ते प्रदोप्रश्च सम्॒ज्यो हव्यवाहनः । 
यवाचचतटतोपेतेसतण्डुलेश्च सुतपितः ॥ 

पूजितव्यश्च पूरनः पथसा पायसेन च । 

रुद्रः सभाय्येः खन्दश्च तया नन्दौश्वरो सुनिः ॥ 
गोमद्धिः सुरभिः पूज्यो कागवद्धिह्कता्रनः । 
श्रौरभ्रवद्धि्षैरुण्णो गजवद्धिविंनायकः ॥ 
पूज्यमान रेवन्तो यथा विभवविस्तरेः । 

ततः पूज्यो निकुम्भस्तु समाषेस्तिलतण्डुलेः ॥ 
सुगन्धिभिश्तोपेतैः कशरायेशख्च शरिभिः । 
नाद्यणान्‌ भोजयिला तु भोक्तव्यं मांसवर्जितम्‌ ॥ 
श्ङ्ख्वाद्यरवो न्मिश््गौ तन्‌त्येख सा निश्रा । 
बङ्किपाशवेगतेनया दृष्टाः कोड़ा: प्रयजिधाः ॥ 
ततः प्रभातसमये खनुजञिपतैः खलङतेः । 
मङ्गलालभनं काये बद्िसम्यूजनं तथा ॥ 

भोक्तव्यं बान्धवैः साद्धं करौडितव्यं यथादुखम्‌ । 
तस्यां रायां यतोतायां डहितोयायामनन्तरम्‌ ॥ 
प्रभाते कदेमाक्रेस्त क्रो डितयं पिशाचवत्‌ । 
निलव्नेथाथ सबव्वैच सद्रवत्‌ सन्वेवेश्प्ध ॥ 
यस्मात्‌ स देश्रः सोत्कण्डः पिश्राचेः शम्भृवादनेः९ । 
लब्धस्तु कश्यपात्‌ पूव्वे सक्रोधस्य प्रजापतेः ॥ 


१९ ^ पडङ्क्तिपश्चकं पतितम्‌ ! २ 7 शान्तवानेः। 


ट 


३७८ । छत्यरल्ाकर; । 


श्रानोय चाय मित्रारि लेपनोवानि कद्मेः। 
कामा चिज्वलने्वाक्येः स्तौ पुंलिङ्गालुवादिभिः॥ 
वाचा पेशाचमाचारं कल्पयद्धिरितस्ततः । 
श्रस्लोलान्यपि जल्यद्धिराक्रो णद्िख ससुखम्‌ ॥ 
तस्िन्नहनि पूर्व्वा निङ्म्भस्ानुयायिनः । 
कान्तवेशाः पिग्राचाख्च प्रविशन्ति नराख तान ॥ 
श्रपराहे ततः सखातांख्यक्ता गच्छन्ति बन्धुवत्‌ । 
द्‌र्पाभिमानदोषेए तच यश्लागतान्‌ नरान्‌ ॥ 

न पूजयति मोदेन करौोडां न कुरुतेऽथवा । 

तं निदंहन्ति ते कोधात्‌ पिगश्राचा रौद्रदभनाः ॥ 
ततः चखातेनैरेः पन्यो देवो दामोदरो दरिः । 
सन्यज्य विप्रान्‌ भोक्रव्यं खतुलिकेः खलङ्तेः ॥ 
बन्ध भिज कलेश सहिते यथाक्रमम्‌ । 

ततः प्रश्ति षण्मासान्‌ खेषु वेश्षसु मानवेः ॥ 
श्रधिः सन्निहितः" कायौ रातौ सिद्धार्थकास्तिलाः । 
मांस समय देयश्च दौपो नित्यं गहाददहिः ॥ 
श्राश्धिने पौणमास्यान्त चरेव्नागरणं निशि । 
कौैमुदौ खा समाख्याता कार्य्या लोकविश्वूतये ॥ 
को मुदयां पूजयेललच्छौ मिन्द्रमेरावतश्ितम्‌ । 
सुगन्धिनिंशि सदे शस्लचेर्जागरणं चरेत्‌ ॥ 


[मीर 


१ कचित्‌ सुसंस्छतः । 


छ्लत्यरलाकरः । २७९. 


लच्छौपूजामन्तः- 
ॐ नमस्ते सब्वेश्रतानां वरदासि हरिप्रिये । 
या गतिस्त्रपन्नानां सा मे श्यात्तदचंनात्‌ ॥ 
दन्द्रपजामन्तसतु-- 
विविचेरावतस्थाय भाखत्कुलिग्पार्ये । 
पौलोभ्यालिङ्खिताङ्गाय सदहखाचाय ते नमः ॥ 
श्रच कान्तारदौपदानस्य राचिकाच्येश्रतेः-९ 
युगपन्तच कन्त॑दा दाद्‌ रेते महोत्सवाः । 
दरति कचनादन्येऽप्यव्छवा राचिकन्याः । एवश्च साहचर््यात्‌- 
श्ङ्खवाद्यरवोन्डिेरगोतनुत्येच सा निशा । 
बद्िपाश्चेगतेनंया- 
दूति खरसादाचाराच् श्रन्यच् निकुम्भादिप्रूजायां चेचरुष्ण- 
चतुरंश्यां राचित्यलद श्नात्‌ गोडरति विहितजागर एर जरेव 
सन्निडितायाः- 
कौैसुदरौ सा समाख्याता कार्यां लोकविग्रतये। 
इत्यनेन स्तुतिविषयलौ चित्यादनुकूलतापादक स्ानमागं- 
शोधनाद्यतिरिक्र दारोद्धंभित्यादिखकलपरूनादिकश्र राचा- 
वेवेति बहवः । 
श्रन्ये तु- पूर्वाह्णो परोधेन प्राचौनपूजां तैव मन्यन्ते लच्छो- 
पूजादिकञ्च राचौ कारयन्ति । श्रनुक्रूलन्त॒ मना गाद्पेच्ते (?) । 


0 


१ 7 --काथ्यैखितेः । 


द ८० जत्यरल्ना करः । 


स्कन्दपुराणे- 
श्रन्धके चागते तिन्‌ कर्ताहं कौसुदौमिति , 

इत्युपक्रमे- 
ततः प्रति राजा तरे ्राज्ञापयति कौमुदीम्‌ । 
देवराचिद्च देवस्य रद्रस्यासुरनाश्िनोम्‌ ॥ 
सुष्ष्टो पलम्धाभो रथ्याभिः क्रियतां पुरम्‌ । 
वासोभिरहतेः सर्वव भवन्त पुरवासिनः ॥ 
सज्विणः सभरिरःलाता दत्तपङ्घा यथाक्रमम्‌ । 
गायन्तु गायनश्चैव नृत्यन्त नटनन्तेकाः ॥ 
उडोयन्तां पताकाञ्च गहवौश्यापणषु च ! 
ग्ण्हाणि चोपलिक्रानि नित्यमेव भवन्त्‌ वः ॥ 
पुष्यप्रकरजृष्टानि धूपेनानाविधेरपि । 
खग्दामवन्ति सव्वांणि नवमालायुतानि च ॥ 
नराह्मणशेव भोज्यन्तां क्रियन्तां वाचनानि च । 
न्रद्यघोष्श सव्व पुाहोदौरणणनि च ॥ 
दौपा राचौ च सव्वेचच राजमागेग्देषु च । 
श्रनन्तराः क्रियन्तां वे प्रचुर खेहवन्तेयः ॥ 
तङणाः सह योषिद्धिः समन्तात्‌ प्येटन्त्‌ च । 
रममाण हसन्तश्च गायन्तो नुत्यसेविनः ॥ 
भाण्डवाद्यानि वाद्यन्तां नुत्यन्तां सह योषितः । 
महादेवस्य प्रजान्ते गन्धपुष्पादि श्रदभाम्‌ ॥ 
उपहारा विविधाः कपनानि महान्ति च । 


लत्यरल्ाकरः । २०२ 


वलयः पुष्कला्ैव भच्छभोच्येरलङ्कताः ॥ 
दौपांख विविधाकांरान्‌ पानानि चरसांस्तया । 
फलानि च विविचाफणि मांस पक्मयामकम्‌ ॥ 
सुवणेमणिचिचाणि ईश्वराय प्रयच्छत ¦ 
वध्यन्तां पश्वश्चाच भोज्यन्तां दिजसन्तमाः ॥ 
यो न कुरययादिदं स्वे पुरवासौ नरः कचित्‌ । 
पातयेत्तस्य देे तु राजा दण्डं महायशाः ॥ 
तथा घनत्कुमार उवाच 
एवं सह्रगेषयिल्ा तु घाण्डिकोश्स्तिप्रष्टगः | 
जगाम खग्हं श्यः कौमुदी चाप्वन्तेत ॥ 
यथोक्तन्त॒ तदा सव्वेमङ्व्वन्‌ सुपुरे जनाः । 
राजापि संयतः खातः शएचिः प्रयतमानः ॥ 
सव्वेस्यायतनं गला खयमेव सुभक्तितः । 
पञ्चगव्येन श्एद्धेन तेखेन च सुगस्धिना ॥ 
दत्याद्यमिधाय पुनः सनत्कुमार उवाच - 
श्रय तस्यां सह सखोभिः कोौसुद्यां देत्यदानवाः । 
रेमिरे रक्रमनसो देवाः खर्गागता भवे ॥ 
तच काचिच्छभापाङ्गौ पद्म दियं मुखोपरि । 
सुखार विन्दच्राणाथं ददौ सोमभयादिव ॥ 
काचित्‌ प्रायेण सन्त्यक्ता विमानात्तच्न निर्गता । 
ग्टदाचन्दरादिभिः सृष्टा पपात मदमानषाः ॥ 





९ 1 छष्टिकारः | २ 1) मदनास्लसा | 


८२ छत्यरनाकरः । 


प्रय कान्तार्दोपदानविधिः। 
अच ब्रह्मपुराणे - 
पूव्वेमाश्वयुजे मासि पौणमास्यां समाडितः , 
प्रथमे च निशारम्भे मनोवाक्कायसंयता ॥ 
नमः पिदभ्यः प्रेतेभ्यो नमो धम्माय विष्णवे । 
नमो धश्नाय र्द्राय कान्तारपतये नमः ॥ 
दद्यादनेन मन्त्रेण दपं अद्धासमन्ितः । 
यः कार्तिके समयन्त बद्धेन्ते तस्य सम्पदः ॥ 
दिवाकरेऽस्ताचलमो लिसंस्थिते 
ग्टहादपूरे पुरुषप्रमाणम्‌ । 
यूपाकतिं यज्जियट्रच्चदार- 
मारोप्य श्मावय तख मृद्धं ॥ 
पञ्चाङ्गुला मध्यद्धटरेण युक्ता 
दिदस्तदौर्घां श्रय पट्टिकासु । 
छत्वा चतसोऽषटरलाकृतौश्च 
याभिभेवेदष्टमार्गानुसारः ॥ 
तत्कणिकायान्त॒ महाप्रकाश्ा 
दौपाष्ठ॒ देया दलगास्तथा्ठौ । 
उदड्मृखान्‌ दौपर वरांश्च तेल- 
इता दधवुकतांश्च ययोपलग्ान्‌ ॥ 
अ्रनङ्गलग्ं त्वथ वस्रखण्डम्‌ 
नवं सुरक्तं तवथवा सुश्टक्तम्‌ । 


द्त्यरल्एरः | २८२ 


वणं प्रयोज्यश्चषकञ्च छत्यम्‌ 
लिग्धन्दुखण्डं सुसमं प्रशस्तम्‌ ॥ 
"चवक भद्यकम्‌ । 
तच्छालिपिष्टोपरि सन्निधेयम्‌ 
यया न नयेन्न च कम्पते च । 
स्वे प्रकुर्याननिगुणप्रमाणएम्‌ 
मध्यस्थितस्यायय दौपराज्ञः ॥ 
दलेषु शोभायेमतौोव ज्ूुर्यया- 
न्नोरथप्राद्युपलग्धय च । 
घण्टाष्टक लम्ितपुष्यदाम 
सवस्तरशोभाजितमच् पश्चात्‌ ॥ 
सपरोच्छ ग्मि लथ गोमयेन 
सचन्दनाक्तन जलेन लिघ्चा । 
अनेकवणेरथ मण्डलन्त 
छृलाष्टपचम्‌ कमलग्रमाएम्‌ ॥ 
पलानि मूलानि तयेच्चवञ्च 
लाजा दधि-चौरमयान्नपानम्‌ । 
नानाविचघम्‌ भच्छय विश्रेषणएच्च 
स नृत्यगौतं मधरञ्च वादम्‌ ॥ 
निवेद्य धर्माय हराय श्धूमौ 
दामोदरायाणय धम्मेरान्ने। 


२८४ 


कत्यरनात्ररः । 


प्रजापतिभ्यस््य सत्पिटन्धः 
्रतेभ्य एवालुमतः खितेभ्यः ॥ 
नेच्छैत्यकोणादय द्चिणान्तम्‌ 
धम्म दिभ्यः प्रेतपय्येन्तकेभ्यः । 
ततो जलं ग्रौतलमानयिला 
सपिःसमायुक्तमतौव द्यम्‌ ॥ 
श्रापूयये चाष्टौ कलसांश्च तेन 
नेकछंत्यकोणदर थ सन्निधाय । 
हेमादिपाचं जलप्रणेमेव 

दद्यात्‌ पिधानश्च सद्चचिणएद्च ॥ 
गोद हिरण्छम्‌ रजतञ्च वसम्‌ 
वस्तं फलानि मूलानि यवांश्च धान्यम्‌ । 
ग्रह रथ श्रयनं वाडइनञ्च 

यच्ाय किञ्चिद्य मनोन्ञम्‌ ॥ 
निबेदयेद्राद्यमणएसन्तमेभ्यो 
नेकैत्यकोणादय संख्धितेभ्यः । 
एकेकश्रः पौणएनञ्चाच छुर्य्या- 
द्‌ श्रौ दिभ्यः प्रेतपथ्येन्तकेभ्यः ॥ 
एतत्‌ समयं विचिवच्च कुर्य्यात्‌ 
खशक्निमादौ खधनं विचाय्ये । ` 
दौपान्‌ खमग्रानय वन्ंयिला 
सव्ये नयेुस्लय विप्रसुख्याः ॥ 


क्रत्यरलाकरः | रर 


प्रद कचिणोकत्य चिरं गता 
ततो भवेत्‌ संयतनक्रभोजो । 
दतोदमोदक व्यवहारय॒कर 
निशामुखे प्रत्यदमेव कुर्य्यात्‌ ॥ 
मासं समय परया च मक्त्य 
घमाप्यते कार्तिकपौणेमास्याम्‌ । 
एवं इते नाकलोकादिशष्ठं 
सुखं भवेत्‌ प्रेतलोकस्थितेभ्यः ॥ 
अयद्ग चाश्वयुज्यां सदा 
पुन\्स्तमायां दिवसेऽथ पौच । 
तमा राः) | 
लूरययात्ततः काल्तिकपौणेमास्याम्‌ 
दिनचयं दौ पमडोत्छवश्च । 
एकोऽथवा दौ पवरः प्रदेयो 
राच्यागमे कात्तिंकपौ णंमाखाम्‌ ॥ | 
द्‌ रिद्रवेश्मसथ काननेषु 
मशानटेवायतने च चेत्य । 
नदौतरे चिचरग्णडान्तरे वाऽ 
प्यथेकलिङ्गेप्यथवेकटचे ॥ 
अष्टाधिकं तेन सदसमाचम्‌ 
विधाय पाते सुश्एमे एतं वा। 


पनन 


१९ 4 7 तुलायाम्‌ । 





(2, 


२८६ क्व्यरत्नाकरः | 


पैर याद्धैरयवा तदद्धैः 
प्रयाण (?) खक्रस्वय साषकेर्वां ॥ 
इष्हाद्धमाचेख रतुं शास्यः 
प्रमाण वस्रं लय दुचकं वा । 
मरन्वाखयेत्तच निष्टप्य धोमान्‌ 
स्तौणामलद्ार तेः प्रपूज्य ॥ 
देया महावनतिरतोव इद्या 
एष्टा च खा ख्छा्भुवनप्रकाश्रा । 
एतन्न वय्याय यस्तु मन्द- 
स्तस्यान्धकारस्य कतः प्रशान्तिः ॥ 
श्र कान्तारो दुर्गम वत्मं । द्रिद्रवेश्मखय वेत्यनेनापि वैक- 
ल्क श्राचार उक्तः । श्त्वपेचेया श्राश्िनोराचितः का्निकौ- 
पय्येन्तं सुख्य एकः प्रयोगः । 
आश्विनौराश्यमावस्याराि का्तिकोराचिषु यथाक्रमं राबि- 
वितथे शक्चपेया, दितोयः कल्पः का्तिकौराचिमाचे वा 
| दौपदानम्‌, श्रष्टाधिकमिल्यादिना इस्ताद्धेनाचैरित्यादिना च 
शत्यपेचया तेलवस््रवन्तिप्र्तिकयनमिति । | 
सकन्दपुराण- 
अला कालेयवचन काल्वेदो तपोधनः । 
सनत्कृमारः प्रोवाच ग्थासमम्बृद्निःखनः ॥ 
नोलोत्यलदलग्ामः श्वा माम्बजसमन्वितः । 
प्रण कालेय कालाभ कालकण्ठ विचेष्टितम्‌ ॥ 


छत्यरुनाकरः । ३८७ 


रतावषानं सम्प्राप्य निक्रान्ते दिक्पतौ पतौ । 
उत्थाय शयनादेवौ शो चश्चकरेऽतिशो षिता ॥ 
ततः स्दनन्याः पाव्वेत्या वारिधाराधरग्रभा । 
चिन्ता समभवन्तस्या भ पुचो दुहितेति वा ॥ 
तस्याखिन्तयमानाया इदयास्बृससुद्धवा । 

ज्ञे कमलपचाकौ कन्या ग्टणएमवपङ्धिता ॥ 

नौ लवस्त्े निंदसिता र क्रवश्ावशुर्ठिता । 
सोत्थाय कदंमात्तस्मात्‌ विशताननमूद्धंजा ॥ 
वद्भाज्नलिपुटा प्राह पाव्वैतौं भाविनीं सतौम्‌ । 
अनुनूहि मया कारे किन्ते देहप्रस्ूतया ॥ 
गिरिकन्या तुतां दृष्ठा इदयान्ननसम्भवाम्‌ । 
उवाच सम्परिष्वज्य मूद्धिं चाघ्राय पव्वेतौ ॥ 
मानस्यसि मम खता इद चाम्बृजरुम्भवा । 

मूड किन्ते प्रयच्छाभि मम प्रोतिः परा वयि ॥ 
इदयोदकसिक्ताङ्गो हदयोद कसभ्भवा । 
श्रनाभाखख गिरेः पुचौँ प्रगोता खा च नृत्यति ॥ 
तस्यास्तदिदतं खूप दृष्ट्रा तच भिरे: सुता । 
इद्येऽचिन्तयद्‌वो किमिदं कोऽप्ययं विधिः ॥ 
चिरायुषौ ततो ध्याला चिरं चौरजटाधरा । 
उवाच तां प्रसन्ना सा नृत्यगोतप्रवन्तिकाम्‌ ॥ 
इदयाशू भवे द्यहि वरदाऽस्मि तवानघे 
तन्निबोघच वरं दास्ये यत्तवाहमनिन्दिते ॥ 


२ ८-प्५ 


हछीत्यरनाकर्‌ः ¦ 


रमिपद्धाङ्गलिपाङ्गा सन्भूतासि यदङ्गने । 
तस्मादुर्टकमेवेति भविष्यसि मद्दोत्छवे ॥ 
दिवसम्मदेजो मद्यभुत्छवो याद्‌ शो भवेत्‌ । 

तादृश्नो तद्दिशि बा भविच्यति तवोत्खवः ॥ 
छन्बन्तवेशं कूर्व्वाणाः सङ्गता बुवि मानवाः । 
उत्से ते भविष्यन्ति मुदिताः सव्वेतो ख्श्म्‌ ॥ 
पाब्वेत्या वचनं श्रला ततः शोदं कशेविका । 

उवाच खाञ्जलिपुटा नलिनोव सक्गुद्यला ॥ 
मामम्ब सुसमाित्य चिलोकोत्सववन्दिते । 

उत्छवो भविता कीदृक्‌ कस्िन काले खयं वद्‌ ॥ 


भगवद्यवाच 
५9 


द्धा श्ररत्कालमग्यं पूणविम्बखमदुतिम्‌ । 
पुल्वाम्बजङतापौडं नोलोत्यलङता ञ्जनम्‌ ॥ 
कठोर शस्वटणएया दे षल्स॒न्ता पतप्तया । 
विभ्रव्याघधरया ` रभ्य पक्षशाच्यवगुण्डितम्‌ ॥ 
राज्ञः परि चयगप्रौत्या--इन्ते शकमरोत्छवे । 
भविष्यति तदा ` श्रो वे उत्छवो ऽमरसन्निभे ॥ 
यद्सिलिन्द्रमदहो लोके दिने पातसुपेव्यति । 
तस्सिन्‌ दिने तव जना आरष्यन्ते महोत्सवम्‌ ॥ 
यः कामो मैरवस्यासौद्चगवत्या भवस्य च । 

म महाभेरवो भूता कन्यां ्ठहऽ करे स्थितः ॥ 


छत्यरलाकरः । ३८९ 


ततोऽम्बिका भगवतो .पननौ भगवतः पिया । 
पुमां समव्रवोत्‌ कर किञ्च गासि. मे सुताम्‌ ॥ 
ततो दद्राकरालास्यो भेरवो मैरवाष्तिः 
पुमान्‌ नोचेः खितः प्राह विच॒न्मत्त. दवाग्बदः.॥ 
-योऽभवद्धेरवः कामो भगवत्या भवस्य च । 
तत्सम्परृतोऽहमेवेषा भा्वां मम भविग्यति ॥ 
देवानान्त्‌ वरं दला गोपतिजेगतः प्रभुः । 
पोतकब्मृमिवादित्यो विवेश्र भगवान्‌ तद्‌] ॥ 
देवोञ्चच्चललेखाङ्ं रतिकामालसेचणाम्‌-। 
अपश्यन्‌ स्तानकमलासुष्णान्तमिव पश्चिनौम्‌ ॥ 
तौ द्म्बतौ विछताङ्गौ इवेषाच्छादनौ सितौ । 
वोचाञ्चक्रं सोमश्षः. काविमाविति शङ्धितः ॥ 
अरय तौ दग्पतौ तख देवतासुरबवन्दितौ । 
-मडेग्रचरणौ कान्तौ प्रणम्य च ततः सितो ॥ 

तावुभावपि भवो भवपालल- 

खन्द्रचिङ्ितवपुख्िपुरारिः । 

प्राह पादपतित सुसमौपे 

कौ युवां वदत किञ्च करोमि ॥ 

्रभ्निका भवमयाह गिरौ 

सथ्येको रितडिद्‌श्चिस वणम्‌ । 

हारपूणेवदना वदमानं 

लोलया भगवतो म्धलमाला ॥ 


कछत्यरनल्ाकरः । 


योऽभवन्तव ममेव हि कामो 

भैरवो भयकर स्विद्‌ श्षनाम्‌ 1 

एष ते किल पुमान्‌ तव जातः 

सरौयसिन्दुवदना मदनाप्नेः ॥ 
सकन्द पुराणे मेरवोत्यत्तिर्नामाध्याधः । 





सनत्कुमार उवाच-- 
सोमलच्छा ततः प्रोक्त उमया सोमभावनः । 
गोपवे श धरो देवो टरन्पतोत्यत्रवौदचः ॥ 
यदेव हि त्वया ध्याने जातेयं श्लौ वराङ्गना । 
तदेव मत्मभावेन भैरवो येष मेऽभवत्‌ ॥ 
सिंहेन दि यया सिंहो इस्तिना इस्तिनौ यथा ! 
तथयेधं रखते सुभ्रु भेरवेण सदहाव्यथा ॥ 
नाह त्वया विना देविं लश्चापि न मया विना ।' 
अतएव मया तेऽद्य दत्तो लम्बोदरारणि ॥ 
लम्बोद्रारणि विनायकमातः । 
उल्छवस्ते च भविता चयौप्रोक्रस्द॒ मम्मिये । 
पूर्व्वागमोऽस्य भविता इत्ते काममशोत्छवे ॥ 
श्रतस्तरात्यको लोकः स्वैः सुरवरार्चिंते । 
भजन्ते तेन चान्योन्यं नरा नाय्थेश्च पाब्वैति ॥. 
लिक्गेषु इदथं स्त्रौणां भेषु इदयं नणाम्‌ 
भगल्िङ्गाद्धितं स्वं तदिदं जगदङ्गमे ॥ 


कछव्यस्नाकर्‌ः । २९१ 


भगलिङ्गाङ्गमुत्को शर कुव्वाणाः खालरा नराः 1 
च्न्योन्यं घातयिव्यन्ति श्राक्रोशन्तः परस्यरम्‌ ॥ 
श्रारन्मे चावसाने च भविता भेरवोष्छवः । 
शक्र वा तदिने तददुद्सेविकयोत्छवः ॥ 
श्रारम्मे चावसाने चेत्युदसेविकोव्छवापेक्चया छद सेविकायाः शं 
कालश्च भवितोत्छवः । 
यत्पुननेगरं यामं भेरवोऽयं प्रवेच्छति । 
उन्द्रत्तसिव तत्सव्वं ससो द्ध भविव्यति ॥ 
छन्द्रत्तवदनुन््न्तं चा तुवेष्छं गिरेः सुते । 
भविय्यति पुरा मन्तं मेरवागमहविंतम्‌ ॥ 
यथा नियुक्तो पिच्रयं विशन देवता दिजान्‌ । 
एवं वे भेरवमहे भेरवो विग्रतेऽमरान्‌ ॥ 
ततो राषभमारूढाः सङृत्‌ कटदेमलेपिताः । 
कटुकाश्चनवल्लौभिः छतवेष्टनन्धषस्ः ॥ 
तत्फलाबद्धवसलयाः प्रकरोत्करनिःखनाः । 
भसमग्दषितसर्ववाङ्गा विन्यूचमलपङ्िलाः ॥ 
तलतालेर्वादयमानेः क्रा बवचोऽन्वितेः । 
अवद्धमसम्बद्म्‌ । 
खच्यमाने वरारोडे भेरवे भाय्यैया सड । 
प्रेच्छति पुर देष उत्छवं जनयश्नणाम्‌ ॥ 


९ ^+ ए खन्काण।; 


३९२ छत्यरलाकरः । 


ये ये रासभादिरोहादिमन्तस्तेषां तलतालेदेस्ततालेर्वाद्यमानेः 
ूरासम्बद्धवचोऽन्वतेः ख्च्यमाने लच्यमाणे समये नणां सम्मद्‌" 
जनयन्‌ भेरवः पुर प्रवेच्छतीत्यन्धः । 
प्रविष्टे भैरवे भौर युरुहताद्िते पुरम्‌ । 
जनस रोचको धोरो भविद्यति तदोव्छवः ॥ 
रोचक विहिततया रुचिविषयो घोरः प्रौट़तया सद्यो द्‌ःखदः । 
येषां वषशतं भौरु जरया ये च जन्नेराः । 
तेऽपि वत्छकवत्सव्वं करि व्यन्त्य्वं नराः ॥ 
वत्सकवत्‌ बालकवत्‌ । 
नानाश्वएवद्धाङ्गाः क्ुङुःमागुरुग्धषिताः । 
पौतैरनेकवरेशच वासोभिः परिवेष्टिता: ॥ 
कणेपूरः समाश्च सदामालः खचूद्निः । 
खदामालः सखजः चृड़ावद्ग्षणए तदन्तः ॥ 
चृणेखचम्यक पुष्या रचदधिष्टगिरोरहाः । 
श्रास्फो टयन्तः क्रन्दन्तः आवयन्तोऽप्रियाणि च । 
रथ्यासु राजमाशेषु श्रावयन्तो यतस्ततः ॥ 
रश्याशब्दोऽच् राजमागेतरमामपरः कुलस्त्रोणामनङ्- 
म्छतौनि च । 
अङ्गानि यानि गद्यानि कालाचारक्ृतानिरं च 
तेषां हि सब्वेसन्देहं द भयन्तः पदे पदे ॥ 
गायन्तश्च प्रनृत्यन्तः कुव्वन्तोऽविनयानि च 





१ 7 ससृत्छवं। ? 8 कुलचारङुतानि च। 


छत्यरन्नाकरः। ३९३ 


पून्वं सलन्नोग्धूवा च निलेव्नलसु पागताः ॥ 
लज्जनोयानपि गुरूनुत्ो शन्तः परानपि ।. 
उदसेविकया - मत्याः करिष्यन्ति यया मम 
न मातुलेव्नते पु न युचरस्य तथारणो । 
अरणो माता । 
पितुने पचः ` पुचसय न पिता न पितामहाः । 
न मातुलस्य खस्लोयः खस्रोयस न मातुलः ॥ 
सुहन्तनेव खजना निलेब्जलसु पागताः । 
सारमेयाननडदस्ारूढ़ा गदेभेषु -च ॥ 
डोम्बवेश्रा गोपवेश्रा वदुवेश्रधराः° पुरे । 
रानवेशाऽन्त्यवेशाख्च तरुणा खद्भरूपिणः ॥ . 
नापितानाञच्च वेषेण नय्यानामपि चापरे ।. 
पलाण्ड़सौधुवषैश्च सछन्धिन्रेखथा खगम्‌ ॥ 
धूपं सञ्चारयिखन्ति घ्राणवेराग्यकारकम्‌ 
जले च रमणञ्चान्ये नरा नणामजानताम्‌ ॥ 
नाधिकायां प्रदास्यन्ति दुगन्धि चाश्रुभेः समम्‌ 
श्रन्ये तु पुरूषा देवि देववेषविग्षिताः ॥ 
काव्यानि अवयन्तोऽपि इष्यन्ति च यथामराः 
यञ नाक्रश्छते तत्र यञ. नाक्रो्ते -परम्‌ ॥ . 
विभ्यन्ति तख पितरो ब्रह्महन्तुयेया क्या । . 
राजानो हि यथयाऽर्यानां कुच्छराणां यथामराः 





१९ 4. } - छतः परे | 
५९ 


{अ ल्लत्यरल्नाकरः । 


डता हि जायते तदत्‌ नराणासुदलेविका । 
न तशय देवा ्रश्नन्ति इविः पितर एव ष ॥ 
सध्यख्यभाव करुते उदसेविकया तु यः| 
उदसेविकयेति शक्तम्यथं ठतौया तेनोश्सेविकायामित्ययेः ¢ 
न त्वं नन्दे नचेवाह तस्य तुब्यन्ति पाब्वति । 
विरामे च महाश्नोकः पुचलाभे यथा छतः ॥ 
पुचलाभे पुजलाभाय मेरवागमो यथा छत इत्यन्य । 
उदसेविकथा वेवं भविता चेव वागमः | 
अतुला हषेषभ्यत्तिः पञचादय तथावयोः ॥ 
न भ्राजते यया वेदं लश््छोकाहूवन तव । 
उदसेविकया हनं तथा च भविता पुरम्‌ ॥ 
नरा नाय्य मिरिने भस्मना कर्दमेन च । 
जिष्यभानि करिग्यन्ति रहाण्ायतनानि च ॥ 
चोरेर्दासितमिव पुरं देवि भविति । 
त्पिष्डभस्मविनभूेनेरः पे विराग्डतम्‌ ॥ 
भेरवोऽयं डत इति घोषयन्तसतो नराः । 
दरणं नर तच स्वेश्वाम्बरखंयुतम्‌ ॥ 
दूति वाचः प्र्र्व्वाणा भेरवोऽधं जहाति नः । 
निहेरियस्सि तं मत्यां खतं शुश्सिव मयम्‌ ॥ 
तड़ागमूले तं न्यस्य सरित्कूले तथापि वा । 
खानाजिञयक्तकलषाः प्रयास्यन्ति ततो ग्यम्‌ । 
संसाध्य सरव खाता उल्वोत्करसखेदिताः ॥ 


छीत्यरलाकरः | २९५. 


सुनित्रता इव नरा भविव्यन्ति क्रियायुताः । 
. थयेव ते पाब्वेति भेरवागसे 
नवां न लन्नां मुद्रेव लज्निरे । 
तयेव सभ्भावितभेरवाः पुन- 
प्वश्चवुरेकान्त तपोधनादठ़ताः ॥ 
इमन्तु यः सुन्दरि भेरवोखखवं 
पठेच्च विप्रो दिजदे वसंखदि । 
ख पुच-पौेः सममेव तशषएे 
महागणेग्रलमवा्ुयाभ््छिवम्‌ ॥ 
्रयञ्चोत्छवः कल्पतरुलिखनानुसाराद्‌ालुवादिकफलकामे- 
राभ्िनाव्यवहितोत्तरप्रतिपदादौ करणमैयः, सापि च तिथिः 
शक्रमदव्यापकया वदहिवषाव्यवदह्दितायिमा भवल्येव । 
पचविश्षे इन्दरध्वजो्राये यदादइ- 
दे वोपुराणे- 
प्रोष्टपद्यामयाष्टम्यां श्टक्ञायां शोभनेन च । 
श्राश्िने वाय श्रणक्तायां अवसे वाथ उच्छरयेत्‌ ॥ 
अन्ये तु वाक्खर साद्धा दर स्रोत्छवानन्तरमेवाश्वुसुल्छवं मन्यन्ते । 
मद्छपुराणे- 
यचा नारदो धर्मान्‌ रहत्कल्पाञ्रया निर । 
पञ्चविंशदस्ाणि नारदौयं तदुच्यते ॥ 
श्राश्िने पश्चदश्यान्त्‌ यो दयाद्धेलुखधुतम्‌ । 


न्त 


१९ ए 1) वभूवुरेवते | 


२९ € क्रद्यरननकिर्‌ः | 


परमां सिद्धिमाभ्नोति पुनराृत्तिदुलंभाम्‌ ॥ 
विष्एधश्चात्तरे- 
च्राश्वायुच्यां कास्वपाच एतप्ूणं द्विजातये । 
ससुवशं तथा दला दौ प्राङ्गसलभिजायते ॥ 
अरन्नाश्वयुन्यामश्िनो युक्तवं न विवचित एतदनन्तरम्‌- 
पौणमासोषु चैताखु मास्॑सदहितासु च । 
एतेषामेव दानानां फलं द शशुणएं भवेत्‌ । 
मह्पर्ववा्च चेताखु फलमचच्यमश्ुते ॥ 
दति विष्णधर्ोत्तरवाक्चान्तरात्‌ । 
महत्व च- 
दृश्येते सहितौ यस्यां दिवि चन््र-रृदस्पतौ । 
पौणेमासौ तु महतो भोक्ता संवत्सरे तु सा | 
तस्यां दानोपवासा दि अद्यं परिकौत्तितम्‌ । 
दरति विष्णुवचनेन लिता । 
सहितौ एकसिन्‌ मासनचतचे खितौ । 
एतच्च सववैपौणंमासौ साधारणमेव बोद्ध्यम्‌ ॥ 
तया तचेव- 
श्र्वयुक्लश्क्तपचे तु या च पञ्चदश भवेत्‌ । 
विदारे तु दातयास्तदा दपा बदूत्तम 
श्न्यच्रापि तदा दौपेमेहत्‌ युण्छफलं भवेत्‌ 
दौपेदेततैरित्यथः । अ्न्यज्रापौत्यनेन ्रादित्यपुराणोक्स्थानानि 
विवकितानि, 


छ्व्यरनाकरः | २९७ 


तचाचादिव्यपुराणे- 
प्रदोषसमये लच्छोः पूजयिता ययाक्रमम्‌ । 
दो पटक्ास्ततः कार्य्याः श्रत्वा देवग्रहेषु च ॥ 
चत्‌ष्यय-श्मशानेषु नदौ- पव्वेतवेश्षसु । 
टचमूलेषु गोष्टेषु चत्वरेषु पटदेषु च ॥ 
पव्वैतवेश्छसु ग॒दाखु एवञ्चाये गदेषु चेत्यनेन देवग्टदहपव्वेत- 
गद्धातिरिक्रं ग्यह सामान्यविशेषन्यायेन दिते, सामान्यिगेषन्यायश्च 
देषग्टद-पव्वतगुहयो रहान्तरापेच्या उत्कषंद्योतना्थैः । 
द्रति महासान्विविग्रहिकक्कुर ्रोवोरेश्रात्मज महा 


सान्पिविय्हिकटक्कुर श्रौ चेण्डश्वर विरचिते 
त्यरनाकरे श्राश्िनतरङ्गः ॥ 


जक 


अथ काल्तिकर्त्यम्‌ । 
तच देवोपुराणे- 
कान्तिके गद्णं श्रेष्ठं गङ्गायमुनसङ्गमे । 
मदाभारते- 
मासि माखश्वमेधेन यो यजेत श्तं समाः । 
न खादति च यो मांसं मासमेतद्युचिष्ठिरं ॥ 
यस्तु वषशतं पूणं तपस्तय्येत्‌ सुदारुणम्‌ । 
यथैकं वच्छंयेन्मासं खम तत्छान्न वा समम्‌ ॥ 
कौमुदन्त्‌ विगरेषेण श्रक्ञपचं नराधिप । 


< छव्यरनाकरः | 


वश्लंयेत्‌ सब्वंमांसानि धक हच विधौयते ॥ 
चतुरो वाविकान्‌ मासान्‌ यो मांसं परिवन्लंयेत्‌ ¦ 
चलारि भद्रा्ाप्नोति कौत्तिमायुर्यशो वलम्‌ ॥ 
्रथवा मामेकं सव्वैमांघान्यभचयन्‌ । 

श्रतौत्य सव्वेदुःखानि उखं जोवेन्निरामयः ॥ 

ये वल्नंयन्ति मांसानि मासग्रः पचचशोऽपि वा । 
तेषां दिः ङुनिटृन्तानां ब्रह्मलोको विधौयते ॥ 
मांबन्तु कौैञ्ुदं पचं वष्जितं सव्वराजमिः । 
सव्वेभ्धतात्मभतेदेविन्नातार्थैपरापरेः ॥ 
नाभागेनाग्बरौषेए गयेन च महात्मना । 
श्रायुषा चानरण्येन दिलोपबन्धृखतुभिः ॥ 
कान्तैवोर्यानिरद्भाग्यां नङ्कषेणए ययातिना । 
नृगेण विष्वकूुखेनेन तथैव ग्रश्रविन्दुना ॥ 
युवनाश्वेन च तथा श्रिविनौश्रौनरेण च । 
सुचृदन्देन सान्धात्ना हरिशद्ेए वालिना ॥ 
सत्यं वदत माऽ सत्यं सत्यं धम्मे: सनातनः । 
हरिशवन्द्रशवरति बे दिवि सत्येन चन्द्रवत्‌ ॥ 

श्येन चन्द्रेण राजेन्दर सोमकेन दकेन च । 

दे वतारन्तिदेवेन वसुना श्येन च ॥ 
दुञमन्तेन करूषेण रामालक्क-नलेस्तथा । 





१ 7 दिसानिदटत्तानाम्‌ | 


करत्यरलल्लाकरः | ३९९ 


-विष्टपाचण निमिना अनकेन ख धौमता ॥ 
श्रद्धेय प्रथुना देव वौरसेनेन चेव हि । 
दच्ाकुना श्भृना च श्वेतेन सगरेण च ॥ 
श्रनेन धुन्धमारेणः तथेव च सुबाहना । 
श्येन च राजेन्द्र चपेट भरतेन च ॥ 
एतैखान्येख्च राजेन्द्रः पुरा मांसं न भवितम्‌ । 
शारदं कौमुदं मामं ततस्ते खगंमाभ्रुदन्‌ ॥ 
शारदपदं सौरल्ख्यापनायेम्‌ । 
ब्रह्मलोके च तिष्टन्ति ज्वलमानाः अया इताः 
उपास्यमाना गन्धर्वः स्रोसहसखमन्विताः ॥ 
तदेवसुत्तमं चम्मेमद्दिंषालचणं प्रभम्‌ । 
ये चरन्ति महात्मानो नाकष्रष्टे वसन्ति ते। 
मधु मांसञ्च ये नित्यं सव्वं ते सुनयः सुताः ॥ 
नन्दिपुराणे- | 
यो नरः कार्तिकं मासं भांषन्तु परिवन्जेयेत्‌ । 
संवत्सरस्य लभते फल सांस विवन्नेनात्‌ ॥ 
यद्मपुराणे- 
कौमुदन्त्‌ विगरेषेण ष्रक्घपचे नराधिप । 
वन्नेयेत्‌ स्व्वैमांसानि ध्मा ह्च विधौयते ॥ 
विष्णः- 


मासः कार्तिकोऽ्निदेवत्योऽभिश्च सम्बेदेवानां सुखं तस्मात्‌ 








९ ^ ८ धून्वना चैव । 





४००  कछव्यरलाकरः । 


कार्तिके माखि बदहिःखाये मायन्ौजपनिरतः सदेव हविय्याश्रौ ` 
वत्सरङ्णेतात्‌ पापात्‌ प्रतो भवतिं । 
` कान्तिकं सकलं मासं बदहिः्ञायो जितेद्ियः 
` हविव्यसुंग्‌ जपन्‌ शान्तः सव्वेपापः प्रभुच्यते ॥ 
विव्ये महाजनपरिग्ेहौतवाकयम्‌-- ` 
हविय्येषु चवा सुख्ास्तद्‌नु नौ हयो मताः । 
` माष-कोद्वव-गौरादौन्‌ सर्व्वाभावे विवल्जंयेत्‌ ॥ 
समयप्रदौपे - | 
ग्रयमं यवास्तद्लाभ नोौदयस्तद्लाभे माष कोद्रव चणक सप्‌ 
मष्छुर चौन कपित्थवच्छंमन्यद्प्यन्नं सेन्धव मानससषम्भवं लवणं तत्त 
साम्मरि दति प्रसिद्धमिति । 
तयाहि- 
हैमन्तिक निताख्िन्नं धान्यं मुद्गास्तिला यवाः । 
कलाय कङ्क नौवारा वास्छकं दिलमो चिका ॥ 
यष्टिका कालश्राकञ्च मूलक केसुकेतरत्‌ । 
कन्दं सेन्धव सुद्धे लवे दयिसर्वि्ो ॥ 
पोऽनुद्धूतसारञ्च पनसाप्रहरौतकौ । ` 
पिप्पलो जोरकद्धेव नागरङ्गकतिन्वि्लौ(ङो) ॥ 
कद लो लवल्लौ धाचो कलान्यरुडनैच्चवम्‌ । 
| ्रतेलपक्तं सुनयो हविय्यान्नं प्रच्तते ॥ वि । 


१ 8 गये च) 


छ्त्यरल्लाकरः । ४०९१ , 


. एकवक्नकलेन वाक्ययोरभेदः। कान्तिकं सकलमित्यादौ सव्व 
पापच्यः फं बदिर्यामात्‌ गण्डा । समयप्रटोपे अच कोके 
निष्यस्लायोति पाठो लिखितः, नित्यस्ञानं प्रातःच्लानमिति 
व्याख्यातं नित्यच्लानं प्रातःक्ञानमिति शङ्खक्तेरिति इेतुरक्तः। 

स च श्राद्धकन्यतरुलिखितवद्धिःखायोतिपाठान्न निविशङ्धः। 
श्रजाचारात्‌ म्रातःस्लानमाचरन्ति। 

भविव्युराणे- खुमन्तृरुवाच- 
कार्सिके मासि राजेन यः कुर्य्यानक्रभोजनम्‌ । 
सौरोदमं प्रमुच्नानः सत्यवादौ जितेद्धियः॥ 
दिवाकराय गां दद्यात्‌ ज्वलनाक्तसमप्रभाम्‌ । 
पूव्वीक्तञ्च विधिं कूर्यात्‌ खय्येतुच्ो भवेद्धुप ॥ 
कालानलसमप्रस्येमेदहायानेनेगो पमेः । 
मदारिदकतारोवैः ष्येवन्मोदते सुखौ ॥ 
्रन्नोपवासददिनसुभयसभ्मोमुक्रा मासं व्याप्य नक्तभोजन, 
पूष्वीक्च्च विधिं पौषे वच्छमाणएमासस्यापि नक्तसप्तमोसामान्य- 
विधिम्‌ 
तथा- 
कान्तिके मामि राजेनद्र यः जर्य्ध्नक्तभोजनम्‌ 
सोरोदनं प्रभुश्नानः सत्यतादौ जितेद्धियः ॥ 
यवान्न पयसा भकं भुच्नानः स्यते लियः । 
पूजयेच्छ्रद्धया देवौ वाराहो चक्धारिणोम्‌ ॥ 
शतप्निकाखग्भिश्च क्ुङमेन विल पयेत्‌ । 


£०र्‌ छत्र नकर. ; 


हष्णागुरं सिह्ठकश्च धूपं देव्ये निवेदयेत्‌ । 
नेवेद्यखण्डबेष्ठन्त्‌ नवम्यां पच्चयोर्दयोः + 
एवं सम्यज्य वाराहौ कुमारो भौजयेत्ततः ॥ 
बराह्मणं श्च यया ग्र्या ततो सुद्धौत वाग्यतः । 
प्राग्रयिला तिलान्‌ विप्र ठता क्ताः च शक्तितः । 
एवं सभ्यूजयित्ा तु वारादहौ खगं मःभ्रयात्‌ ॥ 
रौडते विष्णएना साद क्रडमानः सुरासुरैः । 
पुनरेत्य सुवं राजा सान्यभौमो भवेन्नृपः ॥ 
उभयपक्चनवम्युपवासा दिकमच पौषोभयसप्नसमौ वद्‌न्ेयम्‌ । 
श्रा यपुराण- 
चान्द्रायण यः कूर्यात्‌ कार्तिके राजसत्तम । 
तदन्ते ब्राह्मणेभ्यश्च हेमचन्द्र निवेदयेत्‌ ॥ 
चन्द्र्रतमिदं प्रोक्तञ्चन्रलोकफलप्रदम्‌ ) 
इदञ्च जत छंष्णादिक्रमेण ॥ 
तया च जावालस्मृतिः- 
एकेकं हाखयेद्भासं ष्ण क्ते च बद्धयेत्‌ । 
मासेनाश्नन्‌ दविय्यस्य चन्द्रस्येति सलोकताम्‌ ॥ 
वासनपुराशे- 
रजतं कनकं? दौ पान्मखिमुक्राफलादिकम्‌ । 
दामोद्रभ् तुश्चयें प्रदद्यात्‌ कार्तिके नरः ॥ 
आदिशब्देन प्रवाल-राजपट्यो यँहणमिति दानसागर: - 


11 





१९ 0 डला च) 


छशंत्यर्ल्नाकरः | 8० 


भविव्यपुराणे- 
यः कुर्यात्‌ कार्तिके मासि शोभनां दौपमालिकाम्‌ । 
चणडिकायतने भक्तया स डि सूर्ययोपमां जञेत्‌ ॥ 
तया- 
दढाति काल्तिकं यस्तु दर्य्यायतनटौ पकम्‌ ¦ 
्रव्याहतेद्ियलञ्च स प्राप्नोति न सग़्यः॥ 
जरद्यपुराणे- 
ठल्ला प्रत्यागते द्ये विषुवद्दिवसे सति , 
ब्राद्यणेभ्यः प्रदेयानि गश्स्यान्यभिनवानि च ॥ 
अस्य खगे: फलम्‌ । 
दिवौ पुराणे- 
तुलास्छे ठौपदानेन पूजा कायां महाफला , 
दौपदचः प्रकन्तेव्यो दौ पचक्रमयापि वा ॥ 
दौपयाचा प्रकन्तया चतुटश्यां कुह्षु च । 
शिनौवालौ यदा वत्र तदा काय्यं महाफलम्‌ ॥ 
सव्वेभमेव प्रकन्तेव्य बल्िपरूजामदोत्छवम्‌ । 
विष्णधन्नीत्तरे- 
श्राश्वयुज्यामतौतायां यावद्राजेच्ध कात्तिक । 
तावद पप्रदस्योक्तं फलं राजेन्द्र शाश्वतम्‌ ॥ 
तावत्कालं प्रयच्छन्तिये तु दोपं महानिशि । 
तुङ्ग दे भे बहिस्तेषां महत्य फलं भवेत्‌ ॥ 


१९ ^ 8 दध । 


४०8 छत्यरनल करः | 


श्र्यन्धेकारे गहने प्रा काश्यन्तन जायते , 
प्राकाश्वात्‌ लुरुगराद्‌ ल तेन यान्ति, महत्‌ सुखम्‌ ॥ 
रच छष्णप्रतिपदादिपौणमास्यन्तका्तिके टौ पदानभिति- 
दानसामरः । 
भविव्यपुराए- 
दिने दिने नपन्नाम भास्करस्य महात्मनः । 
ददाति कान्तिके चस्तु भवायतनदौपकम्‌ ॥ 
जातिसमरल प्रज्ञाञ्च प्राकाश्यं सन्वैजन्त॒षु । 
श्रव्याहतेद्ियलश्च स प्राप्रोति न स्प्यः ॥ 
विष्टधस्ीत्तरे- 
कार्तिके दौपदानेन मन्वंचौजस्यपमा्रयात्‌ । अच मौर- 
कात्तिकश्क्घपतिपदाद्यमावस्यापय्येन्त दौ पद्‌ानमिति दानक्ागरः + 
श्रपरदिनेष्वपि संकन्तब्यतिरेकेणः दो पदानमित्युक्तम्‌ । 
ब्रह्मो वाच- 
दौपं प्रयच्छति नरः दय्यस्यायतने तु चः) 
तेजसा रविसद्धाशः सन्वेयन्ञपालं लभेत्‌ ५ 
कार्तिके तु विशेषेण कोसुदे मामि दौपकम्‌ । 
टला यत्‌ फलमाप्नोति तदन्न न लभ्यते ॥ 
काल्तिके तु -विग्रषेण कोसुदे मासि दौपकम्‌ । 
दत्वा द्र्य्यायतने न याति नरं नरः ॥ 





॥ 1 





९ > यान्तिददि तत ₹ 1) चयोन्वष्यम्‌ ; 


छत्यरन्नाकरः | ४०५ 


एष प्रभावो दौपस्य कार्तिके मासि सुव्रत) 

श्र्कायतनद्‌त्तस्य यथया र्द्रवचः पुरा ॥ 
कौमुदे कौसुद्या च्योक्या युक्ते सर्व्वाहोराे रक्तक 

इत्यर्थः, मासविग्ेषणएतवे वे चथ्येप्रमङ्गात्‌ । 

सव्वेकालच्च चचुक्मान्‌ मेधावो दौपदो नरः । 

जायते नरकञ्चापि तमःसन्ञ न पश्यति ॥ 

षष्ठो वा सप्तमो वापि प्रतिपचन्त्‌ यो नरः। 

दपं ददाति दला च फलन्तस्य निबोधमे ॥ 

कान्वृरं मणिसुक्ताच्छे मनोज्ञमतिशौोभनम्‌ । 

टौ पमल्घलं दिव्यं विमानमधिरोहति ॥ 
काब्वर काञ्चनमित्ययः । 

तस्मादायतने भानोर्टौपं द्यान्‌ सदाच्यत , 

तं खदत्तं न दसित न च तेलविवव्नितम्‌ ॥ 

्र्व्वौत दौ पदरत्ता च \्मूकस्लन्धश्च जायते । 

तस्माहयान्न च दरे च्छरेयोऽयं दौपकान्‌ नरः॥ 
एतत्‌सकलपच्-षष्टो सप्तमोषु दौ पद्‌ानप्रसङ्गात्‌ (?) । 
१्कन्दपुराणे- 

रसधेनु तया दवा कार्तिके मासि पायिव। 

सर्वान्‌ कामानवाप्नोति नित्य सुगतिभ।ग्भवेत्‌ ॥ 
महाभारते- 

काल्तिकन्त नरो मासं यः कुर्यादेकभोजनम्‌ ! 


व पि 





१ 7 मूषिकोऽन्धख् | २ + पदय--। 


४ ०६ छत्यरन्नाकरः | 


शरञ्च बङभाय्येश्च कौ्तिमांश्चैव जायते ॥ 
भवियपुराणे- 
एकभक्रन या नारौ कार्तिकं चपयेन्नप । 
चमाऽदहिसादिनियमेः संयता नद्धचारिणो ॥ 
यडाज्यमिश्र शाचयन्न भास्कराय निवेदयेत्‌ । 
एुव्याणि करबौराणि गग्गल साज्यमादरात्‌ ॥ 
सप्तम्यां वाय षठा वा उपवासर तिभैवेत्‌ । 
पच्चयो रभयोः स्ञात्वा श्द्भया परयाऽनज्विता ॥ 
इनद्रनोलप्रतौकागविमानेः साव्वकामिक्रेः । 
नारौ युगशतं मागं द्ययेलोके महौयते ॥ 
तस्मादागत्य लोकेऽस्मिन्‌ यथेष्टं विन्दते पतिम्‌ ,, 
दयेव सर्वयज्ञेषु विधिस्तन्यः प्रकौन्तितः ॥ 
एकभेक्तो पवासस्य सकलं सदु शं भवेत्‌ । 
खय्येपूजा भनि हवन सन्तोषः स्तेयव्ननम्‌ ॥ 
सव्वेनतेषु द्धमः सामान्यो दश्रधा खतः । 
विशेषं हि प्रवच्छामि मासि मासि व्रतं प्रति ॥ 
स्कन्द पुराणे- 
कान्तिकन्वपि यो मासमेकभक्रन तिष्ठति , 
सोऽश्वमेधफलं प्राप्य बद्धिलोके मदमोयते ॥ 
श्रच्राग्निदेवतो मासः कास्सिकः, “ का्तिकोऽग्निदेवत्यः ” दति 
विष्णु (पुराण) वचनात्‌ बद्किलोके मीयते द्त्यनुवादवशाच्ः 
वदन्ति । | 


छत्यस्नाकरः | 8० 


भविय्यपुराणे- 
माघे मामि समुदयक्रस्तिसन्ध्यं पूजयेद्धरिम्‌ । 
लभेत्‌ षाण्मासिकं पुण्यं मासेक्ेन न संग्रयः ॥ 
दत्यभिधाय- 
यथा{माचे तयाषाढ़ मासमेकशच्च कार्तिके । 
विष्णधमात्तरे- 
दिजवेश्पनि यो दद्यात्‌ कात्तिके मासि दौोपकम्‌ । 
्रद्धिष्टोमफलं तस्य प्रवदन्ति मनौषिणएः ॥ 
श्रच्न पौणेमास्यन्तकान्तिकोपक्रमदिने संकरय दिजग्णे 
श्मासमेकं दौपं दद्यात्‌ श्रस्य फलभ्चूयस्ान््ासव्या पिद्‌ानलमिति 
दानसागरः । 
भविव्यपुराण- 
यः कुर्य्यात्‌ का्तिके मासि शोभनां दौपमालिकाम्‌ । 
सप्तम्यामथवा षष्ठवाममावस्यामयापि वा ॥ 
भाकरायुतसद्काग्रस्तेजखा भाखयन्‌ दिशः । 
दिव्याभरणसम्पन्नः कूलमुद्योत्य मव्वेशः ॥ 
दौपदच्च ससुद्दोध्य भास्करस्यालये शभ । 
सव्वेलोकमये वोर वोरलोके महोयते ॥ 
श्रच कालतिकमासौय सप्तमौ - षषठवमावस्यान्यतमतियौ भास्करा- 
ज्ये दौपमालिकादानं दौपटृकसमुद्रोधसहितं दुस्थेलोका- 
वाश्षिफलकमिति वाक्याथेः। वौरः खय्ये : ॥ 


[1 ~~~ ~ = क] 
~~ ~~ 1 ~~ ~~~ ~~~ ॥. 


९ 6 3 मासमेकं इति पाटः पतितः। 


४०८ छव्यरलाकरः | 


भविश्यपुराणे - 
तदो प्रदानेन शिवाय ग्रतयोजनम्‌ । 
विभानं लभते दिव्य खुय्थेको टिममप्रभम्‌ ॥ 
यः कुर्य्यात्‌ कात्तिक मासि शोभनां दौ पमाल्िकाम्‌ । 
छतेन च चतुदैष्टाममावस्याम्‌ विग्रंषतः ॥ 
यावदहोपस्य स्स्या ३ एतेनापूृय्ये बोधिता | 
तावद्युममदस्राति रुद्रलोके महोयते ॥ 
दोपदचं ससुदोध्य ग्रव्व॑स्यायतने प्रभम्‌ ¦ 
युश्छे महदरवाप्रोति शिवलोकञ्च गच्छति ॥ 
शिरसार'धयेदटृदं सव्वं रचिं शिवायतः। 
ललाटे वाय इस्तान्यां ससुदयक्म्तयोरसि \ 
कल्पायुतप्रतन्दिव्य श्िविलोके मदयते । 

सकन्द पुराणे- भिवत्राक्यम्‌ 

प्रदौपमालां यः दुर्य्यात्‌ कारके माभि तै मम। 

अव्ाने च दोपानाम्ब्राह्मणान्‌ भोजये च्छविः ॥ 

गाणपत्यं च लभते दोथते च रविष्येया | 

तचेव 
यः र्यात्‌ का्तिके मासि शोभनां दीपमालिकाम्‌ । 
चण्डिकायतने भक्तया स खय्यांलयमात्रजेत्‌ ॥ 
छतेन क्रुरग्रादल श्रमावस्यां सुभक्नितः । 
विभेषतो नवम्यान्त्‌ भक्तिश्द्धासमन्वितः ॥ 
यावन्तो दोपरुघातासतलेनापर्ख्यं बोधिताः । 


छव्यरनले(करः। ४०९६ 


तावत्कल्यसदहखाणि दुर्गालोके महोधते ॥ 
-यमः- 
कान्तिकश्य तभिखे तु मघासु नवे तिथौ । 
श्रहोराचोषितः साला धम्मेराजाय भोजयेत्‌ ॥ 
विधिवत्‌ त्राह्मणन्‌ भत्वा दुर्गालोके महोयते । 
तिलान्‌ छ्ष्णाजिने दला सुवणं सधुमपिषो ॥ 
द्वा ठू ब्राह्णणायाग्ररु सव्वं तरति दुष्कृतम्‌ । 
धेनुं दत्वोनयसुष्वौं ग्द्दानफलमाभरुयात्‌ ॥ 
मघासु नवमे तिथौ मघाचुक्तायां नवम्याभित्ययेः। धश्च 
राजो यमः तत्रोतये, यस्च वाक्ये मघासु समये दति दानसागर 
पाठः कल्पतर-पारिजात प्रकागश्र-कामधेलुविरोधात्‌ सम्यगन्वय- 
विरदाचाबल्लः | 
शिष्टाः- 
कार्तिके भौमवारेण चिन्रा कष्णचत्‌दं नो । 
श्रस्यामाराधितः स्वानुनयेच्छिवपुरं ध्रवम्‌ ॥ 
विचा-ङृष्णचतुदंश्यां तूला्थां सखिते रवो । 
नासौ प्रेतलमाप्नोति डेतुर्‌द्रालये स्थितः ॥ 
हेतुरुद्रो हेतुकेश्वरः । 
श्रा्मेयपुराणे- 
निशि कलवा जले वासं चतुदेश्यान्त्‌ का त्ति । 
छष्णपच्चे ख मौनोऽपि प्रभाते गोप्रदो भवेत्‌ ॥ 
वारुण लोकमाप्नोति वारूणं त्रतसुच्यते । 


४१० छन्यरनाकरः | 


पद्मपुराणे - 
कार्तिके मासयमावस्या तस्यां दौपप्रदौोपनम्‌ । 
शालायां ब्रह्मणः कुर्य्यात्‌ स गच्छत्‌ परम पटम्‌ ॥ 
प्रतिपदि बाद्यणांश्च गुडमिश्रः प्रदौपकैः । 
वासोभिरदतैः पच्य गच्छे नद्धः पदम्‌ ॥ 
गन्धैः पुष्येनेवैवस्तेरात्मानं श्षयेत्त्‌ यः । 
तसां प्रतिपदायान्त्‌ स गच्छदृह्यणः पदम्‌ ॥ 
महापुण्या तियिरियं बलिरान्यप्रवन्तनो । 
ब्रह्मणः सा भिया निन्यं बालेयो परिकौल्तिंता ॥ 
ज्राद्यणगन्‌ प्रूनयेद्योऽस्यामात्मानच्च विग्रेषतः । 
स याति परमं शान विष्णोरमिततेजसः ॥ 
चेच मासि महाबाहो पुछा प्रतिपदा वरा । 
तस्यां यः पच स्पृ्ा सान कुर्ययान्नरोन्तमः ॥ 
न तस्य दुरितं किंञ्चिदाधयो बयाधयो न च। 
भवन्ति छरुगादल तस्मात्‌ सानं समाचरेत्‌ ॥ 
दिव्यं नोराजनं देतत्‌ सव्वेरो गविनाश्नम्‌ । 
गो-मद्दिव्यादि कं किञ्चित्तत्‌ स्वं षयेन्ञप ॥ 
चेलवस्तादिभिः स््वास्तोरणाधस्ततो नयेत्‌ । 
ज्राद्यणएानां ततो भोज्यं दद्यात्‌? जरुङ्गुलो इव ॥ 
तिक्ल एताः पराः म्रोक्रास्िययः कुरुनन्दन । 
का ्तिंकेऽशवयुजे मासि चेते वापि तथा नृप ॥ 


९ म्रले-- स्नानं हि तेखलतः। २ ^ कुरय्थात्‌ । 





छत्यरन्नाकरः । ४१९ 


सानं दानं शतगुणं कार्तिके या तिथिभेवेत्‌ । 
बलिराको तु एभदा या मूलाग्रटुभनाशिनौ ॥ 
ब्रह्मपुराणे 
श्रमावस्यान्त॒ देवास्त कार्तिके मासि केशवात्‌ । 
अभय प्राप्य सुप्नास्तु खुखं रोर) दसानुषु ॥ 
लच्तमो देत्यभयाचछक्ता सुखं सु्ताऽम्बजोदरे । 
चतुयेगसदखन्त ब्रह्मा सुप्तस्ह पङ्कजे ॥ 
अरतोऽथं विधिवत्‌ कार्य्या मनुष्यैः सुखसुश्चिका । 
दिवा तच न भोक्रव्यम्टते बालातुरान्जननात्‌ ॥ 
प्रदोषसमये लच्छो पूजयिता यथाक्रमम्‌ । 
दौपदास्तथा देयाः शक्तया देव्र्षु च ॥ 
चतुष्ययश्षश्नेषु नटौपव्वेतवेश्मसु । 
छचमूलेषु गोष्ठेषु चत्वरेषु ग्णहेषु च ॥ 
वसेः पुष्पैः शो भितव्याः करय विक्रयश्रूमयः । 
दौपभालापरि क्र प्रदेशे तदनन्तरम्‌ ॥ 
नाह्मणएणन्‌ भोजयिल्ादौ विभज्य प्रबुञुदितान्‌ । 
्रलङ्कःतेन भोक्तव्य नववस्तो पशोभिना ॥ 
स्लिग्धेसुग्धेविदग्धेख बान्धवेन तेः सड । 
शङ्करस्ठ पुरा चूत ससन्जे सुमनोहरम्‌ ॥ 
का्तिके श्एक्ञपच्े तु प्रथमेऽहनि सत्यवत्‌ । 
जितश्च शङ्रस्तच जयं लेभे च पाव्वैतो ॥ 


१ 1 0101 प्ररौषसमय इत्यादि. पंक्तिचतुष्कस्‌ । 


४१२ 


कछव्यर्नात्ररः 


श्रतोऽथ शङ्करो द्ःखौ गौरौ निन्य सुखोषिता । 
तस्माद्युतं प्रकनतव्यं प्रभाते तच मानवैः ॥ 
तस्सिन्‌ चने जयो यस्य तस्य संवत्सरः एभः । 
पराजयो विस्‌द्धस्तु लब्धनागश्करो भवेत्‌ ॥ 
श्रोतव्यं गौतवाद्यादि खनुलिपेः खलङ्गतेः । 
विग्रेषतस्तु भोक्तव्यं प्रशर्तेर्वान्धिवेः मद ॥ 
तस्यां निशायां कन्ंव्यं शय्यास्छानं सुगश्रोभनम्‌ | 
[~ [९ ४ [६ प 
गन्धे: युव्येस्तथा वस्त्रे रनेमाच्येरलङ्कुतम्‌ ॥ 
दौपमाल्वापरिदघं तया धूपेन धूपितम्‌ । 
~ ् 
दयितामश्च महितनया सा च भदेल्लिषा ॥ 
क = भ 
नवेवनम्टख मन्यच्या दिजसम्द न्धिकान्धवाः । 


गौड़ाः- 


सुखराच्यां प्रदोषेषु कुवेर पनयन्ति ये । 


तजर मन्लः- 


धनदाय नमस्तुभ्यं निधिपद्माधिपाय च) 
भवन्तु ल्ममादान्मे धनधान्यादिसम्पदः ॥ 


वामनपुराणे- वलि प्रति दिविक्रमवाक्यम्‌- 


प्तयान्यमुखचं पुछं ठन्ते शक्रमरोत्छवे । 
वौर प्रतिपदा नाम तव भावौ महोत्सवः ॥ 
तन्न त्वां नर शादल दष्टाः पुष्टाः खलङ्कताः । 
युष्यदो पप्रदानेन श्रचंयिय्यन्ति यन्तः ॥ 


पी थ ८ |) 
१ ०५ 1 षिणो "षणि 


१ > अथान्यम्‌ ; 


जत्यरल्ाकरः ; 8२ 


तवोक्छवो सुख्यतमो भविष्यति दिवानिशम्‌ । 
यथेव राज्ये भवत साग्मनम्‌ 
तथेव खा भावयतिकौसुपौति ॥ 
अतिकौसुरति वचनाद्‌ थिनपृूरिंमातोऽतिशयो लभ्यते पद्म- 
एुराणेकमूलतया शुक्त प्रतिपद्‌ । 
शिष्टाः- 
काल्तिके शएक्तपचचस्य दितौयायां युधिष्टिर । 
यमो यञ्रुनया पूव्यं भोजितः खग्ड तद्‌ ॥ 
रतो यसद्धितोया सा ख्याता लोके युधिष्ठिर)! 
तस्यां निजग्े पाये न भोक्तव्यं वुधेरतः ॥ 
यन्नेन भगिने दस्ताद्धौ कव्यं पुष्टिवर्धनम्‌ । 
खर्णणलङ्गारवम््ादि पूजाषम्भारभोजनेः 1 
स्वां भगिन्यः सम्यज्या स्वभावे प्रतिपन्निकाः । 
प्रतिपल्निकाभगिन्यभावे प्रतिपननात्मानः ॥ 
ब्रह्मपुराण- 
षडगर्भान्‌ दानवान्‌ पूर्वं वञ्च यिला जनाटनः । 
खां योगनिद्रामष्जदेषौं र्ताथेमात्मनः ! 
एकानङ्गा भगवतौ भिद्धूये कालदेवतम्‌ । 
शक्तये तु सम्पूज्या कार्तिके कैश्रराक्ञया ॥ 
चतुश्यां वाऽथव्टम्यां नवम्याञ्च सिद्धिदा । 
चत्‌दृश्धामय स्तभि: सुसाताभिरयाक्रमम्‌ ॥ 
ग्रहादाद्य तु यश्च स्यादेकान्ते सफलो द्रमः । 


8९ 8 


चछ्न्यर नाक्रः । 


तचाघेपुष्यधुपान्रसन्यद्‌ा पूजयेच्च ताम्‌ ॥ 
एकपुत्रवतो नारो मनोवाक्कायसंयता ।, 
मव्वापकर णेचैक्त गटडोत्वा यराससुत्तमम्‌ ॥ 

ततो ददाति श्येनाय सुप्रोता प्रौतिकाभिनौ। 
दमं ग्रासः नयसखाय्थे भगवत्ये निवेद्यताम्‌ ॥ 
इत्युक्ता च गहं याति ततः प्रणंमनोरया । 

छते युगे प्रमिङ्धोऽचं दास्वह्भतकौ यया ॥ 
ययोपरिचरो राजा रेतः पणपुटे खकम्‌ ¦ 
निधाय प्रददौ नेतुं श्येनाय खां परिखां प्रति॥ 
युगव्वन्येषु मन्न्तु परटंसबनल इत्यपि । 

जाति शमो तं यासं प्राङ्मुखो याति वेश्च च ॥ 
श्रामन््णन्तृ यस्यापि परिणो निभ्वित पुरा । 

सख एव पकौ ग्टहाति तं गाखमिति निश्चितम्‌ ॥ 
रादौ ग्टहे ततो सङ्क सा नारौ सुसमादहिता। 
पश्चाद हइपतिभुंङ्कं मण्छत्य-न्ञाति-वान्धवः ॥ 

गहे देवौन्त्‌ तेनैव विधिना पूजयेत्‌ पतिः । 
श्येनग्रासो न देयञ्य न च इद्धं समाश्रयेत्‌ ॥ 
किन्तु रपरे डे माय्यां परूजयेत्त पतित्रताम्‌ । 


(^ ५ 


युगेष्वन्येव्वषद्वावो दन्पत्यो > भवेद्यदा ॥ 
तदा ख्गुलधश्मन्त॒ तावन्माच करोति सः , 
द दटेकानङ्गपूजा । 


छ्त्यरनाकरः । ४९१५. 


भविष्यपुराणे- सुमन्तुरुवाच 
षष्ठयां फलाश्ननो राजन्‌ विशेषात्‌ काल्तिके नुप । 
राच्यच्यतो विषेण सखराज्यं लभतेऽचिरात्‌ ॥ 
षष्ठो तियिर्म॑दाराज सब्वेदा सब्वेकामद्‌ । 
उपोव्या सा प्रयनेन सब्देकालं जयायिना \ 
कार्तिकेयस्य दयिता एषा षष्ठौ महातियिः । 
दे बसेनाधिपत्यं हि प्राप्रमस्यां महात्मना ॥ 
श्रस्यां ओषमायुक्तो यस्मात्‌ स्कन्टोऽभवत्‌ पुरा । 
तस्या^ षष्ठयां न सुच्ौत प्राघ्रुचाद्वागेवों मदा ॥ 

भागेवों भियम्‌ । 
द्लाष्ये कार्तिकेयाय खित्वा वे दचिएामुषठः । 
दघ्ना एतोदकैः पु्ये्मन््ेणनेन सुत्रत ॥ 
सक्रषिद्‌ारज स्कन्द मदःसेन महाबले ¦ 
रद्रोमाग्मिज षड्क्त गङ्गागभे नमोस्तु ते ॥ 
म्रोयतां देवदेनानः सम्पादयतु इद्नतम्‌ । 
दत्वा विप्राय चैवान्नं चद्ान्यद्‌ पि वन्तेते ॥ 
पश्चाहुङ्ग लसौ राच्यं छता -खमिन्त्‌ भाजनम्‌ । 
एवं षष्ठोत्रतस्थस्य उक्त रकन्देन यत्‌ फलम्‌ ॥ 
तन्निबोध महाराज मरोच्यमानं यथयाखिलम्‌ । 
षष्ठयां फलाश्नो यस्तु नक्तादहार भविष्यति ॥ 





१९ 7 तस्मात्‌ । २ > चामान्नस्‌। 


४२६ छत्यराल्लकरः | 


ग्क्तायामय कृष्णायां ब्रद्धाचारो समाहितः) 
तस्य सिद्धि्टैतिः पुष्टौ राज्यमायुनिरान्नयम्‌ ॥ 
पारचिकद्चेहिकश्च दद्यात्‌ स्कन्दो न संश्रयः । 
यः श्रक्तो नोपवासस्य स नक्तन व्रतो भवेत्‌ ॥ 
स्वग च नियतं वामो भवेन्नेवाच संश्रयः । 
दह चागत्य कल्पान्ते ययो क्रफलभाग्परबेत्‌ ॥ 
देवानामपि बन्द्योऽसौ राजराजो भविष्यति । 
दूति सकन्दषष्ठो । 
च्र्न च- स नक्तेन बत भवदित्यस्याये खें द नियतं वास 
इत्यस्य पञखाद् विव्यपुराण्यैय भाद्रो रषौ कल्यमध्यश्ः ‹ षष्ठयां तैलं 
न भुख्छ्रौतः इत्यादि सद्धश्नोको वयवधिख्ितोऽपि कन्यतरावचाफि 
योजयित्वा लिखितः । 
'तन्मत- 
षष्ठौ नक्तत्रतत्वेन तद्वद्‌ रा पि तेलाभोज्रनमङ्गम्‌ । 
तचेव भविच्यपुराणे 
चमा सत्यं दया दानं ग्रौचमिद्धियनिगहः 


द वपूजा यिद्वनं शन्तोषः स्तय-ञ्नम्‌ । 

सन्त्रतेव्वेयं धम्मे: सामान्टन सदा खितः ॥ 
तया- 

गडोला सप्तमोकल्पं ज्ञानतो यन्तु मानवः, । 

त्यजेत्‌ कामाद्भयाद्रापि स ज्ञेयः पतिन वुः ॥ 


गरी ना योम न -५-कण 


१ ‰# तन्न । > ^ सानवो यस्तु तःमसः। 


छव्यर्नाकरः । 8१७ 


सप्नम्यां सोपवासस्तु राचौ सुङ्ख त॒ यो नरः| 

छलो पवासं षष्ठयान्तु पद्वम्यामेक कालभुक्‌ ॥ 

दला तु सस्त शाकं भक्तया भोज्यस्षमन्वितम्‌ । 

देवाय ब्राह्मरेन्यख्च रात्रौ भुच्गौत वाग्यतः ॥ 

यावल्जौवं नरः कञ्िद्रतमेतच्चरिष्यति । 

तस्य ओ विजयश्चेव जिवरगंश्च विबद्धंते ॥ 

ग्टतख् सखगमाप्नोति विमानवरमाखितः | 

खय्येलोके स रमते मन्वन्तर गणान्‌ बह्भन्‌\ ॥ 

दह चागत्य कल्पान्ते रिपून्‌^शास्ति समन्ततः । 

पुच-पौतैः परितो दाता स्ान्नपतिशिरम्‌ ॥ 

स सुनक्ति परान्‌ भोगान्‌ विये चालितः परैः , 

गायन्‌ यो राजग्राहूल श्राकाहारेष सप्तमौम्‌ ॥ ` 

उपोष्य लश्वं तत्तोये चैदं वै गयसंज्ञितम्‌ , 
कुरुणा इह पूव्वण शाकाहारेण पै तथा ॥ 

चग्मेचेचं कुरुचेचं छतं तेन विवसखतार । 

मघ्रमो नवमो ष्टौ ठतोया पञ्चमो तथा ॥ 

कामद्‌ स्तिथयो देता इडेव धनरयोषिताम्‌ । 

सप्तमौ माघमासस्य नवम्याश्वयुजे तथा ॥ 

षष्टो भाद्रपदे धन्या वैशाखे च ठतीयिका । 

पुणा भाद्रपदे मासि पञ्चमो नागपञ्चमी ॥ 








९ 7 सन्वन्तरशतान्येथ। २ & विपुल शन्तिसन्ततः । 
रे ^+ वितन्वता | ४ मरूले-- इतर च्र न योषितां । 


*२े 


४९१८ क्रत्यरल्नाकरः। 


इत्येतास््रषु मासेषु विश्रेषाल्तिययः श्भा : 
प्राक सुसंख्ञतं शला पेय-भच्छसमन्ितम्‌ ॥ 
दला विप्रे यथागरक्या पञाहुङ्खं निशि त्रतौ । 
कान्तिके ्क्तपचस्य ग्राह्येयं कुरुनन्दन ॥ 
चतुर्भिंस्वपि मासेस्तु पारणं प्रथमं सतम्‌ । 
अग स्तिक्सुमेस्तच प्रजा कार्य्या विभावसोः \ 
विन्लेपनं कुङ्म्च घूपेशचैवापराजितः | 
स्तानन्त्‌ पञ्चगव्येन तदैव प्राश्रयेत्तथा ॥ 
नेवेद्यं पायसञ्चाच देवटेवस्य कौ्तितम्‌ 
तदेव देय विप्राणं शाक मच्छयमयात्यना ॥ 
प्डभशाकसमायुक्तं जच्छपेयसमन्ितम्‌ ) 
गएएभश्कमनिषिद्धशाकम्‌ | 


५८1 


हितोये पारणे राजन्‌ इएभगन्धानि चानि वें; 
पुष्याणि तानि देवश तया श्वेतच्च चन्दनम्‌ ॥ 
धूपानां गुग्गृलुश्चाच् भियो देवस्य स्वेदा 
श्ाखखयोदनं नेवेद्यञ्च द धिमिश्रं महामते ॥ 
तदेव ब्रह्मणनान्तु भच्छलेद्यषमन्वितम्‌ ¦ 
कालशाकेन च विभोयेक्तं दचादिचक्षणः ॥ 

गौ रसषेपकस्ेन खानञ्चाच विदुषैधाः 

तस्येव प्राश्ननं धन्यं सब्पैपापरं एएभम्‌ ॥ 
दतोयपारणयान्ते महात्राह्मएमोजनम्‌, । . 


1 न~~ ~ ~~---~---* ~~ = =-= ---~ [0 


९ 8 ब्राद्भणानःच्च मोजन। 


छत्यरनाकीरः | ४९९ 


अ्रवणञ्च पुराणस्य वाचनञ्चास्य शस्यते ॥ 

देवस्य पुरतः चातो ब्राह्मणानान्तयाय्रतः | 

न्राद्यमणादाचकाच्छराव्य नान्यवणंखसुद्धवात्‌ ॥ 

श्रय तान्‌ ब्राह्मणान्‌ सर्व्वान्‌ शक्तया भ्या च प्रूजयेत्‌ | 

वाचकस्यामले चाङ्गं वाससौ सन्निवेदयेत्‌ ॥ 

वाचके पूजिते देवः सदा तुष्यति भाखरः) 

करवोरं यथे्टन्त्‌ तथा रक्तञ्च चन्दनम्‌ ॥ 

यथेष्टं ग॒ग्गलुञ्चास्य यथष्टं पायमं सदा । 

ययं मोद कास्तस्य यथा वे ताघ्रभाजनम्‌ ॥ 

यथेष्टञ्च तं तस्य चयष्टो वाचकः सदा । 

पारणएच्च, यथेष्टं वे सवितुः कुरुनन्दन ॥ 

दृत्येषा मघ्नमो पुण्छा सुप्रिया गोपतेः सा 

यामुपोय्येह पुरुषो दौ मैत्येन न युज्यते ॥ 

कार्तिके शएक्ञस्षम्यामुपक्रम्य मतिमां कव्यता चतुय चतूर्थे 
मासि या या एएक्ञसत्तमो तस्यां तस्यां पारणं काय्य, एव- 
मेकस्मिन्‌ वष ॒वारचयं पारणं भवति एवमेव वर्षान्तरे श्येतादृं 
व्रतं यावष्नीवं कन्तेव्यम्‌ । 
दूति शाकसप्रमौ । 
तचेव- 
चयने विषुवे चेव षड्श्गेतिमुखे तथा । 
मासेश्चतुभियेत्‌ पुछं विधिना पृच्य चण्डिकाम्‌ ॥ 


1 





~~~ ~~ “न = = ० 4 च> ० ० 


१ & पुराणञ्च) 


नि ` शि 


४२० छत्यरलन्नाकरः । 


तत्‌ फलं लभते बौर नवम्यां कार्तिकस्य तु । 
युगा दिश्चेयं नवमौ । | 

युगादिषु युगान्तेषु श्राद्धमचयसुच्यते । 
दत्यधिकत्य वराहपुराण- 

कार्तिके शक्कपके त्‌ चेला च नवमेऽहनि । 
वरादपुराण श्रमस्य उवाच- 

माव्पैभौ मव्रतं चान्यत्‌ कथयामि समासतः । 

येन सम्यक तेनाष्ट घान्वेभोमो नृपो भवेत्‌ । 

कात्तिकस्य तु मासस्य द्श्मो शएक्तपरचिका । 

तस्यां नक्ताशनो नि्यः दिच्‌ शद्धवलिं इरेत्‌ ॥ 

विचिः कुसुमेभेत्था पूजयिलाऽय ब्राह्मणान्‌ । 

सब्वां भवत्यः खिद्यन्ते मम जन्मनि जन्मनि । 

एवसुक्ता कलिं तासु दला द्धन चेतसा ¦ 

ततो राजो च भुञ्नौत तदन्नञ्चः सुसंख्तम्‌ ॥ 

न्वं पञ्चात्‌ चथे्टन्तु एवं संवत्सरं नप । 

यः करोति नृपो नित्य तस्य दिग्िजयो भवेत्‌ ॥ 
भवत्यो दिशः तासु दिचच चरन्न व्रते प्राच्यादयो दैवताः 

ताषाञ्च नामभिनेमोऽन्तेः पूजा वल्िदानञ्च । 
दति साव्वेभोमद्श्रमोत्रतम्‌ | 

ब्रह्मपुराणे 

एकादग्वान्त्‌ श्ुक्तायां कार्तिके मासि केतुम्‌ । 


१ बले भूत्वा सन्यः । २ 8 द्यन्नन्तु । 


क्रत्यरनलाकरः। ४२९ 


प्सु बोधयेद्धाचौ अद्धा-भक्तिसमन्वितः ॥ 
नत्यगोते्तया वाद्ये खग्यजःसाममङ्गनलेः । 
बोणापणएवश्रब्देश्च पुराणश्चवणेन च ॥ 
वासुदेवकयामिश्च स्तोचेरन्येख वैष्णवैः । 
खभाव्रैरिन्रजाकेश्च मूमिशोभाभिरेव च ॥ 
ष्य श्रये -नेबेये-दौपटचेः सुशोभने: 
हो मेभच्यैर पूते फलैः शाक्रैख पायसे: ॥ 
द्ो्विकारौमेधुना द्राचाचोडेख, दाडिमिः 1 
कुटेरकस्य मन्यथा मालत्या लवणेन च । 
इद्याभ्यां श्ेतरक्ताभ्यां चन्दनाभ्याञ्च स्वेदा । 
कुङ्कमालक्तकान्याञ्च रक्तजे: सकङ्केः । 
तथाविधे रक्रपुव्यद्रं ेर्वोरक्रयातेःः ॥ 
कुटेरकं छष्णतुलसोमाह्कः, वोरक्रयो विक्र चुपन्यस्तमूलय- 
त्याजनेन क्रयः । 
तस्यां राश्चां बयतौतायां दादश्यामरुणोदये | 
च्रारौ तेन तैलेन मधुना सा पयेत्ततः ॥ 
दघ्ना च्ौरेण च ततः पञ्चगव्येन शास्त्वत्‌ । 
शासरवदिति समन्लकपञ्च गव्येन सानोक्तपरिमाणवता इतादिना 
 चेत्यथैः । 
उदन्तनं माषचणं मद्रामलकानि च । 
लोध्रं कालेयकं खव तगर सुस्तकानि च ॥ 


नोनि ~ ~~ ~~ ---------------- ~ न भ भ न ~ न ~ ता ०० का कमम 


¢ 1) स्तौदधेख। २ 0 -जौतैः। 


६२२ 


छत्यर्नाकरः ; 


सषपाञ्च प्रियङ्गश्च मातुलक्कर सन्तया । 
सब्वौँषध्यः सव्वैगन्धाः सब्वेवौजानि काञ्चनम्‌ ॥ 
मङ्गल्यानि ययाकाम रलानि च कुशोदकम्‌ ¦ 
हसिदन्तड्धता म्द टेषश्रङ्गोद्धूता च भ्टत्‌ ॥ 
नदौतौ राद्गवाखखानादस्मोकाचछङ्गमाद्धतात्‌, । 
राजाम्धानाच्च सरसस्तथा पष्वेत मस्तकात्‌ ॥ 
एताभिः शोध्य देवेश ददया्गोरोचनां इएभाम्‌ ¦ 
सव्वौंषध्यादवः परिभाषोक्ताः ॥ 

ततस्तु कलस देया खथयाप्राप्राः खलङ्कताः । 
जातौपल्लवसम्बद्धाः सफलाशच सकाञ्चनाः | 
पुण्या इजयशब्दन वोण्ण-बेणरवेण च । 
प्रब्दन मधरेणेव स्त-मागध-वन्दिनाम्‌ ॥ 
एवं सस्थाप्य गोविन्द खनु लखिप्र सखलङ्तम्‌ । 
सुवामम पूजयेच्च सुमनोभिः सङ्कङुमेः । 
दौपेश्पेमेनो जे पायसेन च श््रिणा । 
माचयाऽनप्रदानेश्च होमैः पुष्पः सुदकिरेः ॥ 
वासोभिश्वैषरै रने गौभिरथैममनोरमैः । 
ब्राह्मपणः प्रजनोयाख विष्णोराद्याख मूततयः ॥ 
सम्विभच्याञ् दायादा नाद्याः सात्तजातयः । 
यज्ञथिष्टा्तं पश्चाद्धोक्तयं ब्राद्धणेः सदह ॥ 
सम्विभच्यास्ततः पञ्ाच्चयोद श्यान्त नन्तकाः । 
चतुदश्यां न भोक्तयं पातवयमथयवा पयः ॥ 


कछत्यरत्नाकरः) 8्य्द 


पौ णंमास्यान्तु सन्यज्यो भत्वा दामोदरः सद्‌ा । 
मान्या शक्वनुसारेण । 
तस्मिन्नहनि यल्लन कन्तैवये नक्तभोजनम्‌ । 
दौःौखखभ्ना न्तिचिकितेः तच सप्तपिंमिः पुरा ॥ 
सन्त्यक्ताः छृत्तिकाः षट्‌ च ते साष्वौमरुन्धतोम्‌ । 
ततः खन्दश्च भगवान्‌ कान्तिकेयलसमागतः ॥ 
खद सद्रवचनाद्ह्िमध्यात्‌ समुत्थितः 
सद्रात्‌ पाश्रप्रात लेभे वङ्णस्तच दारुणम्‌ ॥ 
अ्रग्रिख ग्टगुणणपाच सुक्तस्तत् महाभयात्‌ । 
बद्धितौ मनुना मव्छो नौला तच पयोनिधिम्‌ ॥ 
खातग्त्यं वृषभेस्तच प्राप्न उत्सङ्ग एव दि । 
पुषिः साङ्खाभिकौ तच कता उेवेजिमौषुभिः ॥ 
तस्मादशाच कन्तयाः पौराणा उत्सवाः सत्‌ । 
तच चन्द्रोदये पुज्यास्तापस्यः छ्तिकाश्च षट्‌ ॥ 
काल्तिकेयस्तया खज्ञो वरूणख इताग्रनः । 
घान्येः सश्क्रर्दारोद्धं भ््षितव्यं निशागमे ॥ 
माये -धपस्तया-गन्यर नयरद्ावचेस्तया | 
परमान्नेः फलैः श्ाकेबं द्िनाद्यणएतपेशैः । 
दरचूणाञ्च विकारेण दौपटचेः सुग्नोभनेः ॥ 
छषरेणाथ पयसा तथा चान्येश्च गोरसः । 
लोपिकाभििंचिचाभिः खजाल्यकतेशच पानकैः ॥ 
सोपिका पक्तान्नविश्रेषः ¦ 


४२४ 


॥ १ श, 





छल्यरलाकरः । 


एवं देवास्तु सम्यूज्य दौपो देयो गटदाद्रहिः, 
ष््रारोपान्ते ततो गत्तश्चतुरसतो मनोहरः ॥ 
चत्‌विंशराङ्खलः काय्यै: सिक्श्चन्दनवारिणा | 
गवां चोरेण सम्पण समन्तात्‌ परिर चितः ॥ 
तच हेममयो मत्छो सुक्रानेचो मनोहरः । 
सङ्प्षव्यो विधानेन नमोस्तु हरये पठेत्‌ ॥ 
ब्राह्मणाय मनोज्ञाय दद्यात्‌ तत्‌ चौरसागरम्‌ । 
सब्वे शसखधर रम्ये सव्वेमन्धखमज्ितम्‌ ॥ 
सुधासमम्‌ ब्राह्मणाय महाकान्तारतारगम्‌ । 
यावन्ति तस्य रोमाणि शरोरे सन्ति संख्यया ॥ 
तावद्युगसहसाणि स्वगे वशति तम्मदः | 
पूजयिला ततो विष्णुं रक्तमा्यानुकेपनेः ॥ 
भोक्तयं गोरसप्रायं सुप्य खण्डिले ततः 
एकादश्यादिषु तथा ताखु पञ्चद्धु राचिघु। 
दिने दिने च क्ञातव्य शौतलासु नदौश्वपि | 
पूजनोयो हरिदैवो ब्राह्मणाः सङ्ताप्नाः ॥ 
रभयं सब्पैगधतेभ्यो दत्तं पूव्यं सुरासुरः। 
विष्णोः प्रबोधसमये दिय युगश्रतं क्रमात्‌ ॥ 
यथावत्‌ पालितं तच्च सुनिसिवाक्यसुत्तमम्‌ । 
देवेविष्णप्रवोधादि समयं रत्तराचणम्‌ ॥ 
पालितं त्च वचनं पञ्चात्यक्त विधेवंश्ात्‌ । 








न ~~ [कि 7 1 ए त त जन 


१ + 7 दौपोपान्ते। > ५ {> सुवाससम्‌ । 





--- ++ 


क्द्यरनलनाकरः । 8२५ 


नित्यं संगरामशौललाद्धग्मा द्विंसात्सकेस्तया ॥ 
देवदानवयकेश्च पिशाचैरथ राचसेः । 
वव्जिता प्राणिहिंसा त मांशारटेदिनपञ्चकम्‌ ॥ 
यस्मान्न भोजनं धाचा तेषां मांसादुते क्तम्‌ । 
ततः प्रष्टति यो येन धम्मेश्च खयमाभितः ॥ 
ख तेन पाद्यते नित्यमद्यापि प्रयतात्मना ) 
सुनिवदटेववचचाय देत्यदानववत्तया ॥ 
देया च स्व्वेश्रूतेभ्यो नरेरभयद्‌ चिण । 
अरभयदलिणएण श्रदिखा सा चाममांसाभोजनरूपाऽपि, अ्रतएव 
मांसत्यागात्वारोऽच शिष्टानां मांसभच्णस्यापि हिसाप्रभेदत्ात्‌ ॥ 
तथाच मनुः- 
श्रनुमन्ता विश्रसिता निहन्ता क्रयविक्रयौ । 
संस्कनत्तां चो पहरन्तां च खादकाश्चाष्टचातकाः \ इति । 
प्रबोधः श्यनानुसारारेव नेतव्यः । दिनपञ्चकेऽच कत्य- 
कथनमाचं वकपञ्चकमिति प्रसिद्धं चेदं दिनपञ्चकं गौडनिषन्धे 
अतोव निन्दितं मांसम्‌ । 
विष्णध्नात्तरे श्एक्तदयादशोः प्रकम्य 
सरोमवस्लदानेन कार्तिके दिवमाश्रयात्‌ । 
सखरोमवस्तं पडादि । ` 
वराहपुराणे- 
यन्मया पूव्वष्ष्टोऽसि घरण च यश्रोधन । 


पीर 11111 





म 


१ > 2 प्रियमात्मना ) 
8. 


8६ छ्यरल्याकर्‌ः : 


कश्मेणण येन्‌ पश्यन्ति तददख पदं विभो ॥ 
तन्ममाचच्च देवेग्र छत ध्यं सनातनम्‌ । 
येन मे संशयो देव इदयाटदपगच्छति ॥ 
वराइ उवाच- 
कौेसुटस्य तु मास या सिता दादौ भवेत्‌ | 
अच्येदयस्त॒ मां तच तस्य युण्फलं शरटण ॥ 
यावल्लोका हि वन्तन्ते यावच्चद्धव माधवि | 
मदक्ती जायते तावदन्यभक्रो न जायते ॥ 
छल्ा वे मम कर्माणि द्वादश्यां मत्परो नरः, 
ममेव बो धनार्थाच दमं मन््मुदरयेत्‌ ॥ 
नद्योन्ररद्र रभिनूयमानो' 
भवानुषिवं न्दितवन्दनौयः । 
प्राप्ता तवेयं किल कौमुदाख्या 
जाग्टस्व जाग्टष्व च लोकनाय " 
मेघा गता निश्मेलपूणचनद्रः 
ग्रारद्यपुष्याणि च लोकनाय | 
श्रं ददानोति च युखदेतो- 
जाग्टव्व जागव च सलोकनाय ॥ 
स यज्ञो यच भासि व सव्वेयन्ञानुभवोऽसि यज्ञाः | 
यजन्ति वार््ताखुविष्एद्धषलाः प्रबुध्य जाग्टव्व च लोकनाय ॥ 


भाय कः न ~~ ~ + ~ ~ ----- ~ ~~ ~~~ ~ = न ~ ~ ~~ ~ -= ~~~ ~~ -~ ~ ~~ = ----- = नधान नध, कनद 


९ अभिषटूयसानः 


दछद्यर्ल् क्रः । 


8२७ 


यञ्वान्तिमो मन्तः समयप्रदैपाद्यलिखितोऽपि वरादपुराणे 


कृत्यसमुचयादिषु च दूष्टलाल्ञिखितः । 
एवं कर्म्माणि कष्वेन्ति दादण्टां ये यश्खिनि, 
मम भक्ता नरभ्रष्ठास्ते यान्ति परमां गतिम्‌ 1 
एवं बे ग्रारदं कम्मे निखिलं कथितं मया । 
मोदते देवि संसारे मम भक्तः सुखावदः ॥ 

श्रगस्त्य उवाच- 

प्रणय्व भक्तितो राजन्‌ का्तिंकैकाद्‌ शु तया ¦ 
उपोग्य विधिना येन सर्वषां प्राप्रुयात्‌ फलम्‌ ॥ 
प्राजिधानेन सङ्कल्प्य तद्त्‌ खानं समात्रेत्‌ । 
विलोमेन चंयेदेवं नारायणम कस्मषम्‌ ॥ 


पराज्िधानेन मागेलिखितद्वादश्यक्रसामान्येतिकन्तेयतया विलो- 


सेनान्यद्राद शो विदहितपाद्‌ा दि प्रूजवेपरौव्येन । 

नमः सदसरशिरसे शिरः समयज्य वें इरेः । 
पुरुषायेति च भुजो कण्डं वे विश्वषपिणे । 
ज्ञानात्यमनेति चास्त्राणि श्रौोवत्छाय तथा उरः । 
जगट्धसिष्वे पूज्य उदर दिव्यमृन्तेये ॥ 
कटिं सहखूपादाय पादौ देवस्य पूजयेत्‌ । 
श्रन॒लोमेन देवेशं पूजयिता विष्वणः ॥ 
नमो दामोदरायेति सर्व्वाङ्ग पूजयेद्धरिम्‌ । 

श्रनुलोमेन तन्तन्मन््रसदितपादादिप्रूजादिक्रमेण , 
एवं सम्यूज्य विधिना तस्या चतुरो घटान्‌ । 


8५८ 


छी्यग्न्ाकरः । 


स्थापयेत्‌ रनगभंस्त॒ सितचन्दनचचिंतान्‌ ॥ 
खण्द्‌ा मवद्धयो वांस्तु भितवस््रावगुण्ठितान्‌ । 
स्धितान्‌ ताचपाजै्ठ तिलपूरेः सकाञ्चनेः । 
चल्रारः सागराश्चेते कल्पिता दिजसन्तम । 
तन्मध्ये प्राजिघानेन सवणे स्थापयेद्धरिम्‌ ॥ 


प्राभ्िधानेन मद्छदाद्‌ श्रौ विधानेन । 


योगेश्वर योगनिधिमनन्तं पौ तवासखम्‌ । 
तम्येवन्त सम्पज्य जागरन्तच कारयेत्‌ ॥ 
कुर्य्याच्च वैष्णवं यागं यजेद्योगेश्वर हरिम्‌ । 
षोडशारे रथाङ्ग तु रजोभिबे्धभिः कते ॥ 


वड्भिविष्णपूजास्थानचक्रप्रकतिग्ठतपञ्चवणेकैः । 


एवं छला प्रभाते तु ब्राह्मणान्‌ पञ्च चानयेत्‌ ॥ 
चत्वारः कलशा देया चतूवर्णाः पञ्चमस्य तु! 
योगौश्वरन्त सौवण प्रदद्यात्‌ प्रयतः श्टुददिः ॥ 
वेदाध्येचे सम दन्तं तदिद दिगण तथा 
श्राचाय्यं पञ्चरात्राणां सहखगुणितं भवेत्‌ ॥ 
यस्िद खर स्यन्त समन्तं चोपपादयेत्‌ । 
विधानं तद्य भक्ताः वे दत्तं कोटिशणेन्तरम्‌ ॥ 
गरौ तिष्टति यस्वन्यमासन्नं पूजयेत्‌ सुधौः । 

स दुगेतिमवाप्नोति दन्त तस च निष्फलम्‌ ॥ 
प्रसन्ने च गुरौ पृव्व पञ्चादन्यख रीयते । . 


भ स न ृककमः - 





ण पु मा कमा ज १ ७०५.०५०० ५०००० 





++ = ~~~ ~~ ~ 


8 योगनिद्राशयिनम्‌ | > 8 योग्ये, 


छ्मत्यरनाकरः । ४२९ 


अविद्यो वा सविद्यो वा युरज्ञंयो जनादन ॥ 
मागेस्छो वाष्यमागेखो गुरुरेव परा मतिः । 
प्रतिपद्य गुर्‌ चस्तु मोहादिप्रतिपद्यते । 
युगकोटि स नरके पच्यते नाच संग््यः। 
एवं दला विधानेन तलतो दिष्णमच्य च ॥ 
विप्राणं भोजनं दद्याद्ययाश्नत्या सदकिणम्‌ । 
धर णौत्रतमेतद्धि पुरा कला प्रजापतिः ॥ 
प्रजां लभेननथा मुक्तिं ब्रह्मण विचले एएभ, । 
युवनाश्वश्च राजषिरेतेन विधिना पुरा ॥ 
मान्धातार सुतं लेभे पर जह्य च श्राश्चतम्‌ | 
तया हेदयद्‌ायादः छतकवौौ नराधिपः ॥ 
कान्तैवौय्यं सुतं लेभे पर ब्रह्म च शश्वतम्‌ 
श्रकून्तला प्येवसेव बतं चोरत्ा महामुने ॥ 
लेभे शाकुन्तलं पुज दौ दन्तः चक्रवत्तिनम्‌ । 
पनेन विधिना प्राप्त चक्रव्तित्सुनत्तमम्‌ ॥ 
धर्वा श्रपि पाताले पद्मया च छतं पुरा । 
ब्रतमेतन्ततो नान्ना चघरणोत्रतसुच्यते ॥ 
समाेऽक्छिन्‌ धरा देवौ हरिणा क्रोड्रूपिणा । 
उद्धताद्यापि तुष्टेन धारिता नौरिवाम्भसि ॥ 
य ददं ष्टणयाद्धत्या यश्च कुर्यया्नरोत्तमः । 
सबव्वेपा पविनिभ्ुक्रः विष्णसालोक्येतां जरजेत्‌ ॥ 


1 प भमा कककग्ककमाच 


चाचित्‌ ब्रह्मण्य विमल्तं प्रभम्‌ । २ ^ दुख्मन्तात्‌। 


8० छत्य रत्नाकरः । 


एकेकाप्रति, चापल रान्यसेका प्रयच्छति । 
कि पुनर्ादगरेतास्ह येनेन्रलं ददुः पुरा॥ 
दति खोगौश्वरदादणश धरणोत्रतम्‌ । 

जद्यपुराण- 

पुण्या महाकान्तिकतौ खाव्नोवेन्दवोः कन्तिकाखयोः । 

पुष्या ओआआद्भकरणेन पुडेत्सतयेव प्रक्रमात्‌ 1 
लया- 

आश्चेयन्त्‌ यदा चं का्तिक्यां भवति कचित्‌ । 

महतो सा तिथिक्लंया खानदानेषु चोत्तमा ॥ 

यद्‌। याम्यन्त॒ भवति छन्त तस्वामयोौः कचित्‌ । 

तिनि: पि महापुण्या मुनिभिः परिकौ्तिता ॥ 

प्राजापत्य यदा छक तिथौ तस्यां नराधिप | 

सा महाकातिकौ ग्रोक्ता देवानामपि दुलेभा ॥ 
अप्रयं डन्तिकानच्दं याम्यं भरण प्राजापद्य रेदि । 
तया- 

विग्राखासु यदा भानुः सल्तिकादु च चन्रमा: । 

स योगः पद्मको नाम पुष्करेष्वतिदलेभः ॥ 
विष्णः 

दृश्येते सहितौ यस्यां दिवि चनद्रहृस्यती । 

पौणेमासौ तु महतौ प्रोक्ता स्वत्सरे तु सा॥ 


[गी हि १ ~ व ~~ ~ ~~ = [91 + -- ~न क 
~ -- ~ "~ ~ = 1 नम = 


१ 1 रकैकयापि चःपत्स । ९ + तस्यान्तियौ 


छत्यरत्नाकरः ¦ ४३९ 


तस्यां दानोपवाखाद्यमच्यं परिक त्तितम्‌ 
तथेव दादू श्एक्ता यान्या अवणएसंयुता ॥ 
सहितौ एकराग्िस्ितौ नलेकनक्षचस्यितौ संवत्सर इति 
वचनात्‌, न हि प्रतिसंवत्छरे नियमेन पोणंमास्यासे कनक्चस्थौ च 
चन्द्र-खहस्पतो भवतः , 
एकरा शिखितौ भवत्‌ दवेति पारिजातः 
यथा- 
कात्तिक छत्तिकायुक्रा चेत्‌ स्यात्तस्यां सितसुच्ाणसेकवणे 
वा शशाङ्लोदये सव्व॑रन्नगन्धोचेतं दौपमध्येे ब्राह्मणाय ददात्‌ 
कान्तारभय नश्यति 
भविव्यपुराणे- 
कार्तिके पौ णंमाख्ान्त सोपवासोऽचयेदुमाम्‌ । 
सोऽग्िष्टो मफलं विन्देत्‌ स्य्येलो कञ्च गच्छति ॥ 
देवोपुराणए- 
"कालिके कारयेत्‌ पूजां यागं देवीमयं सद्‌ा । 
नद्विष्णुशिवा रौनां तच पूजा महाफला ॥ 
गवोत्सगेश्च कन्तेव्यो नलं वा डषसुत्सृजेत्‌ । 
मव्वेयज्ञफलं वौर म्राभ्रुयाद्‌ विचारयन्‌ ॥ 
मत्छपुराण- 
कार्तिक्यां यो ठषोत्सगं कत्वा नक्तं समाचरेत्‌ । 
स शेवं पदमाप्नोति दृषत्रतमिदं स्मृतम्‌ ॥ 


नेन 





निरि. 1 


१ 1 कात्तिक्यास्‌ | 


४३२ क्त्य रत्नाकर" । 


यमः- 
कान्तिक्यां पुष्करे सातः सव्वैपापेः रसुच्यते । 
श्रौमहाभारते- 
तस्मात्त कपिला देवा कौमुद्यां जये्टपुव्करे । 
न तस्य विषमं किञ्चिन्न दुःख न च कण्टकाः ॥ 
यस्तु वंत परूणंमभ्रिहोन समाचरेत्‌ । 
कानि वा वसेदेकां पुष्करे खममेव तत्‌ ॥ 
ब्रह्मपु राण- 
च्य चेच्यां ठषोत्सरमः कान्तिक्यां वा प्रयन्नतः | 
कन्तैवयसू्वथ रेवत्यां वचिभिवेषेद्धिंजातिभिः ॥ 
ठेषभः छष्णमारस्तु प्रत्ययश्च चिदहायनः । 
मनोज्ञो द्‌ नोयञ्च सव्वैलच्चणसंयुतः ॥ 
श्र्टाभिर्धेनभियुक्रशतु्भिंरथवा क्रमात्‌ । 
चिदायनौ सिधेन्याभिःः सुरूपाभिः सुशोभितः ॥ 
सव्वापकरणोपेतः सव्व॑शस्यचरो महा न्‌ । 
उत्‌ सष्टव्यो विधानेन श्रुतिस्मृतिनिद शेनात्‌ ॥ 
प्रागदकुञ्चवने देभ्े मनोज्ञे निव्जंने वने । 
न च वाद्यो न च रौरं पातव्यं केनचित्‌ कचित्‌ ॥ 
खधा पिदभ्यो माहश्यो बन्धभ्यश्चापि तुष्टयेर । 
माटपच्वाख्च ये केचिद्ये चान्ये पिठपक्काः ॥ 


१९ ‡ वल्याभिः। २ कचित्‌-- न वादं न च तत्‌ चौरम्‌ । 
३ 8 हभ्रथे। 





छत्यरुनाकरः । ४२३ 


क 


यरु-श्वशएर-बन्धूनां ये कुलेषु समुद्भवाः । 
ये प्रेतभावमापन्ना ये चान्ये श्राद्ुवल्िंताः । 
ट्षोत्सन ते स्ट लभन्तां पिदितपंणाम्‌ । 
दद्ादनेन मन््ेष तिलाच्चनयुतं जलम्‌ ॥ 
पिदशभ्यश्च मासेन ब्राह्यणभ्न्य ददिणाम्‌ । 
ततः प्रभुदितास्तन इषभन ममन्विताः ॥ 
वनेषु गावः करौडन्ते टषोत्सम्प्रसिद्धिषु । 
अरय उत्ते ठषोवसर्गे दाता वक्रोक्तिभिः पदेः । 
नराद्यणनाहइ यत्‌ किञ्चिन्मयोतसृष्ठन्त्‌ निञ्जेने ॥ 
तं कथिदन्यो न नयेन्न विभाच्यं यथाक्रमम्‌ । 
टृषोत्सर्गाद्ते नान्यत्‌ युखमस्ति महौतले ॥ 
नया पञ्चद्‌ भोप्रमङ्गात्‌ । 
युगाद्ेषु युगान्तेषु षड्गशोतिमुखेषु च । 
दकिणोन्तरगे सुय्यं तथा एिषुवतोदंयोः ॥ 
सक्रान्तिषु च सर्व्वासु ग्रहणे चनद्र-खुय्ययोः । 
पञ्चदश्धं चतूरृश्यां पश्चम्यामष्टमौषु च 
उपचारो गवां कार्यां मासि मासि यथाक्रमम्‌ ॥ 
लवणस्य च चत्वारि पलान्यष्टौ एतस्य च । 
परकोयस्य दुग्धस्य तया देयानि षोड्श्र ॥ 
दाविश्च्छोतलस्यापि जलम्य च पलानि च। 
श्रारौ दिचाय्यै वयसः, परिमाणं बलं प्रएचिम्‌ ॥ 
एदिमिं जटय्येम्‌ । 





१ 7 पयस्ः। 


8३ 


ना ननमय न> 


क्रत्यरनाकररः)। 


श्राकस्िकन्त्‌ दातव्य प्याय न्त गवाद्धिकम्‌ । 
प्रभाते वणं यच दौयते च ततो जलम्‌ ॥ 
ततस्तएएनि भोन्वञ्च पोषणं मांसवव्ितम्‌ ॥ 
निभि दीपाः सनन्ललोका देवाः पौराणिक्रौ कथा । 
एवं छते रन्नप्रणां महो दला फलं भवेत्‌ ॥ 
मोरमेथ्यः स््प॑ह्हिताः पविचाः पुष्छराश्यः। 
प्रतिग्हन्त्र मे ग्रासं गावम्वरेलोक्यमातरः ॥ 
दद्यादनेन मन्त्ेण गवां ग्रास सदेव हि) 

गवां कण्डुयनं घासग्रासमाङ्किकमेव वा ॥ 

दता भवेन्महापुष्छे गोप्रदानसम च्णात्‌ । 

गो प्रदानाच्च चत्पु्ठं गवां भरच्णाद्धवेत्‌ ॥ 
मनु्ये्तएतोयादर्गावः पाच्याः प्रयन्तः । 

देयाः पोयाश्च रच्छाख पूज्या व्राद्याश्च सच्ब्टा ॥ 


कालिकापुराणे- 


कान्तिक्यामथ वेशाख्यामयनादिषु पर्व॑सु । 
दला दौपान्‌ समसु दरोष्य देवस्याग्रे बलिं ततः ॥ 
भूतानां देवदेवस्य बदिदिच दरेव्छुधौः । 

स तरतो देवमामन्त्य सुपेद्ूमौ इर स्मरन्‌ ॥ 
उपलिप्य गह गवा निराहारो निशि खपेत्‌ । 
अपरेऽहनि पूर्वाह्ने गला तच्रैव मन्दिरम्‌ । 
ऋरयेत्त्‌ महाच््ानं इराय विधिना ष्टण ॥ 


नि त 


९ कीचत्‌-- प्रतिग्टह्लन्निमम्‌ , 


क्रत्यरल्ाकरः। | ४२५. 


पञ्चवि भ्र पलं लिङ श्रभ्यङ्खः कारयेदय । 
गिवस सपिषा लान प्रोक्तं पलश्देन तु ॥ 
तावता मधुना चेव दघ्ना चेद ततः पुनः ¦ 
तावतैव हि चौरेण पञ्चगव्येन वा ततः ॥ 
ग्यः साद्धंसहसखेए पलानामेच्वेण तु । 
रदेन कारयेत्‌ स्लानं भक्तया चोष्णाम्ना ततः ॥ 
शोताखखना तयोदत््ये वस्त्रपूतेन मन्लवित्‌ । 
खापयेद्धक्रितो श्यो गन्धमन्तसख्धितेन तु ॥ 
मन्ल्वता गन्धवता चेत्ययेः | 
विधिना क्लाप्य चानेन लिङ्ग रोचनया लिपेत्‌ । 
कुष्ट-कुङ्कम-कपूर-चन्दनागुरुयुक्तया । 
लेपयिला ततो लिङ्गमापौडानत घनं व्रुभम्‌ ॥ 
` नोलोत्पलसदसेण मालां वद्धा च पूजयेत्‌ । 
त्रलाभात्तत्सदसाणा मद्भाद्भनापि पूजयेत्‌ ॥ 
उत्यलानान्वलाभे तु पच ओतरोर्यजेत्‌ । 
पद्मेवां चथ्यकरर्वापि जात्या पारलयापि वा ॥ 
पुन्नागेः कणिकाररवा स्रेतमन्दारजेरपि । 
दमनेमेरुवकैर्वापि ्रमो-षएक्ञाकं-नागरेः ॥ 
यथालाभञ्च प्चैवां निगेम्य (?) च मलो च््ितैः । 
मरपरूच्य ` कारयेद्ध्या सुगन्धे पुष्यमण्डलम्‌ । 
ग॒ग्गुलच्चाज्यमयुक्तमशरं वाऽशित दहेत्‌ ॥ 
असितं छष्णम्‌ । 


४३६ 


छल्यरनलाक्ररः। 


सम्ुज्य गो सेभरत्तारं गोतवादि चमङ्लेः 
श्रालिपिष्टोद्धवेः भिदे तपरणे ममुज्वलेः ॥ 

तनो नोराजनं दोपे: षङ्ध्गशद्धिस्त॒ कारयेत्‌ । 
सर्पे-दं धिमंयुत्ेदर्वा-गो रो चनाचतेः ॥ 

गन्धपुष्यो दकं दद्यात्‌ श्वूयोऽघं चिन्य ग्रडगम्‌ ! 
श्ात्गम्ममयं पद्चमष्टपच सकणिकम्‌ । 

यात्वा निवेदयेकूह्धिं जिङ्गस्य ुपमेः ष्ह ॥ 
दुच्छवस्तयुगं श्एभ्नं दोप श पडसम्भवम्‌ । 
चामर द्‌र्प॑णश्ेव द्‌ो पटच प्रदापयेत्‌ ॥ 

पयूपं साधारण्येव सघटं पूणमेव च । 


पूश्च घटस्येव । 


वितानक्र-ष्वजो दद्यात्‌ किङ्धिणोरवकाचितौ ¦ 
अयाष्टाभिः चिति पौद्य शरङ्खभ॑ह्या तु दण्डवत्‌ ॥ 
ततः किद्धित्‌ पठेत्‌ म्तोचं शङ्करं भवग्रङ्धरम्‌ । 
प्रद्‌ किणं ततो गच्छच्छ.ने- निर्मा च्यवच्जंकः ॥ 
प्रणम्यो चेस्ततः पश्चाद्ेवेद्यञ्च निवेदयेत्‌ । 
दौनानकृपणां ब आगतांश्च बुभुदितान्‌ ¢ 
तपयेदन्नपानेन सन्वीस्तान्‌ नक्रमोचरान्‌ ) 

पलानां दे सुखे तु महास्नाने प्रकोत्निते । 


नणान्यस्तानौय-द्रयमद्यापरिकलने दे मद्खे । 


र्या तत्‌ महास्नानं विधिनानेन धश्मविद्‌ । 


१९ {) धूप। 





छल्यरनाकरः। 


कारयेद्यः शिवे भक्त्या तस्य युर्एफलं भटण 1 
समुद्त्य श्रतं सायं कुलानां पापवच्िंतः। 
्रजेत्‌ क्रौडायने तसन्‌ विमानो ऽमरेयेनः ॥ 
मुक्ता ययेदष्धितान्‌ भोगान्‌ शवसा युज्यतां त्रजेत्‌ । 
मायाितानमुतसब्य चान्ते योगमवा्रुयात्‌ ॥ 
केवज्ञेनाप्ययाज्येन दघ्ना गव्येन वे तथा । 
पयसा पञ्चगव्येन मधुनेचरसेन च ॥ 
यः कारयेग््हास्ञानं विधिनानेन मन्तितः। 
सोऽपि तेनेव मार्गेण गमिच्यति परं पदम्‌ ५ 
विधिनानेन निष्टोयः सानं तोयेन कारयेत्‌ । 
नराणं विंशतिर्यावन्‌ सोऽपि यास्यति तत्पदम्‌ # 
श्रन्तरा चियते यस्तु श्रपूणं नियमे तया । 
सोऽपि गच्छेत्‌ पद्‌ तन्तु शिवभक्ता ह्यतद्दितः ¢ 
एवभेव हि धममस्य रागिमेन्त्रविव्््वितः९ । 
मन्त युको ऽचयेदयस्त नातः पुण्ोऽलि ध्मेतान्‌ ॥ 
विष्णधद्मात्तरे- 
काल्तिक्याद्धन््रवर्णाभमन्यवणेमयापि वा । 
रने-मन्पे-सया धान्ये-र्बोजे वस्त स्येव षत | 
छता युक्रमयोक्ताणं दला दौपान्‌ समन्ततः । 
चन्द्रोदये नरो टला सुग्वेपापेः प्रमुच्यते ॥ 
चन्द्रवर्णभमन्याे वा दति तखयवद्धिकन्त्ण नुपपत्या 


१ 4 8 मन्वस्य वच्ितः। 


४द८ छ्त्यरलाकरः । 


एकच खपे प्राधान्य विवक्लितं तच प्रथमोपश्थितेः श्वेतरूप एक ¦ 
कान्तारे यममार्े च तेनासौ व्रजते सुखम्‌ ¦ 
सर्व्वाणि चास्य सोग्यानि तत्र चासौ प्रयच्छति । 
दौपा नरौषु दातवयाः काल्तिक्यान्त्‌ विगेषतः ॥ 

अच व्रिश्रेषत दृति द्भनादिष्एधक्भात्तरोक्तमेव फलम्‌ । 
तेजसो च यश्रसलौ च रूपवानभिजायते, 

दति सागरः) 

भविष्यपुराणे सुमन्तरुवाच-- 
पौ एंमास्यपवासन्त्‌ त्वा महश नराधिप , 
अनेन विधिना यस्तु विरिञ्चि पूजयेन्नरः ॥ 
प्रतिपद्यां मद्ाबाद्ो स गच्छेद्द्यणः पदम्‌ । 
चषिर्विंग्रेषतो देवविरिश्चि-्वासतुदेवतम्‌ । 
कार्तिके मासि देवस्य रथयात्रा प्रकेल्तिता । 
यां रुला मानवो भक्या याति नह्मख्लोकताम्‌ ॥ 
कार्तिके मासि राजेन पौणमास्याञ्चतुमुखम्‌ । 
मार्गेण च्ोणा साद्धे साविश्याय परन्तप ॥ 
सामयेन्नगरं भव्वे नानाधान्येः समन्वितम्‌ |. 
च्लापयेद्वामयिला तु सकलं नगरं नृप । 
जाद्धणान्‌ वाचयिवाये ्राण्डिलेचं प्रपूज्य च । 
श्रारोपयेद्रय देवं पुष्यवादिवनिखमैः । 
रयाय शण्डिलौयुचं पूजयिला विधानतः । 
ब्राह्मणान्‌ सुच््रयिता तु कला पुश्छाहमङ्गलम्‌ । 


-कत्यरलाकरः । ४२८ 


दवमारोपयित्वा तु रय ह्र््यात्‌ प्रजागरम्‌ । 
न ना विधः प्रचणके-नंद्यघो षेख पुष्कलैः । 
कला प्रजागरं वं प्रभाते ब्राह्मणान्‌ नुप । 
भोजयिता चथा ग्र्या भच्छयभोच्येरनेक ग्रः | 
पूजयिला जलं वोर श्रनेन विधिना नप । 
आज्येन च महावादो पथमा पायसेन च। 
्राद्यप्णन्‌ वाचयित्वाद्‌ावन्ते तू विधिवद्धृप । 
छला युष्यादशब्दञ्च रथ वा भ्वामयेत्‌ पुनः) 
चतुर्वेद विदे- विप ामयेद्‌ ब्रह्मरणे रयम्‌ । 
व्क चायव्वेणे-रवोर कन्दो गास्वय्युभिम्तथ। 
भ्रामयेदेवदिवम्य सुरख्टेटस्य तं रथम्‌ ॥ 
परददिणं पुर सव्वं मागण सुषमेन च । 
नारोद्य्यं रथं वोर शूद्रेण प्रटभमिच्छता ॥ 
नारुहेच तया प्रान्नो सुक्कं भोजकं नृप 
ब्रह्मणण दचिणे पाञ्च माविकचनौं स्था पयेन्नप । 
भोजको वामप्च॑ तु पुरतः कच्जजं न्यसेत्‌ ¦ 
एवं शला निनादन्तु शङ्खन्देश्च पुष्कलैः ॥ 
भ्रामयिलला रथं वौर पुर मव्वं प्रद्दिएम्‌ । 
ख्याने घ्यापयेद्रूयः छला नौराजनं वृधः ॥ 
य एव कुरते याजां भक्तया यश्चापि पश्चति ¦ 
रथञ्चाकषते यस्त॒ ख गच्छद्यमएः पदम्‌ ॥ 


88 छव्यर्ल्लाकरः!. 


मब्यपुराणे- 
यचाधिक्छत्य शक्ुनोन्‌९ चरम्नाधस्मे विचारणा { 
पुराण नवसा दसं माकंण्डेयमि दोच्यते ॥ 
परिलिख्य च यो दध्यात्‌ सौवरेकविमयुतम्‌ । 
कान्तिक्यां पुण्डरौकस्य यज्ञस्य फलभाग्रवेत्‌ ॥ 
विष्णधर््रोत्तरे- 

मद्दिषोदटानमादाव्य कथयामि युधिष्टिर । 
पुष्छ पविच्रमायुव्यं सन्व॑कामसुष्वप्रदम्‌ ॥ 
चन्द्र व्यैडे पुष्ये कान्तिक्यामयने तथा । 
¶्एक्रपक्ते चत्‌द्श्यां खय्येसक्रान्तिवासरे ॥ 
यदावा जायते चित्तं वित्तञ्च कुशनन्दन । 
तदेव देया मद्िषौ संसारभवभौरुणण ॥ 
सुपयथोधरा सुजघना सुष्टङ्ो सुखुरा तथा । 
प्रयमप्रद्धता तरणो सुग्रला दोषव्रक्छिता ॥ 
सुवणेष्टङ्गतिलका घण्टाभरण्भ्रषिता । 
रक्रवस्ताटेता रम्या ताघटोदहान्िता श्रभा ॥ 
पि्छाक्पिण्डकोपेता सदिरण्या च शक्तितः । 

पिण्छाकस्तिलकल्कः । द्दिरण्येत्याभरण्डारेण । 
सक्रधान्ययुता देवा ब्राद्यणे वेदपारगे । 
पुराणपाटके तदद्ध ्रेणास्तरविदे तया ॥ 
देया न वेद्रदिति न वकत्रतिने क्रचित्‌ । 








१ 4 शकुलोन्‌ । सूले शव्कुलौन्‌ । 


छ्त्यरनएकरः । | ४४९ 


दवयेरेभिः समायुकः एण्येऽद्धि विधिपुव्वंकम्‌ । 
दद्ान्न््ेय रजेन पुराएपटितेन च ॥ 
दृन्द्रादविलोकपालानां या राजमद्दिषो शटुभा। 
मदिदिषोदानमादात्यादम्तु मे सव्वकामदा ॥ 
धम्मराजस्य मादाग्यमिदह सव्वं प्रतिष्ठितम्‌ । 
मदिषासुरस्य जननो या सास्तु वरदा मम॥ 
ददानमन्तः- 
ददात्‌ प्रदचचिणणैकत्य ब्राह्मणं तां पयखिनोम्‌ । 
प्रतिग्रहः खनस्वस्याः प्रष्ठदेप्ो स्व यस्भृवा ॥ 
एव दत्वा विधानेन ब्राह्मणएस रदं नयेत्‌ । 
चमापयेत्ततो विभ खुसन्त॒ष्टो भवेदिह ॥ 
श्रनेन विधिना दत्वा मदििषों दिजपुङ्खवे । 
सर्व्वान्‌ कामानव्राप्नोति दृदलोके परत्र च ॥ 
यास्तौ ददाति मदि्षों रा्ञः सा महिषौ भवेत्‌ 
महाराजो भवेत्‌ पुरषो व्याषस्य वचनं यथा ॥ 
यज्ञयाजो भवेदिप्रः चचियो विजयौ भवेत्‌ 
वेश्ठस्त॒ धान्यधनवान्‌ शद्रः सववा येपरयुतः ॥ 
तस्मान्‌ मर्व्व॑ंए दातव्या मद्दिषो विभवे सति । 
पुचरपौ चप्रपौ चाणामात्मनः इएभमिच्छना ॥ 
दश्धेनुममानां यन्महिषों नारदोऽत्रवत्‌ । 
चिशद्धेनुसमां यासः मव्वदानोन्तमां कविः ॥ 


सगरेण कङ्कुत्‌स्येन जनकेन च गाधिना। 
5 


8७२ छव्यरुनाकरः ; 


दत्ताः मदिद्विप्रेभ्यो महिष्यः भव्वकामदाः ॥ 
मद्दिषोदानमाद्वाव्ये यः टो स मानवः । 
म्वेपापवि निमुक्रः भरिवलोके महौोयते ॥ 
दुग्धाधिकां सुमदिषौ नवमेघवर्णां 
खद्ष्टपटकवतो जघनाभिरामाम्‌ । 
दला सुत्रणंतिलकां दिजयुङ्गवाय 
लोकद्यं तिजयतेऽप्रतिमप्रभावः॥ 
दूति महिषोदानविधिः ॥ 
दति महाषासन्धितिग्रहिकठक्र श्रोवोरेखरात्मज महा- 


मास्विवियददिकटद्कर श्रो चण्डश्चर तरिर चिते रत्य - 
रन्नाकरे का्तिंकतरङ्गः ॥ 





अथ मागेमासक्षत्यम्‌ | 
तत्र देवोपुरणे- 
मागे रसोत्तम दधात्‌ छतं पौषे महाफलम्‌ । 
रखोन्तमं लवणम्‌ ¦ 
तिलान्माघे सुनिशरेठ सकप्तधान्यानि फाड्याने , 
विचिच्ाणि च वस्त्राणि चेषे दद्यादिजोत्तम ॥ 
वैशाखे यवगोधुमान्‌ च्येष्टे तोयष्टेतं घटम्‌ । 
श्राषाढ़ चन्दनं देयं सकपूरं महाफलम्‌ ॥ 


छ्त्यरलाकरः | डे 


नवनोतं नभोमासि कचं भोष्टपदे मनम्‌ , 
गड्ग्रकरव्रणाव्छान्‌ लड्‌ कानाश्चिने सुने ॥ 
दौपद्‌ानं महापुण्यं कार्तिके यः प्रयच्छति । 
सर्वान्‌ कामानवाप्नोति क्रमेणेद सुदाइतम्‌ ॥ 
ब्रतान्ते गां एभां दद्यात्‌ सवल्छां कांस्यदोहनाम्‌ । 
सयुगां सखजं वत्स दापयेद्धिधिना सुने ॥ 
देवीः विरिञ्धिनं द्थ्ये विष्णं वापि यथाविधि । 
सखभावप्ररद्धौ विधिवत्‌ पूजयित्वा दिजोत्तमौ ! 
दातवा वौतरागे तु कामक्रोधविवच्छिते । 
अयाष्वके सदाचारे विनोते नियमानच्विते ॥ 
गोदानाल्ञभते कामान गोलोकेषु मनोरमान्‌ । 
इदञ्च दानं संवत्सरनिष्याद्यं अ्रधिकारिभेदकन्यनामौरवात्‌ ) 
वराहपुराणे वराह उवाच- 
ये यजन्ति वरारोे मारि मामेिरे दिजाः 
तान्‌ सव्वानिनुग्य्ामि इव्य-कथ्यपयि ख्ितान्‌ ॥ 
यजन्ति मामिति शेषः । 
वामनपुराणे 
खरोद्राश्वतरान्‌ नागान्‌ शकटान्‌ चुग्यजाविकम्‌ । 
दातय्यं केशवमोत्ये मासि मामंशिरे नरः ॥ 
श्वतरो वेश्रर दति प्रसिद्धः। युगो युक्ररथ इति दान- 
गरः । अजज्डागः, चविरुषः गोपाल-श्चपाल-कल्यतरू-पारि- 
श्ातेषु तु श्रकटान्यजाविकमिति पाटः मतु सुगमः ॥ 


8988 टीद्यसर्नाकरः। 


भविव्यपुराण- 
मागें इदमे मासि व्योमयपिष्टेत जिंतम्‌ । 
गन्धमाच्येरलङ्कत्य भाखराय निवेदयेत्‌ ॥ 
गे रिकेयमयै-यानै-रष्रोगणरुढतेः । 
समेकाद्‌ ्रसादख सुय्यैलोके महो यते ॥ 
गेरिकेयमयेः सौवर्णैः । 
क्रमादागत्य लोकेऽस्मिन्‌ राजानं पतिमाभ्रुयात्‌ । 
रच च मासव्यापेकभक्तादिकम्‌ भविव्यपुराणीय पूर्वज 
कात्तिककामव्रतवन्नेयम्‌ । 
स्कन्दपुराणे- 
एकभक्रन यो दद्ान््ासं मागे चपेतं च । 
ष तेन कश्मंणठा युक्तः सुभगो भवति भव्वेतः ॥ 
मदाभारते- 
मागेोरषन्तु यो मासेकभक्तन सक्ठिपेत्‌ । 
भोजयेच्च दविजान शक्या मुच्यते व्याधिकिखविषिः ॥ 
मराफलमुपक्रम्य देवोपुराण- 
मागे तु ग्रहणं प्रोक्तं देविकायां महामुने ¦ 
देविका नदौविग्रेषः। 
विष्णधननीत्तरे- 
खव मागंशषं तु दला सौभाग्यमश्रते । 
शष मामेश्नोषांभिमतदिने दानमिति दानसामरः। 





कद्यरन्नाकंरः ) 89४ 


भविय्धपुराण्- 
मागंग्रोषें प्रभे मासि यः कुरयया्नक्रभोजनम्‌ । 
यवान्न पयसा युक्तं भुच्ानः सयतेन्ियः ॥ 
प्रयच्छद्धं तया ष्णां नानालङ्गारग्षिताम्‌ 
सूर्याय रशादटूल विधिञ्चापि समाचरत्‌ ॥ 
विधिरचैवाये वच्छमाणएः । 
सितपदमनिभेर्यानेः श्ेताश्वतर सयुतेः । 
गत्वादिव्यपुर रभ्य प्रभया परयान्ितः॥ 
श्रडिंसा सत्यवचनमस्तेयं चान्तिराष्जंवम्‌ । 
रिखवनाग्चिहवनं शगशय्या नक्तभोजनम्‌ ॥ 
पच्योरुपवासेन मक्तम्यां कुरुनन्दन । 
एतान्‌ गणान्‌ समाञ्चित्य इ्र्व्वाएणो व्रतसुन्तमम्‌ ॥ 
सघ्नम्यभयमाख्यातं सन्वेष्टो गभया पदम्‌ । 
सव्बरयाप्रश्रमनं मव्वकामफलप्रदम्‌ ॥ 
इत्येवमादिनियमेश्चरेत्‌ द्धयत्रतं सदा । 
य दृच्छेद्धिपुलं स्थानं भानोरमिततेजसः ॥ 


दत्युभयसप्रमोव्रतम्‌ । 





ऊ, 
तचेव- 
राजन्‌ मागंशिरे मासि यः कुर्ययाज्नक्रभोजनम्‌ | 
सुच्नानः शष्वलोभित्यं जिनात्मा च जितेद्ियः ॥ 


भामो 





१ 4 सष्वेपाप- ₹ ^ सव्वरोगम-- 


9.8 छ्ल्रनाकरः | 


पूजयेद्धि धिवद्धत्षा चामुण्डां चण्डखुटनोम्‌' 
नौलोत्यलेस्तथा पद तरिस्वपचकदम्बकैः ॥ 
चन्दनागरुकष्ुर गुग्गृलेन तया नुप | 
भच्छेभौज्छेरनेकैश्च सुरामासेरनेकशः ॥ 
रुधिरेण तथा वौर शिरोभि विविषधेनप 
अरजाविमद्िषाणाञ्च खरेरस्य च भेदनात्‌ ॥ 
नवम्यां विधिवद्क्या पच्योरुभयोरपि । 
ङुमारो मोजयेद्धापि ब्राह्मणान्‌ यो षितस्तथा ॥ 
पञ्चगव्यकछतन्नानो मम्यक्‌ प्राश्य विधानतः 
ततो भुञ्ौत राजेन्द्र श्वमिं छवा तु भाजनम्‌ ॥ 
य एवं प्ूजयेद््या चासुण्डां सततं नरः । 
ख्याति परमं स्थानं यन्न सा परमा कला\॥ 
सौवण यानमारुह्य ष्वजमाला कलं प्रभम्‌ । 
मोदते देवतैः खाद्धं यावदिन्द्रा 1 
पुनरेत्य महाराज राजा भवति तल्ञे । ` 
प्भयाम्वुजख ङ्का शस्तेजमा बवङ्किसन्निभः? ॥ 
कान्या चन्द्रसमो वोर बुद्धा घोषण-्क्रयोः । 


अचर नवमोद्योपवासादिमि भंविव्यपुराणोक्त पौषमासोमय- 
जवमो कथितो मन्तयः । 


द्रत्युभयनवमौत्रतम्‌ । 


न ~ न ~ न = न ० 
क श ना = नि ० ० 
---~-- ~~ भ 


7 मुष्डनाशिनोस्‌ । २ 8 रविसत्रिभः, 


क्रत्यर्नाकरः ¦ (1. 


तचेव श्रादित्य उवाच- 


रष्एषष्टयां . प्रयनेन इत्वा नक्तं विधानतः 

माचि मामेशिरस्थाद्‌ादंश्टमानिति पूजयेत्‌ ॥ 
विधिवत्‌ प्राश्च गो मूजमनाहारो निशि खपेत्‌ । 
श्रतिराचस्य यज्ञस्य फलं प्राप्रोति मानवः ॥ 

पपौ षेऽयेवं षसं भानुमन्तमुश्रन्ति वे। 


उशन्ति गच्छन्ति । 


ना ४०५००५००७० ५०५ 


वाजपेयफलं तच टलं प्राश्य लभेन्नरः ! 

माधे दिवाकर नाम छष्एषष्टयां नियोजयेत्‌ ॥ 
निशि पौला तु गोमूचं गोमेधफलमश्ुते ।. 
+मान्तेण्डं फास्गुने मासि पूजयेद्धच्ये स्तिलान्‌ ॥ 
राज्यस्य यज्ञस्य फल युष्यमतप्रुयात्‌ । 

चेचे च सनामानं छष्एषष्टयां प्रपजयेत्‌ ॥ 
गक्घपुष्यं नरः प्राश्य श्रश्वे धफलं लभेत्‌ । 
वैशाखे ्यंनामानं कष्एषष्ठयां प्रपूजयेत्‌ ॥ 
पौला कुशोदकं पुं जितक्रोधो जितेद्धियः। 
महामेधस्य यज्ञस्य वेनतेय फलं लभेत्‌ ॥ 

खेषटे दिवस्पति पच्य गवां श्टङ्गोदकं पिवेत्‌. । 
गवां को रि प्रदानस्य निखिखं फलमश्नुते $ 
आषाढे त्कनामानसिष्टा प्राश्य च गोमयम्‌ । 


ग्रयात्यकंसलोकल्वं वर्षासां दिग्रत विभो ५ 


~~ ~ ~~~ ~ ----- ~ *---~ ~ ~+ ~~~ ~~ "~~~ ~~~ -~--~-~-------- -- ~~~ ~~~ 


९ 47 पुष्ये । २ कचित्‌ तितस्तु ! ८ 


४8८ त्व्यरनाक्ररः) 


आ्आवरेऽस्येमनामानं पूजयिवा पयः पिवेत्‌ । 

वर्षाणएमयुतं साग्रं मोदते भास्करालये ॥ 

मासि भाद्रपद ष्टां भाखर नाम पूजयेत्‌ । 

प्रा्रनं पञ्चगव्यस्य सन्पसेव फलं लभ्त्‌ ॥ 

गोमूचफलमश्नौ याद श्वमेधफलं रूभत्‌ । 

मासि चाश्वयुजे षष्ट्यां भगाव्यं नाम पूजयेत्‌ ॥ 

ूर्व्वाङ्कुरं षत्‌ प्राश्य राजद्धयफरं रभ्‌ । 

मासे त्‌ कार्तिके षष्ठयां गत्रास्यं नाम पूजयेत्‌ ॥# 

गोमूचफलमङ्ो याद खमे धफलं लभेत्‌ । 

वर्षान्ते भोजयेद्धिमरान्‌ सूखूभःक्रपरायणान्‌ ॥ 

पायसं मघुभयुक्रमन्येन सुपरिषुनम्‌ । 

श्या दिर ण्छवासां सखि श्रक्तया तेभ्यो निवेदयेत्‌ # 

निवेदयन्त खर्याय गाश्च छष्णां पयखिगोम्‌ 

वर्षमेकं चरेदेवं नेरन्तख्ण यो नरः + 

सब्येपापविनिसुक्तः सन्दकामममन्वितः । 

मोदते स्व्यलोके तु स नरः श्राश्तोः समाः ॥# 

ष्द्ति स्कन्दषषटोव्रतम्‌ । 

मव्छपुराणे- 

छष्णा टमो मयो वच्छे सट पापप्रणाशनम्‌ । 

शान्तिुक्रिश्च भवति जयः पुमां विशेषतः ॥ 


१ मूले अशमे देवदैवन्त॒ सप्राञ्चभिति पूजयेत्‌ । 
ः 1 कब्णएषष्टोव्रतस्‌ । 


छत्यरनाक्ररः | 89९ 


शङ्करं मागं शिरसि शरस पौषेऽभिपूजयेत्‌ । 
माघे महेश्वर देवं मदादेवश्च फाल्गुने ॥ ` 
स्थानु चेते शिवं तद्देशा खेऽभ्यचवंयेन्नरः । 
व्ये पश्टपतिं प्वा्ँदाषाढ़ उग्रमच्च॑येत्‌ ॥ 
प्ूजयेच्छ्रा वणे शव्वं नभस्ये अ्यम्बकं तथा । 
इरंमाश्वयुजे मासि तथेशानच्च काल्तिके ॥ 
छष्णाषटमोषु सववा भक्या सम्युजयेद्धिजान्‌ । 
गो--दिरण्छ-वासोभिः श्िवभक्रानुपो षितः ॥ 
गोमूचषटतगोचोरं तिलान्नञ्चः कुश्योदकम्‌ । 
गो ्रङ्गोद- शिरो षाक्कं-विल्वपच-दधौनि च \ 
पञ्चगव्यञ्च सम्प्राश्य श्डःर प्रजयेन्निशि । 
श्र्वत्यञ्च वरश्चेवोडम्बर क्षचमेव च ॥ 
पला शं जग्बचञ्च विदुः षष्टं महषयः । 
मागंशोर्षादिमासाभ्यां दाश्वां दाभ्यां यथाक्रमम्‌ ॥ 
एकैकं दन्तधावनं ठवचेष्वेतेषु भच्येत्‌ । 
दद्यात्‌ समाप्ते दध्यन्नं वितानध्वजचामरम्‌ ॥ 
देवाय ' दद्यादण्टाञ्च छृष्णां गां कष्एवाससो । 
कृष्णगेन्दुकवाससो इति छत्यसमसुच्ये पाटः ॥ 
दिजानामामङमां च पञ्चरनसमन्वितान्‌ । 
गावः छष्णाः खवणेञ्च वासांसि विविधानि च ॥ 





१ 48 प्रेयात्‌ । २ 8 तिलान्‌ यव-- 
 ₹ ए--पवनं। ४ ए खदकुश्भांख | 
१७ 


8१५० 


क्रव्यर्लाकरः 1 


देयानोति शेषः । | 
क्रविश्च गाः छष्णाः सुवणञ्चेति पाटः घच्‌ सुगम एव। 
श्रप्रक्रप्तु पुनर्द॑दयाद्ामेकामपि भक्तितः । 
न वित्तश्खं कुन्बोँत कुन्न्‌ दौषमवान्नयात्‌ ॥ 
छष्णाष्टम्यामुपोग्येवं स्षकन्यश्रत चयम्‌ । 
पुमान्‌ सम्जितो देवैः शिवलोके महोयते ४ 
दनि छष्णाष्टमोत्रतम्‌ । 
भविष्यपुराणे ~ विष्णरवाच-- 
छष्णाष्टम्यां ्रयनेन ला सक्तं विधानतः । 
नक नक्तत्रतसंकस्यम्‌ । । 
मासि मार्गशिरे विप्र शद्धरं देवमर्चंयेद्‌ 
वोल्ला शक्या च मोमूचमनादारो निभि खपेत्‌ ॥ 
श्रनाहारो गोमू बातिरिक्राहारशन्यः, एवसुत्तरचापि । 
अतिराचस्य यज्ञस्य फलमष्टगणं लभेत्‌ । 
एवं पौषे तु सुम्ूज्य अन्ुनामाननौश्वरम्‌ , 
छष्णाष्टम्यां एतं प्राश् वाजपेयफलं लभेत्‌ ४ 
माचे महेश्वरं विप्र ष्णा म्यां प्रपूजयेत्‌ । 
निग पौवा च गोचरं गोमेधफलमान्नुयात्‌ ॥ 
फार्गने च महादेव खनयज्य प्राग्रयेत्तिलान्‌ । 
राज्यम यच्चद्य फलमष्टगणं लभेत्‌ ॥ 
चेचे च स्थानुनामानं कृष्णा ए्म्यां प्रपूजयेत्‌ । 
गवाञ्च भच्छिंतान्‌ प्राश्च सोऽशवसेधफलं लभेत्‌ ॥ 


क्व्यर्नाक्ररः | 8४. 


वशाखे शिवनामानं पूजयिला प्रयत्नतः । 
सान्न कुोदकं प्राश्य सन्धसेधफलं रमेत्‌ ॥ 
च्येष्ठे पष्पति एन्य गवां परङ्गोद्‌क् प्वित्‌ । 
मवा कोटिप्दानस्य यत्‌ फलं तदवाभरुच्मत्‌ ॥ 
श्राषाढ़ चोग्नामानमिद्धा प्राश्य च गोमयम्‌ । 
वर्षाणाञ्चु श्रतं मागं शिवलोके मस्भेयते ॥ 
शमन्त आवे मायि पूज्याकं 'ग्येन्निशि । 
गो सवस्य तु यज्ञस्य फलमाभ्नोति मानवः ॥ 
अम्बकन्त्‌ भाद्रपद्‌ कृष्णाष्टम्यां प्रपूजयेत्‌ । 
मम्प्राश्च विल्वपचन्त वाजपेयफलं रूभेत्‌ ॥ 
मासे चाश्वयुजे प्रोक्त प्राशनं तण्ड्लोद्‌कम्‌ 
ना्ञा ईशं यजञेदेत पुण्डरौकफनं रमेत्‌ ॥ 
मसि तु कान्तिकेऽष्टम्यामगानाख्य प्रपूजयेत्‌ । 
पञ्चगव्य सछत्यौला पड यद्धफलं लभेत्‌ ॥ 
वर्षान्ते भोजयेदधिप्रान्‌ शिवभक्रिममितान । 
पायसं मधुखयुक्र एतेन सुपरिडतम्‌ ॥ 
निवेदयेत श्राय गां छष्णाञ्च पयखिनीम्‌ । 
वषेमेकं तथा कुर्य्यान्नेर न्त्स यो नरः ॥ 
छष्एाष्टमोत्रतं भक्तया तस्य पुष्फलं श्ण । 
सव्वैपापविनिनुक्रः समेश्वय्यैममन्वितः ॥ 
वसेच्छिवपुरे नित्यं न चेहायाति नाकभाक्‌ । 
यचापि छष्णाष्टमो न खता निग्ाकालञ्च न श्रत: त्नापि 


8५२ छत्यरलाकरः | 


माच तौ बोद्धव्यो पूर्व्वापरपरामर्षात्‌ प्रतिमासप्राणएन च्रुतफल- 
श्चा शुणफलरोत्या संवह्छर फलश्चाधिकारिविगेषणएमिति सव्वं 
खमश्चसम्‌ । 
ब्रह्मपुराण- 
मा॑श्नोषस्य मासख प्रारम्मं प्रतिपद्यपि ¦ 
नवसंवत्छरारम्भो देवैः छतयुगे इतः ॥ 
काश्यपेन त्‌ कश्मोरा निस्मिता च सुश्रोभना। 
तस्मात्तच नरः काय्यैः सद्‌ा पुण्यमहोत्छवः ॥ 
पुष्ये मास्ये तवादे मंक्गले दुष्टशोभिभिः । 
माद्य पुष्पमाला । 
याने रतेस्तथा वस्त्ेरपयुक्ते नैरः सदा । 
काल्िकापुराणे- श्रनिलाद्‌ उवाच- 
मासि भा्शिरे प्राप्ते चन्द्र्रद्धौ श्रुचिः सिताम्‌ । 
दितोथान्तु समासाद्य नक्तं सुश्जोत पायसम्‌ ॥ 
श्राचम्य च दरुचिश्चला दण्डवच्छङ्रं नमेत्‌ । 
सुदान्वितो नमस्त्य विन्ञाप् संसगशेनत्तरुम्‌ ॥ 
उदुम्बर. ततो गह्य भच्येद्‌ धावनम्‌ । 
उन्तराशागतं सारं सत्वचं निव्रेणं प्रभम्‌ ॥ 
तोयायां परे चाङ्कि गौरौं शु प्रपूजयेत्‌ । 
पूजयिता निराहारः शङ्करं कौत्तेयन्‌ खपेत्‌ ¢ 
श्रालिपिष्टमये छता रूपे स्तो पुंसयोः शभ । 
ूपे रूपके प्रतिमे इति यावत्‌ 


च्त्यर्नाकरः। ४५ 


पात्रे स्थाप्य च ते पृच्छे जागर निशि कल्पयेत्‌ः। 
विधिवत्‌ प्रूजयिला तु इर ल्लाप्य छतादिसिः ॥ 
 भ्रभाते ते ण्डोला तु पुष्यं तस्मे निवेदयेत्‌ । 
तस्मे इराय । . 
श्राचाय्ये पूजयेद्धकवा लिङ्गिनश्च तथा दिजान्‌ । 
दाग्पत्यानि च तच्चैव श्त्या तांञ्चापि द्येत्‌ ॥ 
प्रतिमासच्च कुर्वबौति विधिनानेन सव्बैतः । .. 
का्निंकान्ते ततो मासि मागेगों समुद्यते ॥ 
नामान्यतः प्रवच्छामि प्रतिमासं क्रमाच्छण । 
अतो मागेशिरसः परं, मागंोषं तु शमम गौरी वेति नामनौ 
रथमत एव कथिते | 
पूजाजपनिमित्तञ्च सिद्याथं चिन्तितखय च ॥ 
एवं पौषे तु स्मात्ते गिसेगश्रं पावत तथा । 
शरद्य जप्य चतुर्थश्च पञ्चगव्यं ततः पिवेत्‌ ॥ 
मवञ्चेव भवानौश्च माघे नित्यं प्रपूजयेत्‌, 
फाल्गुने च महादेवसुमया सहितं विभुम्‌ ॥ 
ललितां श्र उवं चेन्रे मासि प्रपूजयेत्‌ । 
स्वानुञ्चेव हि वेशाखे लोकमाचरा समं यजञेत्‌ ॥ 
सुद्रा्धा सह रुद्रञ्च श्येष्टे मासि प्रप्रजयेत्‌ 
श्राषाढ़ पश्टनाथञ्च शच्या सदहसरलो चनम्‌ ॥ 
नोलकष्ठं श्रावणे च सुनन्दाश्च समर्चयेत्‌ । 
भोम भाद्रपरे मासि कालराच्या समं विभुम्‌ ॥ 


लव्यस्नाकर- | 


शिवमाश्वयुजे देवं दगया माद्धमर्च॑येत्‌ । 
दे्रानं कार्तिके मासि श्िवादेवोयुते, विभुम्‌ ॥ 
जपध्यानाचचनादौ च नामान्येतानि सुत्रत । 
सृतानि नामचूपाणि विना रेतेरभिद्धिमाक्‌ ॥ 
प्रतिमामन्त्‌ एुव्याणि भराय {नियोजयेत्‌ । 
तानि क्रमात्‌ प्रच्छा"म मदस्बुषटिकराणि च॥ 
चराद्य नोलोत्यल योज्यं तद्भावे पराणि वै। 
परचाणि च ुगन्पौनि योजयेत्‌ भनितोऽ्चने ॥ 
करवोर रिल्वपचं किप्रकं कुरुमल्िकाम्‌ । 
कुरश्ब्दः कुरूकण्टकपरः । 
पारलाञ्च कदम्बञ्च तगर दोण मालतीम्‌ । 
वत्सरान्ते तितानञ्च ्वजं घण्टाञ्च दौपिकाम्‌ ॥ 
धूमोक्षेपं युगं रच्छं श्ङ्राय निवेदयेत्‌ । 
युगं वस्लवुगम्‌ । 
खापयिव्वान्चैयिला तु सौवण प्रचुरं न्यसेत्‌ । 
कूपयुग् ततो दद्यात्‌ णलियिष्टमयद्च यत्‌ ॥ 
सूपयुगपं पू्ाक्म्लोपुंसप्रतिमायुग्मम्‌ 
नेबेद्यश्च व लि्चेव संयोज्य विधिवच्छिवे । 
कुर्यान राजनं श्रम्भोस्ततो गच्छं ख्कम्‌ ॥ 
चतुरस महादेवसुमाञ्चैव चिकोणिकाम्‌ , 
ष्यालाचारय्याय तदग्रं मौक्तिकादियुतं ददेत्‌ ॥ 
ब्रतिनो भोजयेत्‌ पञ्चात्‌ दाद गेव दिजोत्तमान्‌ । 


क्रत्यरन्लाकर्‌ः । 8४५ 


मिथुनानि तथा ब्रह्मन्‌ भोज्य श्रत्वा तु द येत्‌ ॥ 
कषेकरेकप्रमाणन शातकुम्भमयं इभम्‌ । 


शातङ्खम्भमयं तच॒ग्ममित्यन्वयः ॥ 


ष्मो क्रिकानां रतुःष ष्ठ प्रवालकचतुष्टयम्‌ । 
तावन्ति पुष्यरागाणि ताघ्ररूपाणि चैव हि ॥ 
एतान्‌ समग्रान्‌ मम्भारान्‌ वस्त्रयुग्छो परि न्यसेत्‌ । 
चत्वारिग्तमष्टौ वा कुम्भांशो पानद तया ॥ 
सदहदिरण्धाचतान दद्यात्‌ पुष्योद्‌कखमन्ितान 
दौनान्तेदुःखितानाञ्च तददिने चानिवारितम्‌ । 
कल्ययेद द्‌ानञ्च प्रानक्तः शक्तितो वृधः ॥ 
न्नाधिकं न कन्तंव्ं खदिन्तपरिमाएतः । 
पूरयेत्‌ कन्यनायेव (?) विन्तश्रायं न कारयेत्‌ ॥ 
दत्य वियो गन्तम्‌ । 


भविय्यपुराणे- खुमन्त्रुवाच- 


प्राप्ने मागेशिरे माभि शरक्तषष्यान्त यो भवेत्‌ । 
ख ज्ञेयः कामदो वारः सटेष्टो भास्करस्य त्‌ ॥ 
तच चः पूजयेद्धानु भ्या अद्धाखमन्ितः ! 

ख मुक्तः सव्वेपापेभ्यः प्राश्ुते चण्डदौधितिम्‌ ॥ 
रक्रचन्दनमिश्राणि करबोराणि सुव्रत । 

धूपे ताति वौर भाराय प्रयोजयेत्‌ ॥ 


= ~ = भि वि 11 0 


२ -- मौक्तिकानि : । २ ‡ अनेकस्‌ ` 


४५६ लत्धरलाकरः। 


एताति धूपं टतप्रचेपोद्धवं घूपमित्यथैः । 
नेवेद्यश्चापि कासार सुगस्धिं तौच्शमेव च । 
काखार कसार दति प्रसिद्ध पक्तान्नविगरेषम्‌ । 
छत्वोपवासमयवा नक्रं चिपुरसटन ॥ 
दत्थं प्रप्र जितो च भासरो लोकभासकरः । 
ददाति विपुलान्‌ भोगानतोऽयं कामदः स्मृतः ॥ 
स पुर पुच्नकामेभ्यो धनकामाय वे धनम्‌ । 
विद्याथिने इएभां विद्यामारोग्यं रोगिरे प्रसुः ॥ 
शरस्याञ्च विविधान्‌ भोगान्‌ तच सम्यूजितो विधिः | 
तचेव ब्रह्मोवाच । 
यातु मागेभिरे मासि शुक्तपके त॒ सप्तमो, 
नन्दा सा कथिता वोर सर्व्बानन्दकसे शभा ॥ 
पञ्चम्यामेकभक्तञ्च षष्ठयां नक्त प्रकीर्तितम्‌ , 
सप्तम्यासुपवाखन्त्‌ कौन्तेयन्ति मनौ षिएः ॥ 
पावनान्यच वे च्रौणि ऊश्रन्ति वे मनोषिएः । 
मालतोङ्सुमानोह सुगन्धं चन्दनं तथा ॥ 
कपूरागुरुसमिश्रधूपञ्चाच विनििथेत्‌ । 
दध्योदनं खखण्डन्तु नेवेदयं भास्कर प्रियम्‌ ॥ 
तदेव दद्यादिप्रभ्यखाश्नौयाच्च खयं तया । 
एवश्चतुव्वेपि भागजिरः-पौष-माघ-फारगनेषु, युष्यं मालत्याः 
कपूरादिधुपः खखण्डदध्यो दनं नैवेद्यं पारणएमपि तेनेव । 
पूजाय भास्करस्य प्रथमे पारणे विधिः । 


कछव्यरनाकरः । ४१० 


चेचादिचतुष्टये विधिमाद- 

पलाग्रपुष्याणि विभो यंच्तचन्दनमेव च 
एतत्‌ परिभाषयति- 

कपूरञ्चन्दनं कुष्टसुशोरं सिन्ध (ह) कन्तया । . 

ग्रन्थि षणं मौमं कुङ्कुमं खच्जनं तया । 

इरोतकौ तथा भौम एष यच्वाङ््‌ उच्यते ॥ 
एतदयं चन्दनमुच्यते दत्ययः । तदिद मनुलेपनम्‌ । 

भूपश्चाद- ` 

धुप प्रबोधमादिष्टं नेवेद्य खण्डवाद्यकाः । 
प्रनोधधूपं परिभाषयति- 

छष्णागरं चिन्य्‌ (ह्न) कञ्च वालकं टषणन्तया । 

चन्दनं तगर सुस्तं प्रबोधं शकंरान्वितम्‌ ॥ 
प्रबोधं धूपमाहरिति शेषः । खण्डवाद्यकाः खण्डनिश्धित- 

श्वाद्यानि । 

भोजयेदह्यणंश्चापि खण्डवादेगं णाधिप । 

निम्बपचन्तु सम्प्राश्य ततो भुच्छौत वाग्यतः ॥ 

पार्स दितो यस्य विधिरेष प्रकौत्तितः । 
शावणादिचतुषटये- 

नोलोत्यलानि शए्राणि धूपं गृग्गुलमाहरेत्‌ । 
शएथाच्युत्पलान्येव । 

नेवेद्यं पांश्णसुयकान्‌ प्रीतये भास्करस्य च । 


विलेपनश्चन्दनञ्च प्रा श्नं विल्वसुच्यते | 
श्ट 


४५८ छल्यर्नाक्ररः । 


ठतौयस्यापि ते बौर कथितो विधिरत्तमः ॥ 
दतौयस्य पार णस्य । । 
श्रयण देवस्य नामानि पावनानि व सद्‌ा, 
विष्णुभगम्तया धाना प्रोयतामुचरेदचः ॥ 
तेन विष्णः प्रोयतामिति प्रथमे चतुर्मासे, ददिनौये भगः 
प्रौयतामिति, धाता मे प्रौयतामिति दतौये क्रमेण वाचौ 
भवन्ति | 
अनेन विधिना यस्तु कुर्य्यान्नन्दां नरः खदा । 
स कामानिह सस्राप्य विधातारमवाप्रूयात्‌ ॥ 
सदा म कामान्‌ स॒म्प्र.ेत्यन्वयः, श्राद्रद्योलनाय वा सदेति 
काम्यल्ेर्य्खात्‌ । 
पचकामो लभेत्‌ पुजान्‌ धनकामो लभेद्धनम्‌ । 
विद्यायां प्राश्रुयादिद्यां यग्रष्कामो यग्रस्तया ॥ 
सर्वान्‌ कामांम्तया प्राप्य तदन्ते शाश्वतीः समाः । 
लनः दर्खेमदो गत्वा नन्दते नन्दिबद्धंनः ! 
सखय्येमदः द्द््य॑सभाम्‌ । 
दत्येषानन्द जननौ नन्दा ख्याता मया दिन । 
याञुपौय्य नरः ्रुवा नन्दते कमथाप वें ॥ 
क खगम्‌ । 
विष्ण॒र्वाच-- 
कुले जन्म तथारोग्यं धनड्ञेह दुरंभा , 
जित प्राप्यते येन तन्मे गद्‌ अगत्यते ॥ 


छत्यरलाकरः | 8५९. 


ब्रह्मो वाच- 

यो मागंग्नोषं सितसत्तमेऽङ्कि 
इहस्तचंयोगे जगतः प्रस्धतिम्‌ । 
स्यूव्य भातु विधिनोप्सो 
खग्गन्धधूपान्नवरो पारः ॥ 
ग्टद्धोत यः प्राश्न-प्रूजनादि 
दानादि युक्तं ्रतमनब्दभेकम्‌ । 
दद्याच्च दानं दिजपुङ्खवेभ्य- 

स्तं कथ्यमान विनिबोध वौर ॥ 
व्रं यवान्‌ त्रो हियवं दिरण्छं 
यवान्नमम्भः करकानननपाचम्‌ः 
कंच पयोऽन्नं गुडफाणिताच्छम्‌ 
द दयात्तया वस्तरमनुक्रमेण ॥ 
यद्येकयव्ये विधिनो दितेन 
तसां तिथौ लोकगुर्‌ प्रपूज्य । 

यब्यो मासः, वचं तं गड़ा अच्ननानि फाणितं बयितेच्रस- 
भिदं दरवद्रव्यम्‌ ॥ 

अश्नीत यञ्चात्मविश्टद्धिडेतीः 
संप्राश्नानोह निवोध तानि॥ 
मोमूचमम्भो छतभामशाक 


[9 2 कि त त) = र मतान [क 
ध ~~ ४ ज कोक ५४ 


१९ 8 धान्यानि चाम्भः..... . पानस्‌। 


ॐ ६० कत्यरन करः । 


दर्वा दधित्रौहियवां म्तिलांञ्च । 
य्था एतप्तं जलमम्बजानि 
सौोरञ्च मासक्रम गोपयुल्य९, ॥ 
कुले प्रधाने धनधान्यपुरं 
पद्माटृते ष्वस्तसमस्तदुःखे । 
म्राप्रोति जन्भाविकलेद्धियश 
भवत्यरोगो मतिमान्‌ सुखो च ॥ 
पद्माटते लक्तयाठते । 
दति चितयप्रदा नाम सप्तमो ॥ 
जरद्भपुराणे- 
यदिष्णोदेकिणं नेच तदेवाङृतिमत्‌ पुनः । 
श्रदितेः कश्यपाज्जन्ञे भिच्ौ नाम दिवाकरः ॥ 
मार्भशषेसय मासस्य श्रक्तपकत श्रमे तियो । 
सक्षम्यां तेन सा स्याता लोकेऽसिन्‌ भिचसप्नमौ ॥ 
ष्टवानतु खपनं कायं तस्म मिचाय भानवे । 
यथया विष्णोः प्रबोधे तु क्रियते सव्वेसम्पदा ॥ 
यथा विष्णोरित्यनेन कात्तिकष्णक्ोकादग्युक्त विष्णचानोय- 
द्व्यातिदेशः 1 
तचोपवासः कन्तो भच्छाण्छय फलानि च 
राच्रिजागरणं काय्यं नृत्यगौतपुरःखरम्‌ ॥ 





? सूले कऋरमणश्टोऽपि योज्यम्‌ । 


कत्यरन्नाकरः | ४६९ 


सप्रम्यां खपनं छला ततः क्ञाला यजेद्रविम्‌ 
नानाङ्सुमसम्भारे भेच्येः पिष्टमयेः श्एभेः । 
मधुना च प्रन्दतेन होमजय समाधिभिः । 
जरा दहमएणंस्तपेयेत्‌ पञ्चादौ नानाधांख मानवान्‌ ॥ 
चरष्टम्यां सं विभच्याय तथाच नट नत्तकान्‌ । 
दिनदये च भोतरव्यं पेष्टमन्नं मधुशचतम्‌ ॥ 
मिचसप्नमौत्रतमित्युपसंहारेण रत्यसमुद्ये श्व पालोऽस्या त्रतलं 
मन्यते । 
वरादपुराणे- श्रगस्य उवाच- 
एकाद श्वान्त्‌ यनेन नक्त दुर्ययाद्ययाविधि । 
मार्मङ्नोरषं च शक्ताद आ्ररभ्या्द्‌ विचच्चणः । 
त्तं धनदस्येष्टं छतं वित्तं प्रयच्छति ॥ 
श्टक्तेकादश्यामारभ्याब्द ङर्य्यादित्यन्रवः । 
नरसिंहपुराए- 
छपवासो मुनिश्रेष्ट एकादश्यां विधौयते । 
नर सिं समभ्यच्छौ सव्वेपापेः प्रमुच्यते ॥ 
एतह्कतं शएक्ञेका दश्वामेकदिनसमाप्यमेव वदन्ति । तथापि 
प्रसद्गम दिह ' लिखितम्‌ । 
विष्णः-- 
मागं ग्नो शक्तेकादश्यासुपोषितो दादश्यां भगवन्तं वासुदेव- 
मचथेत्‌ । पुष्यधुपानुलेपननेबेदेबंङ्किन्ाद्यएत्पंणे* तमेतत्‌ सवत्र 
छता पापेभ्यः पूतो भवति यावन्जौवं कला श्वेतद्रौपमवाप्रोति 


४६२ छत्यरलाकरः । 


उभयद्ादभोष्वेवं स्वत्सरेणए सखगेमवाप्नोति चावव्नौवं छता 
विष्णलोकमेवं पञ्चद शौष्वपि । 
्रद्मश्चतममावस्यां पो रंमास्ान्तयेव च । 
यो गम्चूत परिचरन्‌ के प्रवं मट्‌ भरुयात्‌ 8 
ब्रह्मपुराणे सत्यतपा उवाच- 
कोऽसौ धरश्ां सक्च एं उपवासो महामुने ! । 
कानि व्रतानि च तथा एतन वक्तमहेमि ॥ 
दुर्वासा उवाच 
मागेस्य शक्तपक्े तु दग्रम्याज्नियतात्मवान्‌ , 
च्वाचा देवार्चनं कला अभिकाय्ये यथगविधि ॥ 
प्रएचिवासाः प्रष्ननात्मा दव्य चान्ने सुरुद्छेतम्‌ । 
मुक्ता पञ्चपदं गत्वा पुनः शौचञ्च पादयोः ॥ 
छतवाष्टाङ्गुलमानन्त चौर टचसमु द्रवम्‌ । 
भचयेदुन्तकान्त॒ ततश्चाचम्य यनतः ॥ 
स्वाङ्गानि तथाङ्धिश्च विर्‌ ध्याला जनादनम्‌ । 
शङ्खचक्रगदापाणिं पोतवासः*-किरौरटिनम्‌ ॥ 
प्रसन्नवदन देवं सव्वेलचणलचितम्‌ । 
ध्ाला जलं होना तु भानुषूपं जनाद्‌ नम्‌ ॥ 
९्दलाघेम्‌ पादयंः पश्चात्‌ करतोधेन मानवः , 
एवमुश्वारयेदाच तसन्‌ काले महामुने ॥ 





९ ए वस्नम्‌ । २.6 षटवे, 





चछ्त्यरनाकरः | 8६ 


एक1दश्ट निरादारो श्वाऽदनि परे लहम्‌ ) 
भोच्छामि, पुण्डरोकाच्च शरणं मे भवाच्यत ॥ 
एवसुद्व7 ततो रान ३२वदेदस्य सन्निधौ | 
जपन्नारायणणायेति रूपेत्तच विधानतः ॥ ` 
ततः प्रभाते विम्ले नदौ गला समुद्रगाम्‌ 
इतरां वा तङ्ागं वा र्डे वा नियतात्मदान्‌ ॥ 
श्रानोय म्डन्तिकां शद्ध मन्तेएानेन मानवः 
धारण पोषणं वत्तौ श्चलतानां देवि सव्वैदा ॥ 
तेन सत्येन मां दिस पापान््ोचय श्घुन्तके 
्रह्माण्डोद्रतौर्यानि करः स्यष्टानि ते रषे ॥ 
भवन्ति श्छलानि यतो गत्तिकामारूमेत्ततः । 
त्वयि सच्छ वशा नित्यं शिता वरुण सन्ध्टा , 
तेनेमां ब्हन्तिकां प्रा्यमां प्रतं क्रुर मा चिरम्‌ ॥ 
एवं श्छदं रि तोयं प्रमाद्यात्धानमालभेत्‌ ॥ 
चिः छ्य गेषष्टदया जुष्डमालिख्य बे जले \ 
ततः साला नरः मम्यक्‌ मन्तरवद्धो पद्दामतः९ ॥ 
साला चावश्टकं हवा पुनद्वगरदं ब्रजेत्‌ । 
तचाराध्य महायोगं देवं नारायणं विधुम्‌ ॥ 
केशवाय नमः पादौ करि दामोदराय च। 
जानुभ्यां नर्मिहाय उष्‌ श्रनैवव्छधारिणे ॥ 





7 . 


| , भि + 


९ ^) चक्रवर्प्चरतः। 


४६४ छ्व्यरनाकरः | 


कण्टं कौस्तुभनायाय वक्षः ओरौ पतये तया , 
चेशोक्यविजयायेति बाह सर्वात्मने शिरः ॥ 
रथाङ्गधारिणे चक्र श्रद्धरायेति वारिजम्‌ । 
वारिजं शङ्ुग्म्‌ । 
गम्मोरायेति च गदां पङ्कजं शान्तमूर्तये । 
एवमभ्यद्धो देषेशं देवं नारायणं प्रभुम्‌ ॥ . 
एुनस्तस्याग्रतः कुम्भां खत्रः खधापयेदधः । 
जलपूर्णान्‌ समस्याश्च श्तिचन्दनलेपितान्‌ ॥ 
चतुभिस्तिलिपावेस्टु स्थगितः वन्नगग्पिंएः । 
चत्वारस्ते समुद्रास्तु कलशाः परिकीर्तिताः ॥ 
तेषा मध्ये एमं पौठं स्थापयेदस््रसंटतम्‌ । 
तसिं रोषये सौवणं तां वा दारवन्तया ॥ 
` श्रलाभतस्तोयपू्ं कला पाच ततो न्यसेत्‌ । 
श्रलाभतः सौवणदौनामभावे दारवमपि दुर्ययादित्य्थैः । 
सौ वणे मन्छद्पेण कृता देवं जनारंनम्‌ । 
बेदवेदा्गसंयुक्रं अरुतिरुति विश्धूषणम्‌ ॥ 
तचानेकविधेर्भच्छैः फलैः पुष्येञ्च श्रो भितम्‌ । 
गन्वभयेशच मन्तेख॒ शभ्रद्व यला यथाविधि ॥ 
रखातलगता वेदा यथा देव वयाइताः । 
म्छ्टपेण तस्मान्मां भवानुद्धर्‌ केशव ॥ 
एवसुच्चाय्ये तभ्याग्े जागरं तच कारयेत्‌ । 
यथा विभवसारेण प्रभाते विमले तथा । 


क्रव्यरन्नाकरः ४६५ 


यथा विभवस्षारेण यया विन्नालुशारेणख । 
चतुणां ्राद्णनाञ्च चतुरो दापयेहटान्‌ । 
पूव्वेञ्च बहुच दद्यात्‌ कन्दोगे दचिणन्तया ॥ 
यजुःग्राखान्विति दद्यात्‌ पिमं घटसुत्तमम्‌ । 
उत्तर कामतो दद्यादेष एव विधिः समृतः ॥ 
छग्बेदः प्रयतां पूव्वं सामबेदस्तु दके । 
पञ्चिमे तु यजुंदोऽथब्ववेदस्तयोत्तरे ॥ 
ताग्नपाचेश्छ सतिलः स्थ गितान्‌ कारयेद्वरान्‌ । 
ततस्तं जलपाचस्थं ब्राह्मणाय कुटुम्बिने ॥ 
दचादेवं महाभाग ततः पश्चात भोजयेत्‌ 
ब्राह्मणान्‌ पायसेनाग्यान्‌ ततः पञ्चात्‌ खय नरः ॥ 
ञुञ्ोत सहितो ग्त्येवाग्यतः संयतेख्ियः । 
यः सरृद्रादशोमेतां करोति विधिवन््रने । 
ख ब्रह्मलोकमाभ्रोति तत्कालद्चेव तिष्ठति । 
ततो ऋऋद्योपसहारे तल्लयस्तिष्ठते चिरम्‌ ॥ 
पुनःष्टौ भवेदेवो वैराजो नाम नामतः । 
ब्रह्महत्यादिपापानि इह लोके कृतान्यपि ॥ 
कामतः कामतो वा तानि नश्यन्ति तत्‌चणात्‌ । 
दृह लोके दरिद्रो वा भ्ष्टराच्योऽथयवा नृपः ॥ 
उपोय्य तु विधानेन मेश्वरो राज्यभाक्‌ भवेत्‌ । 

मेश्वरो लच्छोश्वरः । 


वन्ध्या नारो भवेद्या तु श्रनेन विधिना शरभा ॥ 
< 


8६६ 


छव्यर्नात्ररः | 


उपोव्य तु भवेत्तस्याः पुचः परमधघाभ्जिकः । 
अगम्यागमनं येन जानताजानता कतम्‌ ॥ 
स दम विधिमास्थाय तस्मात्‌ पापादिरुच्ते 
जद्भयकरियाया लोपेन बह्कवषैकतेन च \ 
उपोष्येमां सङ्द्धत्वा वेदसस्कारमाश्रुचात्‌ । 
किञ्चाच बह्कनोक्तन न तदस्ति महासुने ॥ 
प्रां वा प्राप्यते नैव पापं वा यन्न नश्यति ; 
अ्रदौकिताय नो देयं विधानं नास्तिकाय च ॥ 
वेददेवद्धिषे वापि न श्रायन्त्‌ कद्‌ाचन ! 
गुरुभक्ताय दातव्यं सब्वेपापम्रणाग्ननम्‌ ॥ 
दह जन्मनि वैराग्य धनधान्यं वरस्तियः ; 
भवन्ति विविधा यसु उपोषति विधानतः ॥ 
दूति मच्छदादशोत्रलम्‌ । 





मव्छपुराण- नारद उवाच- 


भगवन्‌ श्तभवयेश तथान्यदपि यद्रतम्‌ ¦ 
सुक्रिसुक्तिफलोपाय तत्‌ पुनवेक्रमहंसि ॥ 
एवमुक्तो ऽतरवोच्छम्भर्नार दं तपसां निधिम्‌९ । 
मल्समस्तपस्ा नह्यन्‌ युराणश्चतिवत्छलः ॥ 
धब्माऽयं इषरूपेण नाक्ना नन्दौश्वरो विभुः । 


धर्मान्‌ माङश्वरान्‌ वच्छत्यतःप्रशूति नारद ॥ 





0 





भम 
जाक कन कन नकम भो कि [9 


१९ म्रूले शयं वदूनंयपारगः | 


त्रन्यरल्ाकरः | 8 € ॐ 


द्रयुक्ता देवदेवेशरस्तचैवान्तरधौवत । 
नारदोऽपि हि प्रशुर एच्छन्नन्दिकेश्वरम्‌ ॥ 
्रादिष्टसं ग्रिवेनेह वद माहेश्वर व्रतम्‌ । 
नन्दिकेश्वर उवाच- 
ष्टणव्वावहितो ब्रह्मन्‌ वच्छे मार ततम्‌ । 
चिषु लोकेषु विख्याता नाना गिवचत्दंगो ॥ 
मागप्रौषं चयोदश्यां सितायामेकभोजनः । 
पप्रायेयदवदेवेश त्वामद्दं श्ररणङ्गतः ॥ 
चतुरश्यां निरादारः समभ्यच्छौ च श्ङ्रम्‌ | 
खुवणे टषभं दत्वा भो च्येऽहञ्चापरेऽहनि । 
एवं नियमशत्‌ सद्वा प्रातर्त्याय मानवः । 
छतस्ञानजपः पश्चादुमया सह शङ्करम्‌ ॥ 
पूजयेत्‌ कमलेः क्ते गेन्धधूपानुलेपनेः । 
पादौ नमः शिवायेति शिरः सर्व्वात्मने नमः ॥ 
ललाटन्त्‌ चिनेचाय नेचाणि हरये नमः । 
सुखमिन्दुमुखायेति ओओकण्टायेति कन्धरम्‌ ॥ 
सद्योजाताय कणे तु वामदेवाय वे भुजो । 
रस्तनौ तत्यृरषायेति तथेशानाय चोदरम्‌ ॥ 


१ 8 पूजयेत्‌ । र 8 निनेचायेति नेचाणि सललाटं हरये नम! | 
₹ 8 प्के स्तनावित्यादिपङ्किखाने । रू चानन्तवेराग्धिं येति प्रपूजयेत्‌ । 
दत्यक्षिकः। 


४६८ 


छव्यर् लकरः । 


श्रघोरहद यायेति दद यञ्चाभिप्रजयेत्‌ । 
च्ननन्तेशवययैनायाय जानुनो परूजयेद्धः ॥ 

पारा चानन्तघर््राय ज्ञानश्रूताय त्रै कटिम्‌ । 
प्रधानाय नमो जङ्घे गुर्फो व्योमात्मने नमः ! 
व्योमकेशात्मरूपाय केशान्‌ प्र्टञ्च पूजयेत्‌ । 
ततस्तु टषभं ₹हेमसुदकुम्भसमन्ितम्‌ ॥ 
बूटक्तमाच्याम्नरघर पञ्चरनस्मन्वितम्‌ । 
भच्छेरनाना विधेेक्रं ब्राह्मणाय निवेदयेत्‌ । 
प्रीयतां देवदेवोऽच सद्योजातः पिनाकष्टक्‌ । 
ततस्त विप्रानन्नेन तपेयेच्छक्रितः शभान्‌ ॥ 
प्रषदाच्यन्त्‌ सम्प्राश्य खपेद्धमावुदङ्सुखः 
पञ्चदश्यान्ततः पज्य विप्रान्‌ भुच्नौत वाग्यतः ॥ 
तदत्‌ छष्एचतुदेग्यामेतत्‌ सुन्वे समाचरेत्‌ । 
चतध सर्व्वासु कुर्य्यात्‌ पूृव्वेवदच्ंनम्‌ ॥ 

ये तु मासे विग्रषाः स्यः स्तान्निबोध क्रमादिह) 
माग्रोर्षादिमासे तु क्रमादेतद्‌ दौरथेत्‌ ॥ 
शङ्कराय नमस्तुभ्यं नमस्ते करकीरक । 
च्म्बकाय नमस्तेऽस्तु महेश्वर ततःपरम्‌ ॥ 

नमः पष्पते नाय नमस्ते गर्भवे पुनः | 

नमस्ते परमानन्द नमः मोमाद्धधारिणे ॥ 


0 क 2 


1 77) य थ 


१ केचित्‌ मासविशेषात्त । 


कछ्रत्यरलाकरः| 8६€ 


नमो भौमाय इत्येवं लाम भर णङ्गतः । 
गोमचं गोमयं चौरं दधि सर्पिः कुशोदकम्‌ ॥ 
पञ्चगव्यं तथा विल्वं यव्यं मोष्रटङ्गवारि च । 
तिलाश्च छष्छा विधिवत्‌ प्राश्ननं क्रमशः स्मृतम्‌ ॥ 
प्रतिमासञ्चत्दैश्यामेकेकं प्राशनं सूतम्‌ । 
मन्दारर्मालतोभिख तथा धुरर केरपि ॥ 
सिन्दूवारेर ग्रोकेश्च मल्िकाभिः सपाटलैः । 

श्रव पुष्यः कदम्बेख्च शतप्या तथोत्पलं: ॥ 
एकैकेन चतुद गश्यामचंयेत्‌ पाव्वेलोपतिम्‌ । 
युनश्च कार्तिके मासि सम्प्राप्ते तपयेद्धिजान्‌ ॥ 
श्रननर्नाना विधेभ॑च्छ वेस्रमाच्यविगश्दषणैः । 

कला नोलटषोत्छगे भरु्युक्तविधिना नरः । 
उमामदेश्वर डमं ठषभश्च गवा सद । 

सुक्ता फलाष्टकयुतं सितनेचपटा चितम्‌ ॥ 
सव्वोपस्कर युक्तां शय्यां दद्यात्‌ सकुभ्मिकाम्‌ः । 
ताख्रपांचोपरि पुनः शालितण्डुलसयुताम्‌ । 
साप्य विप्राय. शान्ताय वेद विदप्रवराचः वे , 
व्येष्ठसामविदे देयं न वकत्रतिने कचित्‌ ॥ 
शणज्ञे ओरोचिये दद्यादा चाय्यं तच््ववेदिनि ' 
अव्यङ्गाय च सौम्याय सदा कल्याणकारिसे ॥ 





९ ए कपूर्चागुरं यवान्‌ । कचित्‌ पञ्चमोष्द््वारि च । 
२ ए सकुम्भकाम्‌ । ॐ म्ले वेदत्रतपराय च| 


(-+ ~ 8. 


छद्यरनक्ररः ; 


सपन्नौ काय मम्यज्य माद्यवस्तविश्वूषणेः । 
रो सति उरौ देयं तद्भावे दिजातये ॥ 
विन्तशादयं न कुर्वत क्रुवयैन्‌ दोषात्‌ पतत्यधः । 
अनेन विधिना यमस्तु कु््याच्छिव चतुद भौम ॥ 
सोऽश्वमेधरदरूस्य फल प्राप्रोति मानवः । 
ब्रद्यहत्यादिक किञ्चिदिह चाञ्युज वा कृतम्‌ ॥ 
पिटभिममदिमिर्वापि तकसन्वे नाग्रमाभ्रुयात्‌ । 
दोर्घायुरारोग्य कुलाभि(न्न)्द्धिः 
र चचयाऽसु च चलतुसुंजलवम्‌ । 
म्ण धिषत्ये दिवि कन्पकोरि- 
ग्रत वशित्ना पदमेति ग्रस्मोः ॥ 
न इदस्यलिरप्यल तदस्याः' 
फंलमिन््ोऽपि पितामहो न वक्तम्‌ ) 
न च भिद्धगणोऽप्यलं न चाहम्‌ 
यदि जिङ्णायुतकोटयोऽपि वक्तेः ॥ 
भवत्य मरवल्नभः पठति यः खमरेदा 
प्टणोत्यपि विमत्सरः खकलपापनिमौचनोम्‌ । 
द्मां श्वचतद्‌ शोममरकाभिनोकोरयः 
स्तुवन्ति तमनिन्दितम्‌ किसु समाचरेट्‌ यः षदा ॥ 
या वाय नारो क्रुरुतेऽतिमल्या 
भन्तारमाश्च्छयं रं सुतं वा ¦ 


नि क [य 
ण ~~ 
त] 


१ ए च्धनन्तसस्याः ! ९२ मले वक्लस्‌ 


वद्र नाक्रः ' 89 


सापि प्रसादात्‌ परसश्वरस्य 
परं पटं याति पिनाकपाणः ॥ 
दति शिवचतुदगौत्रतम्‌ ¦ 





ब्रह्यपुराणे- 

वामनेचन्त्‌ यदिष्णौस्तदेव सुवनचयम्‌ ' 

अनस्य त्मजशचन्र स्वम्डते नाभ्य चयत्‌ 

पौ णैमास्यान्त्‌ तस््रात्तं पूजयेत्तच सववेदा , 

रक्तैः एुष्येञ्च पयसां नेवेचेः" श्रद्धयान्वितः 
रनैर्दौवैश्च वल्लिमिरीमेनह्यणतपेणेः 

गोभ्यश्च लवणं देय तस्सिनहनि सव्वेटा ॥ 
तस्मात्त क्वण चन्द्राद्‌ कश्पादिनिःखतम्‌ । 
माता खा च दुदिता पज्याञ्च खकुलाङ्गनाः । 
रक्रवस्तदयेनेव सदन नवेन च । 

रूपग्र्तन्त्‌ विधिवत्‌ कन्तेवयं तच सद्धिजेः । 
कान्तं सूयं भवेत्‌ स्त्ोणणं परन्दोः प्ूजनादिति । 
करोडन्या का ग्रगङ्गायामष्टसेवाभवत्‌ मणिः ॥ (?) 
गजेन्द्राः कुसुदाद्याश्च करेस्तच्नाह्वौजलम्‌ । 
ग्णडोला प्रतिसुञ्चन्ति खुन्कारे रंचिणसुखेः ॥ 
ष्टाः बुष्णोऽग्ररपतेख्च मामौष्यात्‌ ख्येरश्सिभिः ¦ 
मम्यक्‌ सखदेदशान्त्यथे दाहस्य शमनाय च ॥ 


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"~ "~~~ = ~ --- ~ ~~ *-- ~~ न 9 मे) 


१९ ए विकारैः; 


४७२ छन्यरुनाकरः | 


महाप्रतापान्नभसः पतमानन्त्‌ तव्नलम्‌ । 
वाचुना परायमानन्त्‌ स्यानलमु पगच्छति ॥ 

तत्पुश्छं दहिमवत्सानौ पतते च यदा हिमम्‌ । 

प्रथमं तच सम्ृव्यो हिमवान्‌ गरिशिरस्तथा ॥ 
हेमन्तश्च तथा नागो नौलो नोलाजसलिभः । 
स्थाननागञ्च समपव्यः पालैः पतेन मर्जः ॥ 

वकयुष्याछि देयानि धूपो यरग्शलसम्भवः । 
मध्वाच्यतिलसम्मिश्च च्पिदभ्यश्च॒ दिम बहक ॥ 

यस्मिन्‌ देश दमं न स्वात्‌ तच नृयाद्धिम हिमम्‌ । 
एताक्तं ब्राद्यणएभ्यख देयं माषौदनं तथा । 

उन्छवञ्च तथा काया गोतनृत्यसमाङ्लः । 

विशेषत भोक्तव्यं मनोज्ञं भोजनं एभम्‌ ॥ 

श्यामा देवौ पूजितव्या युष्यधूपानुलेपनेः । 

अन्नभेच्यैः फलेमूलेः खनु लिः खलङ्कतेः ॥ 
हिमोपरि निविष्टेश्च ग॒रुप्रावरणाग्बरैः 

पु च्त्याप्तसम्बन्विसहितेञ्च यथासुखम्‌ ॥ 

भोज्ये विग्रेषवत्‌ काय्य भोतच्छं गौतवादितम्‌ । 
द्वयं पुखलोनुत्यं प्ूजनौयास्या स्तियः ॥ 

नवच्च मद्य पातव्यं मद्यपेखच यथाक्रमम्‌ । 


द्रति डिमपूजा। 





छत्यरन्नाकरः । 8७हे 


मद्छपुराणे- 
यत्तदौ श्ानकन्पस् टन्तान्त मधिकृत्य च । 
वसिष्टाया्िना प्रोक्रमाग्रेय तत्‌ प्रचचते ॥ 
लेखयिला यो दद्याद्धेमपद्मसमन्वितम्‌ । 
मागेग्रौययें विधानेन तिलप्रस्छयुतन्तयःं ॥ 
तच्च षोड्शसादहस्तर खब्वेक्रत्‌ फलप्रदम्‌ । 
विष्एधच्योत्तरे- 
मानों तथा मासे परं शिशिरदौधितौ । 
महाराजनरकरन कुसुम्भरन्नितेन वा! 
्रासाद्य कांसपाचस्यं प्रस्य कता समाहितः । 
लवणस्य तु सुख्यस्य चुणितिम्य दिजोत्तमाः ॥ 
प्रस्छो इाक्धिंशत्यलानि, सुख्यस्य च इ विययस्य ¦ 
दत्वा सुवणेनाभन्त्‌ तस्मिन्नेव दिजातये ॥ 
सोभाग्यरूपलावष्छयक्तो भवति मानवः । 
सखुवणेनाभं मध्यन्यस्तसुबणं कौ सुम्भवस्वेण नाद्यएमा च्छाद्य 
कास्वपातरे चुणितरेन्धवप्र्यं निधाय तन्म्ये सुवे दताऽन्वच्यं 
ददादित्य्थः । 
सर्पाणाभित्यनुटन्तौ मव्छपुराखे- 
काय्येः प्रत्यवरोदश्च मागेश्नोय्यों न संश्रयः | 
विष्णः 


€ ग्रौं ह € 
मागश्ोष इफक्तपञ्चदष्वां डगभरिरोयुक्ता्ां सूणएितललवष्स्य 
६० 


६७8 छ्रनाकरः 


सुवणनाभं प्रसेक ब्राद्यणय चन्द्रोदये प्रतिपादयेत्‌ । अनेन 
कर्णा रूपसोभाग्यममिजायते । 

सुवणेनाभं सुवणंगमेम्‌ ¦! प्रयः षोडग्रपलानि, दद्र प्रतिः 
मेति: तच्चतुष्टयं प्रम्ध इति वा| 

वसिष्टः- 

्रावण्छायदहावप्योरष्टकाषु च पिहभ्यो दद्यात्‌ । श्रष्टकालाद- 
चर्यात्‌ आवश्यायहायण्योरपि निव्यश्राद्धम्‌ । 


दति महासान्धिविग्रदिकःक्करमौवोरेश्वरात्मजमदहा- 
मान्धिवियहिक ओरौ चण्डश्वरटद्कुरविरचिते 
छत्यरनाकरे मागेमासतरङ्गः । 





अथ पोषमासकछत्यम्‌ । 

तच विष्णधर््मोत्तरे- 

पौषे कनकदानेन परां तुष्िन्तयेव च । 

पुष्याणाञ्च सिते पक्त दानं लच्छोकर छतम्‌ ॥ 

फलानाञ्च तया दानं छष्छयच्ते महाफलम | 
वामनपुराणे- 

प्रासारनमरारौनि ग््दप्रावरणनि च| 

नारायणस्य त्‌श्चय पौषे देयानि नित्यश्नः ॥ 
अच प्रथमेनादि गन्देन यामकव्वैटयोगदणम्‌ । दितेन ग्थ्यायाः 

इति दानसागर: । तन्मते ग्टद्प्रावरणादिकमिति पाठः, 


कीदर्लक्ररः | 8७४५ 


ग्रहणसुपक्रम्य देवो पुराण- 
पोषे तु बरदा पुष्ा लानदानादिकम्नसि , 
एकभक्रसु पक्रम्य स्कन्दपुराणे - 
पोषं मासे त्‌ पुश्च कड्डनाप्रोति धास्मिकान्‌ 
श्रोमदहाभारते- 
पौषमासन्त्‌ कौन्तेय भकरेनेकेन यः च्िपेत्‌ । 
सुभगो दभेनोयश्च यश्ोभामौ च जायते, 
पौषमभिग्रेत्य मविच्यपुराणएम्‌- 
रतान्ते गरुड हृत्वा भानवे विनिवदयेत्‌ । 
गन्धमाच्येर लङ्त्य भास्करः विबुधो त्तमम्‌ ॥ 
ताभ्रपाचे श्थिते तस्मिन्‌ तत्सव्वं विनिवेदयेत्‌ । 
तसन्‌ गरुड 
महा पद्मकयानेन दिखगन्धप्रवाहिण ॥ 
समेकाद शशाद खुच्यैलोके मदोयते । 
मग्प्ाेवं कमाक्ञो कं यथेष्टं बिन्दते पतिम्‌ ॥ 
रच मासव्यापकमेकभक्त षष्ठ्याम्‌ सप्तम्याञ्चो भयपचयोरूपवासः ! 
मा सत्या दि जिवमाञ् कात्तिकोक्ताः सवध्यन्ते | 
भविष्ये खमन्तरुवाच- 
इन्त ते सम्मवच्छामि सुख्यत्रतमनुत्तमम्‌ । 
पौषे मासि तु स्प्रापते यः कु्याक्षभोजनम्‌ । 
जितेद्धियः सत्यवादौ खातौगोधूमगोरमेः । 
पकच्चयोः सप्तमो यन्नादु पवासेन यो नयेत्‌ ॥ 


४७६ छत्यरनना(करः | 


चिखन्ध्यमचयेद्धानुं शा र्डिलेयञ्च सुत्रत । 

अधःशय भवेलित्यं मन्वेभो गविवजितः ! 

मासि पूंतु सप्तम्यां एतादिभिररिन्दम | 

छ्ञतल्ला स्नानं महापूजां सूय्येमन्ल्ेए भारत + 

नेवेद्यमोद नम्रखं चौर सिद्धं निवेदयेत्‌ । 

भोजयिता दिजानष्टौ सय्येभक्तान्‌ सुखामगान्‌ ॥ 

गाञ्च दद्यान्महाराज कपिलां भास्कराय त्‌ । 

य एवं कुरुते पुण्यं सुख्यत्रतमनुत्तमम्‌ ॥ 

तस्य पुष्फलं वकि सव्वेकामसमन्वितम्‌ 

खग्येको टिप्रतौ कागेर्विमानैः साव्वकामिकरेः ॥ 

्र्यरो गणमङ्गो रेमे विभव विस्तरैः । 

ससगोतनृत्यवाद्ये गेन्धब्वेगणश्नो भितैः ॥ 

दोघूयमानञ्चमरेः यमानः सुरासुर । 

सहस किर णद्ध नोधेनेश्वय्यं समन्वितः ॥ 

ख याति परमं खानं यचास्ते र विरश्दमान्‌ । 

रोमस्ख्या तु या तस्यास्तत्रसूतिङ्कुल्ते तया ॥ 

तावद्युगसहस्राणि खगंलोके महोयते ¦ 

चिःसपषङ्कलजेः साद्धं भोगान्‌ भुक्ता यये स्तान्‌ ॥ 

ज्ञानयोगं समासाद्य सुय्येखेवालयं त्रजेत्‌ । 

श्र नक्तमोजन सप्तमोदयं परित्यव्य मासे प्रयमसक्तम्यां भातः 

सकल्पः । श्रार्डिलेयः शण्डिल युचोऽग्निरिति यावत्‌। विःप्न- 


क्त्यरन्नाक्ररः | ४७5 


कुलजे-रेक विंशरतिक्ुलजेः। मासि संप्र सति सप्तम्यां कपिलाया 
गे भानवे दानम्‌ । 
भविव्यघुराण- 

पोषे मासि तु सश्माप्ते यः कुर्य्यानक्रभो जनम्‌ । 
जितेद्ियः सत्यव्रादौ कामक्रोधविवजितः ॥ 
पक्योनवमौ चन्नादु पवा सेन पालयेत्‌ । 
चिकालं प्ूजयेदाय्यां गन्धपुष्यो पद्ारतः ॥ 
छलाग्निकाय्ये वरिधिवङ्भमौ श्यां प्रकल्पयेत्‌ । 
मासान्ते तपनं कुरययाद्धगवलत्ये छतादिभिः ॥ 
कृतवा ध्यानं महा परजां चण्डिकाये प्रकन्पयेत्‌ । 
नेवेदयं तण्डलग्रसथं चौर सिद्धं निवेदयेत्‌ ॥ 
कुमारौ मोजयिवष्टौ विप्रान भागवतांस्तया । 
रला पिष्टमयं ठेवो नान्ना चार्खति पूजयेत्‌ ॥ 
चतुखुजां शलधरां कुन्द पुष्यैः सशग्ललेः । 
जान छवा तिलेविप्र तिलानां प्राग्रनन्तथा ॥ 
य एवं पूजयेदाय्यों तस्य पुण्यफलं ष्टण । 
स्ष्यको रिप्रतोकाश्रं विमानवरमास्यितः । 
दो धूयमानञ्चमरेः स्यमानः सुरासुरैः । 
गच्छेटुर्गापुरं रम्यं यत्रास्ते चण्डिका खयम्‌ ॥ 
करोड्ते दे वगन्धन्वर्यावद्‌ाभ्चूतसंक्षवम्‌ । 
चिःखप्तक्रुलजेः साड भोगान्‌ भुक्ता यथे श्धितान्‌ ॥ 
पुनरेत्य सुवं वौर राजा भवति गुते । 


द्ध .७ कछरत्यरन्नाकरः , 


भविष्यपुराण- 
मम्यजयन्‌ सद्‌ा पृच्यं भानु सर्व्वायसिद्धिदम्‌ । 
ठताभिषेकं यः कुर्याद होरा चन्त भाखर ॥ 
कुश्रनाना विधेदिषेः पुख्मासे समुद्यतः ¦ 
गैग तनत्यो पद्ारेण शङ्कुवादि चनिखनः ॥ 
कुर्य्यान्नागरणं देवे प्रदौपादयेः सुशोभितेः , 
वसेत्‌ खय्यपुरे श्रौ मान्‌ सय्येतुत्यपराक्रमः ॥ 
ग्रहएे विषुवे चेव पुण्येषु दिवसेषु च । 
छताभिषेकं यः पथ्येदासमाप्रप्रपो धितः ॥ 
विधूच मव्वेपापानि खख्येलोकं स गच्छति । 
तथा- 
छताभिषकं चः कुर्य्याद्‌ हो रान्न शिवस्य च ¦ 
सच्छघारेण भाण्डेन पु्मासे दिजोत्तमः + 
गौ तनुल्यो पारेण शङ्खा दिचनिखनेः । 
कूर्य्याज्नागरणञ्चापि प्रदो पादयुपशशनोभितम्‌ \ 
` समस्तपापनिभक्तः षमस्तक्ुलवद्धेनः । 
सुक्रः शिवपुरे श्रौमान्‌ मोदते शिववत्‌ सुखौ ॥ 
जह्यपुराण- 
पौषकष्णाष्टकायान्त्‌ शाकैः ख्राद्धं सुशोभनैः । 


0), त 7 
न = न = न म क भ म म म 


९ ^ पश्येत सद्‌ाओपेः ¦ 


छत्यस्न्ना्ङः । 8७८ 


वायुपुराण- 
पिश्यदानाच मूले स्युरष्टका स्ति एव च ¦ 
करष्णपच्चे वरिष्ठा दि पूर्व्वा चेनद्रौति भाव्यतेः ॥ 
प्राजापत्या दितौया सखान्ततोया वेश्वदे विक) । 
्राद्यापूयैः सदा कार्यां मांसैरन्या भवेत्तया ॥ 
षाक्रेः कार्य्या ठलौया सखारेष द्रव्यगतो विधिः । 
अन्वष्टका पिद्णान्त्‌ नित्यमेव विधोयते ` 
एवश्च ब्रह्मपुराणे आद्यायां शाक -विधानात्‌ उयपुराएे च 
तस्यामेवापूप-विधानात्‌ शाखाभदेन व्वख्ितो विकल्पः । 
कल्पतर्रष्येवम्‌ । समयप्रदौ पस्व-ङन्दोग-वाजसनेययोः खग्टद्यानु- 
खारादपूषः कठानान्तु शराकमिति यवसा । यभ त्‌ खच्ट्यादौ 
विश्रेषाश्रवणं तस्य तुख्धवदधिकल्य एवेत्याह । 
पापेमच्यते दत्यधिकारे यमः ॥ 
नश्मेद्‌ाम्भसि च खातः पौषरष्णाष्टमोन्तया । 
सपतम्ययं दितौया । 
ओौमहाभारते- 
पौषमासस्य वे शक्ते यदि युच्येत रोहिण । 
तेन नचचयोगेन श्राका श्रशयनो भवेत्‌ । 
सोमस्य र्षयः पौतला महायज्ञफलं लभत्‌ ¦ 
दितौया्यं रश्षय दति प्रथमा ॥ 


1 1 0 ककन 


१९ 1 विभाव्यते। 


£ < क्व्यर्लकरः | 


भविव्यपुराण- महादेव उवार- 
पुष्यमासे यदा देवि शक्ताष्टम्यां बुधो भवेत्‌ । 
तदा सा तु महापुण्या महाभद्रेति कौ्तिता ॥ 
तस्यां खान जपो होमस्तपेणं विप्रभोजनम्‌ । 
मत्रोतखे कतं देवि शतसादखिक भवेत्‌ । 
तस्मात्तस्यां महादेवि पूज्योऽहं विधिवदुधेः । 
गन्धपुष्यो पहार ब्राद्धणनाञ्च तपे; ॥ 
तया- 
पौषे मासि यदा देवि श्रष्टम्यां नगजे इमे । 
नच जायते पुण्यं यल्लोके रौ द्रमुच्यते ॥ 
रोद्रमाद्रा योगश्चायमतिद्लेभोऽपि सुनिवचनविषयलान्तिथि- 
नच्चद्द्धि ह्वासक्रमेण काकतालोयो लचणोयः ॥ 
तदा मापि महापुख्ा जयन्तौ श्रमो शमा । 
तस्यां खानं तथा दान जपो होमश्च तपेणम्‌ ॥ 
स्वं कोटिगुणं दैवि छत भवति छत्रः । 
तस्ान्य्मत्‌ पूजनं दैवि कर्तव्ये विधिवन्नरः ॥ 
द्यमष्टमौ इरज्ञेव प्रकरणात्‌ । 
तजेव विष्णुरूवाच- 
पौषे मामि सखिते प्ते श्रष्टम्यां विधिपूर्वकम्‌ । 
पूजयित्वा महादेवं गन्यपुष्यो णडारतः ॥ 
महापाररपतान्‌ विप्रान्‌ शेवांश्च विधिवद्धिजान्‌ । 
भोजयित्वा यथाश्रक्या देवमारो पयेद्रयम्‌ ॥ 


क्व्यर्नाकरः ) 8८ 


ष्टनाननाचक्ृपणान्‌ ब्राह्मणांश्च विश्रेषतः । 
भोजयेत्‌ पूजयेच्छतया नानाभच्छेविधानतः ॥ 
तिलान्‌ पलाश्रसमिधो जुयात्‌ पावके तथा । 
छला तु सतं वोर देवमारोपयद्रथम्‌ ॥ 
कुर्य्यात्‌ प्रजागरं तच नानाप्रैचणकरैदिंज । 
ष = ४५ 

परि त्राजकबगस्तु नृत्यमानेश्च स््वेशः ॥ 
एवं महोत्सवं छता यामिन्यद्धं वरानने । 
छष्णाटम्यान्ततः पौषे देवं तं भ्रामयेत्‌ पुरम्‌ ॥ 

क ॐ ~ {= श 
नानाप्रचणएकेविग्र ब्रह्मघोषश्च सव्वेशः । 


छन्दः पाष्पतानाच्च नृत्यमानेः समन्ततः । 
रथे विपर्वजच्छवेः किङ्किणौरवकाच्वितिः 
वितानघ्वजमालासिघेण्टाचामरद पणेः ॥ 


शङ्खभर्यया दि नि्ीषेर्गेयरङ्गखमाकुलम्‌ । 

लेष्य दारुमयेयेन्तेर्माठरच्ोगणदिभिः ॥ 
उद्यानखातपानाद्ेरमहो सवसमन्वितेः । 
मदाजनपद्‌ा कंगेणं ययावेभवक जल्पितम्‌ ॥ 
सव्वेदा दानपुण्छानि सव्वेतौयेफलानि च । 
श्र्यु्रतपसां पुण्यं स्वेयज्ञफलानि च ॥ 
लभते च नरः ओरोमान्‌ शिवयाचाप्रवन्तेनात्‌ । 
शिवलोके महाभाग भ्रिववन्‌मोदते सदा ॥ 


मिपो भी कि स 2 


९ 7 दोनाथे कुपणान्‌ | 


किर ल्व्यर नकरः । 


श्च शएक्तपक्कयनानन्तर छष्णाटम्यान्ततः पौष दति भविव्य- 
पुर!ण एव कथनाड्क्त एव प्रज्ञादि मासक्रमेण छष्णः पौ षपक्तः ¦ 

तस्यान्ते देवराजलं चिरकालमवाश्रुयात्‌ । 

जम्बद्ौ पपतिः ओमान्‌ तखान्ते जायते पुनः ॥ 
तथा- 

यः कुर्य्यात्‌ पव्वेकालेषु महो मागेप्रवन्तेनम्‌ । 

शिवस्य रथयाच्ायां टिनराचिपरिक्रमात्‌ ॥ 

स दिवं यानमारूढः किङ्किएणेरवनादितम्‌ ¦ 

प्रयाति लोकमचलं भिरिजावल्लभस्य तु ॥ 

दूति शिवस्य रथयाचा। 

बरह्मपुराणे- 

पोषे माखथ शएक्तावासेकादश्वामुपोषितः । 

दाद्श्यां पूजयेदिष्णं देव नारायणं हरिम्‌ ॥ 

याचा कार्यां चयोदश्यां चतदृश्छासुपोष्य च । 

पौणमास्यां यजेदिष्णं तथा विभव विस्तरैः ॥ 
विष्णधन्नात्तरे- 

पौषश्क्तदादभोसुपक्रम्य-धान्यानाञ्च तथा पौष दूति । 

श्रच् तयेत्यनेन दानस्य पव्वेमारोक्रमदाफलपरामणः । 

वरादपुराण- दुर्वासा उवाच- 

पुखमास्ख या पुणा दादौ शटक्तपचतः। 

तस्यां प्रागिव सकसख्य कुर्य्यात्‌ सानादिकाः क्रियाः ॥ 
प्रागिव मागेवत्‌ । 


च्व्यरनाकरः । 


निव्वैरत्या( रा ) बोधयेद्राचावेकादश्यां जनादेनम्‌ , 
पूज्यमन्त्ेदिजश्रेष्ठ देवदेवं जनादरनम्‌ ॥ 
राय पादौ प्रथमन्त्‌ पृच्यौ 
नारायणायेति कटि हरेख्वु । 

खङषेणायेत्युदरं रेष्ठ 

उरो विष्णोकाय भवाय कण्टम्‌ ॥ 

सुबादबे त्वेव भुजो शिरश्च 

नमो विश्रालाय रथाङ्ग-गश्खनै । 

खनाममन्सेए सुपुव्यगन्से- 

नानानिवेदये विविधैः फालेख॒ ॥ 

अरभ्यच्छे देवं कलसं तद्य 

सस्थाप्य माद्याम्बर दामकष्टम्‌ । 

तं हेमगभेन्त पुरेव छता 
 स्वशक्तितो हेममथन्त देवम्‌ ॥ 

समन्दरं कृन्बरूपेए छलत्वा 

संसा पयेत्ताम्र पाते तख । 

परणं घटोपय्येय सन्निवेश्य 

शवो ब्राह्मणयेवसेवन्त॒ दद्यात्‌ । 

श्यो ब्राह्मणणन्‌ भोच्य खद रिणांश्च 

यया शक्तया प्रौ एयेदवदेवम्‌ । 

नारायणं कूम्मरूपेण पञ्चात्‌ 

सखय्च सुञ्धोत सम्छत्यवगेः ॥ 


8८८ कछरव्यरन्नाक्रः | 


एवं क्ते वे बिविधं हि पापं 
विनश्यते नाच विचारणास्ति । 
संसारचक्रन्त्‌ विहाय छड्धम्‌ 
प्राप्नोति लोकन्तु हरेः पुराणम्‌ ॥ 
अनेन जन््रान्तरसञ्चितानि 
नश्यन्ति पापानि नरस्य भक्तया ; 
मरागक्तरूपन्त्‌ फलं सभन्ते 
नारायणस्वुष्टिमुपेति धद्य: ॥ 
कूश्मेदादभे । 
विष्णुः- 
पौषो चेत्‌ युव्ययुक्ता स्यात्तस्यां गौरसषेपकस्केनोव्छादितश्ररौरो 
गव्यदतपूर्क्मेनाभिषिकरः स्न्वषधि सन्वेगन्धेः सन्वैवौजेञ्च स्नातः 
तेन च भगवन्तं वासुदेवं ्ञापयिला पुष्यधूपनेवेद्यादि भिखाभ्चच्ये 
वेष्णवेः सखीन दैस्यत्य मन्त्रे पावक ह्ला सुवन एतेन च 
ब्राह्मणं खस्ि वाचयेत्‌ । 
बरह्मपुराण- 
ददं जगत्पुरा लक्ता त्यक्तमासौन्ततो हरिः । 
पुरन्दरश्च सोमश्च तया पुब्य-टदस्पतो ॥ 
पञ्चते पुष्ययोगे तु पौणमास्यां तपोबलात्‌ । 
श्रलङ्कतं युनश्चक्रः सौभाग्योत्छाहलच्छीभिः ॥ 
तस्मान्नः पुख्योभे तच सौमाग्यदृद्धये । 
गौ रसषंपकल्ेन समालभ्य खकां तनुम्‌ ॥ 


जत्यस्नाकरः । प 


ऊतस्नानेस्ततः काय्येमलक्छ्रो नाशनं परम्‌ । 
उदत््यै देहञ्च तथा सवौषधियुतेजलेः ॥ 
स्लानं छता नवं वस्तं प्टहोलाच्छादनन्ततः । 
द्रष्टव्यं मङ्गलग्रतं धघूपखडःमाल्यशोभितम्‌ ॥ 
ततो नारायणः शक्रः चन्र: पुष्य-ृदस्यतो । 
सन्पव्याः पुष्यधूपाच न व्यश्च एयक्‌ एथक्‌ ॥ 
प्रशसतेवेदिकैमेन्तेः छता यिदवनं इमम्‌ । 
धनैर्विंप्राश्च सन्तरां नवेवस्तेः सुशोभिताः ॥ 
ततः पुष्टिकरं द्यं भोक्रये टतपायसम्‌ । 
पुव्ययोगे तु कत्तव्य राज्ञा स्ञानन्त्‌ मव्वेदा ॥ 
अच देवोपुराणे- 
पुष्ये पुखयाभिषेकस्ट कन्तेव्यः पूजयेन्नयाम्‌ ¦ 
विष्णधश्मात्तरे- 
गोर सषेपकल्ेन पौय्यासुत्सादितो नरः । 
गव्यस्यान्यस्य कमन सोऽभिषिक्रस्नन्तरम्‌ ॥ 
उत्सारित उदन्तितगाचः । 
विर्क्तितस्तथा सातः सब्वैवोजौ ष्ौजलेः । 
रनगन्धफलोपेतेदट्र ते च तदनन्तरम्‌ ॥ 
स्वदषयि सव्वैवौोजानि परिभाषोक्रानि | 
ससुवे मुखं दृष्टा तमद च्ाद्धिजातये ॥ 
एतेन स्ञापित विष्णुं श्रक्तया सन्पजयेत्तत १ । 
एतञ्च जुहयादक्हौ एतं दद्यादिजातये ॥ 


£ ८६ क्व्यर्ने{करः। 


क्च वस््वुगं दद्यात्‌ सोपवासः समाहितः | 
क््येणानेन धर्मज्ञाः पुषिमाप्नोत्यनुन्चमाम्‌ ॥ 
अधमः! एकभक्त कल्ला नियमेन सुधा परदिनसुपोष्यः- 
परदिने प्रातः शरतसर्ष॑पकल्जोनो दत्य गव्य्टतङ्गुम्मेन सातः तण्ड्ल- 
चर्णादिभोरुक्षणं कला परिभाषोक्त सववेधान्य स्वौ ष्तौ मिश्रेण 
रनफलयुतेन जलेन च स्ञातो मुखं सुवंसहिते एते बोच्छ तत्‌ 
यस्मिन कङ्गा प्रतिपाद्य सापितं भगवन्तं विष्णु यथा- 
शक्तिं सम्यूव्य ब्रादह्मणदारा-- 
ॐ तिष्णवे खादेति एतेन दौम कारयेत्‌ , 
ततो होमस्य कच्च वाससौ दिण्णं दद्यात्‌ ॥ 
ततः म्रतिग्रहौह ब्राह्मणमानाय्याभ्वच्छार्चिंतं तं तस्मे. दचयात्‌ ¦ 
्रचानुत्तमपुष्टिः फलम्‌ ¦ पुष्ययोगे चाचैव दश्रगुणम्‌ : 
मच्छपुराण - 
चतुद प्रसदहसाणि तथा पञ्चश्तानि च। 
भविष्यचरितप्रायं भविय्यं तदिहोच्यते ॥ 
तत्‌ पौषमासि यो दात्‌ पौणमास्यां विग्रेषतः । 
भविव्यचरितप्रायमादिव्यचरितोज्ज्वलम्‌ ॥ 
गडकुम्भममायुक्रमगरिष्टो मफंलं लभेत्‌ । 
दति महाघान्धिविग्रदिकट्क्ुर श्रौवोरेश्रात्मज महा 
सास्पिवि्रहिकटङघर श्रौ चण्डेश्वर विर चिते 
छत्यरनाकरे पोषमासतरङ्गः । 





छचयस्नवक्रः। -# 


अथ माघलत्यम्‌ । 
श्रौ महाभारते- 
माघे मासि तिलान्‌ यस्तु ब्राह्मणेभ्यः प्रयच्छति ; 
सन्वैसत्वसमाकणं नरकं न स पश्यति ॥ 
विष्णधन्नन्तरे- 
तिलग्रदानान््ाघे तु याम्ये लोक न गच्छति 
वामनपुराणे - 
माघे मासि तिलाः श्रस्तासिलधेनुश्च दानवः : 
दप्रेन्धनादयशान्ये माधवप्रीणनाय तु ॥ 
इथाहोमोपयोगिदार्‌) इन्धनममिज्वसलनो चितम्‌। अदिशन्दन्‌ 
श तर द्रलपरो कम्बलाः परिष्टहौता इति द्‌ानमागरः , 
कल्यतरूकारस्य तु- 
यद्यदिषटेतम वस्तुः यच्चाप्यस्ति गे रचि । 
तन्तद्धि देयं प्रौत्यथं देवदेवस्य चक्रिणः ॥ 
दति वामनपुरारे मासद्‌ानोपसंहारे दभेनादस्येवादिपदा्थं- 
त्वमिष्टम्‌ । एवमन्यत्राप्यादिपद्‌ाया नेयः । 
तिलधेनु: धेनुद्‌ानावत्तेश्धमच्छयुराणोक्रतिलघेनु विधया देयेति 
दामस्ागर्‌ः । 
विष्णः- 
माघे मास्यभ्निं प्रत्यहं तिलेङधेला सषटतं कल्माष? ब्राह्मणान्‌ .. 
भोजयित्वा दोप्ना्निभेवति । 





न ०. -१०५५-५.५--------- -ज ~~ ~ --=~ ~~~ 


१ 8 किचित्‌ । र 7 कु्माषम्‌ । 


(-#्मः छव्यरन करः! 


करभाषः? ईषत्‌ खिन्नमाषः ¦ ब्ाद्यणएभोजनमयपि प्रतिदिनम्‌ । 
माघप्रायन्याच्छिशिरन्तेकन्तव्यमयप्यवेव लिख्यते 
सम्न्तेः - 
इन्धनानि चयो दद्यात्‌ विप्रेभ्यः शिशिरागमे ¦ 
स सुखौ दौप्तकायाभिः सुभगस्ेव जायते ॥ 
शिशिरागमे शिशिरोपक्रमे अ्रन्न दानारमभो दानस्य मास- 
दयब्यापिलात्‌ । 
यमः- 
कृशरं भोजयित्वा तु खशया शिशिरे दिजान्‌ ¦ 
दौ प्राञ्निलमवभ्रोति खगेलोकञ्च गच्छति ॥ 
विष्णधक्नात्तरे- 
बहिः स््ानं नरः कला स्ुय्धस्यो दयनं प्रति । 
शिशिरे सततं ब्कि तपेयिल्ला तथा तिलैः ॥ 
करुमाषं सतं द्वा यथाग्र्या द्विजातिषु | 
कार्य्याचिदौक्तिः प्राकाश्य श्चुनाशच्च विन्दति 
शिभिरच्ूपक्रमे उदितमाचे खं यामाद्रदिजेला्ये सतालाग्नौ 
[ॐ प्रजापतये खाहेति ] तिलान्‌ इताः शद्धो ज्राह्मणएदारा होमं 
कारयिला टतसहितान्‌ खिन्नमाषान्‌ दद्यात्‌ । 
विष्णध्नात्तरे- 
इन्धनानां प्रदानेन शिशिरे स्यान्महाफलम्‌ ¦ 


१ 0 कुल्माघः। २ 1 चिदधितांशः पतितः। 


छल्यरनाकरः | 8८९ 


भविव्यपुराण- 
ग्नोतकाङेन्धनं दद्यान्नराणं श्यतनाश्रनम्‌ | 
भानोरायतने देव सौऽश्मेधफल लभेत्‌ । 
नरसिदपुराणएे- 
प्नौतकाले महाबद्कि प्रज्वालयति यो नरः| 
सव्वैषत्वहितार्याय खगे ञ्चाष्यरसुं लभेत्‌ ॥ 
एतज्ज्वालनमाचम्‌ । अतएव धाभ्बिकाः खानघडादिष्व्ि- 
मनुदिन प्रज्वालयन्ति । 
विष्एधन्बीत्तरे - 
शिशिर सकलं कालं ग्रास परगवे तथा) 
दत्वा खगेमवाप्नोति सम्बत्सर रतानि षट्‌ ॥ 
श्राग्रेयपुरार- 
हेमन्ते भिशिरे चेव पुणष्छा्चिं यः प्रयच्छति । 
सत्वेलो कप्रतापायं घुण्ठां गतिमवाम्रुयात्‌ ॥ 
पुण्यां बुण्छाथमचिम्‌ । 
यमः- 
प्रातःखञायौ च सततं दो मासो माघ-फाषब्रनो ; 
देवान्‌ पिन्‌ समभ्चच्ये सव्वेपापेः प्रमुच्यते ॥ 
विष्णः- 
प्रातःख्ायौ भवेनित्यं दौ मासौ माच-फास्शुनौ । 
यदौच्छेदिषुलान्‌ भोगान्‌ चन्द्रस्य पमान्‌ ॥ 
अच फलभेद द्विन्नम्‌लले सखिते यमवाक्यादनुवादानयेक्य- 
६२ 


8६८ कव्यरनाक्ररः 


प्सङ्गादवपिहढतर्पणसद्िनमेव सानं छतसुकल्येना शौ चेऽपि कन्तेवयम्‌ 
विष्एवाक्यबो चितस््ानच्चा श्न चपाते मल्जनमाचमेव विवकितिभिति 
केचित्‌ 
म्छपुराण- 
माकंण्डय उवाच- 
षष्टितोयेसहस्राणि षषितौ्थंशतानि च) 
माचे मासि गमिग्यन्ति गङ्मायमुनसदमे ॥ 
गवां अतमदखस्य सम्यग्दत्तस्य यत्‌ फलम्‌ । 
प्रयागे माघमासस्य च्यंदसानस्य तत्फन्तम्‌ । 
सितासिते तु च्नानं मावे मासि युधिष्ठिर ¦ 
न तस्य पुनराटन्तिः कल्यकोटटिश्रतैरपि ॥ 
 चत््नानं येषां च्ञानमिति तु प्रातःस्ानमनाद्‌ाचेव : 
भविव्यपुराण- 
माघमासे खसुद्यक्त स्तिसन्ध्य पूजयेद्र विम्‌ । 
लभेत्‌ षाएमासिक पुष्यं मासेनेव न संश्रयः ॥ 
यया माघे तयाषाटे मासमेकश्च कालिके) 
चिषु पुछं ममं न्य मासश्ष्ठेषु यत्कृतम्‌ ॥ 
मत्छपुराणे- 
माघे मास्येषमि रूानं छवा द्‌ान्पत्यमचवंयेत्‌ । 
पूजयिला यथाशक्ति माल्य-वस्त-विग्धषणेः ॥ 
ख््येलोके वसेत्‌ कल्यं खय्य्रतमिदं स्मृतम्‌ । 
रच व्रतसाचारणघर््मान्वयः ॥ 


छत्यरल्लाकरः | 8९ 


व्रतमधिद्छत्य- ओरौमहाभारते- 
माघन्त्‌, नियतो सासमे कभक्रन यः चपित्‌ : 
स ओ्मति कुल्ते जातो महत्वेनो पपद्यते ॥ 
यथा स्कन्द पुराण-- 
माघे मासे तु कुर्व्वाणः स्तियः प्राप्नोति वै शभः. 
कु्व्वाए एकभक्तमिव्यर्यान्वयः + ` 
भविच्धपुराणए- 
माघे रथञ्चाश्वयुतं दि यमाद्यविश्डषितम ' 
पेष्टभालुममायुक्तं छलाथतनमानयेन्‌ ॥ 
महारथो पञर्यानेः शे ताम्बर समन्वितैः 
वर्षायुतश्चत मागर सु््येलोके महोयते ॥ 
सर्व्वामराणणं लोकेषु प्राय कामान्‌ ययेषण्ठितान्‌ 
कमाद्‌ागत्य लोकेऽस्मिन्‌ ययेष्टं विन्दते पतिम्‌ ॥ 
मासव्यापकमेकभक्रादिकं कान्िकवन्नेयम्‌ । 
तचैव- 
माघे मारे तु सम्म्ाप्ते यः कुर्य्यान्नक्तभोजनम्‌ . 
पिन्याक टतसभ्िश्र भुच्ानः रुयतेद्धियः ॥ 
उपवासश्च सप्तम्यां भवेदुभयपन्चयोः । 
छतामिषेकं सप्तम्यां कुरय्याद्धानोनेराधिप ॥ 
गाञ्च दद्यादिनेश्ाय तरणो नोलसन्निभाम्‌ । 
गलादित्यपुर रभ्य सक्तं भोगान्‌ यथेख्ठितान्‌ ॥ 


$< २ कछल्यरनाक्ररः | 


अच नक्तभोजन मासब्यापि यपिष्याकस्िलकल्कःः नोल- 
सन्निभं इन्द्रनोलण्यामाम्‌ । 
तचेव- 
मघे मासे तु सम्माप्रे यः कुर्य्यान्नक्तभोजनम्‌ । 
छशर ठतसयुक्तं भुच्ानः संयतेद्धियः ॥ 
उपवाख्परोऽषटम्यां पचयोरभयोरपि । 
पूजयेदम्विकां भक्या कला गोधूमचूएेतः ॥ 
ष्दुर्गामष्टसुजां वोर चअभ्विकाभिति नामतः | 
म ॐ = १९ 
गन्धपुष्यो पद्धारस्तु व्व रक्तश्च प्जयेत्‌ ॥ 
धूपं छष्णागुरं दद्यात्‌ मासं दद्याच्च माहिषम्‌ ¦ 
धान्यसिद्धायेकाः खाने प्राश्नने च यवाः ताः ॥ 
य एव माघमासे तु पूजयेद्‌ सिकं नुप । 
दिव्यं विमानमार्ूदः दय्येलोके महोयते ॥ 
ब्रह्मुपुराणे- 
इषादि चयसंक्रान्तौ चण्डां शावत्तरायणे । 
च 
ब्रह्मलो कन्तु गच्छन्ति देवाः सव्वं सवासवाः ॥ 
तस्मान््ासचयन्तच प्रतिमाः ग्रेलसम्भवाः । 
प्राच्छाद्य ग्ट वस््राभ्यां तथा रच्छाश्च नित्यः ॥ 
> € >, [र £ 
युष्येवंस्लः सुवासश्च गरहोतव्याश्च सब्वेदा । 
पूञ्याः प्रतिदिन ताश्च बाद्यणाख् सुश्ोभनेः ॥ 


[1 यामा माजि ० = अ कयम क १ जत कका = 


९ ‰8 तरुजङ्खा मटभजां वोराम्बाभिति नामतः । 


चछव्यरने{कर्‌ः। 8८ द 


तपेणौयास्तया गावस्तिलेन लवणादिभिः\ । 
बह्धि नित्यञ्च प्रज्वाद्यो नर्णां कार्ययोऽप्निवद्धंनः ॥ 
षोऽ मकरः। गेलसम्भवाः पाषाणनिभ्बिताः। एतन्ोत्तराणे 
देयम्‌ । तदनु मासचरयञ्च परिपालनोयम्‌ । 
तथाचोक्तम्‌ तच 
मेषं जिगमिषौ स्थं शेशिरं एतकम्बलम्‌ । 
अपास्य देदहादवेभ्यः पूजा कार्या प्रयतः ॥ 
कालिकापुराएे- 
कनकं कुलिशं नौलं पद्मरागञ्च मौक्तिकम्‌ । 
एतानि पञ्चरन्नानि विन्यसेलिङ्गमृद्धेनि ॥ 
रन्नानाञ्चायभावे तु कष कर्षाद्धमेव वा| 
सुवणं योजयिल्ा तु तस्िन्धेवोन्नरायरे ॥ 
विधिवच्च तयाभ्यच्छे गबयेनाच्छेन श्रिणा । 
मरच्ास्य मदेयिला तु प्रदद्याद्‌ टतकम्बलम्‌ ॥ 
दद्याद्ोपसकर श्यो ्राद्यणान्‌ यतिभिः सह । 
सभोज्य दक्षयिल्ा तु कल्पयेदनिगरितम्‌ ॥ 
उपोग्य सब्वेमेवेतत्‌ क्याद्‌ भक्तिपुरःसरः । 
पञ्चगव्यं तिलक पौला वे पारयेत्‌ खयम्‌ ॥ 
तिलः ञानं प्रकुर्वौत तैरेवोदन्तेनं बुधः । 
देवतानां पिद्िणाञ्च उभाग्णं तपणन्तया ॥ 


१९ 3 खव णएाम्बुभिः 


४८४ 


दीद्यर् नाक्रः | 


होमं तेश्च प्रक्््वोत सब्वंरैवात्तरायण । 
तवे देवाय विप्रभ्यो हाटकेन समं ददेत्‌ । 
स्तदेव करोत्येवं चिन्न शम्भौ निवेश्व यः । 
उन्तराचणएमासाद्य नरः कस्मात्‌ ख प्रोचते -॥ 


कुलिशं हौरकं । दच्षयिला दङिणएया सम्यूज्य कल्पेत 


भोजनमिति शषः । पारयेत्‌ पारणं जर्य्यात्‌ । तिलललान- 
परयो्नांत् कमो विवकितः। उभाग्यामिति तादथ्ये चतुर्थौ । 


कम्ब लद्‌ानम्‌ ॥ 


भविय्ययुराणे- 


छष्णपच्चस्य पञ्चम्यां माघे मासि भवेच्च यः । 
्ादित्याभिसुशो ज्ञेधः श्ण चास्य परं विधिम्‌ ॥ 
छवेकभक्तं सूर्यस्य वारे चिपुरखूटन । 
प्रातःछ्चला ततः स्लान पूजयिता दिवाकरम्‌ ॥ 
श्रादित्याभिमुखल्तिषठेट्‌ यावदस्तमयं रवेः । 
जपमानो महाश्वेतां स्तम्भमाभित्य सुव्रत ॥ 
चतु हस्तं ग्टद्‌ च्छएमन्रणएञ्च समं घटम्‌ । 
रक्रचन्दनटचस्य कुम्भं कुर्य्याद्‌ गणाधिप ॥ 
तमाञ्ित्य महाबाहो भ्या देवं दिवाकरम्‌ 
पश्यमानो नपन्‌ श्वेतां तिष्ेद्‌ास्तमयं रवेः ॥ 
गन्धपुष्योयदहारेश्च पूजयित्वा दिवाकरम्‌ । 
ब्राह्मणे द्चिणां दत्वा ततो भुद्धोत वाग्यतः ॥ 
दत्यमेनन्त्‌ यः कुर्य्यात्‌ भास्करप्रौतये नरः । 


छव्यस्लाकरः | 8८५४५ 


भातुमांस्तख प्रोतः स्याह प्रौन्ख ददाति हि) 
घनं घान्यं, तथा युचनारोग्यं भागेवौँ नृप ` 
तस्मात्‌ सब्यूजयेन्त गोव्वाणाधिपतिं हरिम्‌ ॥ 
भागेवो लच्छ्ौः । दरिः सुय्यैः । 
दत्यारिव्याभिमुखविधिः ॥ 
ब्रह्मपुराणे- 
छृष्णाष्टम्यान्त्‌ माघस्य मासश्राद्ध मह! फलम्‌ । 
पिभिः प्राधितं पृष्व तस्मान्न्तच कारयेत्‌ ॥ 
एतच्च सव्वेशराखिषाघारणम्‌ विभिव्य बोधकविर्‌ हात्‌ । 
विष्णः- 
पौष्यं समतोतायां कष्णपचद्ादण्यां सोपवास्तिले 
ातस्िलोद्कं दत्वा वासुदेवमभ्यच्ये तानेव इला द्वा 
भुक्ता च सव्वेपापेभ्वः पूतो भवति । 
यमः- 
माघान्धकारद्वादश्यां तिलेङ्धला इताग्रनम्‌ ; 
तिलान्‌ दच्ेव विप्रेभ्यः सव्ब॑पायैः प्रमुच्यते ॥ 
कूषोषुराणे- | 
माघमासे तमिस तु दादश्यां समुपोषितः, 
शरज्ञाम्बरधरः हृष्टे स्तिले्खला डता शनम्‌ ॥ 
प्रदद्याद्गाह्मणेभ्यस्त तिलानेव समादितः । 
जन्मम्रश्ति चत्पाप सव्यैन्तरति वे दविज ॥ 


४९६ छत्यर्नाकरः। 


ब्रह्यपु राणे- 
माघे छष्णद्ाद ञ्च यमोऽपि भगवान्‌ पुरा । 
तिलानुत्पादयामास तपः कला सुदासम्‌ ॥ 
राजा दशरथो ग्रमो तस्ात्तानावतारयत्‌ । 
तिखानामाधिपत्ये तु विष्णस्तच छतः सुरः ॥ 
तस्यासुपोषितः खा तस्तिलेस्तस्मा दयजेद्धरिम्‌ । 
विलतेलेन दौपाश्च देया देवण्टहेश्वपि ॥ 
निबेदये्तिलानेव होतव्याश्च तिलास्तया । 
तिलान्‌ दद्याच्च विप्रेभ्यो भच्येच् तथा तिलान्‌ ॥ 

द्दन्त्‌ गदपालङृव्यमसु चये माघरृत्योपषंहारे दादश्छां 

तिलद्वाद शौ त्रतभिति त्रतरूपतयो पसहतम्‌ । कल्यतरू-पारिजाता- 
दिषु नेयतकालिके लिखितमिति भावनौचम्‌ । 

तेव- 
माघे छष्एचतुदश्यां विष्ोदं हान्मरोचयः । 
निश्खंरुस्तिलकाकाराः श्रतश्योऽथ सदखग्रः । 
सुघ्रस्य भो गिश्यने योगनिद्धागतस्य च । 
उदानपवनो (ड्‌)दूता रोमकूपेषु स्वसु ॥ 
तारणाद्यो मिसुख्यानां भिन्ने वेकारिके सति । 
विनाशिन्यः श्रोरे ताः भिद्धाः खुद्छलमागताः ॥ 
तिलकाकृतयो जाताः सखिताख सुघात्मनः । 
तारकास्त॒ महाघोरात्‌ संसार गहनाणेवात्‌ ॥ 
तर तिः स्वने घातुस्तस्मत्ताखां निगद्यते । 


छ्रव्यरल्ाक्रः। ४८ ~ 


श्रनक्ताभ्यदिते काले सत्स (?) तारांशररके प्रनिः ॥ 
श्निः गनेश्चरः -परज्य दुत्य्ैः | 
राजा च तच्च र्यूज्यो यमः प्रल्यभाखरः 
सव्वाङ्गमेन्तिब्धता नद्यो दिष्णोख्च तत्र च ॥ 
्ररुणोद यवेललायां वा रटन्यपिः नित्यशः । 
नियुक्ता विष्णना सर्व्वाः कस्य पापं पुनोमहे ॥ 
निभित्त पञ्चता वेदं तत्र प्रोक्तं यतो भुवि) 
तदासातु निश्रा द्धेया ताराधाचौ सुदारुष्ण ॥ 
तच्रोपोय्य त्रयोदश्यां सम्प्राप्ते तु निशाच्ये। 
वितस्ताखं विग्रोकायां इन्द्रवत्यामयापिवा ॥ 
तथा इषेपथायाच्च चिनद्यां वा यथाक्रमम्‌ । 
सिन्धौ नरकवादिन्यां तौयेच्ठन्येषु तच वा ॥ 
साला पच्छो जगद्धन्ता हरिः प्ज्याश्च तारकाः । 
यमो नद्यश्च तोर्यानि देवताः पितरस्तथा ॥ 
शेः पुष्यता चूपेद्‌\पमाच्े्िलेपनेः । 
नेवेये विविधाकारैः छएशरेण तु श्दरिणा ॥ 
वद्धिः पएज्यश्च भगवान्‌ ताके स्तिलितण्ड्लेः , 
नमःप्रणतसंयुक्तान्‌ सतिलः जलाञ्जल्येन्‌ ॥ 
यमाय सप्र वितःत्‌ धम्राजाय म्न च। 
म्दत्यवे सप्र देयाश्च तया मप्नाऽन्तकाय च ॥ 


१ 7 वरार्न्नि। 


{| 
९ 


(४4 - व्मद्छस्नाकरः | 


वेवसखताय सष्टान्याः जघ्न काल्ाच चेव हि। 
सप्र देयाश्‌ विधितत्‌ सब्यप्रारदहराय च ॥ 
नशर भो जनो दाश्च जाद्युष्स्तद नन्तरम्‌ । 
राद्धं छता पिदभ्यश्च विसूुक्रः सब्देपातकेः । 
ततो चिभव्य बन्धुभ्यः छश्चर भचयेत्‌ खयम्‌ ॥ 
ताराराचित्रतम्‌ ॥ 
तचरेव-- 
श्रमावास्यायां सवरं रक्ोघ्नं देव्णवं द्‌ । 
तदा पिदहभ्यः आ्द्धन्त्‌ द म्‌ मवति चदाच्चयम्‌ ॥ 
रचोघ्र आद्धमित्यन्वयः अमावाव्यायां रोपर आद्भमिति 
छंत्यस सुद्चयो पसंदहारात्‌ । 
शिष्टाः 
माघे प्दक्तादितौयायां कन्यका स्दरायिनने | 
प्रातः खालाऽचैयेद्धोरौः एुष्यनेतेद्यचन्दनेः । 
मव्यपुराणे , 
माघे मासेऽय चेच वा रड़्धेनुप्रदो भवेत्‌ । 
ंडन्तस्ततौयायां गौरो लोके मोचते ॥ 
ग॒डत्रतो गड़मातच्ा श्नः । 
भ विष्ययुराणे- 
माघे मासि दतोयायां गुडस्य रूवणएस्य च 
दानं भरेधस्करं राजन्‌ नारौषां पुरुषस्य च , 
डन तुग्यते देवौ लवणेन खथयंभुवः । 





मव्छपुराणे- श्वर उवाद- 
अन्यामपि .प्रवच्छाष्मि ठतैयां पापन्यमशिनोम्‌ । 
रखकन््ाशिगैरनां पुरा कल्यविद्र विदुः ॥ 
माघे मामि लु ख्श्रष्य हतौखां श्टक्रपच्तः : 
आतगेव्येन पयखा ल्लः दान समाचरेत्‌ । 
खापयेन्धना देवँ तथेधद्रदेन तु । 
गन्धोदकेन म्ना पूजनं कुद्ुसेन पै ; 
दकििणाङ्गानि सम्ूज्य ततो वामानि पूजयेत्‌ । 
ललिताये नमो देव्याः पदौ युद्फौ तयारयेत्‌ । 
जङ्घं जानु तथेग्रान्ये तया चारुश्चियेः नमः । 
मद्‌ालसाये त कटि अमलाये तयोत्तरम्‌ ! 
स्तनं वट नवामिन्ये कुसुःयै च कन्धराम्‌ | 
४ * ॐ, २ क 
सुज सुजा माधय कमलायं सुखस्मिते । 
रमुद्कुटं विश्ववामिन्ये शरः कान्तये तयाऽयेत्‌ । 
भूललारञ्च रुद्राण्टे श्ङ्राये तथालकान्‌ 
> 1१ © 
मदनाये ललाटन्तु मोदनाये युनभ्ृवौ । 
क £ ० [८ * 
नेच चन्द्राद्ुधारिश्यं तष्य च वद्नं नमः| 
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उत्कण्डिन्यं नमः कण्ठमसटताये नमः स्तने । 
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रम्भाय वामवाङ्कञ्च विशोकाय नमः करिम्‌ । 
# प [८१ 
इदय मन्दगाभिन्ये पाटलनाये तयोद्रम्‌ । 


९ & जङ्गुः जान्‌ । २ 7 'उरुत्रिये। 
2 + 2 पम्कंद्वये पंक्तिनास्ति। 


१०० सि्यर्लाक्ररः। 


कटिं सुरतदासिन्ये तयोर्‌ चभ्यकञ्चिधे | 
जानुजङ्गः नमो गोषः गुल्फ मायके नमः ॥ 
धराघराये पार्दन्त्‌ विश्वकाये नमः शिरः, 
नमो भयान्ये कामिन्ये कामटेय्ये जगज्िध। 
आनन्दाय अनन्दाये सभद्राये नमो नमः ॥ 
नमो भवान्य इत्यादिश्चोकशय परगोत्तरकालम्‌ पाठः गौर्ये 
खादेति उ ठतदहटोमः सामान्यप्राप्नः ' दति पारल्यदः। 
एवं सम्यूज्य विधिवत्‌ दिजद्‌ाम्पत्यम्ेयेत्‌ ! 
भोजयिलान्नपानेन मधुरेण विमत्सरः ॥ 
सलक वारिज्घग्भ श्टक्ताम्बरयुग्द्रयम्‌ । 
द्त्वा सुकककमलं मन्धमाच्छेरयाच्चयेत्‌ ॥ 
म्रौयतामच क्रुञुरा गो याल्ञवणन्नतम्‌ । 
लव्र गादित्रतमित्यथेः । 
अनेन विधिना देवों मासि माणि सदाचयेत्‌ : 
लवणं वजेयेन्माघे फालाने च गुड़ं पुनः । 
तवराजन्तथा चेतरे वच्यंञ्च मधु माधवे । 
तवराजः ओौतष्ाकर्‌ इति प्रभिद्भूः। 
पानकं च्येष्ठमासे च तथाषाढे च जौरकम्‌ । 
श्रावणे वजेयेत्‌ चौर दयि भाद्रपदे तया! 
छतमाश्वयुजे तददूजं वर््याऽय माजिता , 
माजिता रसाला, मा च वेदक | 


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१९ मूले गावद्ये घुटिके नमः। २ 8 तेल राखिस्‌ । 


म णक ० 





छ्व्यर्‌ल्लाक्छरः | ५.०२. 


श्रदधडिकन्त्व चिरपब्धुषितसख दन्न: 
खण्डन षोड पलानि ग्गिप्रभखय । 
सपिःपलं मधुपक मरोचादधैकषे 
ष्रएयाम्तथा दिपलमद्धपरं दिपस्य ॥ 
छवा ऽग्एकेऽतिविमले शदुपाखिषष्टा 
कपूर गन्धसुरभिनंवभाण्डसस्ा ) 
एषा जिभागसडिता ररिता रसाला 
या सेदिता भगवता मधुष्दनेन ॥ 
श्रस्याः छतिग्रक्रिया। असम्यक्‌ (क्तप्)त्यन्प्रहतिमधुररसस्य नाय- 
मानसुरसस्य सम्यग्जातम्य दघ्नः पललम्‌ ई४ श्रटद्धष्ठण्डपलम्‌ १६ 
इतपलम्‌ ९ मधुपलम्‌ १ मरो चचूणेसमा ८ भ्रष्ठ चएं पलम्‌ ९ 
नागकेसरगुण्डाचणंम्‌ तोकम्‌ ४ । एतेत्‌ सव्ये इरक्ञद्धच्छवस्ते 
डला हस्तेन खद्‌ ष्टा नूतनष्धएसयपात सखाणम्‌ । 
ततस्तत्र कापूरलावौ जपन्नकगुड्त्वच एतेषां चै यावता 
` सौ गन्ध, भवति तावन्मानं देयम्‌ । एतन्मानात॒ मारेण खस्पमाने- 
नास्याः कल्पना करण्णेयेति । 
श्रयं रमालापदासा राला शिखरिण्मेति याकुन्दैतानु- 
मोदितः कन्त्यतरकृतेति नेयम्‌ ) 
धान्यकं मागेजो्षे तु पौषे वच्याय शकरा, 
व्रतान्ते करक पूणंभेतेषां मासि मासि च॥ 
दद्यादिकालवेलायां भच्छपारेण संयुतम्‌ । 
वतान्ते करकमित्यादि एतेषां लवणगुड़ादोनां मध्ये यस्िग 


४०२ छत्यश्न्नाकरः ¦ 


मासे सत्‌ त्यक्तं तन्द्रासत्रतान्ते तेन रूवणदिना पूणं करकं 
वच्छम एल्‌ कादिभच्छपा त्युक्तं विकाले दद्यादिव्ययेः 
लङ्ककान्‌ खतवर््तौञ्च सुयावमय पूरिकाः ॥ , 
धारिका छतपरणाश्च पिष्टा प्रपाश्च मण्डकान्‌ । 
चौरशाकच्च द्ध्यन्नमण्डञ्चा\श्नो कव्तिकाः ॥ 
माघादिक्रमशो दवादेतानि करकोपरि 
चारिका पक्घान्नविश्रेषः। घारोति प्रसिद्धः । 
अरगरोकवत्तिकामपि पक्रालविग्रेषमिच्छन्ति । 
कुमुदा माधवो गौरौ रम्भा भद्रा जया शिवा, 
उभा रतिः सतौ तद्न्मद्गला रतिलालसा ॥ 
करमान््ाघादिषु तन्न परौचतामिति कौततयेत्‌ । 
मब्वेच पञ्चगव्येन प्राशनं ससुदादइतम्‌ ॥ 
उपवासो भवेन्नित्यमश्नक्तौ नक्रभिच्धते । 
पनर्माघे तु सम्प्राप श्रकंरा करकोपरि ॥ 
छला तु काञ्चनीं गौरे पञ्चरनसमन्िताम्‌ ! 
डेमो ङ्गम चाच्च साच्च कमण्डलम्‌ ॥ 
चतुभुंजाभिन्दुयुतां सितनेत्पटाद्ताम्‌ । 
तदद्ञो मिथुनं श्ुकञं सुवर्णास्यं सितान्वरम्‌ । 
मवस्तं भाजनं दद्या्व्रानो म्रोयताभिति। 
अनेन विधिना यस्तु रसकन्या णिनौत्रतम्‌ । 
कुर्य्यात्‌ ख सव्वेपापेभ्यस्तत्षणादेव सुच्यते 


४४ पवकः सः ५, [2 8 स ` 1 =-= = ^ जयन जन मोक जामा ३५ क 
त कनन 


१ 7 इनोर्थ्था | 


स यन् निकरः । ५.०२ 


भवाच्छतस खनत न द्‌ःख जायते कचित्‌ । 
अथिष्टोमसदहसेण यत्‌ फलं तद वाभ्रुयात्‌ । 
नारौ वा र्ते वापि कुमारौ च दरानने। 
विधवप्वा वराकै वा मापि तत्‌फलभाग्‌ भवेत्‌ , 
मो माग्धारोग्धमम्यन्ना मौरोौलोके महयौयते । 
दति रम्कन्ाणिनोत्रतम्‌ ॥ 
दूर्गाधिकारे देवौपुराणम्‌ ; 
चतु्थों माघमास देवोप्रजा विधौयते | 
` ब्र्धापुराणे । 
उमाचतुष्यै माच ल्‌ श्रक्ञायां योगिनोगकेः । 
अर्थैः पुष्यैम्तथा धृर्टोपेवेलिभिरेव च , 
प्राक्‌ पूजयिला ष्टा च श्यः खाङ्गङ्गनेगेणेः ; 
कल्यतरौ प्रागमश्चयिलेति परटितम्‌ ) भ्रः पुष्पेरित्यादि- 
श्रो काद्ध न लिखितम्‌ । 
सहिताः सष्धजु्य॑खान्तस्मात्‌ प्रोक्रा यमा सतो ॥ 
तम्भात्‌ खा तच सम्पूज्या नरः स्तौ भिविगेषतः ¦ 
कन्द पुष्यः पयते मम्यक्‌ भावात्‌ ममादितेः ॥ 
कुङुमारूक्तकाग्धःश रक्रद्धयेः सकङ्ेः । 
अेधपेम्तया द्यः पुष्येलिभिरेव च ॥ 
गडाद्रं काभ्वां पयमा वणेनाथ यावक्रैः । 
पज्याः स्तियश विचत्राम्त्या विप्राश्च गोधनाः } 
सोभाग्यदद्धये पञ्च ?इ क्रव्य बन्धुभिः सद ॥ 
इति गौरौपूजा ॥ 


५०९ छ्यरनाक्ररः। 


श्िष्टाः- 
माधे मासि चतूर्थ्यान्त दरमाराष्य च शियः । 
पञ्चम्यां कुन्दकुसुमैः पूजा कार सम्टद्धूये ॥ 
वरो विनायकः । लोके वरचलुर्यो ्रौपञ्चमो चु मरखिद्धा। 
भदिष्यपुराणे। श्रादित्य उवाच ¦ 
माघे मासि तु श्क्तायां सप्तम्यां समुपोषितः । 
यः पूजयेत्‌ पुमान्‌ भक्तया तस्याहं पुचतां व्रजे ॥ 
एवञ्चोभयसप्तम्यां मामि मासि सुरोत्तम 
यस्तु मां पूजयेद्धव्य खमेकमेकमादरात्‌ ॥ 
सखमेकं सम्ब्छरम्‌ । तथा च तेत्तिरोयन्राह्मणएश्रुतिः , खमेक 
दत्याहइ सम्बरो वे खमेक दति वक्षारसदहित म्काराटि- 
खाय शब्दः । 
प्रयच्छामि सुतं तस्य श्रत्यनो द्यशसम्भवम्‌ । 
विन्त यश्रस्तया पुचमारोग्यं परमं तथा ॥ 
माघमासे तु यो ब्रह्मन्‌ शक्तपक्ते जितेद्ियः । 
पाषण्डान्‌ पतितान्‌ नग्नान्‌ जल्यानविजितेद्धियः ॥ 
उपोय्य विधितत्‌ षष्ठयां श्रेतमान्धविलेपनेः, । 
पूनयिला तु मां क्या निभि शमौ खपेदुधः ॥